राजनीतिक चश्मे से देखता है मीडिया
   दिनांक 31-अगस्त-2018
मुख्यधारा मीडिया को बंगाल में दुर्गा पूजा पर राज्य सरकार की पाबंदियां नहीं दिखतीं, पर भाजपा अध्यक्ष जब रैली में यह मुद्दा उठाते हैं तो उसे वह ‘हिंदू कार्ड’ दिखता है
सामयिक मुद्दों पर मीडिया के रुख और रुखाई की परतें खंगालता यह स्तंभ समर्पित है विश्व के पहले पत्रकार कहे जाने वाले देवर्षि नारद के नाम। मीडिया में वरिष्ठ पदों पर बैठे, भीतर तक की खबर रखने वाले पत्रकार इस स्तंभ के लिए अज्ञात रहकर योगदान करते हैं और इसके बदले उन्हें किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता।
मुख्यधारा मीडिया ने बीते कुछ साल में गोतस्करों के पक्ष में जो माहौल बनाया, उसके नतीजे सामने आने लगे हैं। उत्तर प्रदेश के औरैया में एक मंदिर में दो पुजारियों की हत्या कर दी गई और एक को गंभीर रूप से घायल कर दिया गया। क्योंकि वे गोवध का विरोध करते थे। महाराष्ट्र में पुणे के पास गोमांस ले जा रही एक गाड़ी को पुलिस वालों ने रोकने की कोशिश की तो तस्करों ने उन पर गाड़ी चढ़ा दी। आएदिन देश के अलग-अलग इलाकों में ऐसी घटनाएं हो रही हैं। दरअसल, मीडिया ने गोरक्षकों की कथित हिंसा के नाम पर जो झूठ खड़ा किया है, उससे गोतस्करों के हौसले बुलंद हैं। उन्हें भरोसा है कि पकड़े गए तो मीडिया साथ देगा। औरैया या पुणे मामलों को चैनलों पर लगभग जगह नहीं मिली। बस एकाध अखबार ने अंदर के पन्नों पर छापा। 
देशद्रोह के आरोपी उमर खालिद पर दिल्ली के कांस्टिट्यूशन क्लब के पास ‘हमले’ की खबर आई। आमतौर पर ऐसी किसी घटना को मीडिया में आने में 5-10 मिनट लगते हैं, पर द क्विंट वेबसाइट ने लगभग उसी समय विस्तार से ‘हमले’ की सूचना दी। समझना मुश्किल था कि हमला पहले हुआ या हमले की खबर पहले आई। कुछ चैनलों ने ऐसे दिखाया मानो देश के बहुत बड़े नेता पर हमला हुआ हो। यह घटना पुलिस की जांच का विषय है, पर इसे लेकर मीडिया के एक वर्ग की भूमिका संदेहास्पद है।
चीन के किसी अखबार में ‘सूत्रों के आधार’ पर एक खबर छपी, जिसमें दावा किया गया कि भारतीय मुद्रा चीन में छपवाई जा रही है। योजनाबद्ध तरीके से कुछ ही देर में देश के तमाम मीडिया समूहों ने इस ‘दावे’ को सच मानते हुए सरकार को कोसना शुरू कर दिया। सरकार व रिजर्व बैंक ने औपचारिक बयान जारी कर इसका खंडन भी किया, लेकिन मीडिया के इस वर्ग को सरकार के खंडन से ज्यादा चीन के अखबार के ‘सूत्र’ पर भरोसा था। देर शाम तक यह फर्जी खबर वेबसाइट से लेकर चैनलों पर तैरती रही। बंगाल में अमित शाह की रैली का कई स्थानीय चैनलों ने ‘ब्लैकआउट’ किया। ऐसा ममता सरकार के दबाव में किया गया होगा। पर लोकतंत्र की चिंता में दुबले होने वालों को कोई दिक्कत नहीं हुई। बंगाल सरकार हर साल दुर्गा पूजा पर पाबंदियां लगाती है, तब मीडिया उसकी खबर नहीं दिखाता, पर भाजपा अध्यक्ष ने रैली में जब यह मुद्दा उठाया तो ‘आजतक’ चैनल ने इसे ‘हिंदू कार्ड खेलना’ करार दिया।
जब ‘टाइम्स नाऊ’ की पत्रकार को गला काटने की धमकी मिली तो मीडिया की आजादी की बात करने वाले गायब हो गए। इसी महिला पत्रकार ने ‘हिंदू आतंकवाद’ की कांग्रेसी साजिश का पदार्फाश करने वाले गृह मंत्रालय के अधिकारी आर.वी.एस. मणि का इंटरव्यू किया था। तथाकथित बड़े पत्रकार या मीडिया संस्थान ने धमकी के विरोध में एक शब्द नहीं कहा। कुछ माह पहले मेरठ के गांव में दलितों को मंदिर में प्रवेश नहीं देने की खबर मीडिया में खूब छाई थी। दावा था कि दलितों ने कन्वर्जन की धमकी दी है। कुछ दिन पहले इसी मंदिर में गांव की सभी जातियों के लोगों ने मिलकर हवन-पूजन किया। ‘स्वराज्य’ पत्रिका ने इसकी जमीनी रिपोर्ट दी। पहली बार सच्चाई सामने आई कि मीडिया के एक वर्ग ने हिंदू समाज को तोड़ने के उद्देश्य से वह खबर फैलाई थी। बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ आश्रय गृहों में यौन शोषण की त्रासदीपूर्ण घटना को भी मीडिया राजनीति के चश्मे से देख रहा है। मऊ में एक मदरसे में बच्चियों के सामूहिक यौन शोषण की खबर की अनदेखी की गई। कर्नाटक सरकार के शपथग्रहण में पहुंचे नेताओं के होटल खर्च की सूचना सार्वजनिक हो गई। पता चला कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कमरे में 80,000 रुपये की शराब मंगाई गई थी। सोशल मीडिया पर हंगामा मचा, पर दिल्ली की मीडिया के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। होटल में हुई कथित शराब पार्टी में एक ‘क्रांतिकारी चैनल’ का पत्रकार भी था। मुख्यमंत्री के कमरे में’ बैठकर हो रही यह शराबखोरी किस तरह की पत्रकारिता को जन्म देगी?