Panchjanya - कौन हैं ये 40 लाख? ऐसा ही रहा तो हिंदू हो जाएंगे अल्पसंख्यक कौन हैं ये 40 लाख? ऐसा ही रहा तो हिंदू हो जाएंगे अल्पसंख्यक
कौन हैं ये 40 लाख? ऐसा ही रहा तो हिंदू हो जाएंगे अल्पसंख्यक
   दिनांक 04-अगस्त-2018
असम में जारी दूसरी और अंतिम राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर सूची में 40 लाख संदिग्धों के नाम नहीं हैं। अब चर्चा इस बात को लेकर है कि जिन ‘घुसपैठियों’ की पहचान हो गई है, उनका क्या किया जाएगा? असम के मूल निवासी तो लंबे समय से इन्हें राज्य से बाहर करने की मांग करते रहे हैं
उपमन्यु हजारिका

असम में 30 जुलाई को राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) की दूसरी और अंतिम मसौदा सूची जारी हुई, जिसमें 40 लाख लोग एक झटके में बाहर हो गए। हालांकि यह आंकड़ा घुसपैठियों की अनुमानित संख्या से कम है। 14 जुलाई, 2004 को संसद में एक सवाल के जवाब में तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा था कि भारत में मौजूद कुल 1.2 करोड़ घुसपैठियों में से 50 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए असम में हैं। यह संख्या घुसपैठियों की कुल आबादी का 40 प्रतिशत है। 16 नवंबर, 2016 को गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू द्वारा संसद में दिए बयान के मुताबिक, देश में 2 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिए थे। हालांकि उन्होंने असम का कोई आंकड़ा नहीं दिया, लेकिन पुराने आंकड़ों के आधार पर इनकी अनुमानित संख्या 80 लाख हो सकती है।
एनआरसी के मसौदे में घुसपैठियों का यह आंकड़ा आधिकारिक अनुमान से काफी कम है। एक तथ्य यह भी है कि ये लोग 25 मार्च, 1971 को आए। पाकिस्तान या बांग्लादेश से आए लोगों को भारतीय नागरिकता देने के लिए निर्दिष्ट तिथि 19 जुलाई, 1948 है यानी इस तिथि को भारत पहुंचे लोगों को नागरिकता दी गई है। इसके विपरीत, 15 मार्च, 1985 के असम समझौते के तहत राज्य में पाकिस्तान या बांग्लादेश से आए लोगों को नागरिकता 25 मार्च, 1971 को दी गई। मतलब यह कि असम ने घुसपैठियों को नागरिकता देकर अतिरिक्त 23 वर्षों तक बोझ उठाया। ऐसा बोझ देश के किसी दूसरे राज्य पर नहीं है। बांग्लादेशी घुसपैठियों में अधिकांश मुसलमान हैं।
वैसे तो असम और उत्तर पूर्व में अवैध घुसपैठ स्वतंत्रता पूर्व से होती आयी है। स्वतंत्रता से पहले असम की सीमाएं पूर्वी बंगाल के साथ लगती थीं, जो अब एक स्वतंत्र राष्ट्र बांग्लादेश बन गया है। दोनों क्षेत्रों के बीच भौगोलिक निकटता को मुस्लिम लीग ने अपने प्रभाव विस्तार के अवसर के रूप में देखा और असम में खेतिहर मुसलमानों की घुसपैठ को बढ़ावा देकर उनका शोषण किया। तत्कालीन जनगणना अधीक्षक सीएस मुलन ने इस पर गौर किया। 1931 की जनगणना रिपोर्ट में उन्होंने कहा, ‘‘संभवत: पिछले 25 वर्षों के दौरान प्रांत में यह सबसे महत्वपूर्ण एक घटना है, जो स्थायी रूप से असम के पूरे भविष्य को बदल सकती है। इसके अलावा, असमिया संस्कृति एवं सभ्यता की पूरी संरचना को नष्ट करने के लिए पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के जिलों से झुंड के झुंड जमीन कब्जाने वाले घुसपैठियों ने धावा बोला है, जिनमें अधिकांश मुसलमान हैं। ... जहां शव होंगे, वहां गिद्ध इकट्ठे हो ही जाएंगे।’’ आजादी के पहले असम का एक भी जिला मुस्लिम बहुल नहीं था, पर आज आधिकारिक तौर पर 27 में से 9 जिले मुस्लिम बहुल हैं और दूसरे जिले भी इसी राह पर हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा है कि ऐसे घुसपैठियों के खिलाफ तमाम विशिष्ट अधिनियमों व कानूनों के बावजूद छिद्रित सीमाओं के साथ मजहब परस्त व राजनीतिक तत्वों ने घुसपैठ को बढ़ावा दिया और इसे आसान बना दिया। देश के अन्य भागों के मुकाबले असम में मुस्लिम आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
हिन्दू घटे, मुसलमान बढ़े
असम में 1971 में हिंदुओं की आबादी 72.5 प्रतिशत थी जो 2001 में घटकर 64.9 प्रतिशत और 2011 में 61.46 प्रतिशत रह गई। वहीं, 1971 में मुस्लिम आबादी 24.56 प्रतिशत थी, जो 2001 में बढ़कर 30.9 प्रतिशत और 2011 में 34.22 प्रतिशत हो गई। राज्य में 30 वर्षों के दौरान मुस्लिम आबादी में 6.39 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि हिंदुओं की आबादी में 7.2 प्रतिशत की कमी आई। दरअसल, 1901 से जनसांख्यिकीय चलन में उग्र परिवर्तन आया है। 1901 में केवल 2 जिलों गोलपाड़ा और कछार में मुस्लिम आबादी क्रमश: 27.79 प्रतिशत व 30.5 प्रतिशत थी। 1951 तक असम का कोई भी जिला मुस्लिम बहुल नहीं था। केवल गोलपाड़ा जिले में मुस्लिम आबादी 42.94 प्रतिशत थी। लेकिन 50 साल बाद 2001 में 23 में से 6 जिले मुस्लिम बहुल हो गए। बेशक, 1951 के आंकड़े अविभाजित जिलों के हैं, जो विभाजन और उपविभाजन के बाद बढ़कर 27 जिले हो गए।
वैसे तो 1971 से 2001 के दौरान राज्य के सभी जिलों में मुसलमानों की आबादी बढ़ी, पर 9 जिलों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। दिलचस्प बात यह है कि 1951 और 1971 के बीच मुस्लिम आबादी लगभग स्थिर रही। लेकिन 2001-2011 के बीच इसमें 3.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि हिंदुओं की आबादी 3.4 प्रतिशत घटी। खासतौर से सीमावर्ती जिले नगांव और मोरीगांव में मुस्लिम आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 1985 के असम समझौते के तहत, 1971 के बाद आए घुसपैठियों को निर्वासित किया जाना था। वहीं, 1971 से 2001 के बीच धुबरी में हिंदुओं की आबादी में 10 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई। 1971 में जिले में हिंदू आबादी 34.5 प्रतिशत थी, जो 2001 में घटकर 24.7 प्रतिशत और 2011 में 19.9 प्रतिशत रह गई। इसके विपरीत, मुस्लिम आबादी 64.5 प्रतिशत से बढ़कर 74.3 प्रतिशत और 2011 में 79.6 प्रतिशत हो गई। 1971 में 50.1 प्रतिशत और 51.1 प्रतिशत आबादी के साथ क्रमश: गोलपाड़ा और बरपेटा हिंदू बहुल क्षेत्र थे, जो 2001 में क्रमश: 38.2 प्रतिशत और 40.2 प्रतिशत रह गई। वहीं, 2001 में गोलपाड़ा में मुस्लिम आबादी 54 प्रतिशत और बरपेटा में 59 प्रतिशत थी, जो 2011 में क्रमश: 62.44 प्रतिशत और 70.80 प्रतिशत हो गई। मोरीगांव, नगांव और करीमगंज में हिंदू आबादी में 5 प्रतिशत से अधिक की कमी आई, वहीं दारंग जिले में 2011 में मुस्लिमों की आबादी में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई। उनकी आबादी 23.9 से 35.5 प्रतिशत बढ़ी और फिर 64.34 प्रतिशत हो गई।
एनआरसी की जरूरत इसलिए
असम समझौते के उपबंध 5.8 के अनुसार, 25 मार्च, 1971 के बाद असम में आने वाले विदेशियों की पहचान और उनके निर्वासन की जिम्मेदारी राज्य और केंद्र सरकार की थी। दरअसल, विदेशी अधिनियम के तहत राज्य या किसी अन्य व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह विदेशियों के खिलाफ कार्रवाई करे। इसके लिए किसी समझौते की जरूरत नहीं है, पर इसका पालन नहीं किया गया। 1971 के बाद अब तक 3,000 से भी कम बांग्लादेशी घुसपैठियों को उनके देश भेजा गया।
घुसपैठियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने का प्राथमिक कारण यह था कि 1983 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने आईएमडीटी अधिनियम लागू किया। इस कानून के जरिए शिकायतकर्ता पर यह साबित करने की बाध्यता थोप दी गई कि वही सिद्ध करे कि जिसके खिलाफ शिकायत की गई वह विदेशी है या नहीं। इस कानून को केवल असम में लागू किया गया, जबकि देश के अन्य हिस्सों के लिए अलग व्यवस्था की गई। लिहाजा, किसी भी शिकायतकर्ता के लिए संदिग्ध विदेशियों के बारे में दस्तावेज पेश करना असंभव था। इसका परिणाम यह हुआ कि 1983 से 2005 तक, जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय ने आईएमडीटी अधिनियम को दरकिनार नहीं कर दिया, केवल 1489 विदेशियों की ही पहचान और उनका निर्वासन किया जा सका। इसके बाद 2005 में संप्रग सरकार ने एनआरसी की प्रक्रिया शुरू की। 2010 में पायलट परियोजना के तहत बरपेटा जिले में एनआरसी पायलट परियोजना की शुरुआत हुई। लेकिन एएएमएसयू, एआईयूडीएफ व कांग्रेस ने इसका विरोध किया, हिंसक प्रदर्शन हुए। 21 जुलाई, 2010 को प्रदर्शनकारियों ने बरपेटा में मजिस्ट्रेट कार्यालय को जला दिया। इसके बाद इस पायलट परियोजना को रोक दिया गया। डीसी कार्यालय पर हमले के दौरान पुलिस कार्रवाई में घायल और मारे गए लोगों के परिजनों को मुआवजा भी देना पड़ा था।
सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार, 132 लोगों को मुआवजा दिया गया, जिनमें 98 विदेशी थे। इन विदेशियों या इनके माता-पिता के नाम 1971 की मतदाता सूची में नहीं थे। आज तक उन उपद्रवियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद, सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल हुई, जिस पर अदालत ने 2012 से एनआरसी प्रक्रिया की निगरानी की। सर्वोच्च न्यायालय की सीधी देखरेख और सजगता के कारण ही इस प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा सका।
क्या होगा घुसपैठियों का?
एनआरसी की मसौदा सूची में जिन लोगों के नाम नहीं हैं, वे 28 सितंबर, 2018 तक इस बाबत गठित विदेशी न्यायाधिकरण के समक्ष अपने दावे और आपत्तियां दर्ज करा सकेंगे। उन्हें उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का अधिकार भी होगा। इससे तो प्रक्रिया लंबी हो जाएगी। स्थानीय लोग लंबे समय से उनका विरोध कर रहे हैं, पर घुसपैठियों की लॉबी काफी शक्तिशाली है, जो इनकी सुरक्षा के हर उपाय करती रही है। ये घुसपैठिए विभिन्न पार्टियों के वोटबैंक हैं। चूंकि ये मुसलमान हैं, इसलिए इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग दिया गया ताकि देश में मुस्लिम वोटबैंक का ध्रुवीकरण किया जा सके। इसी वजह से असम से घुसपैठियों को निकालना असंभव सा रहा।
दूसरी ओर, पूर्ववर्ती सरकारों, खासतौर से कांग्रेस ने अपने तीन कार्यकाल के दौरान न केवल घुसपैठियों को वन भूमि पर बसने के लिए प्रोत्साहित किया, बल्कि यह जानते हुए भी उन्होंने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किया है, उन्हें पंचायत गठित करने सहित सभी सुविधाएं मुहैया करार्इं। इसका खामियाजा असम के मूल स्थानीयों को भुगतना पड़ा। भारत में मौजूद 525 नस्लीय समुदायों में से 247 उत्तर-पूर्व में हैं, जिनमें अकेले 157 असम में हैं और इनकी आबादी करीब दो करोड़ है। निचले असम और मध्य असम के अधिकांश हिस्सों पर घुसपैठियों का कब्जा है और उन्होंने इन मूल निवासियों को उनके ही घरों से बेघर कर दिया है।
एनआरसी प्रक्रिया मूल नागरिकों की पहचान करने और घुसपैठियों को बाहर करने की दिशा में पहला कदम है। लेकिन घुसपैठियों की तादाद अनुमान से कम होना और देश की कानूनी प्रक्रिया का उनके द्वारा प्रयोग किया लोगों को चुभ रहा है। अत: समय रहते त्वरित और प्रभावशाली कदम उठाने की जरूरत है।
...तो अल्पसंख्यक हो जाएंगे हिन्दू!
पूरे असम में जनसंख्या घनत्व 397 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. की औसत से बढ़ा है। यह आंकड़ा 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. की राष्ट्रीय औसत से अधिक है। जनसंख्या घनत्व सीमावर्ती जिलों और मुस्लिम बहुल जिलों में सर्वाधिक है। धुबरी में जनसंख्या घनत्व सर्वाधिक 1171 है, जबकि नगांव 711, करीमगंज 673, बरपेटा 632, मोरीगांव 618, गोलपाड़ा 553, हेलांडी 497 और कछार का 459 है। लोकतांत्रिक बदलाव के आधार पर हुए तीन स्वतंत्र अध्ययनों के मुताबिक, यही हाल रहा तो 2040, 2047 या 2051 तक असम में हिंदू (मूल निवासी) अल्पसंख्यक हो जाएंगे।