'मॉब लिंचिंग' : सामाजिक समस्या को सियासी रंग देना खतरनाक

 

रामबहादुर राय

जब भी ‘लिंचिंग’ की बात होगी, सबसे पहला उदाहरण हमारे सामने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों का आएगा, जिसमें हजारों लोग मारे गए। यह सियासी था और सुनियोजित तरीके से कांग्रेस नेताओं ने इसे अंजाम दिया। अगर थोड़ी देर के लिए इसे छोड़कर लिंचिंग के मौजूदा परिप्रेक्ष्य की बात करें तो पाएंगे कि सुर्खियों मंं रहने वाला इसका सबसे बड़ा कारण गोहत्या है। यह एक ऐसी समस्या है जो किसी भी कोण से राजनीतिक नहीं। यह एक सामाजिक समस्या है।

ऐसी समस्या जो देश के आजाद होने के पहले से थी। आजादी के बाद सरकारें आती और जाती रहीं, लेकिन यह समस्या बनी रही। लोग लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि गाय की तस्करी बंद हो, इनकी हत्या बंद हो। गाय की रक्षा हो, इनकी सेवा हो। गो-रक्षा को गांधी जी बड़ा मुद्दा मानते थे। गो-रक्षा के लिए उन्होंने एक संस्था बनाई थी-अखिल भारतीय गोसेवा संघ—जिसके अध्यक्ष वह खुद थे। वर्धा में उन्होंने गोरक्षा के मुद्दे पर एक सम्मेलन भी बुलाया था जिसमें उन्होंने कहा था कि मेरे लिए गोरक्षा का सवाल स्वराज से बड़ा है।

गोरक्षा का प्रश्न 1870 से विभिन्न रूपों में हमारे सामने आ खड़ा होता है। यह एक अकेला सवाल है जो पिछले डेढ़ सौ साल से हमारे बीच निरंतर चिंता का, संघर्ष का, मारकाट का विषय बना हुआ है। आज भी इसके कारण तनाव हो जाता है। लिंचिंग की घटनाएं हो रही हैं, इसमें दो राय नहीं।

जो लोग चाहते हैं कि गोरक्षा हो, उनमें कुछ ‘उद्दंड’ भी हैं जिनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भर्त्सना की और जब भी मौका मिलता है, वे ऐसा करते भी हैं। किंतु अप्रिय घटनाएं इसलिए नहीं रुकीं क्योंकि गाय की हत्या का सिलसिला बंद नहीं हुआ। लेकिन ऐसी घटनाओं को राजनीतिक रंग में पेश किया जा रहा है, जो खतरनाक है। जब भी इस तरह की कोई घटना होती है, पूरी कोशिश की जाती है कि इसका दोष केन्द्र सरकार पर मढ़ दिया जाए। मानो, उन्हें कोई बटन दबा देना है और लिंचिंग रुक जानी है, और बटन पर से उंगली हटा लें तो लिंचिंग शुरू हो जानी है। इस तरह की सोच पर तो तरस ही आ सकता है।

गौर करें तो 2014 में केंद्र में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद से ही तमाम सामाजिक-आपराधिक घटनाओं को असहिष्णुता और सरकार की लिप्तता से जोड़कर पेश करने का एक सियासी उपक्रम दिखता है। इसमें खासतौर पर कांग्रेसी और वामपंथी शामिल हैं। इस सियासी बिसात पर वैसे साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों को भी मोहरा बना लिया गया जो पिछली सरकारों के दौरान संरक्षण पाते थे। इन लोगों की दुनिया लुट चुकी है और वे भी मौके की तलाश में रहते हैं।

राजनीतिक दलों ने इन्हें अपना हरावल दस्ता बना लिया है। ये लोग आगे-आगे चलते हैं और अलग-अलग कोने से प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बना करके तीर चलाते हैं। जहां तक मीडिया की बात है, मोदी उस तरह से मीडिया से मेलजोल के अभ्यस्त नहीं रहे हैं जैसा मीडिया नेताओं से मेल-जोल का अभ्यस्त रहा है।

अपने-अपने हितों में रंगे इस सियासी हो-हल्ले में भी मूल सवाल तो यही है कि क्या ये लिंचिंग केंद्र सरकार या फिर राज्यों में भाजपा सरकारों के इशारे पर हो रही है? अफसोस की बात है कि मीडिया तटस्थता से इस बात की पड़ताल नहीं कर रहा। मौके पर जाकर छानबीन करना तो मीडिया का बुनियादी काम रहा है। जब भी इस तरह की कोई विवादित घटना हुई, वहां के इक्का-दुक्का क्षेत्रीय मीडिया को छोड़ दें तो समाचार पढ़ाने-दिखाने के काम में लगे संस्थानों ने क्या मौके पर जाकर देखने की कोशिश की आखिर क्या हुआ, क्यों हुआ?

एक बात समझनी होगी कि गाय को लेकर हमारा समाज बड़ा संवेदनशील रहा है। अंग्रेजों के जमाने में भी गाय के हत्यारों को लोग छोड़ते नहीं थे। आज भी इस तरह के हमले मोटे तौर पर गाय के तस्करों के खिलाफ, गाय को मारने वालों के खिलाफ हैं। हां, जिन लोगों पर हमले होते हैं, उनमें कुछ लोग निर्दोष भी हो सकते हैं और ऐसा हुआ भी होगा। बेशक, लोगों को मौके पर ही न्याय करने की छूट नहीं दी जा सकती, लेकिन इस बात पर ध्यान देना होगा कि आखिर ऐसी घटनाएं क्यों ही रही हैं।

रोग की जड़ तक तो पहुंचना होगा। और इनके मूल में है गाय की हत्या। अगर इसे नहीं रोकेंगे तो ऐसे हमलों पर अंकुश लगाना आसान नहीं होगा। ध्यान रखना होगा कि यह एक सामाजिक समस्या है और अगर इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जाती है तो इसका सीधा-सा मतलब है कि ऐसा करने वालों की नजर वोट पर है। अगर आप वोट पा भी लेंगे को क्या इस समस्या को हल कर लेंगे?

(लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)