अनुच्छेद 35 ए पर हंगामा क्यों !
   दिनांक 06-अगस्त-2018
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अनुच्छेद 35-ए को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं पर सुनवाई टल गई है। सुप्रीम कोर्ट अब 31 अगस्त को इस पर सुनवाई करेगा। जम्मू-कश्मीर में इस सुनवाई का विरोध हो रहा है। आखिर अनुच्छेद 35 ए है क्या ? कौन लोग इसका विरोध कर रहे हैं ? संदिग्ध प्रावधान ने जम्मू-कश्मीर में रह रहे लगभग 20 लाख लोगों को पिछले छह दशकों से उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखा है लेकिन राजनीति के चलते बहुत से लोग नहीं चाहते कि यह खत्म हो
अन्याय का अनुच्छेद 35ए 
• अनुच्छेद 35ए पिछले दरवाजे (राष्ट्रपति आदेश) से किया गया संविधान संशोधन है।
• इसे लागू करने में संसद को शामिल नहीं किया गया था।
• यह अनुच्छेद 370 के दुरुपयोग का एक उदाहरण है।
• यह अनुच्छेद हमारे संविधान के मौलिक ढांचे का उल्लंघन है।
• यह संविधान के प्राक्कथन में प्रदत्त कुछ मौलिक अधिकारों को रोकता है।
• अनुच्छेद 35ए के चलते लाखों भारतीय नागरिकों को न्यायिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों व बराबरी के दर्जे से वंचित होना पड़ा है।
• इस अनुच्छेद ने व्यक्ति के सम्मान को सुनिश्चित करते हुए बंधुत्व के प्रसार को बाधित किया है
• राष्ट्र की एकजुटता और एकात्मता को चोट पहुंचाई है।

 
बात उस सवाल के बारे में है, जो जम्मू-कश्मीर में रह रहे भारत के लाखों नागरिकों के मौलिक अधिकारों से सीधे जुड़ी हुई है। बात भारत के संविधान से नत्थी किए उस संदिग्ध प्रावधान की है, जो अपने ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन की मंजूरी देता नजर आ रहा है।
बात है भारत के संविधान के अनुच्छेद 35 ए की।
इस संदिग्ध प्रावधान ने जम्मू-कश्मीर में रह रहे लगभग 20 लाख लोगों को पिछले छह दशकों से उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखा है। ये लोग जम्मू-कश्मीर में रहते हैं, रहते रहे हैं, लेकिन न वे वहां जमीन खरीद सकते हैं, न सरकारी नौकरी कर सकते हैं, न कॉलेजों में शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, न उन्हें छात्रवृत्ति मिल सकती है और न ही उन्हें पंचायत चुनावों में वोट डालने का अधिकार है। न वे पंचायत, नगर निगम या विधानसभा का चुनाव लड़ सकते हैं।
दरअसल भारत का विभाजन होने पर असंख्य लोग जान बचाकर भारत आ गए थे, और ये 20 लाख वे दुर्भाग्यशाली लोग हैं, जो भारत आकर जम्मू-कश्मीर में पहुंच गए थे। जैसे पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थी, वाल्मीकि, गोरखा इत्यादि। इन्हें भारत की नागरिकता प्राप्त है, लेकिन भारत के संविधान के अनुच्छेद 35 ए ने उन्हें जम्मू-कश्मीर राज्य का नागरिक बनने से रोक रखा है। उन्हें जम्मू-कश्मीर में "स्थायी नागरिक" प्रमाण पत्र नहीं दिए गए। इस प्रावधान के कारण वाल्मीकि समाज को सिर्फ सफाई कर्मचारी की नौकरी मिल सकती है और कोई नहीं। अनुच्छेद 35 ए के कारण अगर जम्मू-कश्मीर की कोई लड़की किसी ऐसे लड़के से शादी कर लेती है जिसे "स्थायी नागरिक" नहीं माना जाता तो उसके परिवार और आने वाली पीढि़यों को भी "स्थायी नागरिक" के अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है। चाहे उस लड़के का परिवार कई पीढि़यों से जम्मू-कश्मीर का निवासी क्यों न रहा हो।
 
क्या है अनुच्छेद 35 ए
अनुच्छेद 35 ए को जिस ढंग से संविधान में शामिल किया गया है, वही संदिग्ध, शर्मनाक और संविधान की मूल भावना, उसके बुनियादी ढांचे के विपरीत है। देखिए, संविधान में कोई भी फेरबदल करने और खासतौर पर किसी नए प्रावधान को शामिल करने की शक्ति सिर्फ और सिर्फ संसद के पास है। आखिर संसद देश की जनता की प्रतिनिधि होती है, जिसमें जम्मू-कश्मीर की जनता भी शामिल है। संविधान में फेरबदल करने के किसी भी प्रावधान पर संसद में खुली बहस होती है, उसके गुण-दोषों पर चर्चा होती है, आवश्यकतानुसार मतदान होता है। रहस्यपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 35 ए को संसद में कभी पेश ही नहीं किया गया। इस पर कभी बहस नहीं हुई। इसे तो चोरी-छिपे अंदाज में, राष्ट्रपति के आदेश पर, 1954 में संविधान में शामिल कर दिया गया।
असंवैधनिक है यह अनुच्छेद
इस संवैधानिक प्रावधान का इरादा क्या था? इसका शीर्षक अपने आप में पूरी चुगली करता है। प्रावधान के शीर्षक की शुरुआत होती है "सेविंग्स ऑफ लॉज" से। वास्तव में इस तरह के प्रावधानों को उन हरकतों के बचाव के लिए जोड़ा जाता है, जो अन्यथा असंवैधानिक होते हैं। प्रावधान कहता है कि इसका उद्देश्य स्थायी नागरिकों के "विशेष अधिकारों और विशेषाधिकारों" की रक्षा करना और बाकी लोगों को इन अधिकारों तक पहुंचने से रोकना है। खास बात यह है कि प्रावधान के अंत में साफ शब्दों में कहा गया है- ऐसे किसी भी कानून को, जो विशेष अधिकार और विशेषाधिकार देता है, कभी भी इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकेगा कि वे मूलभूत अधिकारों के विपरीत हैं।"
संविधान के अनुच्छेद 14 में सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्राप्त है, जबकि अनुच्छेद 35 ए इस समानता को समाप्त कर विशेष अधिकार प्राप्त नागरिकों का एक वर्ग खड़ा कर देता है। पश्चिमी पाकिस्तान से पलायन करके भारत आने वाले नागरिक देश के विभिन्न राज्यों में बसे हैं। हर राज्य में उन्हें नागरिकों को प्राप्त सारे अधिकार मिले हुए हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर इसका अपवाद बना हुआ है।
इसी प्रकार अनुच्छेद 35ए जिस तरह राज्य में बसने और अचल संपत्ति खरीदने पर रोक लगाता है, वह भी भारतीय संविधान पर सीधा आक्षेप है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1) में सभी नागरिकों को देशभर में कहीं भी बसने की पूरी आजादी है। अनुच्छेद 35ए प्रदेश में उन पर जिस तरह के प्रतिबंध लगता है, उसका कहीं कोई औचित्य नहीं है।
अनुच्छेद 35ए महिलाओं और पुरुषों में भी करता है भेदभाव
अनुच्छेद 35ए सिर्फ नागरिकों के बीच भेदभाव नहीं करता। वह पुरुषों और महिलाओं के बीच भी भेदभाव करता है। सारे विशेषाधिकारों का आधार बनने वाला स्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र विरासत में उपलब्ध होता है। लेकिन इस विरासत का अधिकार सिर्फ पुरुषों को है, महिलाओं को नहीं।जब भी कोई स्थायी नागरिकता प्राप्त महिला राज्य के बाहर के किसी व्यक्ति या राज्य के अंदर किसी स्थायी नागरिकता विहीन व्यक्ति से विवाह करती है, तो वह अपनी स्थायी नागरिकता से हाथ धो बैठती है। इसी के साथ राज्य में मौजूद संपत्ति से उसके अधिकार भी समाप्त हो जाते हैं। वह और उसकी संतानें राज्य में उच्च शिक्षा लेकर सरकारी नौकरियों तक तमाम अधिकारों से वंचित हो जाती हैं।
सुशीला साहनी बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य मामले में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि महिलाओं को संपत्ति के अधिकारों से वंचित करना असंवैधानिक है। इसके बावजूद यह व्यवस्था आज भी बरकरार है।
सरकारी नौकरी में भेदभाव का भी है कारण
अनुच्छेद 35ए के तहत सरकारी नौकरियों में भेदभाव करना भी भारत के संविधान से मेल नहीं खाता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 16 में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि किसी भी सरकारी नौकरी के लिए किसी को भी समान अवसर देने से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन राज्य सरकार ने बेहद चतुराई का परिचय देते हुए सेवा नियमों को इस तरह बनाया है जिसमें स्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र से संबंधित मामलों पर सिर्फ राज्य सेवा के अधिकारी ही कोई निर्णय ले सकते हैं। कोई आईएएस अधिकारी, अपने विभाग में वरिष्ठ होने के बावजूद इस तरह के विषय पर निर्णय नहीं ले सकता है। इस तरह से भेदभाव की नीति न केवल सरकार द्वारा चलाई जाती है बल्कि खुद सरकार के भीतर भी बनी हुई है।
छात्रों के साथ भी अन्याय
राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्तियों के मामले में तो अनुच्छेद 35ए की भूमिका बहुत ही शर्मनाक है। अनुच्छेद 35ए के तहत राज्य सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह सिर्फ राज्य के "स्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र" प्राप्त नागरिकों को ही छात्रवृत्ति और अन्य सहायता दे सकती है। राज्य सरकार इसी संदिग्ध प्रावधान का प्रयोग उन छात्रवृत्तियों के मामले में भी कर रही है, जिनके लिए केंद्र सरकार से धन उपलब्ध कराया जाता है। जम्मू-कश्मीर राज्य में छह दशकों से रहते आ रहे लोग, जिनके पास स्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र नहीं हैं, इन छात्रवृत्तियों से वंचित हैं।
स्थायी नागरिकता से वंचित हैं लोग
अनुच्छेद 35ए की शरारत यहीं समाप्त नहीं होती। स्थायी नागरिकता को इस प्रकार से परिभाषित किया गया है कि 1947 के बाद राज्य में आने वाले लोगों को स्थायी नागरिकता नहीं मिल सकती। इस परिभाषा को बदले जाने की गुंजाइश जरूर छोड़ी गई है, लेकिन ऐसा करने के सारे अधिकार संविधान के अनुच्छेद 35ए के तहत राज्य विधानसभा को दे दिए गए हैं। इसका एक अत्यंत वीभत्स उदाहरण राज्य में रह रहे हजारों सफाईकर्मियों का है।
1957 में राज्य सरकार के तहत काम करने वाले सफाईकर्मियों ने हड़ताल कर दी थी। जम्मू-कश्मीर सरकार ने उनकी पूर्ति पंजाब से सफाईकर्मियों को बुलाकर करने की कोशिश की। उन्हें आश्वासन दिया गया था कि उन्हें भी स्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र दिया जाएगा। यह प्रमाण पत्र तो उन्हें मिला, लेकिन उन पर सफाईकर्मी ही बने रहने की शर्त लगा दी गई। इसका अर्थ यह है कि जब तक वे और उनकी संतानें सफाईकर्मी बने रहती हैं, तब तक वे जम्मू-कश्मीर राज्य के स्थायी नागरिक माने जाएंगे और जैसे ही वे किसी अन्य रोजगार में लगते हैं, वे अपनी स्थायी नागरिकता खो देंगे, भले ही उन बच्चों ने कितनी भी ऊंची शिक्षा क्यों न प्राप्त की हो। दासता की ऐसी और संविधान लिखित परंपरा विश्व में शायद ही कहीं हो। यह बंधुआ मजदूरी अनुच्छेद 35ए का एक "साइड इफेक्ट" है।
वंचित वर्ग के हिंदुओं के साथ अन्याय
यह अनुच्छेद संविधान का भाग नहीं है, लेकिन संविधान की पूरी शक्ति के साथ लागू जरूर है।
वे हजारों हिंदू, जिनमें से अधिकांश वंचित वर्ग के थे, 1947 में अपने जीवन, अपने सम्मान और अपनी संस्कृति की खातिर भागकर जम्मू आए थे। लेकिन तब से आज तक वे पुन: अपने जीवन और अपने सम्मान के लिए संघर्ष ही करते आ रहे हैं। वे स्वयं को एक ऐसे राज्य में फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं, जहां उन्हें मूलभूत नागरिक अधिकारों से भी वंचित रखा गया है।
बिना संसद की मंजूरी के किया गया था लागू
"अनुच्छेद 35 ए" को वर्ष 1954 में राष्ट्रपति द्वारा जम्मू-कश्मीर में लागू कर दिया गया। इसके बाद से ऐसे लोग, जिन्हें वहां रियासत के समय राजा ने राज्य में बसाया था, आज मुहाने पर खड़े हैं। संविधान का अवलोकन करते हैं तो पता नहीं चलता है कि वास्तव में यह अनुच्छेद है कहां? तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से उस समय बिना संसद की मंजूरी के पिछले दरवाजे से इसे लागू कर दिया गया।