#Mob_Lynching नई बात नहीं न ही जाति मजहब तक सीमित

आज देशभर में मॉब लिचिंग की कथित घटनाओं पर संसद से लेकर सड़क तक हंगामा मचाया जा रहा है। सेकुलर नेता और बुद्धिजीवी कह रहे हैं कि इन घटनाओं के जरिए एक मजहब विशेष के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि ऐसा नहीं है। इस तरह की घटनाओं से हर जाति और वर्ग के लोग पीड़ित हैं। आपको याद होगा बिहार के भागलपुर का वह अंखफोड़वा कांड, जिसमें कुछ अपराधियों की आंखें तेजाब डालकर फोड़ दी गई थीं। यह करतूत पुलिस की थी। इसके बाद तो बिहार में भीड़ द्वारा इस तरह की घटनाएं होने लगीं। वरिष्ठ पत्रकार और ‘द आॅइज आॅफ डार्कनेस’ फिल्म के निर्माता अमिताभ पाराशर मानते हैं कि भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा आज की नहीं है। भीड़ ने कई लोगों की आंखें फोड़ी हैं और अभी फोड़ी जा रही हैं। इस संदर्भ में पाञ्चजन्य के सम्पादक हितेश शंकर ने उनसे विस्तृत बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-

 

फिल्म ‘द आइज आॅफ डार्कनेस’ का एक दृश्य आपकी फिल्म ‘द आइज आॅफ डार्कनेस’ को पिछले साल देश का सबसे सम्मानित फिल्म पुरस्कार मिला। यह फिल्म एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दे को उठाती है। आज के संदर्भ में इसकी कितनी प्रासंगिकता है? मेरी फिल्म ‘द आइज आॅफ डार्कनेस’ बिहार में भीड़ द्वारा आंखें फोड़ने की घटनाओं पर आधारित है। यह फिल्म दिखाती है कि आज भी बिहार में भीड़ द्वारा कथित अपराधियों और निर्दोष लोगों की आंखें उसी तरह फोड़ी जा रही हैं जैसी 1980 के दशक के कुख्यात भागलपुर अंखफोड़वा कांड के दौरान फोड़ी गई थीं। आपकी नजर सबसे पहले इस मुद्दे पर गई, जबकि दिल्ली मीडिया में बड़ी संख्या में कार्यरत लोग बिहार और आसपास के प्रांत से आते हैं!जी, मैं इस बात का थोड़ा-सा श्रेय ले सकता हूं। मेरा गांव भागलपुर जिले में है और मैंने स्कूल की पढ़ाई वहीं के एक कस्बे से की है। उन्हीं दिनों की बात है। एक थाने के बाहर पुलिस ने एक व्यक्ति की आंखों में तेजाब डालकर छोड़ दिया था। भीड़ उसे घेरे खड़ी थी। मैंने स्कूल जाते समय जो कुछ देखा, उसे आजतक नहीं भूल पाया हूं। उसकी आंखों से खून निकल रहा था और वह बुरी तरह चिल्ला रहा था।मैं इसकी पृष्ठभूमि बता दूं। 1980-81 के दौरान बिहार के भागलपुर जिले की पुलिस ने जिले में अपराध नियंत्रण का एक नायाब तरीका निकाला। करीब 31-32 अपराधियों को पकड़कर जिले के अलग-अलग थानों में लाया गया और उनकी आंखों में तेजाब डाल दिया गया। तेजाब को ‘गंगाजल’ कहा गया और इस आॅपरेशन को ‘आॅपरेशन गंगाजल’!भागलपुर अंखफोड़वा कांड बहुत बड़ा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना। यह कांड एक तय समय में शुरू होकर तय समय में खत्म (1980 के अंत से 1981 के शुरुआती महीनों तक) हो गया। ‘द आइज आॅफ डार्कनेस’ यही बताती है कि आम धारणा के विपरीत बिहार में अंखफोड़वा कांड कभी खत्म ही नहीं हुआ। दरअसल, अभी तक आंखें फोड़ी जा रही हैं! क्या आप इसे थोड़ा और स्पष्ट करेंगे? भागलपुर अंखफोड़वा कांड को बिहार पुलिस ने अंजाम दिया। पुलिस ने कथित अपराधियों की आंखें तेजाब डाल कर फोड़ डालीं। कई पुलिसकर्मी निलंबित हुए, कई खुद को बचा ले गए, लेकिन पुलिस के इस कृत्य ने बिहार की जनता, बिहार के भीड़ तंत्र को एक हथियार दे दिया। आंख फोड़ना कुछ लोगों के लिए बदला लेने का एक हथियार बन गया। नतीजा यह हुआ कि 1981 के बाद पुलिस ने तो आंखें फोड़ना बंद कर दिया, लेकिन भीड़ तंत्र ने आंखें फोड़ने को एक आसान-सा हथियार बना लिया। 1981 के बाद से बिहार में कई लोगों की आंखें फोड़ी गर्इं और यह आज तक जारी है।  अमिताभ पाराशर आप इस फिल्म के विषय तक कैसे पहुंचे? मेरे माता-पिता पूर्णिया में रहते हैं। मेरी बड़ी इच्छा थी कि मैं मशहूर हिंदी कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु के गांव जाकर उनका पुराना घर देखूं, उनके परिवार के लोगों से मिलूं। आखिर एक बार जब मैं पूर्णिया गया तो रेणु जी के गांव हिंगना औराही चला गया। उनके बड़े बेटे ने मेरा बड़ा आदर-सत्कार किया और उनका पूरा घर दिखाया। बातचीत में उन्होंने बताया कि उनके गांव में पहली बार एक ऐसी घटना हो गई है जिसका अंदाजा किसी को नहीं था। पता चला कि गांव के लोगों ने गांव के ही एक पूर्व अपराधी मुन्ना ठाकुर और उसके दोस्त कन्हैया ठाकुर की आंखों में सीरिंज से तेजाब डाल दिया है। नतीजतन, दोनों अंधे हो गए हैं। मैं उनमें से एक मुन्ना ठाकुर से मिला। उसकी कहानी में मेरी रुचि जगी और मैं उससे नजदीकी बढ़ाने लगा। बाद की मुलाकातों में पता चला कि पास के ही एक अन्य गांव में भी किसी की आंख फोड़ दी गई है। फिर कुछ दिन बाद ऐसे एक और मामले का पता चला। धीरे-धीरे मुझे मालूम हुआ कि अररिया, फारबिसगंज, पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर जैसे इलाकों में भीड़ द्वारा आंख फोड़ने की कई घटनाएं हुई हैं। तब मुझे लगा कि मेरे पास एक फिल्म का विषय है। बिना किसी आर्थिक मदद के मैं लगभग दो साल बिहार के विभिन्न इलाकों में कैमरा लेकर घूमा। मैंने पाया कि कोई ऐसा इलाका नहीं है, कोई ऐसा जिला नहीं जहां भीड़ ने आम लोगों की आंखें ना फोड़ी हों! आपकी फिल्म आज इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है कि भारत में भीड़ द्वारा हत्या करना एक बड़ा मामला, बड़ा मुद्दा बनता दिखाई दे रही है!देखिए, यह फिल्म ‘लिचिंग’ या ‘मॉब लिचिंग’ (भीड़ द्वारा की गई हत्या) पर नहीं है, बल्कि भीड़ की मानसिकता के शिकार एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे भीड़ ने अंधा कर दिया था। ध्यान देने की बात यह है कि कोई भीड़ आंख फोड़ने की बजाय बड़े आराम से उस व्यक्ति की हत्या भी कर सकती है। तो भीड़ ने हत्या नहीं की..आंख क्यों फोड़ी? इसलिए कि कई बार मकसद हत्या से भी बड़ी सजा देने का होता है। अंधा होकर आदमी पल- पल मरता है। मेरी फिल्म का एक अंधा किरदार कहता है, ‘‘आंख क्यों फोड़ी..गोली क्यों नहीं मारी?’’ क्या भीड़ तंत्र द्वारा की गर्इं हत्या एक नई घटना है या नया चलन है?तथ्यों की दृष्टि से बात करें तो ऐसा कहना या सोचना गलत होगा। एक उदाहरण देता हूं। अपनी फिल्म की शूटिंग के दौरान मैं अररिया के सदर अस्पताल गया था। जिन सज्जन से मिलना था, वे आए नहीं थे। इसलिए हम पास ही के बरगद से सटे चबूतरे पर बैठकर उनका इंतजार कर रहे थे। हमारी बगल में एक अंधा व्यक्ति, अपनी पत्नी और एक लड़की के साथ बैठा था। मैंने उससे ऐसे ही पूछा कि वह यहां क्यों आया है। उसने जो बताया, वह भयावह था। उसकी कहानी सुनकर मैं अंदर तक हिल गया। उसी जिले के एक दूर के गांव में रहने वाले इस आदमी की दोनों आंखें गांव के लोगों ने फोड़ दी थीं, लेकिन बारी-बारी से। उसकी बार्इं आंख 22 साल पहले फोड़ी गई थी और दार्इं आंख 22 साल बाद। उसका नाम मोहम्मद शाहिद था। मैंने उससे इसकी वजह पूछी तो उसने बताया कि गांव वालों ने उस पर छोटी-मोटी चोरी के आरोप लगाए थे। मुझे लगा कि मैं अपनी फिल्म के लिए इस व्यक्ति का साक्षात्कार करूं, जो मैंने किया भी। लेकिन अपने संपर्कों से मुझे बाद में पता चला कि इस व्यक्ति पर गाय की तस्करी करने के आरोप थे और गांव वालों ने इसी वजह से उसकी आंखें दो बार फोड़ीं। बहरहाल, वजह जो भी हो, खुद को सभ्य कहने वाला कोई भी समाज इस तरह की घटना को किसी भी आधार पर सही नहीं ठहरा सकता। मैं जो बात कहना चाहता हूं, वह यह है कि आज से 23-24 साल पहले भी भीड़ द्वारा हिंसा के कई उदाहरण हैं। शायद उससे पहले के भी होंगे। आज सभी वर्ग के लोग, यहां तक कि बच्चे भी भीड़ तंत्र के शिकार हो रहे हैं। इसे जरा विस्तार से बताएंगे?‘मॉब लिचिंग’ किसी जाति, मजहब या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। मैं सिर्फ तथ्यों के आधार पर अपनी बात कहूंगा। 2014 के दिसंबर महीने में बिहार के मधेपुरा जिले के रहने वाले अजय यादव की दोनों आंखें तेजाब डाल कर फोड़ दी गर्इं। उस पर आरोप था कि उसके किसी से अवैध संबंध थे। भीड़ ने उसकी आंखों में तेजाब डाल दिया। जो व्यक्ति भीड़ का नेतृत्व कर रहा था, वह अजय यादव की ही जाति का था। इससे तीन साल पहले सुपौल जिले के हंसा गांव के रंजीत दास नाम के एक युवक की आंखें भी तेजाब डालकर फोड़ दी गई थीं। यह काम उसी के गांव के एक दबंग ने किया था। 2007 के 11 सितंबर को बिहार के नवादा जिले के तीन युवकों को भीड़ ने एक साथ तेजाब डाल कर अंधा कर दिया। उन पर मोटर साईकिल छीनने का आरोप था। दो साल पहले भीड़ ने एक स्कूल के प्राचार्य की पीट-पीट कर हत्या कर दी, क्योंकि भीड़ को लगा कि उन्होंने दो बच्चों को बेच दिया है। उनकी मौत के बाद पता चला कि वह सिर्फ अफवाह थी। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि दो साल पहले नालंदा जिले में अदालत ने दो अपराधियों को आजीवन कारावास और 1,00,000 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। मामला यह था कि 28 साल पहले 1989 में जीयर गांव के रतन सिंह और तनिक सिंह ने जमीनी विवाद में पीड़ित उपेंद्र सिंह की आंखों में तेजाब डाल कर उनकी एक आंख चाकू से निकलवा ली। यहां भी भीड़ का ही सहारा लिया गया। तो क्या बच्चे भी पीड़ित हुए हैं?हां..बिल्कुल, पटना जिले के एक गांव के सरपंच के आदेश पर भीड़ ने 14 साल के धनवीर यादव की आंखें निकाल लीं। मेरे पास एक ‘विजुअल’ है जिसे मैंने फिल्म में जान-बूझकर इस्तेमाल नहीं किया। 2016 के जुलाई महीने में लखीसराय की आठ साल की एक बच्ची की एक आंख इसलिए फोड़ दी गई, क्योंकि उसने किसी के खेत से मटर के चंद दाने तोड़ लिए थे। ये ऐसी घटनाएं हैं जिनसे हमें अपने को सभ्य कहते हुए शर्म आ जाए.. !बिल्कुल.. यह जो भीड़ है, यह अपने आप काम नहीं करती। इसके पीछे एक तंत्र काम करता है जिसे हम भीड़ तंत्र के नाम से जानते हैं। जब मेरी फिल्म के मुख्य किरदार मुन्ना ठाकुर और उसके मित्र कन्हैया ठाकुर की आंखें फोड़ी गर्इं तो उसके पीछे जाति और अन्य निहित स्वार्थ काम कर रहे थे। मुन्ना ठाकुर अपराधी था। बैंक लूटने, मारपीट, रंगदारी वगैरह के कई आरोप थे उस पर, लेकिन वह हत्या या बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में शामिल नहीं था। उसके समर्पण करने और जेल से वापस आने के बाद जब उसने गांव और समाज में में फिर से अपने लिए जमीन तलाशनी शुरू की तो उसने सबसे पहले अपनी पत्नी को महिलाओं के लिए आरक्षित सीट पर मुखिया उपचुनाव में लड़वाने का ऐलान कर दिया। विरोधी पक्ष को यह बात नागवार गुजरी तो उसने मुन्ना को मना किया कि वह ऐसा न करे, वरना परिणाम भुगतने होंगे। लेकिन मुन्ना ने उनकी बात नहीं मानी। नतीजा यह हुआ कि कोई तीसरा ही जीत गया। अगले दिन विरोधी पक्ष के लोग करीब 200 लोगों की भीड़ लेकर आए और मुन्ना और उसके दोस्त की आंखों में तेजाब डाल दिया। इस मामले में पीड़ित और उत्पीड़क, दोनों एक ही समाज के हैं। दोनों गैर-सवर्ण जाति के हैं, एक ही गांव के हैं। गौर से देखें तो पाएंगे कि यह मामला ऐसा है जिसे आप अंग्रेजी में 'orchestrated action' कह सकते हैं। यानी भीड़तंत्र को कोई अपने निहित स्वार्थ के लिए पूरी योजना के साथ निर्देशित कर रहा है, लेकिन वह आदमी या तंत्र पीछे है और भीड़ आगे है। और पूरे मामले में स्वार्थ सिद्ध हो रहा है उस व्यक्ति का जिसने मुन्ना ठाकुर से बदला लिया..भीड़ के जरिए.. भीड़ की मदद से। इसलिए ‘मॉब लिचिंग’ के ज्यादातर मामलों को इस संदर्भ में देखने की जरूरत है। आपकी दृष्टि में भीड़ द्वारा अंजाम दी गई हिंसा के क्या कारण हैं? आमतौर पर माना जाता है कि जब जनता का विश्वास लोकतंत्र के तीनों खंभों (न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका) से उठ जाता है तो ऐसी घटनाएं बढ़ने लगती हैं। मेरी राय में भीड़ कभी भी खुद कोई कार्रवाई नहीं करती। उसके पीछे कोई कारक काम कर रहा होता है और ज्यादातर मामलों में यह कारक अपने निहित स्वार्थ के तहत काम करता है। मुझे लगता है कि इस पर नीति निर्धारकों को गंभीरता से सोचना होगा। इन घटनाओं के बौद्धिक कारणों पर अनर्गल टीवी बहसों और कथित बुद्धिजीवियों द्वारा किसी पंथ/पक्ष के चश्मे से देखकर बेसिर-पैर का ज्ञान देने से कुछ नहीं होगा। एक खास बात काबिलेगौर है। आप देखेंगे कि भीड़ जिसे अपना शिकार बनाती है, उसमें शायद ही कोई बड़ा अपराधी हो। ज्यादातर लोग मामूली चोर, छोटे-मोटे अपराधी और कई मामलों में तो बिल्कुल निर्दोष रहे हैं। बिहार में तो कई मामलों में साइकिल/मोटरसाइकिल चोरी के अपराध में भीड़ ने कथित चोरों की आंखें फोड़ दी हैं। तो क्या भीड़ बड़े अपराधियों से डरती है? या फिर, भीड़ को उकसाने वाला कारक/तंत्र डरता है?दूसरी बड़ी वजह मेरे हिसाब से यह है कि हम अफवाहों पर यकीन करने वाले समाज का हिस्सा हैं। भीड़ सहज ही अफवाहों पर यकीन करती है। इस भीड़ में पढ़े-लिखे और अनपढ़ दोनों किस्म के लोग होते हैं, लेकिन मानसिकता भीड़ तंत्र की ही होती है जो उन्हें उकसाने वालों पर बड़ी आसानी से यकीन करती है। तो मेरा मानना है कि ऐसी घटनाओं को अविलंब रोकने का एकमात्र तरीका भीड़ को नियंत्रित करने के असफल उपायों को छोड़ उन लोगों को पहचानने पर होना चाहिए जो भीड़ में उन्माद पैदा करते हैं। वह छुटभैया नेता हो सकता है, किसी पार्टी का मूर्ख लेकिन महत्वाकांक्षी कार्यकर्ता हो सकता है, किसी मुहल्ले या गांव का आपराधिक मानसिकता का कोई आदमी हो सकता है जो ऐसे घटनाओं के जरिए अपने निजी स्वार्थ साध रहा है या फिर बड़े शहरों में रहने वाला सफेदपोश हो सकता है।इन सब के अलावा, मेरी सोच है कि इंटरनेट और डाटा की सहज और सर्वसुलभता से फायदे कम, नुकसान ज्यादा हुए हैं। यह एक दुधारी तलवार है जिसे अगर सही इस्तेमाल किया तो फायदे वरना नुकसान। इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध गलत सामग्री ने युवकों में एक आक्रामकता भर दी है जिसका असर उनके चरित्र पर अलग-अलग तरीकों से पड़ता है। क्या भीड़ द्वारा की गई हिंसा की घटनाओं के प्रति समाज को सजग करने में मीडिया की भूमिका सही है? इस पर अनगिनत किताबें और लेख लिखे जा चुके हैं। बहरहाल, मेरा मानना है कि आज का सेकुलर मीडिया उत्तेजना फैलाता है, सनसनी फैलाता है। उसे लगता है कि लोग यही देखना-सुनना चाहते हैं। इसलिए वह पूरी तन्मयता से इस काम में मशगूल है।किसी भी चैनल पर किसी भी गंभीर मुद्दे पर गंभीर बहस के लिए समय नहीं है। चैनल लोगों को सोचने का मौका नहीं देना चाहते। आज तो जो संजीदा व्यक्ति है, उसे भी लगने लगा है कि जब तक चीखूं- चिल्लाऊं नहीं, तब तक कोई सुनेगा नहीं। तो आज उसने भी चिल्लाना शुरू कर दिया है। चैनलों पर हर आदमी चीख रहा है। वहां किसी भी गंभीर चीज के लिए कोई जगह नहीं है, न कोई उम्मीद है। उम्मीद समाज से ही है। समाज जागेगा तो ऐसी घटनाएं नहीं होंगी, वरना इसका कोई अंत नहीं है।

फिल्म ‘द आइज आॅफ डार्कनेस’ का एक दृश्य 

आपकी फिल्म ‘द आइज आॅफ डार्कनेस’ को पिछले साल देश का सबसे सम्मानित फिल्म पुरस्कार मिला। यह फिल्म एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दे को उठाती है। आज के संदर्भ में इसकी कितनी प्रासंगिकता है?

मेरी फिल्म ‘द आइज आॅफ डार्कनेस’ बिहार में भीड़ द्वारा आंखें फोड़ने की घटनाओं पर आधारित है। यह फिल्म दिखाती है कि आज भी बिहार में भीड़ द्वारा कथित अपराधियों और निर्दोष लोगों की आंखें उसी तरह फोड़ी जा रही हैं जैसी 1980 के दशक के कुख्यात भागलपुर अंखफोड़वा कांड के दौरान फोड़ी गई थीं।

आपकी नजर सबसे पहले इस मुद्दे पर गई, जबकि दिल्ली मीडिया में बड़ी संख्या में कार्यरत लोग बिहार और आसपास के प्रांत से आते हैं!

जी, मैं इस बात का थोड़ा-सा श्रेय ले सकता हूं। मेरा गांव भागलपुर जिले में है और मैंने स्कूल की पढ़ाई वहीं के एक कस्बे से की है। उन्हीं दिनों की बात है। एक थाने के बाहर पुलिस ने एक व्यक्ति की आंखों में तेजाब डालकर छोड़ दिया था। भीड़ उसे घेरे खड़ी थी। मैंने स्कूल जाते समय जो कुछ देखा, उसे आजतक नहीं भूल पाया हूं। उसकी आंखों से खून निकल रहा था और वह बुरी तरह चिल्ला रहा था।

मैं इसकी पृष्ठभूमि बता दूं। 1980-81 के दौरान बिहार के भागलपुर जिले की पुलिस ने जिले में अपराध नियंत्रण का एक नायाब तरीका निकाला। करीब 31-32 अपराधियों को पकड़कर जिले के अलग-अलग थानों में लाया गया और उनकी आंखों में तेजाब डाल दिया गया। तेजाब को ‘गंगाजल’ कहा गया और इस आॅपरेशन को ‘आॅपरेशन गंगाजल’!

भागलपुर अंखफोड़वा कांड बहुत बड़ा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना। यह कांड एक तय समय में शुरू होकर तय समय में खत्म (1980 के अंत से 1981 के शुरुआती महीनों तक) हो गया।

‘द आइज आॅफ डार्कनेस’ यही बताती है कि आम धारणा के विपरीत बिहार में अंखफोड़वा कांड कभी खत्म ही नहीं हुआ। दरअसल, अभी तक आंखें फोड़ी जा रही हैं! क्या आप इसे थोड़ा और स्पष्ट करेंगे?

भागलपुर अंखफोड़वा कांड को बिहार पुलिस ने अंजाम दिया। पुलिस ने कथित अपराधियों की आंखें तेजाब डाल कर फोड़ डालीं। कई पुलिसकर्मी निलंबित हुए, कई खुद को बचा ले गए, लेकिन पुलिस के इस कृत्य ने बिहार की जनता, बिहार के भीड़ तंत्र को एक हथियार दे दिया। आंख फोड़ना कुछ लोगों के लिए बदला लेने का एक हथियार बन गया। नतीजा यह हुआ कि 1981 के बाद पुलिस ने तो आंखें फोड़ना बंद कर दिया, लेकिन भीड़ तंत्र ने आंखें फोड़ने को एक आसान-सा हथियार बना लिया। 1981 के बाद से बिहार में कई लोगों की आंखें फोड़ी गर्इं और यह आज तक जारी है।

 

 अमिताभ पाराशर

आप इस फिल्म के विषय तक कैसे पहुंचे?

मेरे माता-पिता पूर्णिया में रहते हैं। मेरी बड़ी इच्छा थी कि मैं मशहूर हिंदी कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु के गांव जाकर उनका पुराना घर देखूं, उनके परिवार के लोगों से मिलूं। आखिर एक बार जब मैं पूर्णिया गया तो रेणु जी के गांव हिंगना औराही चला गया। उनके बड़े बेटे ने मेरा बड़ा आदर-सत्कार किया और उनका पूरा घर दिखाया। बातचीत में उन्होंने बताया कि उनके गांव में पहली बार एक ऐसी घटना हो गई है जिसका अंदाजा किसी को नहीं था। पता चला कि गांव के लोगों ने गांव के ही एक पूर्व अपराधी मुन्ना ठाकुर और उसके दोस्त कन्हैया ठाकुर की आंखों में सीरिंज से तेजाब डाल दिया है। नतीजतन, दोनों अंधे हो गए हैं। मैं उनमें से एक मुन्ना ठाकुर से मिला। उसकी कहानी में मेरी रुचि जगी और मैं उससे नजदीकी बढ़ाने लगा। बाद की मुलाकातों में पता चला कि पास के ही एक अन्य गांव में भी किसी की आंख फोड़ दी गई है। फिर कुछ दिन बाद ऐसे एक और मामले का पता चला। धीरे-धीरे मुझे मालूम हुआ कि अररिया, फारबिसगंज, पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर जैसे इलाकों में भीड़ द्वारा आंख फोड़ने की कई घटनाएं हुई हैं। तब मुझे लगा कि मेरे पास एक फिल्म का विषय है। बिना किसी आर्थिक मदद के मैं लगभग दो साल बिहार के विभिन्न इलाकों में कैमरा लेकर घूमा। मैंने पाया कि कोई ऐसा इलाका नहीं है, कोई ऐसा जिला नहीं जहां भीड़ ने आम लोगों की आंखें ना फोड़ी हों!

आपकी फिल्म आज इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है कि भारत में भीड़ द्वारा हत्या करना एक बड़ा मामला, बड़ा मुद्दा बनता दिखाई दे रही है!

देखिए, यह फिल्म ‘लिचिंग’ या ‘मॉब लिचिंग’ (भीड़ द्वारा की गई हत्या) पर नहीं है, बल्कि भीड़ की मानसिकता के शिकार एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे भीड़ ने अंधा कर दिया था। ध्यान देने की बात यह है कि कोई भीड़ आंख फोड़ने की बजाय बड़े आराम से उस व्यक्ति की हत्या भी कर सकती है। तो भीड़ ने हत्या नहीं की..आंख क्यों फोड़ी? इसलिए कि कई बार मकसद हत्या से भी बड़ी सजा देने का होता है। अंधा होकर आदमी पल- पल मरता है। मेरी फिल्म का एक अंधा किरदार कहता है, ‘‘आंख क्यों फोड़ी..गोली क्यों नहीं मारी?’’

 

क्या भीड़ तंत्र द्वारा की गर्इं हत्या एक नई घटना है या नया चलन है?

तथ्यों की दृष्टि से बात करें तो ऐसा कहना या सोचना गलत होगा। एक उदाहरण देता हूं। अपनी फिल्म की शूटिंग के दौरान मैं अररिया के सदर अस्पताल गया था। जिन सज्जन से मिलना था, वे आए नहीं थे। इसलिए हम पास ही के बरगद से सटे चबूतरे पर बैठकर उनका इंतजार कर रहे थे। हमारी बगल में एक अंधा व्यक्ति, अपनी पत्नी और एक लड़की के साथ बैठा था। मैंने उससे ऐसे ही पूछा कि वह यहां क्यों आया है। उसने जो बताया, वह भयावह था।

उसकी कहानी सुनकर मैं अंदर तक हिल गया। उसी जिले के एक दूर के गांव में रहने वाले इस आदमी की दोनों आंखें गांव के लोगों ने फोड़ दी थीं, लेकिन बारी-बारी से। उसकी बार्इं आंख 22 साल पहले फोड़ी गई थी और दार्इं आंख 22 साल बाद। उसका नाम मोहम्मद शाहिद था। मैंने उससे इसकी वजह पूछी तो उसने बताया कि गांव वालों ने उस पर छोटी-मोटी चोरी के आरोप लगाए थे। मुझे लगा कि मैं अपनी फिल्म के लिए इस व्यक्ति का साक्षात्कार करूं, जो मैंने किया भी। लेकिन अपने संपर्कों से मुझे बाद में पता चला कि इस व्यक्ति पर गाय की तस्करी करने के आरोप थे और गांव वालों ने इसी वजह से उसकी आंखें दो बार फोड़ीं।

बहरहाल, वजह जो भी हो, खुद को सभ्य कहने वाला कोई भी समाज इस तरह की घटना को किसी भी आधार पर सही नहीं ठहरा सकता।

मैं जो बात कहना चाहता हूं, वह यह है कि आज से 23-24 साल पहले भी भीड़ द्वारा हिंसा के कई उदाहरण हैं। शायद उससे पहले के भी होंगे। आज सभी वर्ग के लोग, यहां तक कि बच्चे भी भीड़ तंत्र के शिकार हो रहे हैं।

इसे जरा विस्तार से बताएंगे?

‘मॉब लिचिंग’ किसी जाति, मजहब या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। मैं सिर्फ तथ्यों के आधार पर अपनी बात कहूंगा। 2014 के दिसंबर महीने में बिहार के मधेपुरा जिले के रहने वाले अजय यादव की दोनों आंखें तेजाब डाल कर फोड़ दी गर्इं। उस पर आरोप था कि उसके किसी से अवैध संबंध थे। भीड़ ने उसकी आंखों में तेजाब डाल दिया। जो व्यक्ति भीड़ का नेतृत्व कर रहा था, वह अजय यादव की ही जाति का था।

इससे तीन साल पहले सुपौल जिले के हंसा गांव के रंजीत दास नाम के एक युवक की आंखें भी तेजाब डालकर फोड़ दी गई थीं। यह काम उसी के गांव के एक दबंग ने किया था। 2007 के 11 सितंबर को बिहार के नवादा जिले के तीन युवकों को भीड़ ने एक साथ तेजाब डाल कर अंधा कर दिया। उन पर मोटर साईकिल छीनने का आरोप था।

दो साल पहले भीड़ ने एक स्कूल के प्राचार्य की पीट-पीट कर हत्या कर दी, क्योंकि भीड़ को लगा कि उन्होंने दो बच्चों को बेच दिया है। उनकी मौत के बाद पता चला कि वह सिर्फ अफवाह थी। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि दो साल पहले नालंदा जिले में अदालत ने दो अपराधियों को आजीवन कारावास और 1,00,000 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। मामला यह था कि 28 साल पहले 1989 में जीयर गांव के रतन सिंह और तनिक सिंह ने जमीनी विवाद में पीड़ित उपेंद्र सिंह की आंखों में तेजाब डाल कर उनकी एक आंख चाकू से निकलवा ली। यहां भी भीड़ का ही सहारा लिया गया।

तो क्या बच्चे भी पीड़ित हुए हैं?

हां..बिल्कुल, पटना जिले के एक गांव के सरपंच के आदेश पर भीड़ ने 14 साल के धनवीर यादव की आंखें निकाल लीं। मेरे पास एक ‘विजुअल’ है जिसे मैंने फिल्म में जान-बूझकर इस्तेमाल नहीं किया। 2016 के जुलाई महीने में लखीसराय की आठ साल की एक बच्ची की एक आंख इसलिए फोड़ दी गई, क्योंकि उसने किसी के खेत से मटर के चंद दाने तोड़ लिए थे।

ये ऐसी घटनाएं हैं जिनसे हमें अपने को सभ्य कहते हुए शर्म आ जाए.. !

बिल्कुल.. यह जो भीड़ है, यह अपने आप काम नहीं करती। इसके पीछे एक तंत्र काम करता है जिसे हम भीड़ तंत्र के नाम से जानते हैं। जब मेरी फिल्म के मुख्य किरदार मुन्ना ठाकुर और उसके मित्र कन्हैया ठाकुर की आंखें फोड़ी गर्इं तो उसके पीछे जाति और अन्य निहित स्वार्थ काम कर रहे थे।

मुन्ना ठाकुर अपराधी था। बैंक लूटने, मारपीट, रंगदारी वगैरह के कई आरोप थे उस पर, लेकिन वह हत्या या बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में शामिल नहीं था। उसके समर्पण करने और जेल से वापस आने के बाद जब उसने गांव और समाज में में फिर से अपने लिए जमीन तलाशनी शुरू की तो उसने सबसे पहले अपनी पत्नी को महिलाओं के लिए आरक्षित सीट पर मुखिया उपचुनाव में लड़वाने का ऐलान कर दिया। विरोधी पक्ष को यह बात नागवार गुजरी तो उसने मुन्ना को मना किया कि वह ऐसा न करे, वरना परिणाम भुगतने होंगे। लेकिन मुन्ना ने उनकी बात नहीं मानी। नतीजा यह हुआ कि कोई तीसरा ही जीत गया। अगले दिन विरोधी पक्ष के लोग करीब 200 लोगों की भीड़ लेकर आए और मुन्ना और उसके दोस्त की आंखों में तेजाब डाल दिया। इस मामले में पीड़ित और उत्पीड़क, दोनों एक ही समाज के हैं। दोनों गैर-सवर्ण जाति के हैं, एक ही गांव के हैं। गौर से देखें तो पाएंगे कि यह मामला ऐसा है जिसे आप अंग्रेजी में 'orchestrated action' कह सकते हैं। यानी भीड़तंत्र को कोई अपने निहित स्वार्थ के लिए पूरी योजना के साथ निर्देशित कर रहा है, लेकिन वह आदमी या तंत्र पीछे है और भीड़ आगे है। और पूरे मामले में स्वार्थ सिद्ध हो रहा है उस व्यक्ति का जिसने मुन्ना ठाकुर से बदला लिया..भीड़ के जरिए.. भीड़ की मदद से। इसलिए ‘मॉब लिचिंग’ के ज्यादातर मामलों को इस संदर्भ में देखने की जरूरत है।

आपकी दृष्टि में भीड़ द्वारा अंजाम दी गई हिंसा के क्या कारण हैं?

आमतौर पर माना जाता है कि जब जनता का विश्वास लोकतंत्र के तीनों खंभों (न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका) से उठ जाता है तो ऐसी घटनाएं बढ़ने लगती हैं। मेरी राय में भीड़ कभी भी खुद कोई कार्रवाई नहीं करती। उसके पीछे कोई कारक काम कर रहा होता है और ज्यादातर मामलों में यह कारक अपने निहित स्वार्थ के तहत काम करता है। मुझे लगता है कि इस पर नीति निर्धारकों को गंभीरता से सोचना होगा। इन घटनाओं के बौद्धिक कारणों पर अनर्गल टीवी बहसों और कथित बुद्धिजीवियों द्वारा किसी पंथ/पक्ष के चश्मे से देखकर बेसिर-पैर का ज्ञान देने से कुछ नहीं होगा।

एक खास बात काबिलेगौर है। आप देखेंगे कि भीड़ जिसे अपना शिकार बनाती है, उसमें शायद ही कोई बड़ा अपराधी हो। ज्यादातर लोग मामूली चोर, छोटे-मोटे अपराधी और कई मामलों में तो बिल्कुल निर्दोष रहे हैं। बिहार में तो कई मामलों में साइकिल/मोटरसाइकिल चोरी के अपराध में भीड़ ने कथित चोरों की आंखें फोड़ दी हैं। तो क्या भीड़ बड़े अपराधियों से डरती है? या फिर, भीड़ को उकसाने वाला कारक/तंत्र डरता है?

दूसरी बड़ी वजह मेरे हिसाब से यह है कि हम अफवाहों पर यकीन करने वाले समाज का हिस्सा हैं। भीड़ सहज ही अफवाहों पर यकीन करती है। इस भीड़ में पढ़े-लिखे और अनपढ़ दोनों किस्म के लोग होते हैं, लेकिन मानसिकता भीड़ तंत्र की ही होती है जो उन्हें उकसाने वालों पर बड़ी आसानी से यकीन करती है।

तो मेरा मानना है कि ऐसी घटनाओं को अविलंब रोकने का एकमात्र तरीका भीड़ को नियंत्रित करने के असफल उपायों को छोड़ उन लोगों को पहचानने पर होना चाहिए जो भीड़ में उन्माद पैदा करते हैं। वह छुटभैया नेता हो सकता है, किसी पार्टी का मूर्ख लेकिन महत्वाकांक्षी कार्यकर्ता हो सकता है, किसी मुहल्ले या गांव का आपराधिक मानसिकता का कोई आदमी हो सकता है जो ऐसे घटनाओं के जरिए अपने निजी स्वार्थ साध रहा है या फिर बड़े शहरों में रहने वाला सफेदपोश हो सकता है।

इन सब के अलावा, मेरी सोच है कि इंटरनेट और डाटा की सहज और सर्वसुलभता से फायदे कम, नुकसान ज्यादा हुए हैं। यह एक दुधारी तलवार है जिसे अगर सही इस्तेमाल किया तो फायदे वरना नुकसान। इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध गलत सामग्री ने युवकों में एक आक्रामकता भर दी है जिसका असर उनके चरित्र पर अलग-अलग तरीकों से पड़ता है।

क्या भीड़ द्वारा की गई हिंसा की घटनाओं के प्रति समाज को सजग करने में मीडिया की भूमिका सही है?

इस पर अनगिनत किताबें और लेख लिखे जा चुके हैं। बहरहाल, मेरा मानना है कि आज का सेकुलर मीडिया उत्तेजना फैलाता है, सनसनी फैलाता है। उसे लगता है कि लोग यही देखना-सुनना चाहते हैं। इसलिए वह पूरी तन्मयता से इस काम में मशगूल है।

किसी भी चैनल पर किसी भी गंभीर मुद्दे पर गंभीर बहस के लिए समय नहीं है। चैनल लोगों को सोचने का मौका नहीं देना चाहते। आज तो जो संजीदा व्यक्ति है, उसे भी लगने लगा है कि जब तक चीखूं- चिल्लाऊं नहीं, तब तक कोई सुनेगा नहीं। तो आज उसने भी चिल्लाना शुरू कर दिया है। चैनलों पर हर आदमी चीख रहा है। वहां किसी भी गंभीर चीज के लिए कोई जगह नहीं है, न कोई उम्मीद है। उम्मीद समाज से ही है। समाज जागेगा तो ऐसी घटनाएं नहीं होंगी, वरना इसका कोई अंत नहीं है।