Panchjanya - ‘लिंचिंग’ को मुद्दा बनाकर हिंदू समाज को लिया जा रहा निशाने पर ‘लिंचिंग’ को मुद्दा बनाकर हिंदू समाज को लिया जा रहा निशाने पर
‘लिंचिंग’ को मुद्दा बनाकर हिंदू समाज को लिया जा रहा निशाने पर
   दिनांक 07-अगस्त-2018
कहीं भी, किसी की भी हत्या या कानून हाथ में लेना गलत है, लेकिन गोतस्करों के संदर्भ में ‘लिंचिंग’ एक खतरनाक शब्द हो चला है, जिसकी आड़ में सेकुलर मीडिया या दल घटना की जड़ में न जाकर, या चालाकी से तथ्यों को छुपाकर कहीं न कहीं केन्द्र सरकार या भाजपा की राज्य सरकारों पर निशाना साधते हैं। घटना अलवर की हो या मेवात की, केरल की हो या चेन्नै की, तथ्यों की प्रामाणिक परख न करना और हिन्दू समाज को सिरे से निशाने पर लेने के गलत चलन के विरुद्ध देश में आक्रोश बढ़ रहा है
 
 अकबर उर्फ रकबर के विरुद्ध मार्च, 2014 में अलवर में पुलिस में दर्ज एफआईआर की छायाप्रति   गोतस्करों के कब्जे से गायों को मुक्त कराते पुलिसकर्मी
हर शब्द की एक ध्वनि होती है, एक गूंज होती है। अक्सर ये आपकी जिज्ञासा, आपकी उलझनों का जवाब देते हैं। लेकिन ये सवाल भी करते हैं और हमसे जवाब की अपेक्षा करते हैं। और तब तक सवाल करते रहते हैं, जब तक जवाब मिल न जाए। ऐसा ही एक शब्द है ‘लिंचिंग’। शब्द हिंदी का नहीं है और न ही हमारी किसी क्षेत्रीय भाषा का। तो क्या हुआ? तमाम विदेशी भाषाओं के शब्दों की तरह यह भी हमारे सोचने-विचारने से लेकर अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया में शामिल हो चुका है। तो इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। हाल के समय में यह बार-बार हमारे सामने आ खड़ा होता है। तीखे और असहज करने वाले सवाल करता है। हम बार-बार नजरें चुराते हुए निकल जाते हैं। लेकिन ऐसा कब तक और किस कीमत पर? जवाब दें, जवाब तो देना पड़ेगा। तो क्यों न कम-से-कम यह विचारना शुरू करें कि जवाब क्या है?
‘लिंचिंग’ का दायरा बड़ा है। किंतु हाल के समय में यह मोटे तौर पर गो-रक्षा और गो-हत्या के बीच कहीं जाकर अटक गया है और ‘मुसलमानों के खिलाफ अत्याचार’ को परिभाषित करने लगा है। मामला उत्तर प्रदेश में दादरी के अखलाक का हो, हरियाणा के पलवल के जुनैद का, हरियाणा के नूंह के पहलू खान का या हरियाणा के ही मेवात के रकबर का। एक के बाद एक मामले जुड़ते जाते हैं और एक ‘मुसलमान विरोधी भाव’ पैदा करते हैं। लेकिन यह सब क्यों हो रहा है, क्या भारत वाकई इतना ‘असहिष्णु’ हो गया है? सो गिरेबां में झांकना जरूरी है।
सबसे पहले बात अखलाक की। अखलाक की भीड़ ने ‘गोमांस’ के शक में हत्या कर दी। इसमें निजी रंजिश का भी एक कोण था। पढ़ाने-दिखाने-सुनाने वाले तमाम मीडिया ने इसे ‘झूठे आधार पर की गई हत्या’ करार दिया और हिंदुओं के असिहष्णु होने का उदाहरण बताया। खैर, अखलाक के घर से बरामद मांस को फॉरेंसिक लैब भेजा गया और जांच में पुष्टि हुई कि वह गोमांस ही था। पहले चंद घटनाओं को एकत्र कर लें, विवेचना बाद में कर लेंगे। जुनैद की हत्या की जड़ में ट्रेन में सीट के लिए हुआ विवाद था, यह बात जांच में सामने आ चुकी है। मेवात के अकबर उर्फ रकबर की हाल ही में अलवर में भीड़ ने पिटाई कर दी और थाने में उसकी मौत हो गई। सुर्खी बनी, बननी भी चाहिए थी। तमाम मीडिया ने ‘लिंचिंग’ का बही-खाता निकालकर इसे बड़ा बना दिया, लेकिन एक बुनियादी सवाल की ओर से मुंह फेर लिया, कि रकबर की पृष्ठभूमि कैसी थी। मेवात की एसपी नाजरीन भसीन के मुताबिक उनके इलाके में रकबर के खिलाफ ऐसा कोई मामला नहीं, लेकिन अलवर में 2014 में उसके खिलाफ गो-तस्करी का मामला दर्ज हुआ था और वह जमानत पर चल रहा था।
अब विवेचना। पहली बात यह है कि चाहे कोई भी तर्क हो, ‘लिंचिंग’ को सही नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि हमारी व्यवस्था में इसके लिए कोई जगह नहीं है और इससे निबटने के लिए कानूनी रूपरेखा तैयार करने का काम चल रहा है। यह है कानूनी उपचार या प्रतिकार। लेकिन जो घटनाएं बार-बार हो रही हों, इतनी निरंतरता के साथ हो रही हों... और सबसे जरूरी बात यह कि, जिनके कारण देश-समाज का आधार-तत्व क्षीण हो रहा हो, क्या उसकी जड़ों की सुध नहीं लेनी चाहिए?
अगर एक तंत्र के तौर पर हम सही उपचार करने का लक्ष्य रखेंगे तो ‘लिंचिंग’ को अस्वीकार करने के बाद सबसे पहले मंथन इस बात पर होगा कि जिस संदेह के आधार पर ‘लिंचिंग’ हुई, क्या वह जांच में सही निकली? अगर इसका जवाब हां में है तो तंत्र को अपनी गिरेबां में झांककर यह खोजना होगा कि उससे कहां चूक रह गई कि लोगों का उस पर से भरोसा उठ गया और इसे कैसे बहाल किया जाए। अगर जांच में यह पाया गया कि ‘लिंचिंग’ जिस शक के आधार पर की गई, वह गलत थी तो इस पर सोचने की जरूरत नहीं। कानून उनसे निबट लेगा।

 
मेवात के अकबर उर्फ रकबर के पास से पुलिस ने बरामद कीं ये गाएं 
उम्मीद जगाती पहल
समस्या कोई भी हो, अंतत: उसका असर तो समाज पर ही पड़ता है। और अगर कोई समस्या बनी रहे तो उसके प्रतिकार के लिए समाज को आगे आना चाहिए। शासन-प्रशासन को जो करना है, वे करें। मेवात और इससे लगते इलाकों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनकी रोजी-रोटी गाय से जुड़ी है। लेकिन चंद गोतस्करों ने उनके लिए भी मुसीबत पैदा कर दी है। इसी को देखते हुए 2017 के दिसंबर में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने संघर्ष टालने का एक आसान सा उपाय सुझाया। उसने कहा कि मवेशियों को रात के अंधेरे में लेकर न निकलें, इससे पहली नजर में आपकी नीयत पर सवाल उठता है। अगर आप गो-तस्कर नहीं हैं तो अंधेरे में क्यों जाएं? गाय को लेकर जाना तो गुनाह है नहीं और न ही उन्हें खरीदना या बेचना। फिर आपको डरने की क्या जरूरत? आप पूरे कागजात के साथ गाय लेकर जाएं, लेकिन दिन के उजाले में। इसके साथ ही चेतावनी भी दी कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो किसी भी अप्रिय स्थिति पेश आने पर उनकी ओर से बचाव नहीं किया जाएगा।
वैसे ही, हरियाणा के रेवाड़ी से लगभग 14 किलोमीटर दूर एक गांव है बावल। हाल ही में वहां इसी मुद्दे पर 14 गांवों के पंचायत प्रतिनिधियों की बैठक हुई जिसमें गो-तस्करों के कारण गांव की सामाजिक समरसता पर उठ रहे सवाल पर चिंता जताई गई और नांगल तेजू में मेव और बावरिया जाति के लोगों के गांव में घुसने पर रोक लगाने की घोषणा की गई। यह है समाज के प्रतिकार का तरीका। कहते हैं, समस्या जहां केंद्रित होती है, उसके हल की प्रक्रिया भी वहीं से शुरू होती है। मेवात और इसके आसपास का इलाका गो-तस्करी की दृष्टि से जितना बदनाम रहा है, वहां से इस तरह के सकारात्मक उपचार का स्वागत किया जाना चाहिए। तमाम कानूनी-संवैधानिक कोशिशों के बीच इस धारा को जिंदा रखना चाहिए और इसे ताकत देनी चाहिए। आखिर एक छोटी-सी जमात ने यह तो समझा कि समस्या की जड़ गो-तस्करी में है, गो-हत्या में है और कानून किसी अप्रिय घटना के होने के बाद आॅपरेशन के लिए छुरी-कांटे निकालता है, लेकिन समाज तो इसे होने से ही टाल सकता है।
देश-समाज के सामने आज सवाल करता जो शब्द ‘लिंचिंग’ खड़ा है, उसे अब और टालना ठीक नहीं। यह समझना होगा कि ‘मजबूती’ और ‘कमजोरी’ बेशक नदी के परस्पर दो सर्वथा अलग किनारे दिखते हों, जो आपस में कभी नहीं मिलते, लेकिन सच्चाई ये है कि ये न केवल एक-दूसरे से जुड़े होते हैं बल्कि ऐसे जुड़े होते हैं कि एक किनारे की दिशा-दशा तय करने वाले जल कण आगे चलकर दूसरे किनारे के साथ उसी संलग्नता के साथ सक्रिय हो जाते हैं। यह दर्शन हर संदर्भ में लागू हो सकता है और देश के लिए भी। हमारे देश की मजबूती है इसकी विविधता। अलग-अलग वेश-भूषा। अलग-अलग बोली। अलग-अलग रीति-रिवाज।
आचार-विचार की बहुरंगी धाराएं। लेकिन यही कमजोरी भी बन सकती है अगर अविश्वास और भेद-भाव के कभी-कभार उभर आने वाले लक्षणों को स्थायी भाव बनाने की छूट दे दी जाए। नागरिक समाज को जो करना होगा, करेगा लेकिन सोचना इस तंत्र को भी होगा कि जन के मन में व्यवस्था के प्रति विश्वास का भाव कैसे जगाया जाए? ठोस आकार लेती ‘लिंचिंग’ की जड़ों को कैसे काटा जाए?
कम हमलावर नहीं गोतस्कर
वैसे तो देशभर में इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं जब पकड़े जाने पर गोतस्कर आक्रामक हो उठते हैं। दिल्ली के आसपास की बात करें तो राजस्थान-हरियाणा के सीमांत इलाकों में रोजी-रोटी के लिए गो-वंश पर निर्भर लोगों की संख्या अच्छी-खासी है, लेकिन मुट्ठी भर गोतस्कर इलाके को बदनाम कर रहे हैं। खासतौर पर नूंह-मेवात और इससे लगते राजस्थान के इलाके। ये गोतस्कर इतने दुर्दांत हैं कि पुलिस पर भी हमला करने से नहीं चूकते। पशु तस्करों की आक्रामकता और आए दिन पुलिस को पेश आ रही परेशानियों पर मेवात की पुलिस अधीक्षक नाजरीन भसीन कहती हैं, ‘‘कई बार ये लोग पुलिस पर हमला कर देते हैं। गोलियां तक चला देते हैं। कई बार हमने मुठभेड़ के दौरान ऐसे हमलावरों को पकड़ा भी है।’
कभी बिहार के रोहतास में चेनरी के पास गोतस्करों के हमले में सीओ और एएसआई गंभीर रूप से घायल हो जाता है तो कभी रेवाड़ी में गोतस्कर पुलिस दल पर गोलियां चला देते हैं। जब पुलिस इन्हें घेरकर पकड़ लेती है तो ये तस्कर नूंह के निकलते हैं। कभी उत्तर प्रदेश के संत कबीरनगर में गोतस्करों पर छापा मारने गई पुलिस टीम पर हमला बोल दिया जाता है, कभी बंगाल के मालदा में कुछ लोगों की इसलिए जमकर पिटाई की जाती है कि वे गोतस्करी में मदद करने से इनकार कर देते हैं। गोतस्करों की आक्रामकता की कहानियां देश के कोने-कोने से मिल जाएंगी।
14 जुलाई, 2017
ओडिशा के रायगढ़ जिले के चंदीली स्थित खेड़पोड़ा गांव में सॉफ्टवेयर इंजीनियर कानन व उनके दोस्तों पर गो-तस्करों डंडों व कुल्हाड़ियों से हमला किया। तस्करों ने कानन की पत्नी के साथ दुर्व्यवहार भी किया।
10 जुलाई, 2017
हरियाणा के रेवाड़ी में पुलिस ने गोतस्करों को पकड़ने की कोशिश की तो उन्होंने अधिकारियों पर गोलियां बरसार्इं और चेकपोस्ट तोड़ते हुए फरार हो गए।
9 जुलाई, 2017
ओडिशा के बेगुनिया में कालापत्थर में लगने वाले पशु मेले में तस्वीरें लेने पर गोतस्करों ने लाठी-डंडों से तीर्थो और निरंजन पर हमला किया और उन पर पत्थर फेंके। निरंजन गंभीर रूप से घायल हो गया, जबकि हमलावर घायल तीर्थो के पैसे, फोन और पासपोर्ट भी ले गए।
24 जून, 2017
कर्नाटक में पुलिस के सामने गोतस्करों ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड अधिकारी तिमाराजू पर हमला किया, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए। तिमाराजू ने हसन जिले के चन्नारायपटना में अवैध बूचड़खाने का भंडाफोड़ किया था।
महिलाओं पर हमले
कर्नाटक के रामनगर जिले में कनपुरा बाजार में गोतस्करों ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड की अधिकारी जोशीन एंथनी और कविता जैन तथा गऊ ज्ञान फाउंडेशन के कार्यकर्ताओं पर हमले किए और पुलिस तमाशबीन बनी रही। इन लोगों ने गोतस्करों की अवैध गतिविधियों की सूचना पुलिस को दी थी। एंथनी और कविता पर कई बार हमले हुए। एक बार तो गोतस्कारों ने उन्हें मंड्या जिले में मद्दुर पुलिस थाने के सामने बल्ले से बुरी तरह पीटा।
‘लिंचिंग’ की इन घटनाओं पर चुप्पी क्यों?
23 अगस्त,2008-ओडिशा के कंधमाल में वनवासी समाज की सेवा में लगे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती महाराज की ईसाई चर्च प्रेरित नक्सली तत्वों ने जन्माष्टमी के दिन जलेशपेटा आश्रम में हमला करके हत्या कर दी।
फरवरी, 2018 - केरल के पलक्कड़ जिले के अट्टाप्पदी में अनुसूचित जनजाति के 27 वर्षीय मधु की के.हुसैन एवं पी.पी. अब्दुल करीम ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। मधु पर खाने का सामान चुराने का आरोप था।
मार्च,2016- दिल्ली के विकासपुरी में अपने घर पर बेटे के साथ क्रिकेट खेल रहे 41 वर्षीय दंत चिकित्सक पंकज नारंग की गेंद सड़क पर मोटरसाइकिल सवार मुस्लिम युवक को जा लगी, जिसके बाद दोनों में बहस हुई। मामला इस कदर तूल पकड़ गया कि मुस्लिम युवक ने अपने 5 साथियों के साथ मिलकर पंकज की पीट-पीटकर हत्या कर दी।
पिछले वर्ष जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर की नौहट्टा जामिया मस्जिद के बाहर सुरक्षा में तैनात पुलिस उपाधीक्षक अयूब पंडित को शब-ए-कद्र के दौरान नमाजियों की भीड़ ने उकसाया और फिर पीट-पीटकर हत्या कर दी।
26 जनवरी,2018 -उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में तिरंगा यात्रा पर मुस्लिम बहुल मुहल्ले से पथराव किया गया, जिसके बाद हिंसा भड़क उठी। कट्टरपंथियों ने यात्रा में शामिल चंदन की गोली मारकर हत्या कर दी।
जुलाई, 2018 - महाराष्ट्र के धुले जिले में बच्चा चोरी करने वाले गिरोह का सदस्य होने के संदेह में भीड़ ने पांच लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी।
फरवरी,2018 -दिल्ली के रघुवीर नगर में रहने वाले अंकित सक्सेना की स्थानीय मुस्लिम परिवार ने इसलिए गला काटकर हत्या कर दी क्योंकि अंकित की कथित तौर पर उनके परिवार की लड़की से मित्रता थी।
सवाल मीडिया पर भी...
सवाल मीडिया पर भी है। जब कोई लिंचिंग होती है, उसे दिखाना ही चाहिए। लेकिन जो हो रहा है, उसकी एक परत उतारकर खबर की जड़ तक पहुंचने की उसकी प्रतिबद्धता को क्या हो गया है? मौके पर जाकर रिपोर्टिंग करने का बुनियादी सिद्धांत कहां गया? इसकी वजह आपाधापी और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ तो नहीं हो सकती, खासतौर पर अखबारों या प्रिंट मीडिया के संदर्भ में। दृश्य मीडिया में ब्रेकिंग न्यूज का दबाव हो सकता है। वैसे तो यह भी ‘गलती से चूक’ का बहाना नहीं हो सकता। जब होड़ होगी तो काम बेहतर होगा या बुरा हो जाएगा?
सच पूछें तो यहां सवाल ‘बुरे’ काम का नहीं बल्कि ‘झुके’ काम का है। ज्यादा पीछे नहीं जाइए, रकबर मामले को ही देख लें। जिस दिन उसकी हत्या हुई, उस दिन बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों ने बीते दिनों में लौटकर लिंचिंग कब-कब हुई, के जिक्र के साथ खबर पढ़ाई-दिखाई। लेकिन लिंचिंग की पृष्ठभूमि खंगालने वाला तीक्ष्ण दिमाग रकबर की पृष्ठभूमि खंगालना भूल जाता है। यह नहीं देख पाता कि 2014 में उसके खिलाफ गो-तस्करी का ही मामला दर्ज हुआ था।
दिल्ली-एनसीआर में बैठे बड़े मीडिया संस्थानों ने यह जहमत नहीं उठाई कि मौके पर जाकर ही देख लें कि क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ। 30 जुलाई को अलवर के उसी इलाके में, जहां रकबर को मारा जाता है, 40 किलो गोमांस पकड़ा गया। मौके पर पशु विशेषज्ञ को बुलाया गया, उसने गोमांस और गो-चर्म की पुष्टि की। कुछ लोग गिरफ्तार किए गए। लेकिन यह खबर नहीं बनती। क्यों? लिंचिंग के ही संदर्भ में सही, आपने गोतस्करी पर बात करनी तो शुरू की है। सच बताएंगे तो यह ढिंढोरा पीटने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि आप सच ही बताते हैं। खासतौर पर वैसी फॉल्ट लाइन पर तो हितों की रोटियां न सेंकें जो समाज को भ्रमित करती हो, गलत धारणा बनाती हो और लोगों को बांटती हो।