Panchjanya - उन्माद की असलियत, 1984 में सिखों के साथ हुई थी सबसे वीभत्स 'लिंचिंग उन्माद की असलियत, 1984 में सिखों के साथ हुई थी सबसे वीभत्स 'लिंचिंग
उन्माद की असलियत, 1984 में सिखों के साथ हुई थी सबसे वीभत्स 'लिंचिंग
   दिनांक 07-अगस्त-2018
पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के सिख विरोधी दंगों में कथित कांग्रेसियों के समूहों द्वारा सैकड़ों निर्दोष सिखों को यातनाएं देने, उन्हें जला कर मारने की लिंचिंग की सबसे वीभत्स घटनाएं हुई थीं। वर्तमान में ऐसी घटनाओं में तेजी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त रवैया अपनाया है
 
भाजपा कार्यकर्ता की हत्या के विरोध में सड़क पर उतरे पार्टी कार्यकर्ता 
उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में ‘भीड़ द्वारा कानून अपने हाथ में लेने’ की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए केन्द्र और राज्यों को ऐसी गतिविधियों से सख्ती से निबटने के सख्त दिशा-निर्देश देने के साथ ही संसद से भी ऐसे अपराध के लिये कठोर कानून बनाने पर विचार करने का सुझाव दिया है। सरकार भी इसके लिये तैयार नजर आयी और उसने गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में इसके लिये 7 सदस्यीय मंत्री समूह गठित कर दिया है।
लेकिन यहां सवाल उठता है, कि ऐसी क्या वजह और कारण हैं कि किसी घटना को लेकर उग्र भीड़ हिंसा पर उतारू हो जाती है? इसके लिये कहीं स्थानीय स्तर पर पुलिस की निष्क्रियता की तो भूमिका नहीं है? या फिर क्षेत्र की जनता या समूह को यह लगता हो कि संदिग्ध को पुलिस को सौंपने से कोई फायदा नहीं होगा? वैसे तो भीड़ द्वारा हिंसा करने और महज संदेह के आधार पर किसी की भी पीट-पीटकर हत्या करने की घटनायें लंबे समय से होती आ रही हैं। हमेशा ही यह आरोप लगता रहा है कि ऐसे मामलों में पहले तो पुलिस ही स्थानीय स्तर पर ढुलमुल रवैया अपना कर इसे टालने का प्रयास करती है और अधिक दबाव पड़ने पर वह जांच के बाद इतना ठोस मामला नहीं बनाती कि आरोपी को सजा हो सके। इसके लिये कई बार उसे अदालतों से डांट भी सुननी पड़ती है।
यह सही है कि ‘गोरक्षकों’ से जुड़ी ऐसी कुछ घटनायें इधर ज्यादा ही सुर्खियों में लाई गई हैं। लेकिन वास्तव में इससे अलग भी किसी उग्र समूह द्वारा निर्दोष व्यक्ति को पीट-पीटकर मारने की घटनायें सालों से होती आ रही हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के सिख विरोधी दंगों में कथित कांग्रेसियों के समूहों द्वारा सैकड़ों निर्दोष सिखों को यातनाएं देने, उन्हें जला कर मारने की सबसे वीभत्स घटनाएं हुई थीं। इसी तरह, हिंसक भीड़ द्वारा काला जादू करने के संदेह में महिलाओं की पीट-पीटकर हत्या, बच्चा चोरी करने के संदेह में लोगों से बर्बरता, उन्हें मार डालने की घटनाएं भी लिंचिंग ही हैं और दशकों से होती रही हैं। बलात्कार के आरोपी को भी पेड़ से बांधकर और पीटकर मार देने की घटनायें भी ‘लिंचिंग’ की श्रेणी में ही आती हैं। बताते हैं कि 2014 से पहले के राष्टÑीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो में उग्र भीड़ द्वारा हिंसा के दौरान लोगों की पीटकर हत्या करने जैसे अपराध के बारे में अलग से आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। शायद इन्हें पहले वर्गीकृत नहीं किया गया था।
इस संदर्भ में नागालैंड की घटना भुलाई नहीं जा सकती, जहां हजारों की संख्या में लोगों ने दीमापुर की केन्द्रीय जेल पर धावा बोलकर बलात्कार के आरोपी को निर्वस्त्र करके घुमाने के बाद उसे पीटकर मार दिया था। इसी तरह की एक अन्य घटना त्रिपुरा के दक्षिणी जिले में हुई जहां उग्र भीड़ ने एक सरकारी कर्मचारी की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। यह कर्मचारी गांव में एक युवक के शरीर की किडनी निकालने संबंधी अफवाह को निराधार बताने गया था। इन तथ्यों के मद्देनजर तुषार गांधी और कांग्रेस के तहसीन पूनावाला की जनहित याचिकाओं में चंद राज्यों को ही प्रतिवादी बनाना याचिकाकर्ताओं की मंशा पर भी सवाल उठाता है।

 
मार्च, 2015: लिंचिंग की एक वीभत्स घटना में दीमापुर जेल में बंद बलात्कार के एक आरोपी को भीड़ ने जेल से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला था
जबकि उधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद यह कहा भी था कि कथित ‘गोभक्तों’ की हिंसा स्वीकार्य नहीं है। राज्य सरकारों को ऐसे मामलों में तत्काल सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि हमारे समाज में हिंसा के लिये कोई स्थान नहीं है। पुलिस को अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाने के लिये अब शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। तुषार गांधी और तहसीन पूनावाला सहित कुछ लोगों की जनहित याचिकाओं में कम से कम तीन निर्देश देने के अनुरोध किये गये थे। इनमें से दो अनुरोधों पर न्यायालय ने विचार किया, लेकिन तीसरे बिन्दु को अपने दायरे से बाहर रखा। क्या था वह तीसरा बिन्दु? इसमें गुजरात, महाराष्टÑ और कर्नाटक में पशु संरक्षण और गोवध से संबंधित कानूनों के चुनिन्दा प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने का आग्रह किया गया था।
याचिका में गुजरात पशु संरक्षण कानून, 1954 की धारा 12, महाराष्ट्र पशु संरक्षण कानून, 1976 की धारा 13 और 15, कर्नाटक गोवध रोकथाम और पशु संरक्षण कानून, 1964 की धारा 13 को असंवैधानिक घोषित करने का भी अनुरोध किया गया था। लेकिन न्यायालय ने इन प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने के अनुरोध पर विचार नहीं किया। याचिकाओं में सिर्फ केन्द्र सरकार और छह राज्यों उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, झारखण्ड और कर्नाटक को प्रतिवादी बनाया गया था। अन्य राज्यों को प्रतिवादी नहीं बनाया गया था। क्यों? क्या दूसरे राज्यों में अकारण ही संदेह होने पर भीड़ लोगों की पीट-पीटकर हत्या नहीं करती? दूसरे राज्यों में भी इस तरह की घटनायें होती हैं। न्यायालय ने मामले पर कहा कि ऐसे अपराध का पता चलते ही तत्काल इसमें प्राथमिकी दर्ज की जाये और ऐसे मुकदमों की सुनवाई आरोप पत्र दाखिल होने के छह महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए। इन अपराधों की सुनवाई भी बलात्कार के मुकदमों की तरह ही त्वरित अदालतों में हो और दोषी पाये जाने वाले प्रत्येक अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं में प्रदत्त अधिकतम सजा दी जानी चाहिए। अब देखना यह है कि न्यायालय के सख्त निर्देशों के बाद भीड़ द्वारा हिंसा करने और कानून अपने हाथ में लेने की घटनाओं पर काबू पाने में पुलिस और प्रशासन किस हद तक कामयाब होता है।

 
कश्मीर में पुलिस उपाधीक्षक अयूब पंडित (प्रकोष्ठ में) की हत्या मुसलमानों की भीड़ ने कर दी थी, लेकिन किसी सेकुलर ने इसे मॉब लिचिंग नहीं कहा
इसलिए पनपता है आक्रोश
अधिकांश मामलों में होता यह है कि न्यायपालिका प्रशासन और पुलिस की अकर्मण्यता पर चिंता व्यक्त करते हुए महत्वपूर्ण निर्देश देती है और फिर मामला धीरे धीरे शांत हो जाता है। आवश्यकता तो स्थानीय स्तर पर पुलिस को अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाने के साथ ही स्थानीय स्तर पर लगभग निष्प्रभावी से पड़े खुफिया तंत्र को दुरुस्त किया जाये। अगर पुलिस और खुफिया तंत्र मजबूत हो तो स्थानीय स्तर पर पनपने वाले असंतोष पर समय रहते काबू पाया जा सकता है। कई बार तो यही लगता है कि पुलिस का ढुलमुल रवैया ही अनेक समस्याओं और अपराधों को जन्म देने में अप्रत्यक्ष रूप से अपना योगदान दे रहा होता है। देश की निचली अदालतों में ढाई करोड़ से भी अधिक मुकदमे लंबित हैं और यहां फैसले आने में काफी वक्त लगता है। हो सकता है कि ऐसे मामलों में भीड़ की मानसिकता फटाफट फैसला कर देने की रहती हो। यह एक गंभीर विषय है जिस पर सरकार से लेकर पंचायत स्तर तक विचार की आवश्यकता है।
न्यायालय ने दिए कड़े निर्देश
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अपने फैसले में केन्द्र और राज्योंं को ये निर्देश दिये हैं-
 1. एहतियाती कदमों के तहत राज्य सरकारों को हर जिले में पुलिस अधीक्षक स्तर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को नोडल अधिकारी बनाने और भीड़ की हिंसक गतिविधियों की रोकथाम में उनकी मदद के लिये पुलिस उप-अधीक्षक स्तर के अधिकारी तैनात करने का निर्देश दिया है। इस तरह की घटनाओं में संलिप्त होने की संभावना वाले समूहों के बारे में खुफिया जानकारी प्राप्त करने के लिये विशेष कार्यबल गठित करने और नोडल अधिकारी को अपने जिले के थाना प्रभारियों और खुफिया इकाई के साथ नियमित बैठक करके गोरक्षकों, उग्र भीड़ या पीटकर मार डालने की प्रवृत्ति वाले तत्वों की पहचान करने, सोशल मीडिया या अन्य तरीके से उत्तेजना पैदा करने वाली सामग्री को संप्रेषित होने से रोकने के लिये उचित कदम उठाने का निर्देश दिया है। राज्य के पुलिस महानिदेशक और गृह विभाग के सचिव के लिये सभी नोडल अधिकारियों और पुलिस के खुफिया प्रमुखों के साथ तीन महीने में एक बार स्थिति की समीक्षा करना जरूरी है।
2. उपचारात्मक कदमों के अंतर्गत यदि स्थानीय पुलिस के संज्ञान में किसी व्यक्ति को पीटकर मार डालने या भीड़ द्वारा हिंसा करने की घटना आती है तो उस क्षेत्र के थाना प्रभारी भारतीय दंड संहिता के संबंधित प्रावधानों के तहत अविलंब प्राथमिकी दर्ज करके अपने नोडल अधिकारी को सूचित करेंगे जो यह सुनिश्चित करेंगे कि पीड़ित परिवार को अनावश्यक परेशान न किया जाये। नोडल अधिकारी को इस तरह के अपराध की जांच की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करनी होगी और वह यह सुनिश्चित करेंगे कि प्राथमिकी दर्ज होने या आरोपी की गिरफ्तारी की तारीख से कानून में निर्धारित समयावधि के भीतर आरोप पत्र दाखिल हो। न्यायालय ने राज्य सरकारों को इस निर्णय की तारीख से एक महीने के भीतर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 ए के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुये लिंचिंग और भीड़ की हिंसा से पीड़ितों के लिए मुआवजा योजना तैयार करने का निर्देश दिया है। ऐसे अपराधों से संबंधित मुकदमों की सुनवाई के लिये प्रत्येक जिले में विशेष या त्वरित अदालतें होंगी।