मुसलमान योद्धाओं को शर्मसार करते हैं ओवैसी के बयान
   दिनांक 08-अगस्त-2018
अपनी वीरता से परमवीर चक्र, महावीर चक्र पदक प्राप्त करने वाले मुसलमान योद्धा ओवैसी जैसे नेताओं के बयानों से शर्मसार हैं
- अरुणेन्द्र नाथ वर्मा

वे सबके सब थल सेना की हरी वर्दी में नहीं थे। किसी के गठे हुए शरीर पर वायुसेना की वर्दी फब रही थी, तो कोई नौसेना की वर्दी में था। लेकिन विभिन्न पल टनों और सेवाओं की उन वर्दियों में एक समानता थी। मेरे सामने खड़े इन योद्धाओं के सीनों पर चमकते ये पदक आसानी से हासिल हो जाने वाले नहीं थे, बल्कि इनमें से एक के सीने पर तो वह पदक सुशोभित था जो लाखों सैनिकों वाली भारतीय सेनाओं में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से अब तक केवल 21 सपूतों को अलंकृत करके स्वयं गौरवान्वित हुआ था।
उस परम पावन पदक का ओज भरा नाम था-परम वीर चक्र। देश के जिन 21 सपूतों को ये पदक अभी तक मिले हैं उनमें सबसे पहला नाम सोमनाथ शर्मा का था। और उनके बाद के बीस वीरों में धनसिंह थापा, एल्बर्ट एक्का, सरदार निर्मल जीत सिंह सेखों, अब्दुल हमीद, ए. बी. तारापोर और विक्रम बत्रा भी थे। लेकिन इस समय मेरे सामने इनमें से एक अमर योद्धा ही खड़ा था। मैंने क्वार्टरमास्टर हवलदार अब्दुल हमीद को तुरंत पहचान लिया।
उनके साथ कंधे से कंधा भिड़ाकर दो और सजीले जवान सामने थे। उनके शौर्य पदक से भी कम आभा नहीं फूट रही थी। इन्हें भी पहचानने में समय नहीं लगा। आधे श्वेत और आधे नारंगी रंग के रिबन से लटकते उनके सीने पर दिल के साथ धड़क रहे इस पदक का नाम था महावीर चक्र। और जो दो योद्धा इनसे सुसज्जित थे उनके नाम से मैं परिचित तो था लेकिन पहचान नहीं पाया। देश में सबसे पहले महावीर चक्र से विभूषित होने वाले योद्धाओं में से इन दो को यह पदक आज से सत्तर साल पहले विभाजन के तुरंत बाद कश्मीर के युद्ध में मिले थे। फिर मुझे याद आ गया।
इनमें से एक का नाम था मोहम्मद उस्मान और दूसरे का नाम था मोहम्मद इस्माइल। और तब नजर पड़ी उनके साथ खड़े हुए दो और फौजियों पर जिसमें से एक वायुसेना की वर्दी में था। वीरचक्र से सम्मानित किए जाने वाले पहले वायुसैनिक जफर अली शाह को पहचानना कठिन नहीं था। उसी ने अपने साथी मुहम्मद अहमद जकी की तरफ इंगित करके कहा, ‘‘1948 में कश्मीर में मेरे साथ ये भी शहीद हुए थे।’’
इतने सारे परमवीरों, महावीरों और वीरों से घिरकर मैं भौंचक्का रह गया था। बड़ी मुश्किल से पूछने का साहस कर पाया कि वे मुझसे क्या चाहते थे। इनमें सबसे वरिष्ठ तो ब्रिगेडियर उस्मान थे, लेकिन सर्वोच्च पदक प्राप्त अब्दुल हमीद ने उत्तर दिया ‘‘इतने साल से हम चैन से अपनी कब्रों में लेटे हुए थे। देश के प्रति अपना सबसे बड़ा कर्तव्य निभा कर हम संतुष्ट थे और जन्नत में जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। लेकिन अब अचानक ओवैसी जैसे हमारे कुछ पथभ्रष्ट बंधुओं द्वारा हमें बताया जा रहा है कि हम हिन्दुस्थानी बाद में और मुसलमान पहले थे।
सेना में रहते हुए हमने तो अपने को हिन्दुस्थानी छोड़कर और कुछ समझा ही नहीं। अब समझ में नहीं आ रहा है कि क्या हम कयामत के दिन की प्रतीक्षा में यहां पड़े पड़े चुपचाप देखते रहें कि उसके आने के पहले ही पूरे देश को दोजख बना देने की क्या-क्या तरकीबें की जा रही हैं। देशभर को अपनी चपेट में लेने को आतुर इस कयामत को रोकने के लिए क्या करें? किसको समझाएं हम अपनी हताशा, अपनी मजबूरी? तुम ही कुछ करो?’’
मैंने उन्हें समझाना चाहा, ‘‘विघटनकारी तत्व किसी एक गुट के तो हैं नहीं। अब तो गुटों के बीच नए गुटों को खड़ा किया जा रहा है। ऐसे में किस-किस को मना कर पाऊंगा कि देश के सामने आपका नाम किसी एक पाले में डालने की बातें करके आपको दोजख में न घसीटें।’’ वे बोले, ‘‘सुना है तुम फौजी भी हो और लेखक भी। कोशिश करोगे तो जरूर जरा हमारी भावनाओं को किसी तरह पूरे देश के पास तक पहुंचा सकोगे।’’
मैंने वादा किया ‘कोशिश करूंगा।’ इस पर समवेत स्वर में उन्होंने जोर से जय हिंद का घोष किया कि मैं चौंक कर उठ बैठा। अब सोच रहा हूं वह बस एक सपना था या उनकी आत्माएं सचमुच मुझसे कुछ कहना चाहती थीं?