मीडिया के ये 'कुकर्म' जनता की नजरों से छिपे नहीं

कल्पना कीजिए कि स्कूल के आगे इस्लामिया की जगह किसी ने ‘हिंदू’ शब्द जोड़ा होता तो इसी मीडिया की क्या प्रतिक्रिया होती

बड़े-बड़े अखबार और चैनल बेशर्मी के साथ झूठी खबरें देने लगें तो इसे क्या कहेंगे? ‘टाइम्स आॅफ इंडिया समूह’ फर्जी खबरों की इस दौड़ में सबसे आगे है।

बीते सप्ताह इसकी वेबसाइट ने खबर दी कि भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने राफेल सौदे पर सवाल खड़े किए हैं और अदालत जाने की बात कही है। यह फर्जी खबर थी। स्वामी ने जब टाइम्स समूह को न्यायालय में घसीटने की धमकी दी तो उन्होंने माफी मांगते हुए यह फर्जी खबर हटा दी।

महाराष्ट्र के बुलढाणा में आसिफ नूरी नाम के एक मौलवी को अप्राकृतिक यौन कर्म करते पकड़ा गया। अखबार ने उसके बदले तिलक लगे एक साधु की तस्वीर लगाई। शीर्षक में भी मौलवी न लिखकर उसे ‘साधु’ बताया। यह वह ‘गलती’ है जो टाइम्स आॅफ इंडिया लगभग हर उस खबर के साथ करता है जिसमें कोई पादरी या मौलवी आरोपी हो। कुछ ऐसी ही स्थिति अंग्रेजी के दूसरे बड़े अखबार ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की है।

राजस्थान के बाड़मेर में एक हिंदू युवक को मुसलमानों की एक उग्र भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। अब अगर इस खबर में ‘मॉब लिंचिंग’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता तो मीडिया का वह झूठ खुल जाता जिसके अनुसार गोरक्षक ही लोगों की जान ले रहे हैं।

जौनपुर में 5 क्विंटल गोमांस पुलिस ने पकड़ा तो अमर उजाला अखबार ने उसे ‘प्रतिबंधित मांस’ लिखा।

असम में नागरिक रजिस्टर में 40 लाख लोगों को शुरुआती तौर पर अवैध पाया गया। यह लंबी प्रक्रिया है और अभी इस सूची में बदलाव की पूरी संभावना है। लेकिन मीडिया के एक वर्ग ने देशहित के इस कदम को विवादित बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शुरू से यह बात स्पष्ट थी कि यह सूची अंतिम नहीं है, इसके बावजूद इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार ने तीन-चार अपवादों को लेकर ऐसी रिपोर्ट छापी, जिससे पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े किए जा सकें। यहां याद रखना होगा कि याकूब मेमन और बुरहान वानी जैसे आतंकवादियों का समर्थन कर चुका इंडियन एक्सप्रेस पिछले कुछ समय से अक्सर भारत के नक्शे में आधा कश्मीर ही दिखा रहा है।

उत्तर प्रदेश के देवरिया में कुछ मुसलमान प्रधानाचार्यों ने अपने सरकारी प्राथमिक विद्यालयों को मदरसे में बदल दिया। उनमें गांधी, सुभाषचंद्र बोस की तस्वीरें हटाकर कुरान की आयतें लिखवा दीं और बच्चों को उर्दू में पढ़ाना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं सरकारी स्कूलों के आगे ‘इस्लामिया’ शब्द भी जुड़वा दिया।

स्थानीय लोगों ने सोशल मीडिया के जरिए यह मुद्दा उठाया तो कुछ अखबारों में छपा। लेकिन दिल्ली का ‘सेकुलर मीडिया’ इस पर चुप रहा। कल्पना कीजिए कि स्कूल के आगे इस्लामिया की जगह किसी ने ‘हिंदू’

शब्द जोड़ा होता तो इसी मीडिया की क्या प्रतिक्रिया होती।

रांची में भाजपा के एक नेता की हत्या कर दी गई। आरोपी मुसलमान थे। लोगों का आरोप था कि इसी समुदाय से संबंध रखने वाला स्थानीय पुलिस इंस्पेक्टर हत्यारों को बचा रहा है। लोगों का आरोप गलत भी हो सकता है, लेकिन आजतक चैनल ने इस खबर का संज्ञान लिया और पुलिस इंस्पेक्टर को बाकायदा हीरो बनाया। ]

सवाल पूछा गया कि क्या इस देश में मुसलमान होना गुनाह है। चैनल ने मारे गए दलित नेता को भाजपा की बजाय राष्ट्रीय जनता दल का बताया, ताकि भाजपा को पूरी तरह से खलनायक ठहराया जा सके। मीडिया के ये ‘कुकर्म’ जनता की नजरों से छिपे नहीं हैं। लोग भी समझने लगे हैं कि समस्या का असली कारण कहां पर है।