9 अगस्त ‘विश्व मूल निवासी दिवस' और भारत में उसकी प्रासंगिकता
   दिनांक 09-अगस्त-2018
 
प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी 9 अगस्त का ‘विश्व मूलनिवासी दिन’ और भारत सहित विश्व में अनेक स्थानों पर इसका सार्वजनिक कार्यक्रमों के रूप में आयोजन कुछ संकेत देकर जाता है। भारत के जनजाति क्षेत्रों में इस दिन को ‘आदिवासी दिन’कहते है।
आज हम यहां इस दिन को भारत में मनाने की क्या प्रासंगिकता है, इसके बारे में चर्चा करेंगे 
पहली बात तो ये कि 9 अगस्त को जिसे भारत में ‘आदिवासी दिन’ कहा जाता है वह वास्तव में ‘विश्व मूलनिवासी दिन’ है। अतंरराष्ट्रीय स्तर पर यदि विश्व मूलनिवासी दिन मनाया जाता है तो उसका उद्देश्य यह कि भूतकाल में विश्व के कई देशों में वहां के मूलनिवासियों पर हुए अत्याचारों के बारे में समाज को जानकारी मिले और उसके माध्यम से सच क्या है ?वह सबके सामने आये।
पहले कभी यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका खंड के देशों में साम्राज्यवादी ताकतों ने स्थानीय मूलनिवासियों पर आक्रमण कर अमानवीय अत्याचार किए, उनकी संस्कृति को नष्ट किया, वहां अपने उपनिवेश—कॉलोनियां बनाई। कहीं कहीं तो सम्पूर्ण मूलनिवासी समाज को ही नष्ट कर अपनी बस्ती बनाई। हमें यह जानना भी आवश्यक है कि कुछ वर्षों पूर्व आॅस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री केविनरूड ने इस संदर्भ में संसद में 13 फरवरी 2008 को सार्वजनिक रूप में वहां के मूल निवासियों से माफी भी मांगी थी।
आज समय बदला है। विश्व में हम परिवर्तन देख सकते हैं। जनजातीय समाज में आई जागृति के कारण आज समाज अपने अधिकारों के लिए आया है। ऐसे में जनजातीय समाज ‘विश्व मूलनिवासी दिन’ मनाए, उनके लिये एकता प्रकट करे तो उसमें कुछ अनुचित नहीं। परन्तु भारत में इसके मनाने की प्रासंगिकता पर विचार होना आवश्यक है।
पहली बात तो भारत में मूलनिवासी कौन है ? - भारत में सारे भारतीय यहां के मूलनिवासी हैं। यहां तो कोई न पहले आया, न बाद में। मूलनिवासी के बारे में विश्व में जो संकल्पना है, वैसा यहां कोई मूलनिवासी समाज नहीं है। यह बात हमने कई वर्षों पूर्व अंतरराष्ट्रीय मंच पर अधिकृत रूप में कही है और आज भी भारत सरकार अपने विचारों पर अड़िग है।
भारत के संविधान ने जिस समाज को अनुसूचित जनजाति के रूप में घोषित किया उसके विकास हेतु कई प्रकार के प्रयास चल रहे हैं। संविधान में जनजाति समाज के लिये कई अधिकारों का प्रावधान है। विश्व में मूलनिवासियों के अधिकारों की जो बात आज चल रही है वैसे अधिकार (उससे भी अधिक) भारतीय संविधानकर्ताओं ने पहले से ही जनजाति समाज को दिए हैं। इसलिए विश्व के अन्य देशों में मूलनिवासियों के अधिकारों की लड़ाई और भारत में जनजाति अधिकारों की बात में बहुत अंतर है।
एक बात है कि स्वतंत्रता के बाद जनजाति समाज के विकास हेतु जिन योजनाओं की सरकार ने आज तक घोषणा की है उसका लाभ वास्तव में जनजाति समाज को नहीं मिला। सरकारी अधिकारियों के रवैये के कारण समाज के अंतिम पंक्ति में खडे व्यक्ति तक लाभ नहीं पहुंचा। इसके लिये जनजाति समाज को अपनी बात करना उचित एवं न्यायपूर्ण कह सकते हैं। परन्तु विश्व के अन्य देशों में अपने अधिकारों के लिये जिस प्रकार की भाषा बोली जाती है वैसी स्थिति भारत में नहीं है।
भारत में कुछ लोग ‘आदिवासी दिन’ के नाम पर अपनी राजनीति कर रहे हैं, उसे भी समझने की आवश्यकता है। जनजाति समाज को संम्पूर्ण समाज के साथ जोड़ने के बदले अलग पहचान की बात होती हो तो उसमें देशहित नहीं है। जनजाति समाज के पढ़े-लिखें युवकोंं कोे इसे समझने की आवश्यकता है। वैसे भी अपने जनजाति बन्धुओं में शिक्षा का प्रतिशत कम है। इसलिये कोई भी आए और अपनी बात कहने के बहाने कुछ भी समझाये - ये कितना उचित होगा ? ‘हमें अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करना पड़े तो हम संघर्ष करेंगे परन्तु हमारे अधिकार लेकर ही रहेंगे’, यह सुनने के लिये तो अच्छा लगता है। परन्तु भाषण के बाद आंदोलन और इसका परिणाम यदि हिंसा में परिवर्तित होता हो तो कदापि उचित नही, इससे जनजाति को ही परेशानी होगी। स्वभाव से भोले भाइयों को समझाने वाले स्वार्थी तत्व मनमानी करते रहे और हम केवल देखते रहें यह भी ठीक नहीं। जागृत जनजातीय युवकों को ऐसे स्वार्थी तत्वों की मनसा को समझना होगा। इससे अपने समाज को बचाना होगा। ‘आदिवासी दिन’ के नाम पर यदि अलगाव की भावना बढ़ती है तो वह न जनजाति समाज के हित में है और देश के हित में।
हमें एक बात स्पष्ट रूप में जानना आवश्यक है कि हम समाज को जोड़ने का कार्य कर रहे हैं, न कि तोड़ने का। जनजातीय समाज यह सम्पूर्ण समाज का अभिन्न अंग था और आज भी है, इसमें कोई दो राय नहीं। यदि कोई हमारे जनजाति बन्धुओं को सम्पूर्ण समाज से अलग कर उसकी अलग पहचान बनाना चाहता है तो वह देश की एकता एवं अखण्डता के लिए संकट ही होगा। वास्तव में सांस्कृतिक विरासत को लेकर समाज को जोड़ने का कार्य करने की आवश्यकता है। देश में बाहरी शक्तियां सक्रिय हैं ऐसा न हो पाए। ऐसे में हमें समाज को जोड़ने के लिये कार्य करने की आवश्यकता है। जनजातीय समाज का विकास हो इस हेतु शिक्षा, आरोग्य, रोजगार जैसे क्षेत्रों में सेवा प्रकल्प चलाते हुए विकास के प्रयास होने चाहिए। सरकारी योजनाओं को भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक ले जाने के प्रयास होने चाहिए। परन्तु सेवा की आड़ में समाज को यदि उसकी आस्थाओं से दूर किया जाता है तो वह सर्वथा अनुचित है। जिसे ‘आदिवासी दिन’ कहते है उसका मंच जनजाति समाज के हित के लिये हो। मंच की भाषा सकारात्मक हो। यही भारत में प्रासंगिक होगा। आंखों पर पट्टी बांधे, कान बंद कर, हम विश्व के प्रवाह में बह न जायें और देश हित में क्या है और क्या होना चाहिए का विचार न करें यह कितना उचित होगा? जनजाति समाज के पढ़े-लिखें लोगों को और सम्पूर्ण समाज के संवेदनशील व्यक्तियों ने क्या सही और क्या गलत का विवेक जागृत रखते हुए अपने समाज का दिशादर्शन करना चाहिए।
भारत के तत्कालिन मुख्य न्यायाधिश वाई. के़ सबरवाल के अंतरराष्ट्रीय विधि संगठन, आई़ एऩ ओ़द्घ टोरेंटो में 2006 के इस विषय पर उनका भाषण इस विषय को पूरी तरह से स्पष्ट करता है।
9 अगस्त को विश्व मूलनिवासी दिन द्वारा जनजाति समाज के उत्थान हेतु बात हो और वह भी सकारात्मक भाषा में हो तो उसकी प्रासंगिता रहेगी। अन्यथा भारतीय समाज को तोड़ने की भाषा के लिये इस मंच का ‘आदिवासी दिन’ नाम से यदि उपयोग (वास्तव में उपयोग नहीं दुरूपयोग) होता है तो उसकी निंदा होनी चाहिये। इस के माध्यम से यदि राजनीति हो रही हो तो वह सर्वथा अनुचित है। राजनीति में भी कुछ नेता ऐसे होंगे जो समाज के हित में सोचते हैं उन्होंने अन्य के बद इरादों को खुली चुनौती देकर समाज का दिशादर्शन करना चाहिए। जनजाति समाज के पढ़े-लिखे व्यक्तियों ने इस बात को समझते हुए कार्यक्रमों का आयोजन करना और विश्व के मूल निवासियों के लिए एकजुटता दिखना ही भारत में प्रासंगिक होगा।