विश्व मूल निवासी दिवस और इतिहास में दबा दर्द
   दिनांक 09-अगस्त-2018
 

सन 1492 में भारत की खोज में कोलंबस निकला और पश्चिमी द्वीप समूह में पंहुचा। स्पेनिश यात्रियों को सोने की खोज में भारत (India) पहुचने का भ्रम हुआ इसलिए उस नई दुनिया को उसने प्दकपं नाम दे दिया तथा उनके निवासियों को इंडियन कहना प्रारंभ किया । किन्तु जब पूर्व दिशा से वास्कोडिगामा के नेतृत्व में India की खोज में निकला दल वास्तविक India के कालीकट बंदरगाह पर 1498 में उतरा तब वहां के लोगों को Indian कहा जाने लगा।
कोलंबस द्वारा खोजे क्षेत्र के लोगों का रंग लाल था इसलिए उन्हें रेड इण्डियन कहा गया। स्पेनिश लोगों ने चार बार यात्रा की। इटली के निवासी अमेरिगो वेपुस्सी (Amerigo Vepucci) ने दो बार अभियान चलाया। अमेरिगो ने पत्र लिखा। new world – more densely peopled & full of animals than our Europe or Asia or Africa अमेरिगो के इस पत्र के आधार पर जर्मन मानचित्र बनाने वाले ने इस क्षेत्र के अपने मानचित्र में Amerigo नामकरण किया। जो धीरे धीरे बदलकर अमेरिका कहा जाने लगा। सन 1507 में यह क्षेत्र अमेरिका कहा जाने लगा।
प्रथम बार 90 स्पेनिशों के साथ स्पेन से सात पाल नौकाओं से चला क्रिस्टोपफर कोलंबस जब 12 अक्टूबर 1492 को वर्तमान सन साल्वाडोर के सागर तट पर उतरा तब वहां के स्थानीय 'अरावाक' जनजाति के लोगों ने अतिथि के रूप में उनका खुले हृदय से एवं मैत्री भाव से स्वागत किया। उन आदिवासियों ने उस यात्री दल के सभी सदस्यों को अपने ढंग का उपहार देकर अतिथि के रूप में उनका सम्मान किया। कोलंबस ने स्पेन के राजा को लिखा है की वे लोग कितने शांतिपूर्ण और सद्भावी है जिसके आधार पर मैं निश्चयपूर्वक कहता हूं कि सारे विश्व में उनसे उत्तम अन्य कोई राष्ट्र नहीं हैं। वे अपने पड़ोसियों से आत्मीयता पूर्ण व्यवहार करते हैं। उनकी वाणी अत्यंत मधुर एवं सौम्य मुस्कराहट के साथ होती है। यद्यपि वे नग्न रहते हैं तथापि उनका व्यवहार अत्यंत शालीन तथा प्रशंसा योग्य है। ऐसे उद्गार व्यक्त करने के बाद भी उन स्पेनिशों ने उन पर भीषण अत्याचार, शोषण व जनसंहार का जघन्य व घृणित व्यवहार किया। इन स्पेनिशों ने 50-60 वर्षो में जोर जुल्म अत्याचार व अग्नेयास्त्रों तथा छल व बल से वहां अपना विशाल साम्राज्य खड़ा कर दिया। सन 1493 में कोलंबस को दूसरी बार 17 बड़े जहाजों में 1500 सैनिकों के साथ फिर भेजा गया। उस बार कोलंबस ने पोर्टेरीको सहित अन्य कई द्वीपों पर अपना अधिपत्य जमा लिया। उसने उनसे वहां के मूलनिवासी-जनजातियों को गुलाम बनाकर जमीन खोदकर सोना निकालने का काम क्रूरतापूर्वक करवाया। वापसी में कई आदिवासियों को बंदी बनाकर साथ भी ले गया।
1506 में कोलंबस के निधन के पश्चात स्पेनिश खोजी हर्नान्ड़ो कोर्टीस 500 सैनिकों के साथ 1519 में क्यूबा से पश्चिम चलकर प्रथम बार मैक्सिको पहुंचा। वहां ‘एजटेक’ जनजातीय लोगों ने उनका स्वागत किया तथा उन्हें उपहार स्वरुप स्वर्ण भेंट किया। एजटेक जनजाति के लोग अपने स्वजातीय प्रधान कठोर शासन से असंतुष्ट थे जिसके कारण स्पेनिशों के साथ राजधानी पर हमला करने पर एजटेकों ने कोर्टीस का साथ दिया। उन लोगों ने उसे पर्याप्त सोना उपहार में देकर वापस लौटने जाने को कहा। किन्तु कोर्टीस ने उनका सोना भी ले लिया तथा पूरे मैक्सोकोे देश पर स्पेनिशों का साम्राज्य भी स्थापित कर दिया। प्रतिक्रिया स्वरुप एजटेकों ने विद्रोह कर कोर्टीस सहित पूरी स्पेनिश सेना को भाग जाने को विवश कर दिया। किन्तु सोने के आकर्षणवश आग्नेयस्त्रों से संपन्न भारी सेना लेकर पुन: अगले वर्ष 1520 में उस नगर पर आक्रमण करके उसे पूरी तरह से तहस नहस कर दिया तथा ‘न्यू स्पेन’ नाम से उस देश की नई राजधानी मैक्सिको सिटी बसाई।
इस साम्राज्य विस्तार के समय हर जगह बड़ी संख्या में वहां के मूलनिवासियों पर स्पेनिशों ने निर्मम अत्याचार, कोड़ो की मार व दासों जैसा व्यवहार तथा स्त्रियों का शोषण किया। कितने ही बार जनसंहार भी किया गया। यह नंगा नाच दो सौ वर्ष तक चलता रहा।
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार सन 1517 में स्पेनिशों ने प्रथम बार 5 हजार अश्वेत अफ्रीकियों को कई जहाजों में भरकर करीबी देशों (वर्तमान वेस्टइंडीज) में स्थानांतरित कर के गुलामों के रूप में उनसे श्रमिकों का काम लिया। उनकी औरतों के साथ बलात्कार किया गया। यहां से अमेरिका में अफ्रीकियों को दास बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। इसके बाद अमेरिकी दासों के क्रय विक्रय ने स्पेनिशों के व्यापार का नया स्वरुप ही धारण कर लिया।
ब्रिटिश अभियान सन 1607 में ‘वर्जिनियां कम्पनी अप्रिफलन्दन’ का गठन करके प्रथम बार एक सौ अंग्रेज व्यापारियों को उस नए क्षेत्र में भेजा गया। वहां के स्थानीय आदिवासी ‘पौहटन’ ने अपने स्वजातीय स्वाभाव से उनका भी स्वागत किया। किन्तु अंग्रेजों ने कूटनीति अपनाते हुए स्थानीय जनजातिप्रमुख ‘वहुनसोनाकुक’ को सोने का मुकुट पहना कर उस जनजाति का राजा घोषित कर दिया। उससे प्रभावित होकर राजा ने लोगों को अंग्रेजों की सेवा करने व उनके कृषि कार्य में श्रमिक के रूप में कार्य करने को बाध्य कर दिया। वाहुनसोनाकुक ने 5 अप्रैल 1614 को अपनी बेटी ‘पोकाहोंटज’ का विवाह जॉन रौल्फ नाम के प्रमुख अंग्रेज से कराया। और स्वयं को इंडियन के बजाय अंग्रेज समझने लगा।
अंग्रेज बड़ी मात्रा में वहां के लोगों की जमीन पर तम्बाकू की खेती करने लगे। जिस कारण उन लोगों का अंग्रेजों से विवाद होने लगा सन 1622 में संघर्ष शुरू हो गया, जो बीच बीच में शांत होता और उभरता रहा। सन 1644 में जो संघर्ष हुआ जिसमें यद्यपि इंडियन्स ने सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा किन्तु दोनों ही बार इंडियन्स को ही पराजित होना पड़ा। अंग्रेजों ने जेम्सटाउन नाम से प्रथम बस्ती बनाई। 1675 में नथैनिअल बेकन ने वर्जिनिया के अन्त:वर्ती क्षेत्रों के मूल निवासियों पर एक हजार अंग्रेजों ने पुन: आक्रमण किया। स्थानीय लोगों के तीर कमान अंग्रेजों की बंदूकों के आगे नहीं टिक पाए। अंग्रेजों के बर्बरता का इतिहास गवाह है कि थोड़े ही समय में उस क्षेत्र के 8 हजार आदिवासियों की संख्या घटकर एक हजार से भी कम रह गई। सन 1670 में अंग्रेजों की संख्या 40 हजार जा पहुंची।
सन 1662 में ‘वैम्पानोआग’ जनजाति के प्रमुख ‘मैसासोइट’ का देहांत होने के बाद उसके पुत्र ‘मेटाकाम’ को किंग फिलिप नाम से राजा घोषित कर उसे अपनी और मिलाने की धूर्ततापूर्ण चेष्टा की। लेकिन मेटाकाम सजग था उसने इस षड्यंत्र को पहचाना और उसने अन्य जनजाति के लोगों के साथ भी अच्छे संबंध स्थापित कर जनजाति संघ निर्माण किया। किंग फिलिप ने 1675 में अंग्रेजों के 52 उपनिवेशों पर एक साथ आक्रमण कर के 12 बस्तियों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। किन्तु अंग्रेजों की बंदूकों आगे वे लोग टिक नहीं पाए और उपनिवेशवादियों ने पोकानोकेट एवं नैरंगासेट जनजातियों को उस क्षेत्र से समूल नष्ट कर दिया। इतना ही नहीं तो फिलिप की हत्या कर सार्वजनिक प्रदर्शन तथा अपना आतंक जमाने हेतु सड़क पर 20 वर्षों तक उसके नरमुण्ड को लटका कर रखा। किंग फिलिप की पत्नी, बेटे सहित सैकड़ों जनजातीय स्त्रियों और बच्चों को पकड़कर वेस्ट इंडीज में दास बनाकर बेच दिया गया। कुछ ही वर्षों में अंग्रेजों ने पूर्वी तटीय क्षेत्रों में अपने अपने समुदाय पर आधारित 13 ब्रिटिश उपनिवेश स्थापित कर दिए, जिसने आगे चलकर 50 स्वतंत्र राज्यों के सम्मिलित स्वरुप ‘संयुक्तराज्य अमेरिका’ नाम के श्वेतों के एक विशाल सशक्त राष्ट्र के नवनिर्माण की प्रमुख भूमिका अदा की।
डचों का आगमन
नीदरलैंड (हालैंड) के शासन ने हडसन नाम के एक ब्रिटिश नागरिक को समर्थन देकर 1610 में मेरिका के अभियान पर भेजा। वह नौकायन कारते करते अंध महासागर से संलग्न नुअर्क की खाड़ी में पहुंच गया तथा निकटवर्ती भू-प्रदेश को नीदरलैंड की सम्पति घोषित किया। सन 1634 में 300 डच एक स्थान पर बस गए तथा वहां के इंडियन्स के साथ फर व चमड़े का व्यापार करके लाभ कमाने लगे। कुछ दिन बाद व्यापारियों का एक और दल हडसन नदी के उत्तरी तट के एक द्वीप पर आया। उन्होंने वहां रहने वाले ‘मैहिकन’ जनजाति के लोगों को 50 मुद्रा तथा शीशे के चमकदार मोतियों का लालच देकर पूरा द्वीप खरीद लिया। उस द्वीप का नाम ‘मनहट्टन’ था। डच ओपनिवेशकों ने हालैंड की राजधानी ऐमस्टर्डम के नाम पर उसका नाम न्यू ऐमस्टर्डम रखा। आज वही मनहट्टन विश्व के आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया। अंग्रेजों ने यह नाम बदलकर इंग्लैंड के ड्रयूक आफ यॉर्क के नाम पर न्यूयॉर्क रखा।
1641 में क्रिफ्रट ने निकटवर्ती स्टेटन द्वीप के रैरिटन नाम के निरपराध आदिवासियों का दमन करने के लिए उनकी गिरफ्तारी प्रारंभ की। उसके प्रतिरोध करने के कारण 4 रैरिटनों की डच सैनिकों ने हत्या कर दी। उन जनजातियों ने बदले में 4 डचों को मारा। उसके कारण क्रिफ्रट ने क्रोध में आकर दो गांवों के निवासियों का रात्रि में सोते समय ही संहार करने का आदेश दिया। और रातों रात नरसंहार कर दिया गया।
इसी प्रकार यूरोपीय देशों ने अमेरिकी भूभाग पर आक्रमण कर, वहां के मूलनिवासियों के ऊपर अत्याचार, अनाचार एवं जनसंहार कर अपना अधिपत्य जमाया। वहां के मूलनिवासियों को शरणार्थी, गुलाम, आश्रित एवं दोयम दर्जे का नागरिक बनाया और आक्रांता मालिक बन गए। यही इतिहास अफ्रीका एवं आॅस्ट्रेलिया का भी है। आज वहां का मूल निवासी अपनी पहचान खोज रहा है, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। संयुक्त संघ द्वारा घोषित 9 अगस्त के विश्व मूल निवासी दिवस के उपलक्ष्य में इस इतिहास को याद करें उन अमेरिकी, अफ्रीकी एवं आॅस्ट्रेलिया के देशों के मूल निवासियों के प्रति भारत के सभी लोग अपनी संवेदना प्रकट करें। उनकी पीड़ा को समझे एवं उनके संस्कृति रक्षा के प्रयासों को बल दे। उनकी अधिकार की लड़ाई में उनके साथ खड़े रहे।
दुनिया में भारत ही ऐसा एकमात्र देश है जो संयुक्त राष्ट्र संघ के मूलनिवासी संरक्षण कानून के 57 वर्ष पूर्व यानि 1950 में भारत अपने जनजाति समाज को वो सभी संवैधानिक अधिकार दे चुका है जिसका उल्लेख संयुक्त राष्ट्र संघ ने किया है। संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत सरकार के प्रतिनिधि ने सन 2007 को घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करते समय यही कहा था कि भारत में रहने वाले सभी लोग यहां के मूल-निवासी हैं, हमारे यहां बाहर से कोई नहीं आया। अत: दुनिया के देशों में मूलनिवासियों की रक्षा करनी है तो भारत के संविधान का अध्ययन उन देशों को एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ को करना होगा और भारत के पदचिन्हों पर दुनिया को चलना होगा।
संदर्भ संकलन त्रिलोकीनाथ सिन्हा द्वारा लिखित आधार-किताब ‘विश्व की जनजातियां से लिया गया है’
(लेखक अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय संगठन मंत्री है।)