विश्व मूल निवासी दिवस पर विशेष : जनजातियों को तोड़ने का वैश्विक षड्यंत्र
   दिनांक 09-अगस्त-2018
भारत के जनजातीय समाज और दुनिया के अश्वेतों में अलगाववादी भावना भरने और उनको भड़काने का षड्यंत्र वैश्विक है। हमें साजिश को समझना बेहद जरूरी है।
- राजेन्द्र सिंह मरकाम

अपने परंपरागत परिधान में एक जनजातीय युवक। यह समाज सदियों से भारतीय संस्कृति का वाहक रहा है। 
भारत में 21 प्रतिशत वन क्षेत्र है। इसके 60 प्रतिशत क्षेत्र में जनजातीय लोग रहते हैं। लगभग 90 प्रतिशत खनिज संपदा जनजातीय क्षेत्रों में है। भारत में लगभग आठ प्रतिशत जनजातीय समाज है। जनजाति लोग सदियों से देशभक्त रहे हैं। जब भी जरूरत महसूस हुई, इन लोगों ने देश के लिए बलिदान दिया है। लेकिन आजादी के बाद कुछ भारत विरोधी तत्वों ने जनजातियों को देश की मुख्यधारा से काटने का प्रयास किया है। इस कारण अनेक क्षेत्रों में समस्याएं खड़ी हो गई हैं।
‘तोड़ो और राज करो’
11वीं सदी से ही एक-दूसरे इलाके पर चढ़ाई और कारोबारी संपन्नता एक-दूसरे की पूरक रही हैं। इसका आधार ‘न्यू क्रिश्चियन इकॉनोमी’ सिद्धांत है, जो पूरे विश्व के अश्वेत या गैर-यूरोपीय लोगों को ईसाई मत के अंतर्गत लाना चाहता है। इसके लिए विकासशील देशों में विश्व की बड़ी यूरोपीय शक्तियां छद्म रूप से कार्यरत हैं, जो बहुत बड़ी संख्या में मानवीय कार्य के बहाने पहले कन्वर्जन और फिर मजहब आधारित राष्ट्र के सिद्धांत पर कार्य करती हैं। अश्वेत और गैर-यूरोपीय देशों में अलग देश की मांग करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था यू.एन.पी.ओ. द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। इसका सदस्य नागालैंड का अलगाववादी संगठन ‘नागालिम’ भी है। यह संगठन नागालैंड के लिए भारत से अलग देश की मांग कर रहा है। उसकी मांग का समर्थन नार्वे और कई यूरोपीय देश करते हैं। इन ताकतों की नजर जनजातीय क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों पर भी है। इसलिए वे लोग इन क्षेत्रों के उग्रवादी संगठनों को हथियार आदि से मदद करते हैं।
माना जाता है कि जब सारी दुनिया में शांति कायम रखने में ‘संयुक्त राष्ट्र’ असफल रहा तब बहुत से देशों को लगने लगा था कि संयुक्त राष्ट्र में बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। इसके बाद गरीब देशों को ‘आर्थिक’ सहायता देने के नाम पर यू.एन.एच.आर.सी., यू.एन.डी.पी., यूनिसेफ जैसे कई संगठन खड़े हुए, जो देशों को ‘मानवीय’ आधार पर सहायता प्रदान करके अपना अस्तित्व बचा रहे हैं। उदाहरण के लिए दक्षिण अफ्रीका को ले सकते हैं। यहां की 70 प्रतिशत जनसंख्या अश्वेत है। 12 प्रतिशत एशियाई और केवल 18 प्रतिशत यूरोपीय मूल के लोग हैं। 1994 से पहले वहां की पूरी सत्ता केवल यूरोपीय मूल के लोगों के हाथ में थी। इन लोगों ने बड़ी संख्या में नरसंहार किए। संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के बावजूद अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और कई यूरोपीय देशों ने दक्षिण अफ्रीका के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखे। नाटो की सेनाओं के जरिए वहां प्रजातंत्र को मजबूत नहीं होने दिया गया। यानी संयुक्त राष्टÑ की सुरक्षा परिषद के सदस्य अपने स्वार्थों के लिए संयुक्त राष्ट्र का इस्तेमाल करते हैं।
मजदूरों के अधिकारों के लिए कार्य करने वाली संस्था आई.एल.ओ. (विश्व मजदूर संगठन) संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी हुई है। इसकी स्थापना 1919 में प्रथम विश्व युद्ध में विजयी हुए देशों ने की थी। 1989 में आई.एल.ओ. ने ‘राइट्स आॅफ इंडिजिनस पीपुल’ (कन्वेन्शन क्रमांक 169) घोषित किया। इसमें ‘इंडिजिनस पीपुल’ की परिभाषा को स्पष्ट नहीं किया गया है। इस कारण इसे 189 में से केवल 22 देशों ने स्वीकार किया। इसे स्वीकारने वाले मुख्य रूप से वे देश थे, जिनकी आज भी औपनिवेशिक कॉलोनियां हैं। इनमें मूल निवासी अभी भी दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। इसे भारत ने यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया है कि भारत के संविधान में इनसे कहीं अधिक अधिकार भारत के मूल लोगों को प्रदान किए गए हैं।
अमेरिकी दबाव
12 अक्तूबर, 1492 को कोलंबस के आगमन पर अमेरिका में कोलंबस दिवस मनाया जाता है। 1937 में यह आधिकारिक छुट्टी घोषित हुई। 2013 में हुए एक अमेरिकी सर्वेक्षण से पता चला कि वहां के केवल 58 प्रतिशत लोगों ने इस दिन को मनाने का प्रस्ताव माना, बाकी इसके विरुद्ध थे। पूरे विश्व में यूरोपीय समुदाय द्वारा वहां के मूल निवासियों पर किए अत्याचारों को ‘अमेरिकी होलोकास्ट’ का नाम दिया गया।
1977 में संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘इंटरनेशनल कांन्फ्रेंस आॅन डिसक्रिमिनेशन अगेंस्ट इंडिजिनस पॉपुलेशंस इन दी अमेरिका’ ने कोलंबस दिवस का नाम बदलकर इसे ‘इंडिजिनस पीपुल डे’ मनाने का प्रस्ताव दिया। 14 साल बाद इसे स्वीकार कर लिया गया। 1992 में बर्कले शहर में पहली बार 12 अक्तूबर, 1992 को ‘इंडिजिनस पीपुल डे’ मनाया गया। आज भी अमेरिका के अधिकतर राज्य इसे मनाते हैं। अमेरिकी दबाव में 1994 को 9 अगस्त को हुई बैठक को आधार मानकर ‘वर्ल्ड इंडिजिनस पीपुल डे’ बना दिया गया।
लेकिन आज भारत के जनजातीय लोग भी 9 अगस्त को ‘वर्ल्ड इंडिजिनस पीपुल डे’ मनाते हैं, जबकि अमेरिकी मूल निवासी इस दिन को ‘नरसंहार दिवस’ के रूप में मनाते हैं। क्या हमें भी यूरोपीय औपनिवेशिक ताकतों द्वारा अपने जनजातीय समुदायों के ऊपर किए गए अत्याचारों को भूल जाना चाहिए? क्या बिरसा मुंडा या किसी और अन्य वीर जनजातीय नायक से संबंधित दिनों को भूल जाना चाहिए?
भारत की वर्तमान स्थिति
1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से जनजातीय क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नजर है। माना जाता है कि यही कंपनियां वनवासी क्षेत्रों में युवाओं को हथियार उपलब्ध कराती हैं, उन्हें राष्ट्र-विरोधी हरकतों के लिए उकसाती हैं। भारत के लगभग 705 जनजातीय समुदायों को सनातन धर्म से अलग पहचान बनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। जनजातीय समाज के लिए कई विदेशी संस्थाएं अलग ‘धर्म कोड’ या 2021 की जनगणना में सनातन धर्म से अलग मत की मांग के लिए संघर्षरत हैं, ताकि विश्व पटल पर हिंदुओं की संख्या को कम किया जा सके और मिशन संस्थाओं द्वारा इन लोगों को ईसाई बनाया जा सके और वे मजहबी अलगाववाद का कारण बन सकें। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा जैसे राज्यों में जनजाति प्रतिशत किसी भी अन्य राज्य की तुलना में सबसे बड़ी राजनीतिक इकाई है। इसीलिए इन राज्यों में जनजातीय का कन्वर्जन कराया जा रहा है, ताकि राजनीतिक लाभ उठाया जा सके।
मेघालय, नागालैंड, मिजोरम में अधिकांश जनजातीय लोग ईसाई हो चुके हैं। इसके बावजूद वे एक-दूसरे को स्वीकार नहीं करते। मिजोरम के लोग इसी राज्य की चकमा जनजाति को राज्य से बाहर करने की मांग कर रहे हैं। इसी तरह नागा समुदाय ने मणिपुर के जनजाति सुमुदाय को नागा क्षेत्र से हटाने के लिए कई बार आर्थिक नाकेबंदी की है। इसी प्रकार अरुणाचल प्रदेश में ईसाई बन चुके जनजाति लोग अपने ही लोगों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं। इसलिए हमें अपने लोगों को जगाना होगा, अन्यथा आने वाले समय में जनजातीय क्षेत्रों के हालात बेकाबू हो सकते हैं।