खेलेंगे, कूदेंगे, बनेंगे नवाब
   दिनांक 10-सितंबर-2018

पुराने वक्त में कहा जाता था-
पढ़ोगे, लिखोगे, बनोगे नवाब। खेलोगे, कूदोगे, होगे खराब।।
दरअसल यह दरबारी चाकरी, सरकारी नौकरी में ही खुद को शाह समझने की गफलत, और इतने भर को ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मान लेने वाला, दासता के दौर से उपजा और लाइसेंस-कोटा राज में हसरतों के टूटने से गाढ़ा हो चुका अनुभव था। यह वह कल था जब क्लर्की खेल और खिलाड़ियों पर भारी थी, यह आज है-जब खिलाड़ियों ने सामाजिक प्रतिष्ठा का मैदान मार लिया है। वे सामाजिक परिभाषाएं भी घिस गर्इं जिन्हें घिस जाना चाहिए था। यह ‘खेलोगे, कूदोगे, बनोगे नवाब’ वाला नया दौर है। जकार्ता में संपन्न एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन अब तक का सर्वश्रेष्ठ है। सारा देश अपने खेल सितारों के लिये पलक पांवड़े बिछाए है, क्योंकि उन्हीं की वजह से अब भारत खेल महाशक्ति बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर दिखता है।
15 स्वर्ण और 24 रजत पदक बताते हैं कि खेल जगत में एशिया का उनींदा गजराज अब अंगड़ाई लेते हुए जाग रहा है। कुछ लोग इस उपलब्धि का महत्व इस तथ्य से कम कर आंक कर रहे हैं कि 15 स्वर्ण पदक तो हम 1951 में भी प्रथम एशियाड में जीत चुके थे। बात ठीक है, किंतु यह एक पक्षीय और अधूरा तर्क है। इस तथ्य में जुड़ा एक और तथ्य यह है कि 1951 के एशियाई खेल दिल्ली में हुए थे और स्वाभाविक ही मेजबान के तौर पर हमें घर में खेलने का लाभ मिला था। जकार्ता में बात एकदम अलग थी, दूसरी महत्वपूर्ण और रेखांकित करने योग्य बात यह है कि पहले एशियाई खेलों का प्रदर्शन दोहराने में हमें करीब 7 दशक लग गए।
जाहिर है, एक ओलंपिक पदक विजेता खिलाड़ी के केंद्रीय मंत्री बनने से प्रशासकीय सुस्ती और अव्यावहारिक अड़चनों का सिलसिला टूटा है। गौर करने वाली एक और बात यह है कि देश को गर्व से भरने वाले ज्यादातर चेहरे युवा हैं और भारी-भरकम पहचान तथा लकदक से दूर हैं। मिसाल के लिए मेरठ के गन्ना किसान के अप्रतिम प्रतिभावान् पुत्र 16 वर्षीय सौरभ चौधरी और 15 साल के शार्दूल ऐसे खिलाड़ी हैं जिनकी अभी ठीक से मसें भी नहीं फूटीं और उन्होंने निशानेबाजी/ट्रैप शूटिंग में सीधे सोने-चांदी पर निशाना लगा दिया। भालाफेंक में नीरज चोपड़ा की बाजुओं का दम बताता है कि वे ओलंपिक में भी कमाल कर सकते हैं। खिलाड़ी खिलाड़ी ही होते हैं किंतु फिर भी कम उम्र और सामान्य पृष्ठभूमि दो ऐसे महत्वपूर्ण कारक हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और ना ही किया जाना चाहिए।
पहली बात यह कि उम्मीद की जा सकती है कि आपके पास युवा जोशीली खेप है तो इसके खेलने का क्रम भी लंबा चलेगा। दूसरी बात यह कि रिक्शा चालक, बुनकर, किसान और कमजोर आर्थिक स्थिति से गुजरते जिन खिलाड़ियों ने जकार्ता में देश का परचम लहराया, वे आज जीवन के विभिन्न कार्य क्षेत्रों में इस देश के तमाम लोगों के लिए अलग तरह के आदर्श या रोल मॉडल की तरह खड़े हैं। ये विरले उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि तमाम मानसिक व आर्थिक परेशानियों को पीछे छोड़ जीत की ओर, लक्ष्य की ओर कैसे बढ़ा जा सकता है। ये जीत की वे कहानियां हैं जो बताती हैं कि अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर सिर्फ अपना नहीं, सब का मान कैसे बढ़ाया जा सकता है। जाहिर है, ऐसी जीत सिर्फ उत्साह नहीं बढ़ाती, परेशानियों से लड़ने का रास्ता भी सुझाती है, एक आदर्श सामने रखती है।
-भाला फेंक में देश को पहली बार सोना दिलाने वाले तेजिंदर सिंह कैंसर से जूझते अपने मरणासन्न पिता की चिंता में डूबे होने पर भी देश के सम्मान की लड़ाई जी-जान से लड़ रहे थे।
-आॅटो रिक्शा चालक की बेटी स्वप्ना बर्मन जबड़ा टूट जाने पर भी ठोढ़ी पर टेप लगाए, असहनीय दर्द सहते हुए देश के लिए पहली बार महिलाओं का हेप्टाथलन स्पर्धा का स्वर्ण पदक कमा रही थी...
सामान्य पृष्ठभूमि की नई प्रतिभाओं की ऐसी उछाल भावुक करने वाली और कई मामलों में तो द्रवित करने वाली भी है। उदाहरण के लिए एथलेटिक्स में हिमा दास का अंतिम क्षणों में कीर्तिमान रच देना और राष्ट्रगान पर भावनाओं का बह निकलना। हेप्टाथलन में बिटिया को कमाल करते देख एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की विह्वलता, खुशी के आंसू और हिलकियों में लिपटी मां का घर में छोटे से मंदिर में जगत्जननी की मूर्ति के सामने बेसुध होकर गिर पड़ना...खेल बार-बार होते हैं मगर ऐसे मौकों का साक्षी होना बार-बार भाग्य में नहीं होता।
एशियाड के नतीजों का एक बड़ा सकारात्मक संकेत यह भी है कि घरेलू मोर्चे पर जहां ‘खेलो इंडिया’और ‘फिटनेस चैलेंज’ जैसी पहल देश में खेल और कसरत का माहौल बना रही हैं, वहीं राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भारतीय प्रतिभाएं लगातार स्तरीय प्रदर्शन और प्रतिभा की धमक दर्ज करा रही हैं। अत: कह सकते हैं कि अभी आप-हमने पदकों की चमक देखी है। आने वाले दिनों में नई पौध के बूते पदकों की फसल लहलहाएगी। बात पक्की है।