चमकते सितारे आइए, जानते हैं जकार्ता में अपनी प्रतिभा का सिक्का जमाने वाले कुछ सितारों को
   दिनांक 10-सितंबर-2018
 
सौरभ चौधरी (16 वर्ष)  (एयर पिस्टल निशानेबाज)  जन्म - कलीना गांव, मेरठ (उत्तर प्रदेश)
उपलब्धियां
जकार्ता एशियाई खेल -2018 में स्वर्ण
2018 जूनियर विश्व कप, सूल (जर्मनी) में स्वर्ण
युवा एशियाई निशानेबाजी प्रतियोगिता-2017 (जापान) में स्वर्ण
युवा एशियाई निशानेबाजी प्रतियोगिता-2016 (तेहरान) में रजत
सौरभ ने वरिष्ठ श्रेणी में पहली बार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेते हुए एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वे एशियाई खेलों के इतिहास में भारत की ओर से स्वर्ण पदक जीतने वाले पांचवें निशानेबाज हैं
मूल मंत्र
सुबह 8.00 बजे से शाम 6.00 बजे तक पास के बिनौली गांव के शूटिंग रेंज में अभ्यास करते हैं। सौरभ के पिता जगमोहन सिंह कहते हैं, ‘‘सौरभ अभ्यास में इतना मशगूल रहता है कि खाना तक भूल जाता है। वह शाम को घर आते ही अपने कमरे में चला जाता है और दीवार के साथ टारगेट शीट्स लगाकर प्लास्टिक की गोली से तीन-चार घंटे तक निशाना साधता है। वह रात को सोने से पहले कमरे में साधे गए निशानों की जांच करता है और सुबह जागने के बाद भी पहला काम यही होता है। कई बार तो मैं सोच में पड़ गया कि कहीं मेरा बेटा पागल तो नहीं हो गया। पर जब उसने विश्व के तमाम दिग्गजों को बिना किसी तनाव के हराकर देश का नाम रोशन किया तो समझ में आया कि वह महज खेलता नहीं, निशानेबाजी की तपस्या करता है।’’
पृष्ठभूमि
सौरभ ने महज 16 वर्ष की आयु में अपने से दुगुनी उम्र के विश्व चैंपियन और ओलंपिक चैंपियन खिलाड़ियों को पछाड़ते हुए 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता। मेरठ के एक गन्ना किसान के पुत्र सौरभ ने फाइनल में जापान के विश्व चैंपियन तोमोयुकी मत्सुदा को हराकर भारत की ओर से एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाला सबसे युवा खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया। दसवीं कक्षा के छात्र सौरभ का मन पढ़ाई में कम लगता है। वे निशानेबाजी को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना चुके हैं।
प्रेरणास्रोत
बेहद सौम्य और मृदुभाषी सौरभ की मां बृजेश देवी का मानना है कि उनका बेटा निशानेबाजी में इस तरह लीन रहता है कि उसने खुद को प्रशिक्षण केन्द्र और अपने कमरे तक सीमित कर रखा है। वह गांव के ज्यादातर लोगों को पहचानता तक नहीं है। निशानेबाजी के दौरान अपनी पिस्टल को मजबूती व स्थिरता के साथ थामे रखने के लिए सौरभ घंटों अपनी कलाई पर हल्का वजन फीते से टांगकर घंटों अभ्यास करता है।
चुनौतियां
सौरभ के गांव में कबड्डी, सॉफ्टबॉल और भारोत्तोलन के कई खिलाड़ी हैं, लेकिन निशानेबाजी में उनका साथ देने वाला कोई नहीं था। अत: गांव से दूर निशानेबाजी प्रशिक्षण केन्द्र पर अभ्यास करने के लिए उसने पढ़ाई छोड़ दी। यही नहीं, एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के अगले ही दिन सौरभ वापस स्वदेश लौटे, पर परिजनों से मिलने गांव नहीं गए और दक्षिण कोरिया में होने वाली विश्व जूनियर चैंपियनशिप व अक्तूबर में ब्यूनस आयर्स में होने वाले युवा ओलंपिक की तैयारी में जुट गए।
 

शार्दुल विहान (15 वर्ष) (डबल ट्रैप निशानेबाज) जन्म - सिवाया गांव, मेरठ (उत्तर प्रदेश)
उपलब्धियां
जकार्ता एशियाई खेल- 2018 में रजत पदक
राष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिता -2017 में चार स्वर्ण पदक (जूनियर व सीनियर वर्ग में व्यक्तिगत और टीम दोनों स्पर्धाओं के स्वर्ण)
शार्दुल एशियाई खेलों में भारत की ओर से कोई भी पदक जीतने वाले सबसे युवा खिलाड़ी हैं। शार्दुल से दुगुनी उम्र से भी ज्यादा कोरिया के 34 वर्षीय शिन ह्यून वू ने महज एक अंक के अंतर से स्वर्ण पदक जीता। कतर के 53 वर्षीय अल मारी हमाद उनसे पार नहीं पा सके और कांस्य जीता। पूर्व ओलंपियन व अर्जुन पुरस्कार विजेता अनवर सुल्तान से दिल्ली में प्रशिक्षण ले रहे शार्दुल ने कहा, ‘‘स्पर्धा से पहले कोच ने कहा था कि सभी प्रतिभागी तुमसे बड़ी उम्र के होंगे, तुम दबाव नहीं लेना व बेपरवाह होकर निशाने पर ध्यान केंद्रित रखना।’’
पृष्ठभूमि
मेरठ के निशानेबाज शार्दुल विहान गन्ना किसान परिवार से आते हैं। हालांकि उनके पिता दीपक विहान बिल्डर हैं। जकार्ता एशियाई खेलों में पुरुषों की डबल ट्रैप स्पर्धा में रजत पदक जीतने वाले शार्दुल के पिता ने कहा, ‘‘महज 9 वर्ष की उम्र में शार्दुल को निशानेबाजी का शौक लग गया। वह प्रशिक्षण के लिए रोजाना मेरठ से दिल्ली जाता था। जब वह 12 वर्ष का हुआ तो उसे आधिकारिक तौर पर निशाना लगाने की अनुमति मिली। डबल ट्रैप प्रशिक्षण शुरू करने से करीब दो वर्ष पहले वह घंटों राइफल लेकर अपना ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास करता था, क्योंकि उसे फायर करने की अनुमति नहीं थी।
मूल मंत्र
शार्दुल प्रशिक्षण के लिए दिल्ली आने-जाने के दौरान गाड़ी में ही नाश्ता और दिन का भोजन लेते थे। कई बार तो कार में ही सो जाते थे। वे सुबह चार बजे से शाम छह बजे तक बिना रुके अभ्यास करते हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत सकारात्मक सोच के साथ शूटिंग रेंज पर जाना और भरपूर ऊर्जा के साथ घंटों फायर करने की क्षमता है। इतनी छोटी उम्र में भी शार्दुल का एकाग्रता बनाए रखने का अभ्यास उन्हें अन्य निशानेबाजों से अलग करता है। किसी भी बड़ी स्पर्धा में उतरने से पहले वे प्रतिपक्षी खिलाड़ी की प्रतिष्ठा या उपलब्धियों से प्रभावित नहीं होते। सिर्फ सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
प्रेरणास्रोत
शार्दुल के पिता दीपक विहान ने बताया, ‘‘एक 15 वर्षीय बालक के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। उसने यह जो उपलब्धि हासिल की है, उसे लोग ताउम्र हासिल नहीं कर पाते। मुझे एशियाई खेलों में उससे काफी भरोसा था। हालांकि वह रजत पदक ही जीत सका, पर स्वर्ण पदक उसकी पहुंच से दूर नहीं है, क्योंकि शार्दुल ने अब तक जितनी भी प्रतियोगिताओं में भाग लिया, कभी खाली हाथ नहीं लौटा।’’

राही सरनोबत (27 वर्ष)  ,  (एयर पिस्टल निशानेबाज) , कोल्हापुर, महाराष्ट्र
उपलब्धियां
जकार्ता एशियाई खेल- 2018 में महिलाओं की 25 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण
एशियाई खेलों में निशानेबाजी का स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी
2013 में चांगवोन (दक्षिण कोरिया) में विश्वकप में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी
2010- दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों की 25 मीटर एयर पिस्टल पेयर्स स्पर्धा में स्वर्ण
ल्ल 2014 -ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों की 25 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण
पृष्ठभूमि
16 वर्ष की उम्र में निशानेबाजी शुरू की। पुणे में 5-6 घंटे का कड़ा अभ्यास करते हुए युवा राष्ट्रमंडल खेलों में दो स्वर्ण पदक जीत सुर्खियों में आर्इं। इसके बाद देश के लिए कई उपलब्धियां हासिल कीं।
मूल मंत्र
राही अभ्यास के दौरान खान-पान और योगाभ्यास का खास ध्यान रखती हैं। किसी भी प्रतियोगिता से पहले गहन अभ्यास के दौरान इन बातों का ख्याल रखते हुए ध्यान केंद्रित करने के लिए संगीत सुनना पसंद हैं। अपने लक्ष्य से ध्यान नहीं भटकने देतीं।
प्रेरणास्रोत
चोट से उबरने के बाद राही ने जर्मनी की पूर्व ओलंपिक पदक विजेता और विश्व चैंपियन मुंखबायर दोसुर्रेन के मार्गदर्शन में अभ्यास शुरू किया और अपने करियर को अप्रत्याशित रूप से विराम देने से बचाया। दोसुर्रेन और राही सरनोबत के बीच मां-बेटी जैसा रिश्ता है। राही की निजी प्रशिक्षक ने उन्हें मानसिक तौर पर विश्वास दिलाया कि अगर जीत की अदम्य इच्छाशक्ति हो तो वे एशियाई खेलों में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली महिला निशानेबाज बन सकती हैं। उन्होंने जकार्ता में 25 मी. एयर पिस्टल का स्वर्ण जीतने के बाद स्वीकार किया कि 16 वर्षीया मनु भाकर जैसी युवा निशानेबाज की टीम में अहम भूमिका है। युवा निशानेबाजों का शानदार प्रदर्शन हमें अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करता है। राही ने दिखाया कि वे स्वर्ण पर निशाना साधने के लिए निजी कोच से प्रशिक्षण लेने के अलावा युवा खिलाड़ियों की चुनौती भी स्वीकारने से पीछे नहीं हटतीं।
चुनौतियां
2016 रियो ओलंपिक के बाद कोहनी में चोट के कारण काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। एक समय उन्होंने निशानेबाजी छोड़ने का मन बना लिया था, लेकिन जीत की प्रबल इच्छाशक्ति के कारण वे दो साल पुरानी चोट से उबरने में सफल रहीं और जकार्ता में इतिहास रच डाला।

नीरज चोपड़ा (20 वर्ष) ,(भाला फेंक) , पानीपत, हरियाणा
नीरज चोपड़ा ने जकार्ता एशियाई खेलों में 88.06 मीटर दूरी तक भाला फेंक कर स्वर्ण पदक जीता। नीरज एशियाई खेलों की भाला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने। मिल्खा सिंह (1958) के बाद नीरज एक ही वर्ष में राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों की ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट बने
उपलब्धियां
2018 जकार्ता एशियाई खेल में स्वर्ण
2018 गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण
2017 एशियाई चैंपियनशिप, भुवनेश्वर में स्वर्ण
2016 सैफ खेल, गुवाहाटी में स्वर्ण
2016 विश्व अंडर-20 चैंपियनशिप, पोलैंड में स्वर्ण
पृष्ठभूमि
खांद्रा गांव, पानीपत के निवासी नीरज चोपड़ा किसान परिवार से हैं। डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ से पढ़ाई के दौरान नीरज ने वर्ष 2016 में जूनियर विश्व चैंपियनशिप में रिकॉर्ड बनाने के साथ स्वर्ण जीता जिसके बाद उन्हें भारतीय सेना में जूनियर कमीशंड आॅफिसर की नौकरी मिल गई। नीरज शुरू में एनआईएस, पटियाला में प्रशिक्षण लेते थे, लेकिन उनके कोच ने उन्हें बाद में ‘साई’ केन्द्र, बेंगलुरु में अभ्यास करने की सलाह दी। पिछले दो साल से नीरज वहीं अभ्यास करते हैं।
प्रेरणास्रोत
नीरज चोपड़ा ने अपने ट्विटर हैंडल पर डाल रखा है, ‘‘जब सफलता की ख्वाहिश आपको सोने न दे। जब मेहनत के अलावा और कुछ अच्छा न लगे। जब लगातार काम करने के बाद थकावट न हो, समझ लेना, सफलता का नया इतिहास रचने वाला है।’’ वाकई नीरज का आत्मविश्वास बताता है कि उन्हें शिखर छूने से रोक पाना आसान नहीं है। जिस तरह नीरज की चुनौती खुद वे ही होते हैं, उसी तरह उन्होंने सफलताओं की सीढ़ी चढ़ते हुए अपने लिए मुकाम खुद तय कर रखा है। वे निरंतर अपने प्रदर्शन में सुधार करते जा रहे हैं।
लक्ष्य
नीरज का लक्ष्य 2020 टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतना है। बेंगलुरु में चूंकि ठंड या गर्मी ज्यादा नहीं पड़ती इसलिए एथलीटों के अभ्यास के लिए वहां का ‘साई’ केन्द्र सबसे उपयुक्त माना जाता है। जूनियर विश्व रिकॉर्ड बनाने के अलावा नीरज ने 88.06 मीटर का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाते हुए जकार्ता में स्वर्ण जीता है, इसलिए अब उनका एकमात्र लक्ष्य अपने प्रदर्शन को और बेहतर करते हुए ओलंपिक में पदक जीतना है। वे प्रतिदिन छह घंटे अभ्यास करते हैं, जिसमें वह भाला फेंकने की तकनीक और ताकत बढ़ाने पर विशेष जोर देते हैं। आमतौर पर 90 मीटर तक भाला फेंकने वाले एथलीट का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक पक्का होता है। नीरज कहते हैं, ‘‘यह सिर्फ एक थ्रो की बात है। अगर आपका दिन अच्छा हो और आप लय में हों तो यह दूरी कभी भी मापी जा सकती है। मेरा ध्यान अभी 90 मीटर नहीं, बल्कि टोक्यो ओलंपिक से पहले खुद को चोटिल न होने देने के अलावा तकनीक व ताकत को बेहतर करने पर है।’’
 
तेजिंदर पाल सिंह तूर (23 वर्ष) , (गोला फेंक) , खोसा पांडो जिला मांगो (पंजाब)
उपलब्धियां
2018 जकार्ता एशियाई खेल में स्वर्ण
2017 एशियाई चैंपियनशिप, भुवनेश्वर में रजत
पृष्ठभूमि
तेजिंदर पाल बचपन में क्रिकेट खेला करते थे, लेकिन उनके किसान पिता को शायद आभास हो गया था कि उनका बेटा ताकत वाले किसी खेल में नाम रोशन कर सकता है। इसलिए उन्होंने तेजिंदर को गोला फेंक में किस्मत आजमाने को कहा। बेहद बलशाली और खेलों के प्रति दीवानगी ने उन्हें सफलता की सीढ़ी चढ़ाई।
प्रेरणास्रोत
पिता की बीमारी के दौरान तेजिंदर काफी विचलित रहे। वे कई बार खेल छोड़ने की बात सोचते रहे। लेकिन कोच एम. एस. ढिल्लों और परिजनों ने तेजिंदर को हर वक्त अपने खेल पर ध्यान केन्द्रित करने को प्रेरित किया। तेजिंदर को भी आभास था कि वे अपने पिता को कैंसर से निजात नहीं दिला सकते, लेकिन उनके जीते-जी उन्हें देश का नाम रोशन कर गौरवान्वित जरूर कर सकते हैं। बस इसी दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ वे जकार्ता गए और ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। स्वर्ण पदक जीतने के बाद तेजिंदर ने कहा भी था, ‘‘पिता सहित मेरे परिवार ने कभी भी मेरा ध्यान भंग नहीं होने दिया। उन्होंने मुझे सपना पूरा करने की ओर बढ़ाए रखा। मेरे परिवार ने काफी त्याग किए हैं और इन सबका फल मिल गया।’’कठिन परिस्थिति में भी देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने का सपना पालना आसान नहीं होता। लेकिन तेजिंदर ने तमाम तनावों के बीच न केवल पिता का एक बड़ा सपना पाला, बल्कि कड़ी मेहनत और निरंतर आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति के साथ उसे पूरा करके देश के युवा खिलाड़ियों के सामने एक अविस्मरणीय उदाहरण भी पेश किया। वे यह संदेश देने में सफल रहे कि अगर आप शीर्ष पर आने को प्रेरित हों तो उसे हासिल करने से आपको कोई नहीं रोक सकता।
मूल मंत्र
जकार्ता एशियाई खेलों में पुरुषों की गोला फेंक स्पर्धा चल रही थी और तेजिंदर भारत की ओर से चुनौती पेश कर रहे थे। कड़ी मेहनत और जीत की इच्छाशक्ति के साथ जकार्ता गए तेजिंदर के सामने सिर्फ एक लक्ष्य था - स्वर्ण पदक जीतना। लेकिन तेजिंदर अपनी प्रतिष्ठा के हिसाब से प्रदर्शन नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि उनके दिलोदिमाग पर कैंसर से जूझ रहे अपने पिता के प्रति चिंता थी। अचानक प्रतियोगिता स्थल के बगल से तेज आवाज आई, ‘‘तुझे शर्म से मर जाना चाहिए... मैंने तेरे लिए अपना घर छोड़ा और तेरे पिता कैंसर से जूझ रहे हैं।’’ इतना सुनना था कि पंजाब के यह जांबाज एथलीट तेज हुंकार भरते हुए गोला फेंकने के लिए अपने पांचवें और अंतिम प्रयास के लिए चल पड़ा। तेजिंदर ने 20.75 मीटर तक गोला फेंकते हुए न केवल स्वर्ण पदक अपने नाम किया, बल्कि एक ही थ्रो में राष्ट्रीय रिकॉर्ड और एशियाई खेलों का रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज कर शान से तिरंगा फहरा दिया। हालांकि तेजिंदर के कोच एम. एस. ढिल्लों असल में उसे कोस नहीं रहे थे, बल्कि तेजिंदर को गुस्सा दिलाना चाहते थे ताकि 21 मीटर के आसपास की दूरी तय कर स्वर्ण पदक जीतने का जो लक्ष्य लेकर तेजिंदर जकार्ता गए थे, उसे हासिल कर सकें। तेजिंदर का भी ध्यान अपने लक्ष्य पर ही था और उन्होंने उसे हासिल करके दिखा दिया।
 
बजरंग पूनिया (23 वर्ष), (फ्रीस्टाइल पहलवान) , झज्जर, हरियाणा
उपलब्धियां
2018 जकार्ता एशियाई खेल में स्वर्ण (65 किग्रा फ्रीस्टाइल)
2018 गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण (65 किग्रा फ्रीस्टाइल)
2017 दिल्ली एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण (65 किग्रा फ्रीस्टाइल)
2014 इंचियन एशियाई खेल में रजत (61 किग्रा फ्रीस्टाइल)
2013 बुडापेस्ट विश्व चैंपियनशिप में कांस्य (60 किग्रा फ्रीस्टाइल)
मूलमंत्र
बजरंग ने जकार्ता एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के लक्ष्य के साथ सोनीपत में योगेश्वर दत्त के मार्गदर्शन में कड़ा अभ्यास किया। बजरंग ने अपनी आक्रामक शैली के अलावा पिता और योगेश्वर की सलाह पर रक्षात्मक शैली पर भी काफी मेहनत की। बजरंग ने जकार्ता जाने से पहले अपने परिवार और योगेश्वर दत्त से वादा किया था कि इस बार वह स्वर्ण पदक लेकर ही लौटेंगे।
पृष्ठभूमि
7 वर्ष की उम्र में पहलवान पिता ने कुश्ती शुरू कराई। उनका परिवार सोनीपत आ गया ताकि भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के क्षेत्रीय प्रशिक्षण केन्द्र में बजरंग प्रशिक्षण ले सकें। बजरंग लंदन ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता योगेश्वर दत्त को अपना गुरु मानते हैं और अब उन्हीं से प्रशिक्षण लेते हैं।
प्रेरणास्रोत
बजरंग के लिए जकार्ता एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतना सबसे बड़ा सपना था। उन्होंने स्वर्ण जीतने के बाद कहा, ‘‘यह मेरा सबसे बड़ा स्वर्ण पदक है, क्योंकि जकार्ता में स्वर्ण जीतने का मतलब है कि आप टोक्यो ओलंपिक में खेलने के दावेदार बन जाते हैं। मेरी नजर टोक्यो ओलंपिक पर है और मैं उसकी तैयारी भी कर रहा हूं। योगी भाई (योगेश्वर दत्त) ने मुझसे कहा कि उन्होंने 2014 में ऐसा ही किया था और मुझे 2018 में ऐसा करना ही होगा। जब लोग उम्मीद करते हैं तो फिर मुझे भी वैसा ही करके दिखाना होगा।’’
 
दूती चंद (22 वर्ष) , (धाविका) ,जाजपुर, ओडिशा
उपलब्धियां
2018 जकार्ता एशियाई खेलों में 2 रजत पदक (100 मी. और 200 मी. दौड़)
2017 एशियाई चैंपियनशिप, भुवनेश्वर में 2 कांस्य पदक (100 मी. और 4100 मी. रिले दौड़)
2013 एशियाई चैंपियनशिप, पुणे में कांस्य पदक (200 मी. दौड़)
2014 एशियाई जूनियर एथलेटिक चैंपियनशिप, ताइपे में 2 स्वर्ण (200 मी. और 4400 मी. रिले दौड़)
करारा झटका
2014 में इंचियन एशियाई खेलों और ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों के लिए क्वालीफाई करने के बावजूद अंतिम समय में दूती चंद को भारतीय दल से बाहर कर दिया गया। एक गरीब बुनकर परिवार से ताल्लुक रखने वाली दूती के लिए यह सबसे बड़ा सदमा था। दूती को हाइपर एंड्रोगेनिज्म जांच में महिलाओं में पाए जाने वाले हार्मोन का स्तर ऊंचा होने के कारण दो वर्ष के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। उन्होंने कोई शक्तिवर्धक दवा लेने जैसी कोई गलती भी नहीं की थी। यह महज एक संयोग था कि किसी-किसी महिला के शरीर में पुरुषोचित हार्मोन की मात्रा बढ़ी हुई पाई जाती है जो दूती के साथ भी था।
एक गरीब परिवार से संबंध रखने वाली दूती की स्टार एथलीट बनने की आस तब टूटती नजर आई जब उन पर तमाम आरोप लगाए गए। किसी ने उन पर अपने लिंग की जानकारी छुपाने का आरोप लगाया तो किसी ने पूछा, ‘‘तुम लड़का हो या लड़की?’’ जांच के दौरान दूती के रक्त और मूत्र के नमूने के साथ लिंग जांच के लिए उनका अल्ट्रासाउंड भी किया गया। दूती उस समय घोर मानसिक पीड़ा से गुजर रही थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
प्रेरणा
दूती अपने ऊपर लगे आरोप से मुक्त होना चाहती थीं और ट्रैक पर आकर एक बार फिर से दमखम दिखाना चाहती थीं। मैदान और खेल पंचाट दोनों ही जगह उनकी जीत की जिद इतनी प्रबल थी कि अंतत: भारतीय एमच्योर एथलेटिक फेडरेशन को खेल पंचाट (लुसाने) के आगे झुकना पड़ा। दूती को एक्टिविस्ट (सामाजिक कार्यकर्ता) डॉ. पायोशनी मित्रा का साथ मिला, जिन्होंने न केवल उनको संकट के दौर से उबरने में मानसिक तौर पर मदद की, बल्कि खेल पंचाट में भी उनकी ओर से पैरवी कर अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक महासंघ और राष्ट्रीय खेल संघ को दूती पर से प्रतिबंध हटाने को मजबूर किया। दूती मानसिक प्रताड़ना के उस दौर को भूल नहीं पाईं और फर्राटा दौड़ में एक के बाद एक सफलताएं अर्जित करते हुए अपने आलोचकों को करारा जवाब दिया। जकार्ता में भी एशिया की दूसरी सबसे तेज धाविका घोषित किए जाने से पहले दूती के दिलोदिमाम पर मानसिक प्रताड़ना की यादें छाई हुई थीं। लेकिन उन्होंने जकार्ता एशियाई खेलों में फर्राटा भरते हुए अपने ऊपर लगे आरोपों को एक झटके में झूठा साबित कर दिया।