खेलों में भारत का बढ़ता कद

                                                                                                                                                       - प्रवीण सिन्हा            जकार्ता एशियाई खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। भारत ने 15 स्वर्ण सहित कुल 69 पदक जीत इन खेलों में देश को दुनिया में अग्रणी बना दिया। युवा खिलाड़ियों ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से भारतीय खेल जगत का कद तो बढ़ाया ही, बेहतर भविष्य की उम्मीद भी जगाई

जकार्ता एशियाई खेल में भारत का मान बढ़ाकर लौटे खिलाड़ी दल से भेंट करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, दार्इं ओर बैठे हैं खेलमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर जकार्ता एशियाई खेलों में ऐतिहासिक सफलता हासिल करने के बाद भारतीय खेल जगत में फिर से एक नई आस जगी है। भारत ने 15 स्वर्ण सहित कुल 69 पदक जीत एशियाई खेलों में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। सबसे बड़ी बात यह है कि कई युवा स्टार खिलाड़ियों ने विपरीत परिस्थितियों से पार पाते हुए कई जो सफलताएं हासिल की हैं, उसने भारतीय खेल जगत के कद को और ऊंचा कर दिया है। एशियाई खेलों के इतिहास में भारतीय खिलाड़ियों द्वारा कई स्पर्धाओं में पहली बार पदक जीते गए तो कुछ ने तो किशोरावस्था में ही अपना अद्वितीय कौशल दिखाया। इस क्रम में यह कहना गलत नहीं होगा कि जकार्ता एशियाई खेलों में धूमकेतु की तरह उभरे निशानेबाज सौरभ चौधरी व शार्दुल विहान सहित नीरज चोपड़ा, हिमा दास, स्वप्ना बर्मन और दूती चंद जैसी युवा खिलाड़ियों ने नया विश्वास, नया जोश भरते हुए भारतीय खेल जगत को एक नया आयाम दिया है। पदकों के लिहाज से भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन यही दर्शाता है कि पदक विजेता चैंपियन खिलाड़ियों की संख्या बढ़ी है। पिछले कुछ वर्षों से निशानेबाजी, कुश्ती, एथलेटिक्स, बैडमिंटन, मुक्केबाजी और टेबल टेनिस जैसे खेलों में भारत ने अपनी पहचान कायम रखी है। लेकिन इस बार जकार्ता में नीरज चोपड़ा (पुरुष भालाफेंक), स्वप्ना बर्मन (हेप्टाथलन), तेजिंदरपाल सिंह (पुरुष गोलाफेंक), जिनसन जॉनसन (पुरुष 1500 मीटर दौड़) व अमित पंघाल (लाइट फ्लाईवेट मुक्केबाजी) का एशियाई खेलों में भारत की ओर से पहली बार स्वर्ण पदक जीतना कहीं ज्यादा मायने रखता है। यही नहीं, मेरठ के किशोर निशानेबाजों सौरभ चौधरी (16 वर्ष) और शार्दुल विहान (15 वर्ष) ने जकार्ता में यादगार प्रदर्शन करते हुए 15 वर्षीय अनीश भनवाला और 16 वर्षीय मनु भाकर के साथ निशानेबाजी में भारत के स्वर्णिम भविष्य की राह खोली है। ये युवा निशानेबाज भले ही ड्राइविंग लाइसेंस हासिल करने की पात्रता न रखते हों, पर भारतीय निशानेबाजी को शिखर तक ले जाने की ड्राइविंग सीट इसने जरूर हासिल कर ली है।इन युवा खिलाड़ियों का चमकदार प्रदर्शन यही दर्शाता है कि भारतीय खिलाड़ी अब ओलंपिक, एशियाई खेल और विश्व चैंपियनशिप जैसी बड़ी खेल स्पर्धाओं में महज भागीदारी के लिए नहीं जाते, बल्कि उनका लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना होता है। अब भारतीय खिलाड़ियों को हार बर्दाश्त नहीं होती और उनकी बादशाहत कायम रखने की प्रबल इच्छाशक्ति बदलते भारतीय खेल जगत की तस्वीर पेश करती है। शायद इसी का नतीजा है कि एशियाई खेलों के इतिहास में जिस कबड्डी खेल में भारत अब तक लगातार स्वर्ण पदक जीतता रहा, जकार्ता में पहली बार स्वर्ण पदक से चूकने (महिला टीम को रजत और पुरुष टीम को कांस्य पदक मिला) के बाद खेलप्रेमियों और विशेषज्ञों ने हायतौबा मचा दी। कमोबेश यही स्थिति भारतीय हॉकी टीमों की रही जब खेल प्रेमी महिला और पुरुष दोनों ही वर्गों में स्वर्ण पदक न जीत पाने का अफसोस मनाते दिखे। और तो और, एशियाई खेलों के इतिहास में भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी या टीम इस स्पर्धा में अब तक कांस्य पदक से आगे नहीं जीत सकी थी। लेकिन जकार्ता में पी.वी. सिंधू का पहली बार रजत पदक जीतना भले ही इतिहास के पन्नों में एक नया अध्याय जोड़ गया, फिर भी वे सुर्खियां नहीं बटोर पार्इं। कबड्डी, हॉकी और बैडमिंटन में पदक जीतने के बावजूद निराशाजनक प्रतिक्रियाओं के उदाहरण भारतीय खेल जगत में स्वर्णिम दौर की शुरुआत के संकेत माने जा सकते हैं। बहरहाल, भारतीय युवा खिलाड़ियों द्वारा जकार्ता में हासिल की गई उपलब्धियों की यह गूंज 2020 टोक्यो ओलंपिक तक में गूंजने का संकेत दे रही है। दूती चंद, हिमा दास, नीरज चोपड़ा, स्वप्ना बर्मन, शार्दुल विहान और सौरभ चौधरी जैसे दर्जनों युवा खिलाड़ियों ने यही दिखाया है कि अगर हौसले बुलंद हों तो आर्थिक तंगी में भी शिखर तक की दूरी तय की जा सकती है, और यदि देश का मान बढ़ाने का जज्बा हो तो कोई भी मुश्किल उनके आड़े नहीं आ सकती। जरूरत है कि टारगेट ओलंपिक पोडियम (टॉप) के जरिये तराशे और तलाशे गए युवा खिलाड़ियों को सहेज कर न केवल रखा जाए, बल्कि उन्हें भविष्य के चमकते सितारे के रूप में तैयार किया जाए। सच यही है कि उज्ज्वल भविष्य के लिए किए जा रहे निवेश के सकारात्मक परिणाम अब सामने आने लगे हैं।

जकार्ता एशियाई खेल में भारत का मान बढ़ाकर लौटे खिलाड़ी दल से भेंट करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, दार्इं ओर बैठे हैं खेलमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर 

जकार्ता एशियाई खेलों में ऐतिहासिक सफलता हासिल करने के बाद भारतीय खेल जगत में फिर से एक नई आस जगी है। भारत ने 15 स्वर्ण सहित कुल 69 पदक जीत एशियाई खेलों में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया।

सबसे बड़ी बात यह है कि कई युवा स्टार खिलाड़ियों ने विपरीत परिस्थितियों से पार पाते हुए कई जो सफलताएं हासिल की हैं, उसने भारतीय खेल जगत के कद को और ऊंचा कर दिया है। एशियाई खेलों के इतिहास में भारतीय खिलाड़ियों द्वारा कई स्पर्धाओं में पहली बार पदक जीते गए तो कुछ ने तो किशोरावस्था में ही अपना अद्वितीय कौशल दिखाया। इस क्रम में यह कहना गलत नहीं होगा कि जकार्ता एशियाई खेलों में धूमकेतु की तरह उभरे निशानेबाज सौरभ चौधरी व शार्दुल विहान सहित नीरज चोपड़ा, हिमा दास, स्वप्ना बर्मन और दूती चंद जैसी युवा खिलाड़ियों ने नया विश्वास, नया जोश भरते हुए भारतीय खेल जगत को एक नया आयाम दिया है। पदकों के लिहाज से भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन यही दर्शाता है कि पदक विजेता चैंपियन खिलाड़ियों की संख्या बढ़ी है।

पिछले कुछ वर्षों से निशानेबाजी, कुश्ती, एथलेटिक्स, बैडमिंटन, मुक्केबाजी और टेबल टेनिस जैसे खेलों में भारत ने अपनी पहचान कायम रखी है। लेकिन इस बार जकार्ता में नीरज चोपड़ा (पुरुष भालाफेंक), स्वप्ना बर्मन (हेप्टाथलन), तेजिंदरपाल सिंह (पुरुष गोलाफेंक), जिनसन जॉनसन (पुरुष 1500 मीटर दौड़) व अमित पंघाल (लाइट फ्लाईवेट मुक्केबाजी) का एशियाई खेलों में भारत की ओर से पहली बार स्वर्ण पदक जीतना कहीं ज्यादा मायने रखता है। यही नहीं, मेरठ के किशोर निशानेबाजों सौरभ चौधरी (16 वर्ष) और शार्दुल विहान (15 वर्ष) ने जकार्ता में यादगार प्रदर्शन करते हुए 15 वर्षीय अनीश भनवाला और 16 वर्षीय मनु भाकर के साथ निशानेबाजी में भारत के स्वर्णिम भविष्य की राह खोली है। ये युवा निशानेबाज भले ही ड्राइविंग लाइसेंस हासिल करने की पात्रता न रखते हों, पर भारतीय निशानेबाजी को शिखर तक ले जाने की ड्राइविंग सीट इसने जरूर हासिल कर ली है।

इन युवा खिलाड़ियों का चमकदार प्रदर्शन यही दर्शाता है कि भारतीय खिलाड़ी अब ओलंपिक, एशियाई खेल और विश्व चैंपियनशिप जैसी बड़ी खेल स्पर्धाओं में महज भागीदारी के लिए नहीं जाते, बल्कि उनका लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना होता है। अब भारतीय खिलाड़ियों को हार बर्दाश्त नहीं होती और उनकी बादशाहत कायम रखने की प्रबल इच्छाशक्ति बदलते भारतीय खेल जगत की तस्वीर पेश करती है। शायद इसी का नतीजा है कि एशियाई खेलों के इतिहास में जिस कबड्डी खेल में भारत अब तक लगातार स्वर्ण पदक जीतता रहा, जकार्ता में पहली बार स्वर्ण पदक से चूकने (महिला टीम को रजत और पुरुष टीम को कांस्य पदक मिला) के बाद खेलप्रेमियों और विशेषज्ञों ने हायतौबा मचा दी। कमोबेश यही स्थिति भारतीय हॉकी टीमों की रही जब खेल प्रेमी महिला और पुरुष दोनों ही वर्गों में स्वर्ण पदक न जीत पाने का अफसोस मनाते दिखे। और तो और, एशियाई खेलों के इतिहास में भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी या टीम इस स्पर्धा में अब तक कांस्य पदक से आगे नहीं जीत सकी थी। लेकिन जकार्ता में पी.वी. सिंधू का पहली बार रजत पदक जीतना भले ही इतिहास के पन्नों में एक नया अध्याय जोड़ गया, फिर भी वे सुर्खियां नहीं बटोर पार्इं। कबड्डी, हॉकी और बैडमिंटन में पदक जीतने के बावजूद निराशाजनक प्रतिक्रियाओं के उदाहरण भारतीय खेल जगत में स्वर्णिम दौर की शुरुआत के संकेत माने जा सकते हैं।

बहरहाल, भारतीय युवा खिलाड़ियों द्वारा जकार्ता में हासिल की गई उपलब्धियों की यह गूंज 2020 टोक्यो ओलंपिक तक में गूंजने का संकेत दे रही है। दूती चंद, हिमा दास, नीरज चोपड़ा, स्वप्ना बर्मन, शार्दुल विहान और सौरभ चौधरी जैसे दर्जनों युवा खिलाड़ियों ने यही दिखाया है कि अगर हौसले बुलंद हों तो आर्थिक तंगी में भी शिखर तक की दूरी तय की जा सकती है, और यदि देश का मान बढ़ाने का जज्बा हो तो कोई भी मुश्किल उनके आड़े नहीं आ सकती।

जरूरत है कि टारगेट ओलंपिक पोडियम (टॉप) के जरिये तराशे और तलाशे गए युवा खिलाड़ियों को सहेज कर न केवल रखा जाए, बल्कि उन्हें भविष्य के चमकते सितारे के रूप में तैयार किया जाए। सच यही है कि उज्ज्वल भविष्य के लिए किए जा रहे निवेश के सकारात्मक परिणाम अब सामने आने लगे हैं।