पश्चिमी बंगाल-बौखलाई तृणमूल का हत्यावाद
   दिनांक 10-सितंबर-2018
                                                                                                                                                - अम्बा शंकर बाजपेयी

अभी पिछले दिनों प. बंगाल में हुए पंचायत चुनाव के दौरान विभिन्न वारदातों में 70 लोगों की हत्या हुईं जिनमें से 22 से भी ज्यादा कार्यकर्ता भाजपा के थे। चुनावों के बाद भाजपा के जीते कार्यकर्ताओं पर तृणमूल के गुंडों द्वारा जानलेवा हमले किये गए। भय का ऐसा वातावरण बनाया गया कि कई भाजपा कार्यकर्ता भूमिगत तक रहे। सबसे ज्यादा दर्दनाक स्थिति महिला प्रत्याशियों की रही। जो प्रदेश देवी पूजा या नवरात्र इतनी धूमधाम से मनाता है, उस राज्य में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ,विजेता महिला उम्मीदवारों की निर्मम पिटाई की गई, एक को तो उसके पति व समाज के सामने जूतों की माला पहनाकर क्षेत्र में घुमाया गया और धमकाया गया कि देखो, अगर भाजपा से चुनाव लड़ोगे तो यही हाल होगा। पश्चिम-बंगाल में इस तरह की अनगिनत घटनाएं लगातार हो रही हैं। पर भारत का मुख्यधारा का मीडिया इस तरह की घटनाओं को जनता के सामने पेश नहीं करता।
ग्राम पंचायत सदस्यों द्वारा गत 30 अगस्त को प. बंगाल में पंचायत बोर्ड के चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के बीच पुन: खूनी संघर्ष हुआ। दोपहर बाद तृणमूल के हथियारबंद गुंडों ने भाजपा के पंचायत सदस्य पुतुल मंडल के घर पर हमला कर दिया। इस संघर्ष के दौरान मंडल के तीन वर्षीय बालक मृणाल मंडल के सिर पर गोली लगी, मालदा जिले के अस्पताल में आज भी वह नाजुक हालत में है। यह घटना मालदा जिले के मानिकचक क्षेत्र की है। कुछ महीने पहले पुतुल मंडल पर तृणमूल में शामिल होने का दबाव बनाया गया था, लेकिन वे अपनी पार्टी भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते रहे। ऐसा हादसा सिर्फ मंडल के साथ ही नहीं हुआ, चुनाव के बाद भाजपा के विभिन्न कार्यकर्ताओं को यातनाएं देने से लेकर उनकी हत्या तक कर दी गयी। उनके घरों पर देसी बमों से हमले किए गए। कई कार्यकर्ताओं को सड़क पर ट्रेक्टर या ट्रक से कुचलवा दिया गया। इस तरह का वातावरण बनाया गया कि लोगों में दहशत व्याप्त हो जाए।
आजादी के बाद बंगाल सूबे में कांग्रेस की सरकार आई थी और 1967 तक इसी पार्टी का राज्य में शासन रहा था। दुर्भाग्य है कि 1967 से लेकर 1980 तक प्रदेश हिंसक आन्दोलन की चपेट में रहा, क्योंकि 1967 में प्रदेश में नक्सलबाड़ी गांव से सशस्त्र क्रांति की शुरुआत हुई, जिसे नक्सलवादी आन्दोलन के नाम से जाना जाता है। नक्सलवादी आन्दोलन ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह आन्दोलन पूर्णतया चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ से प्रभावित था। प्रदेश नक्सलवादी आन्दोलन, बिजली का गंभीर संकट, हडतालों व चेचक जैसी बीमारियों का गंभीर प्रकोप जैसी अनेक अन्य समस्याओं से घिर गया। यही वह दौर था जब राज्य गंभीर आर्थिक संकट में फंसा या कहें कि इस दौर में आर्थिक गतिविधियां शून्य ही रहीं। साथ ही राजनीतिक अस्थिरता ने प. बंगाल को और पीछे धकेल दिया। आपातकाल के बाद 1977 में वाममोर्चा नामक गठबंधन ने प्रदेश में राजनीतिक सत्ता संभाली। उसके सत्ता संभालते ही प्रदेश में राजनीतिक हत्याओं का दौर शुरू हो गया। सत्ता पर काबिज इस विचारधारा ने प्रदेश में कभी किसी अन्य राजनीतिक विचारधारा को पनपने नहीं दिया।
वाममोर्चा सरकार या उसके कार्यकर्ताओं द्वारा अन्य विचारधारा या राजनीतिक दलों से सम्बंधित लोगों की हत्या करना कोई नई बात नहीं थी। यह इनके डीएनए में था। विश्व परिदृश्य पर गौर करें तो पिछले 80-90 साल में रूस व चीन में क्रमश: 2 करोड़ व 5 करोड़ निर्दोष नागरिकों की हत्या हुई हैं। अगर वियतनाम और क्यूबा, जहां लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था, की संख्या भी जोड़ ली जाए तो कुल मिलाकर 20 करोड़ निर्दोष नागरिकों की हत्या सिर्फ और सिर्फ कम्युनिस्ट (स्टॅलिन-लेनिन व माओ की सशस्त्र क्रांति की विचारधारा मानने वाले) देशों में हुई हैं। ये वही कम्युनिस्ट हैं जो अपने आपको या अपनी विचारधारा को दुनिया में सबसे ज्यादा 'लोकतांत्रिक' मानते हैं। वे यहीं नहीं रुकते, बल्कि अपने आपको मानवाधिकार के सबसे बड़े समर्थक/पोषक व नारीवादी आन्दोलन का एकमात्र जानकार मानते हैं।
कम्युनिस्ट विचारधारा के नेता दुनिया के सबसे बड़े 'बुद्धिजीवी' होने का दम भरते हैं। उनकी थोथी बौद्धिकता प. बंगाल में देखी जा सकती है जहां 1977 से 2011 तक वाममोर्चे की सत्ता रही और 34 साल तक प. बंगाल में उस सरकार ने प्रदेश में किसी भी अन्य विचारधारा के संगठन को पनपने नहीं दिया। जिसने खड़े होने की कोशिश की, उसकी हत्या करवा दी गयी।
उस तरह की राजनीतिक हत्या का दौर आज भी रुका नहीं है। भले ही 2011 में प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता हासिल की और ममता बनर्जी के नेतृत्व में प्रदेश में नई सरकार आयी। यह राजनीतिक परिवर्तन प्रदेश में आर्थिक विकास के अवसान के कारण हुआ था, लेकिन प्रदेश में ममता सरकार से लोगों को जो आशाएं थीं, वे सब धरी की धरी रह गयीं क्योंकि ममता की सरकार में लोग तो वही थे जो कम्युनिस्ट शासन के समय से हिंसक राजनीति में शामिल रहे थे यानी सिर्फ झंडा बदला था, डंडा नहीं। इसलिए भला राजनीतिक हत्या का दौर कैसे थमता।
इसी बीच प्रदेश में एक बड़ा बदलाव हुआ। रा.स्व.संघ की शाखाओं का विस्तार हुआ और प्रदेश के सभी जिलों व मंडल स्तर तक संघ की पहुंच बन गयी। संघ की बढ़ती ताकत ने नागरिकों के लिए संजीवनी बूटी का काम किया। वे राजनीतिक रूप से सशक्त होने लगे और इस माहौल में भाजपा को अपना कार्य बढ़ाने का अवसर मिल गया। प. बंगाल में भाजपा का यह उदय वर्तमान सरकार को जरा नहीं भाया। इस नफरत की आग में घी डालने का काम किया अप्रैल-मई 2018 में संपन्न हुए पंचायत चुनाव ने। इन चुनावों में भाजपा दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। बंगाल में भाजपा ने करीब 32,000 ग्राम पंचायत सीटों में से 5,700 से भी ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की है और यह तब हुआ है जब भाजपा के बहुत सारे कार्यकर्ताओं को ग्राम पंचायत चुनावों में पर्चा तक नहीं भरने दिया गया था।
मई 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 17.02 प्रतिशत वोट हासिल किये थे जो 2009 की तुलना में करीब 6.4 प्रतिशत अधिक थे। दूसरी सबसे बड़ी बात, 2016 में संपन्न विधानसभा चुनाव में भाजपा को 10.16 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। पंचायत चुनाव में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन करके प. बंगाल में यह दिखा दिया है कि जमीनी स्तर पर उसने अपने आपको मजबूत कर लिया है। यह स्थिति वर्तमान ममता सरकार के लिए सिरदर्द बन गयी है। भाजपा की बढ़त व हिंदुत्वनिष्ठ विचारधारा की तरफ लोगों का बढ़ता रुझान तमाम दलों के लिए गले की फांस बन गया है। इससे बौखलाई तृणमूल ने हिंसक रुख अपनाते हुए भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या करने का रास्ता चुना है। लोकतंत्र पर लगे इस लांछन को अगर समय रहते रोका नहीं गया तो 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में इसका असर देखने को मिलेगा।