विदेशी चंदे पर पलता पूर्वाग्रही मीडिया

 

भारतीय मीडिया के चरित्र को लेकर अक्सर चिंता जताई जाती है, लेकिन यह समस्या वास्तव में कितनी गंभीर है। इसका अंदाजा अब लग गया होगा। पुणे में पिछले साल हुई हिंसा की जांच कर रही पुलिस को कुछ तथ्य हाथ लगे, जिसके आधार पर उन्होंने कुछ नक्सली नेताओं को गिरफ्तार किया। राष्ट्रीय सुरक्षा के इस अति-संवेदनशील प्रश्न को लेकर मीडिया के एक बड़े वर्ग की प्रतिक्रिया बताती है कि वामपंथी आतंकवाद की जड़ें 'न्यूजरूम' तक फैली हुई हैं। अगर आप कुछ बड़े समाचार समूहों के संपादकों की पृष्ठभूमि पर ध्यान दें तो पाएंगे कि उनमें से ज्यादातर लोग एक खास विचारधारा से जुड़े रहे हैं। यही वे लोग हैं जो किंतु-परंतु की आड़ में वामपंथी आतंकवाद को 'विचारधाराओं का विरोध' ठहराने की कोशिश करते हैं।

एनडीटीवी, इंडिया टुडे जैसे चैनलों के जरिए पहले यह राय बनाने की कोशिश हुई कि जिन नक्सलियों को पकड़ा गया है वे दरअसल मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। यह तथ्य छिपाने की कोशिश हुई कि इन सभी को पहले भी आपराधिक मामलों में पकड़ा जा चुका है और कुछ को बाकायदा सजा तक हुई है। सोशल मीडिया की मेहरबानी है कि लोगों ने इन नक्सलियों का पूरा कच्चा-चिट्ठा सामने ला दिया। संपादकों की बौखलाहट इसी से समझी जा सकती है कि इस मामले के शिकायतकर्ता तुषार दामगुड़े के साथ इंडिया टुडे चैनल पर राजदीप सरदेसाई ने खुलेआम बदसलूकी की। वे सवाल पूछने के नाम पर बुरी तरह चिल्लाने लगे और उलटा शिकायतकर्ता को ही दोषी ठहराने की कोशिश की।

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब के खिलाफ मुख्यधारा मीडिया का दुर्भावनापूर्ण रवैया भी जारी है। जिन तालाबों में बत्तख पाली जाती हैं, उनमें मछलीपालन करना फायदेमंद होता है। यह बात गांव-देहात में लोग बरसों से जानते हैं। जब यही बात बिप्लब देब ने कही तो उसका मजाक उड़ाकर मीडिया ने अपना अधकचरापन दिखा दिया।

दूसरी तरफ विदेश में राहुल गांधी के अटपटे बयानों को लेकर मीडिया का एक खास तबका बीते हफ्ते जबरदस्त बचाव में रहा। ज्यादातर मीडिया में इसे लेकर या तो सकारात्मक रिपोटिंर्ग की गई या राहुल गांधी की गलतबयानियों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी। लंदन में उनसे पूछा गया कि आप होते तो डोकलाम मुद्दे को किस तरह से संभालते? इस पर राहुल हड़बड़ा गए और कह दिया कि मुझे इस विषय की ज्यादा जानकारी नहीं है। हैरानी की बात है कि ज्यादातर मीडिया ने राहुल के इस बयान को नहीं दिखाया। सोशल मीडिया के कारण राहुल गांधी का वह अनाड़ीपन लोगों के सामने आ सका।

उधर, आम आदमी पार्टी छोड़ चुके आशुतोष की फिर से मीडिया में वापसी हो गई। एबीपी न्यूज पर उन्हें राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर बिठाया गया। बहुत जल्द उनका परिचय पत्रकार के तौर पर दिया जाएगा। इसके बाद वह एक बार फिर से पत्रकारिता की आड़ में अपने राजनीतिक आकाओं के प्रचार में जुट जाएंगे। ऐसे ही तमाम राजनीतिक कार्यकर्ता मीडिया में पत्रकार के वेष में सक्रिय हैं। बीते हफ्ते यह जानकारी सामने आई कि सऊदी अरब दुनिया के कुछ बड़े मीडिया संस्थानों को वहाबी इस्लाम के प्रचार के लिए फंड कर रहा है।

ट्विटर को चलाने वाली कंपनी में भी पेट्रो डॉलर लगे होने का खुलासा बहुत पहले हो चुका है। इसी तरह मिशनरी के पैसे की बात भी समय-समय पर सामने आती रहती है। कुल मिलाकर पूर्वाग्रही मीडिया का मौजूदा चरित्र कहीं न कहीं इसी अवैध वित्तपोषण से जुड़ा हुआ मालूम होता है।