अब किसके दम पर उछलेगा पाकिस्तान
   दिनांक 12-सितंबर-2018
                                                                                                                                                           - संतोष वर्मा
अमेरिका ने पाकिस्तान की आर्थिक सहायता की रकम में कटौती करने की घोषणा की है। अमेरिका से मिली जिस रकम के दम पर पाकिस्तान ने अपना जिहादी तंत्र खड़ा किया अब वह उसे मिलनी बंद हो जाएगी। पाकिस्तान में अमेरिका द्वारा की गई आर्थिक कटौती को लेकर अमेरिका के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं
 
 खैरात पर आंच: ट्रंप प्रशासन द्वारा पाकिस्तान को आर्थिक सहायता के नाम पर बांटे जा रहे डॉलरों में कटौती से बौखलाए पाकिस्तानियों का अमेरिका विरोधी प्रदर्शन
अमेरिकी विदेश मंत्री रैक्स टिलर्सन पॉम्पिओं का पाकिस्तान का प्रस्तावित दौरा एक महत्वपूर्ण घटना माना जा रहा था। चर्चा थी कि देश में इमरान खान के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के बाद अमेरिका के साथ संबंधों में सुधार की शुरुआत हो सकती है। परन्तु अमेरिकी विदेश मंत्री की यात्रा के महज कुछ दिन पूर्व ही, अमेरिकी रक्षा विभाग ने 300 मिलियन डॉलर की पाकिस्तान को स्थायी सहायता में कटौती की घोषणा की है। इससे पहले अमेरिका ने अगस्त माह की शुरुआत में पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता में 75 प्रतिशत तक की कटौती कर इसे एक बिलियन अमेरिकी डॉलर से 150 मिलियन डॉलर तक लाने की बात कही थी। इसके लिए अमेरिका के नेशनल डिफेंस ऑथोराइजेशन एक्ट-2019 में स्पष्ट रूप से कहा कहा गया है कि हक्कानी नेटवर्क या लश्करे-तैयबा के खिलाफ कार्रवाई में पाकिस्तान की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही पाकिस्तान को देश में आतंकवादी गतिविधियों के लिए कोई प्रतिपूर्ति नहीं मिलेगी। अमेरिकी सीनेट में यह बिल 6 अगस्त को पारित हो चुका है।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस्लामाबाद ने अफगानिस्तान में 17 साल के युद्ध के दौरान तालिबान लड़ाकों को शरण ही दी थी। इस कटौती पर पेंटागन के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कोने फाल्क्नर ने कहा कि कांग्रेस द्वारा अनुमोदन के बाद इस धन को अन्य 'तत्काल प्राथमिकताओं' के लिए आवंटित कर दिया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि इमरान खान द्वारा ईरान के विदेश मंत्री जावेद जरीफ का पाकिस्तान में पहले राजनयिक अतिथि के रूप में स्वागत और ईरान की परमाणु संधि के समर्थन को देखते हुए यह अमेरिकी प्रतिक्रिया हो सकती है। अभी पिछले हफ्ते ही पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने एक तल्ख बयान दिया था जिसमें अमेरिका पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए कहा गया था कि पोम्पिओ ने प्रधानमंत्री पर आतंकवादियों के खिलाफ 'निर्णायक कार्रवाई' करने के लिए दबाव डाला था।
उल्लेखनीय है कि इस तथाकथित 'कोएलीशन सपोर्ट फंड' द्वारा दी जाने वाली सहायता को इस वर्ष की शुरुआत में निलंबित कर दिया गया था (अमेरिका ने पाकिस्तान की चीन से बढ़ती निकटता और अफगान तालिबान तथा हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकवादी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल होने पर पाकिस्तान को 1.5 अरब डालर की सहायता रोक दी थी)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तब एक ट्वीट में कहा था कि 2002 से पाकिस्तान को दी गई 33 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता के बदले अमेरिका को 'झूठ और छल' के अलावा कुछ भी नहीं मिला। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में एन्हेंस्ड पार्टनरशिप विद पाकिस्तान ऐक्ट-2009, जिसे केरी-लूगर-बर्मन एक्ट के नाम से भी जाना जाता है, के तहत पाकिस्तान को प्रति वर्ष 1.2 अरब डॉलर की सहायता दी जाती थी।
 
1947 से हुई थी शुरुआत
पाकिस्तान को अमेरिकी आर्थिक सहायता की शुरुआत 1947 से ही हो गई थी। अमेरिका पाकिस्तान को मान्यता देने वाले शुरुआती देशों में था। अमेरिका की पाकिस्तान को सहायता सैन्य और असैन्य दोनों प्रकार की थी। अमेरिकी सहायता ने पाकिस्तान में अनेक असैन्य संस्थानों की आधारशिला रखी जैसे, इंस्टीट्यूट फॉर बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, जिन्ना पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल सेंटर, सिंधु बेसिन प्रोजेक्ट, फैसलाबाद एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट आदि। 1960 और 1970 के दशक में, अमेरिका मंगला और तारबेला बांधों के निर्माण के लिए एक प्रमुख दानदाता था, जो उनके पूरा होने बाद पाकिस्तान को उसकी 70 प्रतिशत बिजली उपलब्ध कराते थे। 1980 और 1990 के दशक के शुरू में, अमेरिका ने सिंध में गुड्डू पावर स्टेशन और लाहौर यूनिवर्सिटी फॉर मैनेजमेंट साइंसेज बनाने में मदद की, जिसे अब देश के शीर्ष व्यावसायिक स्कूलों में से एक माना जाता है।
इसके साथ ही पाकिस्तान को अमेरिका से बड़ी मात्रा में सैन्य सहायता भी प्राप्त हो रही थी। पाकिस्तान 1955 तक 'सीटो' और 'सेंटो' का सक्रिय सदस्य बन चुका था। 1954 के सुरक्षा समझौते ने अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को आर्थिक सहायता के रूप में 1954 से 1964 के बीच लगभग 2.5 अरब डॉलर और सैन्य सहायता के रूप में 700 मिलियन डालर प्रदान करने के लिए प्रेरित किया। 1962 में पाकिस्तान को अमेरिकी सहायता अपने सबसे उच्च स्तर यानी 2 अरब डॉलर तक जा पहुंची। 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों के तुरंत बाद अमेरिकी सैन्य सहायता में गिरावट आई और 1979 में सीआईए की इस पुष्टि के बाद कि पाकिस्तान परमाणु बम के निर्माण में संलग्न है तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने पाकिस्तान को सभी तरह की सहायता (खाद्य सहायता को छोड़कर) निलंबित कर दी। परन्तु अफगानिस्तान में तत्कालीन सोवियत संघ के प्रवेश और उसके विरुद्ध मुजाहिदीन युद्ध ने स्थितियों को एकदम से उलट दिया। इस एक दशक के दौरान पाकिस्तान को अमेरिका द्वारा लगभग 5 अरब डॉलर की सहायता उपलब्ध कराई गई। परन्तु 90 के दशक की शुरुआत होते ही स्थितियां फिर बदलने लगीं। सोवियत संघ की अफगानिस्तान से वापसी के बाद, अमेरिका की पाकिस्तान के 'कुकृत्यों' पर निगाह पड़नी ही थी। तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश द्वारा इस बात को प्रमाणित करने में असफल रहने पर कि पाकिस्तान के पास परमाणु अस्त्र नहीं हैं, प्रेसलर संशोधन द्वारा उसकी बड़ी मात्रा में सहायता में कटौती कर दी गई जो एक दशक तक जारी रही। 1993 में 'यूएस एड' का पाकिस्तान मिशन भी बंद कर दिया गया। इस दशक में अमेरिकी असैन्य आर्थिक सहायता 429 मिलियन डॉलर और सैन्य सहायता 5.2 मिलियन डॉलर के न्यूनतम स्तर पर आ गई तो पाकिस्तानियों ने कहना शुरू कर दिया कि, अमेरिका ने उन्हें दशकों तक उपयोग करने के बाद फेंक दिया है।
1998 में नवाज शरीफ सरकार द्वारा परमाणु परीक्षण और नाभिकीय शक्ति के वैश्विक प्रदर्शन के बाद अमेरिकी सहायता में व्यापक कटौतियां की गईं। परवेज मुशर्रफ द्वरा तख्ता पलट के बाद पाकिस्तान पर दबाब और भी बढ़ता जा रहा था और लोकतंत्र की पुन:स्थापना को सहायता की अनिवार्य शर्त बताया जा रहा था, परन्तु अमेरिका में 9/11 की आतंकवादी घटना के पश्चात किस्मत एक बार फिर पाकिस्तान के पाले में जा बैठी।
तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक युद्ध की घोषणा की जिसके निशाने पर सबसे पहले अफगानिस्तान का तालिबान शासन आया। यह वही तालिबान था जिसे अमेरिका ने पाकिस्तान की सहायता से मुजाहिदीन युद्ध के समय पूर्व सोवियत संघ के विरुद्ध खड़ा किया था। इसी समय ओसामा बिन लादेन, जो अल कायदा के संस्थापक के रूप में वैश्विक आतंकवाद का चेहरा बन चुका था, अमेरिका के निशाने पर था और माना जाता था कि वह अफगानिस्तान में शरण लिए हुए है। आखिरकार अफगानिस्तान को अपने इस पुराने विश्वस्त मुजाहिदीन से नजदीकियों की कीमत चुकानी पड़ी।
इसी समय अमेरिका ने पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व को आतंकवाद के विरुद्ध साथ आने का न्योता दिया जिसे पाकिस्तान ने एक बड़े बहुमत के विरुद्ध जाकर स्वीकार लिया। एक बार फिर 1980 का दशक लौट आया, पाकिस्तान को बड़ी मात्रा में सैन्य और असैन्य सहायता लुटाई जाने लगी। 2001 से 2009 के बीच अमेरिका ने एक बार फिर अपनी वित्त पोषण प्रतिबद्धताओं को मजबूत किया, और अफगानिस्तान के साथ उसके विषम सीमावर्ती इलाकों में पाकिस्तान के द्वारा सैन्य गतिविधियों के संचालन के लिए सहायता, प्रतिपूर्ति और सैन्य सहायता के बदले करीब 9 अरब डॉलर उपलब्ध कराये। उसने 3.6 अरब डालर की आर्थिक और राजनयिक पहलों को वित्त पोषित किया। 2002 से 2009 के बीच कुल अमेरिकी सहायता का 70 प्रतिशत सुरक्षा संबंधी मामलों के लिए व्यय किया गया जिसका सीधा असर भारत जैसे उसके पड़ोसी देशों पर पड़ा। पाकिस्तान ने उसे आतंकवाद के प्रसार के लिए इस्तेमाल किया। सितंबर 2009 में कांग्रेस द्वारा केरी-लूगर-बर्मन ऐक्ट (जिसे 2009 के एन्हेंस्ड पार्टनरशिप विद पाकिस्तान एक्ट-2009 रूप में भी जाना जाता है) द्वारा पांच साल के लिए एक नया, 7.5 अरब डॉलर का सहायता पैकेज पारित किया गया और अक्तूूबर 2009 में राष्ट्रपति ओबामा के हस्ताक्षर से जारी किया गया। हालांकि इसमें इस धन को परमाणु प्रसार के लिए इस्तेमाल किए जाने, आतंकवादी समूहों का समर्थन करने या पड़ोसी देशों में हमलों के लिए इस्तेमाल करने से निषिद्ध किया गया था।
 
सहायता किस मद में?
2002 से अमेरिका ने पाकिस्तान को 14.573 अरब डॉलर दिए हैं। सीएसएफ भुगतान पिछले 15 वर्षों के दौरान पाकिस्तान को कुल अमेरिकी भुगतान का 43.65 प्रतिशत हिस्सा था। 2002 से दी जाने वाली अमेरिकी सहायता का एक बड़ा हिस्सा विदेशी सैन्य वित्त पोषण कार्यक्रम के तहत दिया गया है, जो लगभग 3.8 अरब डॉलर था। इसके अलावा पाकिस्तान को उग्रवाद निरोधी कोष और उग्रवाद निरोधी क्षमता कोष के तहत 2.35 अरब डालर का योगदान दिया गया। तीसरा बड़ा हिस्सा 911 मिलियन डालर का था, जिसे अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय नारकोटिक्स नियंत्रण और कानून प्रवर्तन कार्यक्रम के तहत दिया था।
तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो 2014 से, अमेरिकी सहायता 1.6 अरब डॉलर प्रतिवर्ष हो गई, जो 2002 और 2013 के बीच प्रतिवर्ष औसत 2.3 अरब डालर थी। इसमें गठबंधन सहायता निधि (सीएसएफ) की प्रतिपूर्ति शामिल है। राष्ट्रपति ओबामा के समय से ही इसमें कटौतियां की जाती रही हैं परन्तु ट्रम्प के आने के बाद इस पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
पाकिस्तान की चीन से बढ़ती नजदीकियां भी इसका एक प्रमुख कारण है। एक अमेरिकी विशेषज्ञ के अनुसार 1951-2011 के दौरान पाकिस्तान को 67 अरब डॉलर की सहायता उपलब्ध कराई गई, जो कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनी। वर्तमान में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। ऐसे में उसे अभी जिस धन की दरकार है, उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से प्राप्त करने की राह में अमेरिका एक बड़ा रोड़ा बना हुआ है। इमरान खान का अमेरिका के प्रति रुख कुशल राजनेता की तरह नहीं रहा है। ऐसे में चीन का सहयोग पाकिस्तान को आर्थिक संकट से कैसे निकालता है (जिस संकट का प्रमुख कारण ही चीन है), यह देखने लायक होगा। पाकिस्तान और उसके नेताओं को अब यह समझ लेना चाहिए कि 'चार्ली विल्सन' का दौर बीत चुका है और दूसरे की तरफ हर वक्त पैसे के लिए लार टपकाए रहने और चंद सिक्कों की खनखनाहट के बूते समृद्धि और शक्ति के सपने देखना निहायत ही मूर्खतापूर्ण सिद्ध होगा।