रुपये और पेट्रोल के अर्थशास्त्र की राजनीति
   दिनांक 18-सितंबर-2018

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर इन दिनों एक साथ दो किस्म की खबरें आ रही हैं। एक खबर तो यह कि भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था होने की तरफ जा रही है। दूसरी तरफ यह खबर है कि रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार गिर रहा है। एक डॉलर के मुकाबले 72 रुपये पचास पैसे मिल रहे हैं, कुछ समय पहले एक डॉलर के बदले 64 रुपये आते थे। तो क्या रुपये की कमजोरी को अर्थव्यवस्था की कमजोरी मान लिया जाये। इस सवाल का जवाब हां नहीं हो सकता, क्योंकि कुछ और आंकड़े भी सामने हैं।
2018-19 वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून 2018 के आंकड़े सामने हैं। सकल घरेलू उत्पाद कहें या जीडीपी विकास दर यह 8.2 प्रतिशत रही है। इसमें भी खास बात यह है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में यानी जहां ट्रक, मोबाइल समेत तमाम आइटम बनते हैं, विकास की रफ्तार 13.5 प्रतिशत रही है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जब विकास तेज होता है, तो उन लोगों के रोजगार की संभावनाएं बलवती होती हैं, जिनके पास बहुत ऊंची प्रोफेशनल डिग्रियां नहीं हैं। 8.2 प्रतिशत की विकास दर को कायम रखना मुश्किल है। यह थोड़ी गिरकर सात से आठ प्रतिशत सालाना विकास के स्तर पर भी पहुंच जाये तो भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी बात है। अप्रैल-जून 2018 में खेती की विकास दर 5.3 प्रतिशत रही है। खेती की विकास दर पांच प्रतिशत से ऊपर कायम रह पाये, तो यह समूची अर्थव्यवस्था के लिए खुशखबरी होगी। इस दर के बाद खेती से जुड़ी सारी चुनौतियां खत्म नहीं हो जातीं, पर उन चुनौतियों से निबटने में उच्च विकास दर मदद करेगी।
10 अगस्त, सोमवार, 2018 को कांग्रेस पार्टी समेत कई विपक्षी दलों ने भारत बंद आयोजित किया पेट्रोल, डीजल के लगातार महंगे होते जाने के खिलाफ। विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस का यह अधिकार है कि वह उस मुद्दे को उछाले, जो सरकार के लिए परेशानी का सबब बने। पर तथ्य बताते हैं कि पेट्रोल-डीजल के जो भाव हाल में बढ़े हैं, उसमें सरकार की नहीं, अंतरराष्ट्रीय कारकों की भूमिका रही है। कच्चे तेल के भाव हाल के वक्त में तेजी से ऊपर गये हैं। कच्चे तेल के भावों के ऊपर जाने में सिर्फ अर्थशास्त्र ही काम नहीं करता, राजनीति भी काम करती है। आर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) की राजनीति भी इस उठापटक के लिए जिम्मेदार है। एक समय कच्चे तेल के भाव करीब 60 डॉलर प्रति बैरल तक आ गए थे, अब यह अस्सी डॉलर प्रति बैरल के करीब जाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। ओपेक चाहेगा कि यह भाव लगातार ऊपर चढ़ें, वहीं तेल आयातक देश चाहेंगे कि कच्चे तेल के भाव लगातार नीचे आयें।
भारत सरकार इसमें कुछ ज्यादा नहीं कर सकती। वह यही कर सकती है कि तेल आयात के अपने स्त्रोतों को लगातार बढ़ाये ताकि किसी एक देश या संगठन पर उसकी निर्भरता न्यूनतम हो। हाल के समय के कच्चे तेल के भावों में लगातार तेजी की वजह यह है कि तेल उत्पादक देशों में बहुत समस्याएं चल रही हैं। विश्व का एक महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देश वेनेजुएला गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल का सामना कर रहा है।
ऐसे ही महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देश ईरान पर अमेरिका ने बहुत प्रतिबंध ठोक रखे हैं। ईरान पर प्रतिबंध का मतलब है कि उसका कच्चा तेल बाजार में बिकने के लिए आसानी से नहीं आ पायेगा। कोई भी आपूर्ति बाधित होने का मतलब यह है कि कीमतें ऊपर का रुख करेंगी। कच्चे तेल के बाजार में यही हो रहा है। भारत में चूंकि उपभोक्ता कीमतें पेट्रोल और डीजल की ग्लोबल कीमतों से जुड़ी हैं, इसलिए उनके भाव भी लगातार बढ़ रहे हैं।
पेट्रोल और डीजल की जो कीमत उपभोक्ता चुकाता है, उसके मोटे तौर पर चार हिस्से होते हैं। पहला हिस्सा लागत यानी पेट्रोल की लागत, दूसरा हिस्सा केंद्र सरकार का हिस्सा यानी उसके द्वारा लिया जाने वाला कर, तीसरा हिस्सा राज्य सरकार द्वारा लिया जाने वाला कर। चौथा हिस्सा डीलर का कमीशन यानी जिस पेट्रोल पंप से पेट्रोल लिया जा रहा है, उसका हिस्सा। उदाहरण के लिए अगर दिल्ली में पेट्रोल के भाव लगभग अस्सी रुपये प्रति लीटर हैं तो इसमें से लागत का हिस्सा 38 रुपये 47 पैसे माना जाये। केंद्र सरकार अपना कर करीब 20 रुपये 72 पैसे ले जाती है। राज्य सरकार अपना हिस्सा करीब 17 रुपये ले जाती है। और करीब तीन रुपये 84 पैसे डीलर का कमीशन हो जाता है।
मोटे तौर पर माना जा सकता है कि हम बतौर उपभोक्ता जो कीमत दे रहे हैं डीजल का या पेट्रोल की, उसका करीब आधा हिस्सा राज्य और केंद्र सरकार बतौर कर ले जाती हैं। केंद्र या राज्य सरकार अगर अपने करों में कटौती को तैयार होती हैं, तो इसका एक मतलब यह है कि सरकारों के अपने संसाधन कम होंगे। इस बात के लिए आम तौर पर राज्य सरकारें तैयार नहीं होतीं। जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, वे भी अपने संसाधनों में किसी कटौती के लिए तैयार नहीं होतीं। उधर केंद्र सरकार अपने संसाधनों में कमी के लिए तैयार नहीं है। तो कुल मिलाकर मसला यह आ जाता है कि बढ़ी हुई कीमतों का बोझ उपभोक्ता को ही उठाना होता है।
 
पेट्रोल और डीजल की महंगाई का आशय
समझने की बात यह है कि पेट्रोल और डीजल की कीमत लगभग हर आइटम में समाहित होती है क्योंकि परिवहन लागत लगभग हर आइटम में शामिल होती है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने का एक आशय यह है कि तमाम दूसरी वस्तुएं भी महंगी होंगी। ऐसा सामने भी आने लगा है। स्मार्टफोन बाजार की सबसे बड़ी कंपनी ने घोषणा की है कि उसके कई फोनों की कीमतों में इजाफा हो जायेगा। गैर टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएं जैसे टूथपेस्ट, साबुन, वाशिंग पाउडर बनानेवाली कई कंपनियों ने संकेत दिये हैं कि कई आइटमों की कीमत में बढ़ोत्तरी हो सकती है।
इन तमाम अनिश्चितताओं के चलते डॉलर के मुकाबले गिरता भारतीय रुपया भी सरकार के लिए परेशानियां बढ़ा रहा है। यह महंगाई निश्चय ही किसी भी सरकार के लिए चिंता का विषय है। गौर करने वाली बात यह है कि कई मामलों में आम जनता के लिए महंगाई भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा बन जाती है। पेट्रोल और डीजल के भाव लगातार बढ़े तो देर सवेर हर आइटम की महंगाई को बढ़ने से रोका नहीं जा सकेगा। यह बात एकदम आईने की तरह साफ है।
रुपए का हाल
एक डॉलर के बदले 71-72 रुपये तक मिलने लगे, इसे रुपये का ऐतिहासिक अवमूल्यन कह सकते हैं। एक डॉलर के बदले 72 रुपये पचास पैसे तक का भाव चला गया। यानी एक डॉलर के मुकाबले खड़ा करने के लिए ज्यादा रुपयों की दरकार होगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में भीषण उठापटक मची हुई है। तुर्की की मुद्रा लीरा की गिरावट के चलते अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में अनिश्चितता पैदा हो गई है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता पैदा होती है, उसका एक परिणाम यह होता है कि डॉलर मजबूत हो जाता है।
डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया जनवरी से अब तक करीब दस प्रतिशत गिर चुका है। इसका मतलब यह हुआ कि जिन आइटमों का भुगतान भारत को डॉलर की शक्ल में करना होता है, उनके लिए ज्यादा रुपए खर्च करने होंगे। यानी जनवरी में अगर एक डॉलर के बदले 64 रुपये खर्च करने होते थे तो अब करीब 72 रुपये खर्च करने होंगे यानी 100 डॉलर का जो आइटम 6400 रुपये का पड़ता था, वो बैठे-बिठाये अब 7200 रुपये का पड़ेगा। यानी कुल मिलाकर आयात महंगा होगा। भारत कच्चे तेल के आयात पर बहुत डॉलर खर्च करता है। कच्चा तेल महंगा होगा तो देश में तेल से जुड़े तमाम उत्पाद महंगे होंगे। लैपटॉप, मोबाइल के बड़े हिस्से आयात किए जाते हैं यानी लैपटॉप और मोबाइल भी महंगे होंगे। हां, निर्यातकों का बहुत फायदा होगा, 100 डॉलर का निर्यात करके निर्यातक पहले 6400 रुपये कमाता था, अब बैठे-बिठाये उसे 7200 रुपये मिल जायेंगे। कुल मिलाकर निर्यातकों को तोफायदा होगा पर समूची अर्थव्यवस्था निर्यातक नहीं है। महंगाई का दंश अर्थव्यवस्था को झेलना ही पड़ेगा। गिरते रुपये को संभालने का एक तरीका यह है कि रिजर्व बैंक बाजार में डॉलर डाले यानी डॉलर की आपूर्ति बढ़ाये। डॉलर की आपूर्ति बढ़ेगी तो डॉलर के मुकाबले रुपया संभलेगा। पर डॉलर बाजार में डालने का एक आशय यह भी है कि भारत के विदेशी मुद्रा कोष के डॉलर भंडार में कमी होगी।
17 अगस्त, 2018 को विदेशी मुद्रा कोष करीब 400 अरब डॉलर पर था। रिजर्व बैंक बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ा तो सकता है पर इससे उसका अपना विदेशी मुद्रा कोष गिरता है। यानी रिजर्व बैंक के दखल की एक सीमा है। अंतत निर्यात को बढ़ाना होगा और आयात को नियंत्रित करना होगा। भारत के पास करीब 400 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा कोष है, इसके चलते फिलहाल संकट की स्थिति नहीं है।
विकल्प
सरकार के हाथ बंधे हुए हैं। राज्य सरकारों के हाथ भी संसाधनों के सवाल पर बंधे हैं। केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने हिस्से के कर को पेट्रोल और डीजल पर कुछ कम करके संदेश दे सकती हैं कि उन्हें महंगाई के मसले पर उपभोक्ता की चिंता है। देर सवेर सरकारों को ऐसा ही करना होगा। महंगाई एक बहुत ही संवेदनशील आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक मुद्दा भी है यह बात समझ ली जानी चाहिए।
यह बात अलग है कि अब महंगाई दर पहले की महंगाई दरों के मुकाबले कम ही हैं। एक वक्त में भारत में महंगाई दर आम-तौर पर दस प्रतिशत के आसपास चला करती थी, अब यह पांच प्रतिशत के आसपास है। पर जनता की स्मृति दीर्घजीवी न होती। पुरानी महंगाई ज्यादा थी, अब की महंगाई कम है, यह बात जनता को खुश नहीं करेगी।
जनता हाल की महंगाई को ही ध्यान में रखती है। कुल मिलाकर सरकार को महंगाई के मोर्चे पर कुछ तेजी से करना होगा।