भक्त के घर याचक बन कर आए भगवान --- वामन द्वादशी
   दिनांक 21-सितंबर-2018
                                                                                                                                                    - सर्जना शर्मा
 
हम प्रतिदिन भगवान से अपने लिए दुनिया का समस्त वैभव ,सुख ,ऐशर्वय, यश और कीर्ति की याचना करते हैं । जीवन में ज़रा सी कुछ कठिनाई आयी नहीं की हम भगवान से प्रार्थना करने लगते हैं । लेकिन ज़रा कल्पना कीजिए यदि भगवान किसी दिन अपने भक्त के घर भिक्षा मांगने आए तो भक्त की क्या प्रतिक्रिया होगी ? वो अभिभूत होगा ? आनंदित होगा?अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देगा ?
जगत के पालनहार भगवान विष्णु के ऐसे ही एक भक्त हुए हैं दैत्य राज बलि । राजा बलि ने तीनों लोकों का राज पाने के लिए सौ यज्ञों का संकल्प किया था । जब 99 यज्ञ पूरे हो गए और सौवां यज्ञ आरंभ होने जा रहा था तो देवताओं का सिंहासन डोलने लगा । स्वर्ग के राजा इंद्र भयभीत हो गए । यदि राजा बलि ने सौवां यज्ञ पूरा कर लिया तो देवता सदा सदा के लिए स्वर्ग से बाहर हो जायेंगें । यज्ञ को पूरा होने से कैसे रोका जाए । सभी देवता एकत्र हो कर श्री हरि विष्णु के पास गए । भगवान विष्णु ने सनातन कैलेंडर के भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष द्वादशी को एक छोटे ब्राह्मण बालक के रूप में अवतार लिया जिसे वामन अवतार के नाम से जाना गया । बटुक ब्राह्म्ण बन कर भगवान विष्णु राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंच गए ।
उस समय राजा बलि के कुल गुरू शुक्राचार्य उन्हें सौवें यज्ञ का संकल्प ही दिलाने वाले थे कि उनका एक दरबारी आकर बोला--" एक छोटा सा ब्राह्मण आया है और आपसे भिक्षा चाहता है "। राजा बलि को उनके गुरू ने रोका पहले संकल्प ले लो फिर मिलना . लेकिन राजा बलि असुर कुल में जन्म लेने के बाद भी बहुत धर्मज्ञ , सदाचारी और अपनी प्रजा का ध्यान रखने वाला राजा था । जो प्रतिज्ञा करते उसे पूरा करते थे । राजा बलि ने बटुक को यज्ञ बेदी के पास ही बुलवा लिया और कहा -- "हे बाल योगी आज्ञा दिजिए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं । मेरे पास धरती का समस्त वैभव और सुख हैं बस आप एक बार मुझे बता दें । " बाल योगी ने कहा --"राजा बलि पहले संकल्प लो कि मैं जो भी तुमसे मांगूगा तुम अपना वचन निभाओगे " । दैत्य गुरू शुक्राचार्य संकल्प शब्द सुनते ही चौँक गए उन्होनें अपने तप की साधना का बल प्रयोग किया और अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कि बटुक तो साक्षात विष्णु हैं । वो समझ गए कि ये राजा बलि का यज्ञ पूरा नहीं होनें देंगें । उन्होनें राजा बलि को चेतावनी दी -- "राजा ये बटुक नहीं स्वयं तुम्हारे आराध्य भगवान विष्णु हैं । ये तुम्हारा सर्वस्व हरण करने आए हैं । तुम संकल्प मत लो "। राजा बलि गुरू और गोविंद के बीच धर्मसंकट में फंस गए । किस की बात माने गुरू की या गोविंद की । उन्होनें फैसला किया कि वो अपने द्वार पर आए भगवान को खाली हाथ नहीं जाने देगें । गुरू की आज्ञा की अवहेलना करते हुए उन्होनें संकल्प ले लिया ।
 
बटुक ने कहा - "हे राजा मैं कोई भगवान नहीं मैं तो एक निर्धन बटुक हूं यज्ञ शाला के लिए मुझे केवल तीन पग धरती चाहिए "। राजा बलि ने कहा हे-- "बाल योगी तुमने कितनी छोटी याचना की है । मैं आपको वचन देता हूं कि आप तीन पग धरती अपने पैरों से नाप लें "। यज्ञ शाला में सन्नाटा था और शुक्राचार्य आग बबूला थे कि उनका यजमान उनकी बात नहीं मान रहा उन्होनें राजा बलि को लक्ष्मीहीन होने का श्राप दिया । लेकिन राजा बलि अपनी प्रतिज्ञा से डिगे नहीं । अब बाल योगी बन कर आए विष्णु ने जब धरती नापनी आरंभ की तो सब दंग रह गए उनके पग इतने बड़े होते गए कि उन्होनें एक पग में पूरी धरती और दूसरे पग में पूरा स्वर्ग नाप लिया । राजा बलि हाथ जोड़े निश्चल भाव से खड़े रहे । अब बाल ब्राह्ण ने अपना वास्तविक रूप धारण कर लिया ।भगवान विष्णु ने कहा -- "राजा बलि हम तुम्हारी दृढ़ प्रतिज्ञा और दान वीरता से प्रसन्न हुए लेकिन अभी तुम्हारा वचन अधूरा है मैं तीसरा पग कहा रखूं "। राजा बलि भगवान विष्णु को अपने सामने पा कर भावविभोर हो गए उन्होनें कहा --" हे भगवन् तीसरा पग आप मेरे सिर पर रखें । राजा धरती पर सिर झुका कर बैठ गए " । श्री हरि ने उनके सिर पर पांव रखा और राजा बलि पाताल में चला गया ।
 
राजा बलि का सम्राज्य वर्तमान केरल में था । प्रजा में हाहाकार मच गया । लोक कल्याणकारी ,परोपकारी , धर्मज्ञ , प्रजा हितकारी राजा अब धरती पर नहीं रहेगा । उन्होनें भगवान विष्णु से आर्त पुकार की कि उनके राजा के साथ अन्याय ना किया जाए सारी प्रजा दुखी हो जाएगी । भगवान विष्णु ने कहा -- "प्रतिवर्ष दस दिन के लिए राजा बलि अपनी प्रजा से मिलने धरती पर आयेंगें । आप उनका दिल से स्वागत करना " । राजा बलि के स्वागत में केरल में आज भी औणम उत्सव मनाया जाता है । ओणम किसी एक धर्म के लोग नहीं बल्कि हर धर्म और जाति के लोग श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं । पूरे केरल को फूलों की रंगोली से सजाया जाता है । विभिन्न तरह के पकवान बनाए जाते हैं ।
भारत के अन्य राज्यों में वामन जयंती भक्तिभाव से मनायी जाती है । ये दिन भगवान और भक्त के अनोखे रिश्ते का प्रतीक है । एक ऐसा भकत जो न तो अपने गुरू के श्राप से भयभीत हुआ और न ही अपने वचन से डिगा । जब जब भगवान विष्णु के वामन रूप की बात होती है तब तब राजा बलि को भी श्रद्धा के साथ याद किया जाता है । ये दिन स्मरण कराता है कि जिसने भक्ति भाव से सर्वस्व त्याग किया वो अमर हो गया ।
भगवान और भक्त के इस पावन दिन की पाठकों को बधाई ।