यहूदी से हिंदू बनने की मेरी यात्रा
   दिनांक 21-सितंबर-2018
                                                                                                                                     - डेना मरियम
जब मैं सोचने लगती हूं कि हिंदू होने का मतलब आखिर क्या है, तो यही पाती हूं कि यह धर्म आधारित जीने का तरीका है। यह दुनियाभर के नियम निर्देशन के अनुरूप है। यह हमें ब्रह्मांड और खुद के साथ सामंजस्य बैठाने में मदद करता है. 
मेरा जन्म न्यूयॉर्क के एक पंथनिरपेक्ष यहूदी परिवार में हुआ। हमारे लिए यहूदी होना पांथिक से कहीं ज्यादा जातीय पहचान भर था। बचपन से ही मेरा धर्म की ओर काफी झुकाव था, लेकिन मेरे परिवार ने मुझपर किसी तरह की कोई अवधारणा नहीं थोपी और आध्यात्मिक दुनिया को खुद से जानने-समझने के लिए मुझे मुक्त छोड़ दिया। मैं छोटी उम्र से ही ईश्वर को मां रूप में देखने लगी थी और इस तरह 'देवी' की मेरी खोज शुरू हुई। पिछले जन्मों की धुंधली सी यादें बचपन में मेरे साथ रहीं और इस कारण मैंने पुनर्जन्म को केवल अवधारणा के तौर पर नहीं, बल्कि अनुभूत सचाई रूप में लिया।
मेरे जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब मैं कॉलेज में थी। एक दोस्त ने मुझे परमहंस योगानंद की पुस्तक 'द ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी' भेंट की और मुझे जैसे जीवन की दिशा मिल गई। मैंने उन्हें तुरंत अपना गुरु मान लिया। हालांकि परमहंस जी का देहावसान पहले ही हो चुका था, लेकिन उनके साथ एक मजबूत आत्मिक रिश्ता बन गया। उन्होंने मुझे ध्यान और वेदों की ओर प्रेरित किया और धीरे-धीरे वैसी बहुत सी बातें जिन्हें मैं केवल अंत:दृष्टि से जानती थी, एक-एक कर प्रमाणित होती चली गईं। सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्होंने मुझे देवी मां के विभिन्न रूपों से परिचित कराया। तभी से मैं खुद को हिंदू मानने लगी। जब मैंने देवी की आराधना शुरू की, मुझे इस बात का दुखद भान हुआ कि देवी मां तो अन्य धार्मिक परंपराओं के बोझ तले दबी हुई हैं।
कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं पवित्र ग्रंथों में विशेषज्ञता के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट स्कूल गई। वहां वेद पर भी एक पाठ्यक्रम था और लगा, जैसे मेरी मुराद ही पूरी हो गई हो। मैंने झटपट इसे चुन लिया, लेकिन वहां इसे पढ़ाने के तरीके से मुझे घोर निराशा हुई। इसे पढ़ाने वाले पश्चिमी प्रोफेसर विभिन्न देवी-देवताओं के बारे में ऐसे बताते जैसे वे किसी अप्रचलित-सी पौराणिक कहानी के पात्र हों। मुझे बहुत बुरा लगा और मैंने तभी इसे शैक्षणिक करियर बनाने का इरादा छोड़ दिया, लेकिन दुखी होकर यह फैसला करते समय मुझे इस बात का अंदाजा हुआ कि एक हिंदू के रूप में अपनी पहचान को लेकर मैं कितनी संजीदा हो चुकी थी। मैंने स्वाध्याय का रास्ता चुना और प्राचीन ग्रंथों, उपनिषदों, योग सूत्रों को पढ़ना शुरू किया। सबसे बड़ी बात, श्रीमद्भगवद्गीता को मैंने बार-बार पढ़ा और तब तक पढ़ती रही जब तक कि इसका ज्यादातर हिस्सा कंठस्थ नहीं हो गया। स्नातक में मेरे शोधपत्र का विषय था श्रीमद् भगवद्गीता और 'ओल्ड टेस्टामेंट' के 'बुक ऑफ जॉब' का तुलनात्मक अध्ययन। दोनों ही मनुष्य-दैव संवाद हैं और दोनों का अंत दैवीय इच्छा के समक्ष समर्पण से होता है, ऐसा समर्पण जिसकी उत्पत्ति प्रेम और योग से होती है। लेकिन मेरी प्रोफेसर के विचार इससे अलग थे और उन्होंने मेरे शोधपत्र में जगह-जगह लिखा कि 'ओल्ट टेस्टामेंट' में ईश्वर से रिश्ते का आधार भय था न कि प्रेम। उन्होंने तब मुझसे इस बात पर चर्चा भी की और समझाया कि 'ओल्ड टेस्टामेंट' में तो प्रेम का मनोभाव है ही नहीं। मुझे अच्छी तरह याद है, यह सुनकर मुझे बड़े जोर का झटका लगा था और मैंने मन ही मन कहा- यह तो प्रेम का ही भाव है जिसके कारण मैं हिंदू हूं। अंतिम सत्य से आखिरकार कोई प्रेम का रिश्ता कैसे नहीं रख सकता? ब्रह्मांड का सृजन और इसका पालन प्रेम के कारण ही हो सका। और इस तरह एक हिंदू के रूप में मेरी पहचान और मजबूत हुई।
कई साल बाद मैं अंतरधार्मिक सभाओं के आयोजन से जुड़ गई। मैंने यह सब पहले से सोचा नहीं था। यह अवसर अचानक मेरे सामने आ खड़ा हुआ। बात वर्ष 2000 की है। मैं पहली बार जिस बड़ी सभा के आयोजन से जुड़ी, वह न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय में हुई। यह सभा थी पांथिक और आध्यात्मिक नेताओं का सहस्राब्दी शिखर सम्मेलन। संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय में पहली बार पांथिक नेताओं की बैठक हो रही थी और इसका उद्देश्य था संयुक्त राष्ट्र के शांति प्रयासों में इन पांथिक नेताओं की सहभागिता सुनिश्चित करना। मेरे साथ सह-आयोजक थे एक भारतीय जैन। हमलोगों ने यह सुनिश्चित किया कि सम्मेलन में हिंदू, जैन और बौद्धों की ओर से बड़े-बड़े प्रतिनिधिमंडल शामिल हों जबकि इससे पहले के किसी भी अंतरपांथिक सम्मेलन में इस तरह के प्रयास नहीं किए गए। उस सम्मेलन में भाग लेने के लिए 108 स्वामी आए और जैसे हंगामा मच गया। कुछ अब्राह्मिक नेता बिफरे हुए थे। इसकी वजह थी, इससे पहले अतंरपांथिक सम्मेलन मूलत: अब्राह्मिक विमर्श ही होता था जिसमें अलबत्ता तो पूरब से किसी तरह की कोई भागीदारी होती नहीं थी और अगर कभी हुई भी तो खानापूर्ति के लिए, यानी इक्का-दुक्का प्रतिनिधि। जब मेरा ध्यान अंतरधार्मिक सम्मेलन की इस असंतुलित प्रकृति की ओर गया तो मैंने पहला काम यही ठाना कि इस सम्मेलन में अन्य पांथिक परंपराओं को भी शामिल किया जाए जिससे इस मंच पर संतुलित विमर्श संभव हो सके। आयोजन की तैयारी के दौरान मेरा सारा ध्यान इसी लक्ष्य को पाने पर टिका था। जिस तरह अब्राह्मिक शाखाओं को एक परिवार के तौर पर देखा जाता है, मैंने धर्म परंपराओं को भी एक परिवार की तरह पेश करना आरंभ किया और इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक ज्ञान का सही प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए अंतरधार्मिक सम्मेलन को अब्राह्मिक और धर्म-परंपराओं को तर्कसंगत तरीके से संतुलित करना होगा।
 
अंतरधार्मिक सम्मेलन के आयोजन का मेरा काम सुचारू तरीके से चलने लगा और मुझे वैश्विक सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा। वर्ष 2001 में ईरान के तेहरान में आयोजित होने जा रहे धार्मिक एवं पर्यावरण सम्मेलन में मुझे आमंत्रित किया गया। जब मैं वहां पहुंची तो वहां के एक अधिकारी ने मुझसे मेरा धर्म पूछा। मैंने कहा- हिंदू। उसने मेरी ओर अविश्वास से देखा और दोबारा पूछा। इस बार भी जब मेरा उत्तर वही रहा तो उस अधिकारी को जैसे अपने कानों पर यकीन हुआ और फिर कुछ क्षण की शांति के बाद उसने कहा, ''यह तो अजीब सा धर्म है। आप बंदर और हाथी की पूजा करते हैं।'' उस अधिकारी के शब्द मेरे दिल में नश्तर की तरह चुभे। आखिर मैं उस व्यक्ति को अपने पूज्य हनुमान और गणेश के बारे में क्या कहती? मैं बिना कुछ बोले यह सोचते हुए वहां से हट गई कि यह आदमी इस काबिल भी नहीं कि इसे समझाने की कोशिश करूं। अच्छी बात है कि उस घटना के 17 साल बीत जाने के बाद आज स्थितियां काफी बदल गई हैं और योग तथा हिंदू विश्व दर्शन के बारे में इस हिस्से के लोगों में काफी जागरूकता आई है। वर्ष 2001 के उत्तरार्द्ध में ही जब मैं सऊदी अरब में आमंत्रित थी, वहां भी मेरा अनुभव कुछ ऐसा ही रहा था। वीजा आवेदन में मैंने अपना धर्म 'हिंदू' लिखा। लेकिन जब मैं वहां पहुंची, आव्रजन अधिकारी ने मुझे ठहरी हुई नजर से देखा और फिर मेरा धर्म पूछा। मैंने बताया-'हिंदू'। लेकिन वह उसी सवाल पर अटका रहा जैसे आश्वस्त होना चाह रहा हो कि क्या मैं वाकई हिंदू हूं। मुझे नहीं लगता कि वह अधिकारी मुझे सऊदी अरब में प्रवेश से रोक देता, फिर भी मेरे एक जैन साथी ने बीच-बचाव किया और कहा कि मैं सही में हिंदू ही हूं। तब जाकर उस अधिकारी ने मुझे आगे जाने दिया। लेकिन उसके बाद एक सवाल जरूर मेरे मन में उठा- क्या होता, अगर मैंने खुद को बौद्ध कहा होता। क्या तब भी उस अधिकारी की प्रतिक्रिया वैसी ही होती जैसी 'हिंदू' सुनने पर हुई थी? यह आम धारणा है कि बौद्ध एक वैश्विक धर्म है और इसे मानने वाले तमाम पश्चिमी अनुयायी हैं। यह बात आज हिंदुत्व के लिए भी उतनी ही सही है। मैं लोगों को यह हमेशा कहती रहती हूं कि वे 'गोरे हिंदुओं' को नहीं भूलें। मेरे इन अनुभवों ने मुझे प्रेरित किया कि हिंदुत्व की महानता और इसके सर्वग्राही दर्शन की बात और जोरदार तरीके से लोगों के सामने रखूं और यह बताऊं कि इस प्राचीन परंपरा का हिस्सा बनकर मैं खुद को कितना धन्य महसूस करती हूं।
जब भी मुझ से यह पूछा जाता है कि मेरे लिए हिंदू होने का मतलब क्या है तो मैं भगवान शिव, नारायण, महालक्ष्मी, माता पार्वती, श्री राम, भगवान कृष्ण के अतिरिक्त मेरे अपने गुरुदेव के साथ अपने अलौकिक रिश्तों के बारे में सोचने लगती हूं जो एकदम सच्चे हैं। वे सब मेरे लिए सबसे प्रिय हैं और किसी भी वास्तविक चीज से ज्यादा वास्तविक। मैंने न जाने कितनी बार उनकी प्रतिक्रिया सुनी है, उनमें से किसी की भी प्रार्थना के बाद असंभव को संभव होते देखा है। वे ख्यालों या महज प्रतीक स्वरूप नहीं बल्कि प्राणवान हैं और उनका प्रेम प्रदर्शन मानवीय समझ से परे है, और वे हमारी भक्ति का बड़े ही सशक्त तरीके से जबाव देते हैं।
हिंदू होने के आशय पर विचार करते समय मेरा ध्यान उन तमाम प्रौद्योगिकियोंं और साधना की ओर जाता है जिन्हें हमारे ऋषि-मुनियों ने विकसित किया ताकि ईश्वर से हमारी एकात्मकता अर्थात् समस्त जीव उसी एक ईश्वर के रूप हैं, के तत्व ज्ञान को समझने में हमारी मदद हो सके। हिंदुत्व मान्यताओं अर्थात् चंद सिद्धांतों पर आधारित नहीं है, जैसा कि अन्य मत- पंथों के साथ है। यह अनुभव आधारित है। हिंदुत्व हर व्यक्ति को उस निरपेक्ष सत्य के समाधान का साधन देता है जिससे आत्मज्ञान की प्राप्ति हो सके, उन देवी-देवताओं से रिश्ता जुड़ सके जो हमेशा रास्ता दिखाते हैं और हमारे उत्थान का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
हिंदू होने का एक अर्थ मेरे लिए धर्म अनुकूल जीवन-शैली भी है। इसे अनुभव किया जा सकता है, शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। हर स्थिति में धर्म ही हमारा मार्गदर्शक है। ऐसा धर्म जो समस्त वैश्विक कानूनों का हामी है, इसका वाहक है। इसी कारण हिंदुत्व हमें अपने और ब्रह्मांड के साथ सहचर्य की सीख देता है।
उम्र के साथ मैंने यही समझा कि हमारी गहरी आध्यात्मिक अंत:दृष्टि की सार्थकता समाज की उन्नति में सहायक होना और उन अवरोधों को दूर करने में अपनी भूमिका निभाना है जो लोगों को क्षमतानुसार सकारात्मक परिणाम देने में बाधक हैं। आज हम सभी अपने आधुनिक उपभोक्तावादी समाज की विफलता के साक्षी हैं जिसमें सहज-प्राकृतिक विश्व लगभग नष्ट हो चुका है। इन परिस्थितियों में पश्चिमी समाज में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है जो बड़ी आशा के साथ भारत की ओर देख रहे हैं कि वह प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व आधारिक विकास का कोई नया रास्ता सुझाए। भारत से भौतिक रूप से काफी दूर बैठी मैं तब बहुत अजीब महसूस करती हूं जब भारत में कुछ लोग आज के परिद़ृश्य में प्राचीन धर्म आधारित सभ्यता की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं। मुझे लगता है कि वैश्विक समुदाय के रूप में हमारा अस्तित्व तभी बचा रह सकता है जब पाश्चात्य विकास के रास्तों को छोड़कर मूल्य आधारित सभ्यता की ओर लौटें और आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्राचीन भारत की स्थापना करें। गिनती के नासमझों के आधार पर 'हिंदुत्व' को अतिवादी करार देना हम सभी को- भारतीय हों या गैर भारतीय-समान रूप से आहत करता है। हमें कल का ख्याल कर धर्म आधारित सभ्यता के लिए काम करना चाहिए। हम धर्म को अपने व्यक्तिगत जीवन तक ही सीमित नहीं कर सकते। यह हमारे सामूहिक जीवन के हर क्षेत्र के लिए प्रासंगिक है- शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन से लेकर राजनीतिक जीवन तक। मेरे लिए हिंदुत्व का मतलब धर्म आधारित समझ अर्थात हिंदुत्व का मर्म व्यक्ति की जीवन-दर्शन में उतरना है जिससे हम ऐसी शांतिपूर्ण और कहीं ज्यादा स्थायी संस्कृति का मार्ग खोज सकें। ऐसी संस्कृति जो भूत के ज्ञान पर आधारित हो और उन उन्नत साधनों की पोषक हो जो एक आश्वस्ति के साथ हमें भविष्य में ले जाती हो। अब समय आ गया है जब सर्वहिताय के हिंदू आदर्शों के रंग में गहरे रंगे हम विमर्श को नया आयाम दें। हिंदू मूल्य हाशिए पर सक्रिय उन नासमझों की थाती नहीं है। ये जीवन की मुख्यधारा से जुड़े हैं। यही वे मूल्य हैं जो हमें स्वयं से, एक-दूसरे से, प्रकृति से और समस्त जीवों में विद्यमान उस आधारभूत ईश्वर के साथ एक पवित्र रिश्ता बनाने का रास्ता दिखाते हैं।
(लेखिका ग्लोबल पीस इनिशिएटिव ऑफ वुमेन तथा कन्टेम्पलेटिव अलायंस की संस्थापक एवं लंबे समय से परमहंस योगानंद की शिष्य हैं।)