संघ ने व्याख्यानमाला से संपूर्ण समाज को दिया स्पष्ट संदेश, ऐतिहासिक होगा असर
   दिनांक 25-सितंबर-2018
दिल्ली के विज्ञान भवन में 'भविष्य का भारत : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण', शीर्षक से आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला से निकला संदेश और संपूर्ण समाज को संघ का आह्वान स्पष्ट है। राष्ट्रीय विमर्श में संघ की यह साफगोई ऐतिहासिक असर छोड़ेगी। आयोजन के तुरंत बाद, नियमित दाम और कलेवर में प्रकाशित हो रहा यह अंक संघ से जुड़े विषयों में रुचि रखने वाले पाठकों-शोधकों के लिए विशेष है। विज्ञान भवन की सीमित क्षमता और सीधे प्रसारण को सहेजने में आने वाली तकनीकी दिक्कतों को देखते हुए व्याख्यानमाला को अंशत: सम्पादन के बाद अधिकतम सन्दर्भों व स्पष्टता के साथ, लगभग 'ज्यों का त्यों', दिवस और विषयवार, अपने पाठकों के सामने रखने का निर्णय पाञ्चजन्य ने किया है। 
प्रथम दिवस
 
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत:
"दुनिया को अनुभव होता है कि संघ अब एक शक्ति के रूप में इस देश में उपस्थित है। तो स्वाभाविक उसकी चर्चा चलती है, चलनी भी चाहिए। परंतु चर्चा करने के लिए वस्तुस्थिति का पता भी होना चाहिए। संघकार्य का अनोखा तरीका होने के कारण संघ की शक्ति जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे उसका प्रचार अपने आप होने लगता है। किसी-किसी को उस शक्ति का डर भी लगता है तो फिर उसके बारे में अपप्रचार भी होता है।
डॉ. हेडगेवार और स्वातंत्र्य समर
संघ को समझना है तो प्रारंभ करना पड़ता है डॉ़ हेडगेवार से। संघ के निर्माता। इसलिए संघ के सारे कार्य में डॉ़ हेडगेवार के मानस का प्रतिबिम्ब मिलता है। नागपुर के एक कनिष्ठ मध्यमवर्गीय पुरोहित के परिवार में डॉ़ हेडगेवार का जन्म हुआ। घर की परिस्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं थी। तीन भाई थे, इनसे बड़े दो थे। उस समय स्वतंत्रता की बात समाज में चलने लगी थी। इस वातावरण में बचपन से ही डॉ़ हेडगेवार स्वतंत्रता की आकांक्षा लेकर पले-बढ़े। वे जन्मजात देशभक्त थे।11 साल के थे तब इनके माता-पिता का एक ही दिन देहावसान हो गया। प्लेग की बीमारी नागपुर में चल रही थी तो उनकी सेवा में दोनों लगे हुए थे तो उनको भी प्लेग हो गया था। घर में कमाई का कोई साधन नहीं। अत्यन्त गरीबी में अपनी पढ़ाई पूरी करनी पड़ी। परन्तु सब कालावधि में डॉ़ हेडगेवार के जीवन में, जो आगे चलकर डॉक्टर बने, दो बातें नहीं छूटीं। एक, अपनी पढ़ाई में हमेशा अपने विद्यालय के पहले दस बच्चों में आना। और दूसरी बात, देश के लिए जो कोई प्रयास चल रहा हो उसमें धन तो पास में नहीं था, इसलिए तन-मन पूर्वक सहभागी होना। उस समय वन्देमातरम् आन्दोलन चला और नागपुर के विद्यालयों मंे छात्रों को संगठित करने का काम करने वाली अग्रणी टोली में डॉ़ हेडगेवार थे। उत्कट देशभक्ति के कारण उनको स्कूल से निकाला गया। ऐसे आन्दोलनों में जिनकी पढ़ाई छूटती थी, उनके लिए उस समय के हमारे नेताओं ने राष्ट्रीय विद्यालय चलाये थे। उस राष्ट्रीय विद्यालय मंई वे पढ़े। उनकी यह सक्रियता और दिल की ये चिनगारी नागपुर के तत्कालीन नेताओं को दिख रही थी। इसलिये उन्होंने उनको कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई करने के लिए भेजा। पढ़ाई का तो बहाना था। मुख्य उद्देश्य था देशभर के क्रांतिकारियों की अनुशीलन समिति के सम्पर्क में आकर सेन्ट्रल प्रोविंस में क्रांतिकारियों का काम स्थापित करें। उस क्रांतिकारी समिति की कोर कमेटी में उनका प्रवेश हुआ। यहां उनका कोड नाम था कोकेन। आगे चलकर यह क्रांतिकारी आंदोलन असफल हो गया।
 
देश को अर्पित जीवन
इस सारी कालावधि में उन्होंने संकल्प लिया कि इस जीवन को केवल अपने देश के लिए जीना है, और कुछ करना नहीं है। कमाना नहीं है। देश के काम में पूरी तरह लग जाना है। लेकिन डॉक्टर बनकर आए तो विवाह के भी प्रस्ताव आने लगे। तो उन्होंने अपने चाचा को पत्र लिखा कि मैंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए देश के लिए जीवन लगाने की प्रतिज्ञा की है। फिर प्रस्ताव आने बंद हो गये।अपने देश के लोगों ने मिलकर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी, उसके वेे विदर्भ प्रदेश के कार्यकर्ता बने। आंदोलन के लिए संपर्क हेतु गांव-गांव पैदल जाना, बैलगाड़ी से जाना होता था। लेकिन उनके भाषणों के कारण वे पकड़े गए, राजद्रोह का आरोप लगा और नागपुर के एक कोर्ट में अभियोग चला। उन्होंने वहां कहा, ''सजा तो मैं स्वीकार करूंगा, लेकिन बचाव में बोलूंगा'', क्योंकि कोर्ट में उस समय पत्रकार भी आते थे तो और एक भाषण करके अपना विषय प्रचारित करने का मौका उन्हें मिल गया। इसलिए उन्होंने बचाव का भाषण किया। उस भाषण का प्रारंभ ही यहीं से किया कि किस कानून के तहत अंग्रेजों को भारतवर्ष पर राज्य करने का अधिकार मिलता है। वह कानून अगर कहीं है तो बताओ। मैं तो आपके इस कानून को भी नहीं मानता, आपके न्याय को भी नहीं मानता। स्वतंत्रता मनुष्य का अधिकार है। इसको अगर राजद्रोह समझकर और मुझे और मेरे जैसे लोगों को पकड़कर जेल में डालने की स्थिति अंग्रेज सरकार पर आ रही है तो अंग्रेज सरकार को भी समझना चाहिए कि अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर उनका इस देश से जाने का समय निकट आ गया है। जज ने उनको एक वर्ष के सश्रम कारावास की सजा देते हुए कहा कि जिस भाषण के बारे में उन पर आरोप लगा है, बचाव का भाषण उससे ज्यादा उकसाने वाला है।
उन्होंने जेल जाने से पूर्व एक कार्यक्रम में भाषण दिया। बाद में जेल से छूटने के बाद उनकी एक अभिनंदन सभा हुई, जिसकी अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू कर रहे थे। उसमें भी उन्होंने भाषण दिया, उसमें भी यही बात कही। उन्होंने कहा कि केवल जेल जाना ही देशभक्ति नहीं है, बाहर रहकर लोगों के मन में स्वतंत्रता का अर्थ, स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए प्रयास, इनके बारे में जागृति करना भी देशभक्ति है।
देश के सार्वजनिक जीवन में डॉ़ हेडगेवार का संबंध सर्वत्र आता था। सभी प्रकार के विचारधाराओं के लोग उनके अच्छे मित्र थे। उस समय नागपुर में और एक कम्युनिस्ट नेता थे बेरिस्टर रूइकर। सभी प्रकार के लोगों से उनकी चर्चा, वार्ताएं होती रहती थीं। 
चिंतन की दिशा
1857 में देश को स्वतंत्र करने का एक बड़ा प्रयास भारतवर्ष में हुआ जो विफल रहा। बाद में चिंतन-मंथन करके समाज जागृति के जो प्रयास शुरू हुए उसकी सामान्यत: चार मुख्य धाराएं दिखती हैं। एक धारा कहती थी कि एक प्रयास विफल हुआ तो क्या, सशस्त्र संघर्ष मार्ग पर ही आगे बढ़ना चाहिए और इसलिए बाद में क्रांतिकारियों का मार्ग शुरू हुआ। 1945 में सुभाष बाबू के विमान आघात में अंतर्धान हो जाने तक यह धारा चली। एक धारा ये निकली कि अपने देश के लोगों की राजनीतिक जागृति करनी चाहिए और इसलिए कांग्रेस के रूप में एक बड़ा आंदोलन सारे देश में खड़ा हुआ। उसमें भी अनेक सर्वस्व त्यागी महापुरुष, जिनकी प्रेरणा आज भी हमारे जीवन की प्रेरणा में काम करती है, पैदा हुए और देश के सर्वसामान्य व्यक्ति को स्वतंत्रता के लिए रास्ते पर लाकर खड़ा करने का काम उस धारा ने किया है। एक बड़ा योगदान अपनी स्वतंत्रता प्राप्ति में उस धारा का है। आज अनेक दल हैं। अब उसकी स्थिति क्या है, इसके बारे में कुछ नहीं कहूंगा। तीसरी एक धारा थी जो कहती थी हमारे समाज में ही सुधार की आवश्यकता है। इतने सारे भेद हैं। एक-एक व्यक्ति का चारित्रिक स्खलन है। भाषा, प्रांत, जाति, उपजाति के इतने भेद हैं, अशिक्षा है, दरिद्रता है। तो समाज सुधार में कई महापुरुष हो गए, जिनका नाम हम आज भी लेते हैं। उन्होंने जो समाज सुधार सुझाए और कुछ मात्रा में समाज में परिवर्तन लाकर दिखाया वह वहीं तक सीमित हो गया। उनके सपने अभी अधूरे हैं। चौथी एक धारा थी जो कहती थी कि देखो अपने मूल पर वापस चलो। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद जी, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानंद जी जैसे लोगों ने अपने मूल पर दृढ़ होकर समाज से दरिद्रता और अज्ञान को भगाने के लिए सेवा का संदेश दिया। लेकिन हमारे देश में जो समाज का गुणवत्तापूर्ण चित्र उपस्थित होना चाहिए था, वह नहीं हो सका।
श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर का स्वदेशी समाज नाम का एक बड़ा प्रबंध है। उसमें उन्होंने कहा है कि एकात्मकता की जरूरत है, आपस में झगड़े नहीं चलेंगे। हमारे पास सब विविधताओं को एक साथ चलाने का परम्परा से विचार है, संस्कृति है परंतु इस परिवर्तन के लिए समाज में परिवर्तन होना चाहिए। जो शुद्ध चरित्र सम्पन्न है, सबके प्रति जो आत्मीय भाव रखता है, समाज के मन में उसके प्रति पूर्ण विश्वास है ऐसे नायक को खड़ा करना पड़ेगा। अपने पूर्व राष्ट्रपति डॉ़ अब्दुल कलाम अरुणाचल में गए थे। उन्होंने वहां भाषण में तीन बातें बताईं कि हमारे देश में हम लोगों को स्वयं के प्रति, देश-समाज के प्रति विश्वास जागृत करने की आवश्यकता है। हम सब कर सकते हैं जिसके लिए लोकशक्ति का जागरण करना पड़ेगा। हमको अपने प्राचीन संस्कृति के संस्कारों को पुनरुज्जीवित करना पड़ेगा।
डॉ़ वर्गीज कुरियन, अमूल के जनक, जिनका अभी हाल में देहांत हुआ, उन्होंने अपने आत्मचरित्र-'आई टू हैड अ ड्रीम'-में लिखा है कि केवल शासकीय व्यवस्थाओं पर निर्भर रहकर सामान्य समाज की उपेक्षा करने का ये क्रम ऐसे ही चलता रहा तो इस देश में कोई बड़ा काम होना संभव नहीं है।
यह मैं क्यों बता रहा हूं? डॉ़ हेडगेवार पूर्णतया देश के सार्वजनिक जीवन में सक्रिय थे और कहीं न कहीं इन सब कार्यों के माध्यम से उनका देश के मूर्धन्य चिंतकों से सम्पर्क आया। उन्होंने देश की जागृति के लिए सभाएं कीं। लगातार देश की चिंता में वे व्यस्त ही थे। गांधी जी जब यरवदा में पकड़े गए, शायद 28 मार्च, 1922 को। नागपुर की कांग्रेस कमेटी ने तय किया कि प्रति मास 28 मार्च को गांधी जी का स्मरण करेंगे। अगले महीने की 28 अप्रैल को पहली सभा में वक्ता के नाते डॉ़ हेडगेवार को बुलाया गया था। डॉ़ हेडगेवार ने वहां कहा कि गांधी जी का मात्र स्मरण करने से काम नहीं चलेगा, उनके जीवन में जो परम त्याग है, निस्वार्थ भाव से देश, समाज के लिए काम करने की जो ललक है, उसका हमको अनुकरण करना पड़ेगा। वे सुभाष बाबू से, सावरकर जी से मिले थे। राजगुरु जब भूमिगत हुए तो नागपुर में, विदर्भ में उनके रहने की व्यवस्था उन्होंने ही की थी। वे कहते थे, स्वस्थ समाज के लिए जो आवश्यक है, वह अपने आप होता रहता है, किसी को करना नहीं पड़ता। लेकिन ये जो बार-बार आवश्यकता पड़ती है इसका कारण हमारे समाज की कोई कमियां हैं जिन्हें सुधारकर अगर हम समाज को खड़ा नहीं करेंगे तो हमारे सब काम या तो अपूर्ण रह जाएंगे या तात्कालिक रूप से ही सफल होंगे।
कोलकाता के प्रसिद्ध क्रांतिकारी त्रिलोकनाथ चक्रवर्ती ने 1989 में संघ कार्यकर्ताओं को बताया था कि 1911 में एक बार डॉ़ हेडगेवार मेरे घर आए थे। उन्होंने कहा कि, दादा लगता है इस समाज को कुछ ट्रेनिंग देने की आवश्यकता है पर ट्रेनिंग देने की फुर्सत किसी को नहीं है। मुझे लगता है यह काम मुझे ही करना पड़ेगा। तबसे उनके मन में विचार था कि स्वतंत्र देश कहलाने के लिए योग्य समाज नहीं है, उसे योग्य बनाने का काम करना पड़ेगा। और इसलिए उन्होंने अनेक संस्थाओं के काम देखे, कुछ अपने मन से सोचा। वर्धा में उन्होंने एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक मण्डल भी चलाया। संघ का नाम, संघ की स्थापना के 3-4 वर्ष पहले ही उसके दो शब्दों का उपयोग उन्होंने किया था। और अंतत: शुक्रवार, 27 सितम्बर, 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर में उन्होंने घोषणा की, कि ये काम आज से शुरू हो रहा है। जितने सहयोगी मिल सके, उनके साथ उन्होंने काम शुरू किया।
 
संघ की कार्यपद्धति
लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्या है? ये मैथेडोलॉजी है और कुछ नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम का संगठन करता क्या है? वह व्यक्ति निर्माण का काम करता है। हमको भेद मुक्त समाज चाहिए, समता युक्त समाज चाहिए, शोषण मुक्त समाज चाहिए। स्वार्थ भी जाना चाहिए। समाज का आचरण उदाहरणों की उपस्थिति में बदलता है, आदर्श हमारे यहां हैं, महापुरुषों की कोई कमी नहीं है। देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले आदिकाल से इस क्षण तक बहुत लोग हैं। अगर देश के प्रत्येक गांव, प्रत्येक गली, मोहल्ले में स्वतंत्र भारत के आज के नागरिक का जैसा वातावरण होना चाहिए वैसा आचरण करने वाले, हर परिस्थिति में उसको न छोड़ने वाले, चरित्र सम्पन्न, सम्पूर्ण समाज से अपना आत्मीय संपर्क रखने वाले लोग खड़े हो जाएंगे तो उस वातावरण में समाज का आचरण बदलेगा।
संघ की यह योजना है। प्रत्येक गांव में प्रत्येक जिले में अच्छे स्वयंसेवक खड़े करना। यह योजना 1925 में संघ के रूप में प्रारंभ हुई। संघ बस इतना ही है। पहली बार जब संघ का पथसंचलन 1928 में नागपुर में हुआ, ज्यादा लोग नहीं थे। 21-22 की संख्या थी। लेकिन अपने समाज में उस समय 21-22 लोग भी एक दिशा में कदम मिलाकर चल रहे थे, यह दृश्य बड़ा दुर्लभ था। इसलिये लोग प्रभावित हो गये और डॉ़ हेडगेवार के पास गये। उन्होंने पूछा, डॉक्टर साहब अब अपने 50 लोग हो गये, अब आप आगे क्या करेंगे? तो डॉ़ साहब ने कहा कि पचास के बाद पांच सौ करेंगे। फिर पांच हजार। उसके बाद, पचास हजार करेंगे। ऐसा बढ़ते-बढ़ते पांच करोड़ तक संख्या पहुंची, तब उसने उठकर पूछा कि आप करेंगे क्या इनका। तो उन्होंने कहा, कुछ नहीं करेंगे, इतना ही करेंगे। डॉक्टर साहब ने कहा कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज को हमको संगठित करना है। ऐसा समाज खड़ा होने के बाद जो होना चाहिए वह अपने आप होगा। तो सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उस समय स्थापना हुई।
ये हिन्दू क्यों आया, ये बहुत बड़ा प्रश्न समाज से आता है। संघ की स्थापना के मूल में जो विचार है उसके तीन हिस्से हैं। एक मैंने बताया, समाज का परिवर्तन। व्यक्ति और व्यवस्था, दोनों अच्छे होने चाहिए। लेकिन समाज का आचरण बदलेगा व्यक्ति निर्माण से। अब इस सबमें समाज को संगठित करने मेंे एक मुख्य कठिनाई है कि ये समाज एक भाषा बोलने वाला समाज नहीं है। समाज में कितनी विविधता है। दर्शन में परस्पर विरोध भी है। इस समाज में जोड़ें कैसे? हमारे देश में इतने सारे विचार हैं जो हमारे देश की भूमि से निकले हैं। प्रस्थान बिन्दु एक ही है कि मूल में सब एक हैं। एकम् सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति। इसलिये विविधताओं से डरने की कोई जरूरत नहीं। सभी विविधतायें सत्य हैं। सबकी विविधता का सम्मान करो। ये दूसरा समन्वय का मूल्य है। तीसरा मूल्य है संयम। सब कुछ चाहिए, ऐसा नहीं चलेगा। अपनी जरूरतें कम करते जाओ, किसी चीज की जरूरत न रहे, ऐसा जीवन बहुत अच्छा जीवन है। यह तीसरा मूल्य है। मनुष्य के जीने में सबका योगदान होता है, यह समझ चौथा मूल्य है। और कृतज्ञता पांचवां मूल्य है। ये पांच बातें सर्वत्र भारत से निकले हुए सब विचारों में मिलती हैं। परस्पर विरोध के कारण खंडन-मंडन भी चलता रहा है, लेकिन कभी भी समाप्ति किसी की किसी ने नहीं की। दूसरों को कष्ट देना पाप है। पाप मत करो। और बिना पाप किये हुये भी अपने आपको ठीक रखने की कुशलता। ये सारा करते समय मुख्य काम है चित्त शुद्ध करना। सब जगह संतोष, स्वाध्याय, ईश्वर मिलता है। ये जोड़ने की बात है और हमको जोड़ने वाली यही मूल्याधारित संस्कृति है।
डॉ..
हेडगेवार हमेशा कहते थे कि अपनी दुर्व्यवस्था का कारण अंग्रेजों को, इस्लाम के आक्रमण को, मुसलमानों को कब तक देते रहोगे? इसमें तुम्हारी कोई कमी है। उसको ठीक करो। अपने मूल्यों को भूलकर हमने जब आचरण शुरू किया, तब हमारा पतन शुरू हुआ। ये जो मूल्यधारित आचरण की बात है, जो संस्कृति है उस संस्कृति के कारण हमारा हिन्दूपन है। इसलिए हिन्दुत्व हम सबको जोड़ता है यह विचार उन्होंने किया। और इसलिये उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करेंगे। लेकिन् ा समाज में 'हम हिन्दू नहीं हैं' कहने वाले लोग भी हैं। इसलिये उन्होंने स्पष्ट घोषणा की। ये हिन्दुस्थान हिन्दू राष्ट्र है। हम हिन्दू राष्ट्र को संगठित करेंगे। भेदरहित, स्वार्थमुक्त समाज ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता की परिणति है। समाज मेें अनुशासन है क्या? अनुशासित समाज वैभव प्राप्त करता है। स्वतंत्र देश के हम नागरिकों में सिविकसेंस का पालन दैनंदिन जीवन में देशभक्ति का आविष्कार है। इसकी मैथडोलॉजी रा. स्व. संघ है। लोगों को लगता है कि संघ बड़ा ही अलग तरह का संगठन है। संघ के एक व्यक्ति के नाते सामने होता है सरसंघचालक। उसको गलती से 'चीफ' भी कहा जाता है लोगों को लगता है, इनके मन से सब चलता है। तो इसलिये संघ को अंदर से आकर देखने पर आपको सब बातें पता चलेंगी। डॉक्टर हेडगेवार ने ये सारे प्रयोग पहले कर लिये थे। एक मुख से बात जाए तो एक ही बात जाती है और इसलिये अनुशासन के तकाजे से ऐसा दिखता है कि एक के बोलने पर सब होता है। लेकिन ऐसा नहीं होता। एक एक स्वयंसेवक के विवेक से काम होता है। यहां प्रत्येक स्वयंसेवक किसी से कुछ भी पूछ सकता है। प्रत्यक्ष स्वयंसेवक का विचार चर्चा में आने की पद्धति है। विचार आते-आते ऊपर सहमति बनती है। जो सहमति बनती है उसमंे सब अपना अपना विचार बिन्दु रखते हैं। सबसे लोकतांत्रिक पद्धति देखनी है तो आप संघ में आइये। यहां स्वयंसेवक पर किसी भी प्रकार का अंकुश नहीं है। यह पद्घति डॉ़ हेडगेवार के स्वयं के अनुभव और चिंतन से निकला शास्त्र है। रोज हम छोटे-छोटे सरल सादे-सीधे कार्यक्रमों से संस्कार करते हैं। संघ स्वावलंबी है। खर्चा हम ही जुटाते हैं। संघ का काम चलाने के लिए एक पाई भी बाहर से हम नहीं लेते।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयंसेवकों की गुरुदक्षिणा पर चलता है। भगवा ध्वज गुरु है क्योंकि यह हमारी तब से आज तक की परम्परा का चिह्न है। हमारे इतिहास में यह भगवा झंडा कहीं न कहीं रहता है। यहां तक कि स्वतंत्र भारत के झंडे पर फ्लैग कमेटी ने रिपोर्ट में यही कहा था कि सर्वत्र सुपरिचित यही झंडा हो। बाद में उसमें परिवर्तन हुआ, तिरंगा आ गया तो हम उसका पूर्ण सम्मान करते ही हैं। जब पहली बार कांगे्रस ने सम्पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया तो डॉक्टर साहब ने सब शाखाओं मंे कहा कि हम लोग तिरंगे ध्वज के साथ संचलन निकालें और शाखाओं द्वारा कांंग्रेस का अभिनंदन करने वाला प्रस्ताव पारित करके कमेटी को भेजा जाए। 
संघ और राष्ट्रहित की नीति
हम चाहते हैं कि देश का इतिहास देश का वर्तमान, देश के लोगों के कारण बने। महापुरुष, विचारधारायें आदि सब सहायक होगा। लेकिन सामान्य व्यक्ति के कृतित्व से देश का परम गौरव आना चाहिए। हमको कुछ नहीं चाहिये। सत्ता में कौन बैठेगा, देश किस नीति को स्वीकारे। यह सब समाज के लोग तय करेंगे। उसकी चिंता हमको नहीं है। हमको चिंता केवल इतनी है कि समाज का ऐसा एक आचरण बने।
संघ के कार्य के प्रचार के संदर्भ में इतना ही है कि हम जो करने वाले हैं उसकी प्रसिद्धि हम नहीं करते। जो किया है उसकी जानकारी के रूप मेें प्रसिद्धि करते हैं। संघ का स्वयंसेवक बाकी जीवन में क्या करे, कौन-सा सार्वजनिक कार्य करे? वह जो चाहता है वह करे। वही अपना कार्यक्षेत्र चुनता है। आज संघ के स्वयंसेवक अनेक क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं।
सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करते समय महिलाओं का क्या? यह प्रश्न डॉ़ हेडगेवार से एक महिला ने 1931 में पूछा। डॉ़ हेडगेवार ने कहा कि आपकी बात बिल्कुल ठीक है, परंतु आज वातावरण ऐसा नहीं है कि पुरुष जाकर महिलाओं में काम करें। इससे कई प्रकार की गलतफहमियों को मौका मिलता है। कोई महिला अगर काम करने को जाती है हम उसकी पूरी मदद करेंगे। उस महिला ने इसी प्रकार चलने वाला एक 'राष्ट्र सेविका समिति' नाम का संगठन चलाया। आज वह भी भारतव्यापी संगठन बन गया। संघ के 1 लाख 70 हजार से ऊपर छोटे-बड़े सेवा प्रकल्प चलते हैं। ये 5 साल के पहले का आंकड़ा है। हमारी माताएं, बहनें अपनी-अपनी जगह से भी बहुत मदद सीधे संघ कार्य में करती हैं। संघ के स्वयंसेवक के नाते, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाते सबको जोड़ने का हमारा प्रयास है और इसमें सबको बुलाने का भी हमारा प्रयास रहता है।''
 
द्वितीय दिवस
 
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत
''समाज-जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में स्वयंसेवकों ने कार्य खड़े किए। वे सब स्वतंत्र, अलग, स्वायत्त, स्वावलम्बी हैं। सब स्वयंसेवक हैं, इसलिए विचार की दृष्टि उनको मिली है, संस्कार मिला है। परामर्श चलता है, साथ देना भी चलता है। बहुत बार प्रश्न आता है कि क्या संघ की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा है?
 
संघ और राजनीति
संघ को सम्पूर्ण समाज को जोड़ना है और राजनीति समाज-जीवन के अनेक विषयों को देखती है जिनमें मतभेद होते ही हैं। संघ के जन्म से ही संघ ने यह निश्चित किया है कि राजनीति से हमारा संगठन दूर रहेगा। चुनाव नहीं लड़ेगा। संघ ने स्वयं तय किया है कि प्रतिदिन की राजनीति में हम नहीं जायंेगे। पर संघ की विचारधारा के नाते स्वयंसेवकों के मत हैं। नीति के बारे में मत हंै। कौन राज्य करे, ये तो चुनाव जनता करती है परन्तु वह राष्ट्रहित में कैसा चले, इस बारे में हमारे मत हैं जिन्हें हम सार्वजनिक रूप से बोलते हैं। हमारा वह प्रयास लोकतांत्रिक रीति से ही होता है। संघ अपना मत रखता है। सवाल किया जाता है कि एक दल है, उसमें स्वयंसेवक क्यों हैं? उस दल में बहुत सारे स्वयंसेवक पदाधिकारी क्यों हैं? राष्ट्रपतिजी स्वयंसेवक हैं तो इसलिये लोग कयास लगाते हैं कि नागपुर से फोन जाता होगा और बात होती होगी। यह बिल्कुल गलत बात है। संघ कार्य का जितना मेरा अनुभव है कदाचित उससे कहीं अधिक अनुभव उनको राजनीति का है। उनको अपनी राजनीति चलाने के लिए किसी सलाह की आवश्यकता नहीं है। सरकार की नीतियों पर हमारा कोई प्रभाव नहीं है। वे हमारे स्वयंसेवक हैं। वे भी समर्थ हैं। लोग सवाल करते हैं कि उसी एक दल में ज्यादा स्वयंसेवक क्यों हैं? अब ये तो हमारा प्रश्न नहीं है। बाकी दलों में जाने की इच्छा क्यों नहीं होती यह उनको विचार करना है। हम किसी स्वयंसेवक को किसी एक विशिष्ट राजनीतिक दल का काम करने के लिए नहीं कहते। स्वयंसेवक दैनंदिन जीवन में अपने विवेक से चलते हैं। राष्ट्रनीति के बारे में हम बोलते हैं और यह हमारी शक्ति है। हम जो चीज करवाना उचित मानते हैं उसके लिए हम जोर लगाते है और छुपे-छुपे नहीं, डंके की चोट पर करते हैं। किसी के प्रति बैर नहीं और किसी के प्रति अधिक दोस्ती नहीं। ये संघ का स्वभाव है। 
संघकार्य और महिलाएं
कल और भी एक उल्लेख आया था। हमारे देश में प्राचीन समय से महिलाओं को अत्यन्त बड़ा स्थान दिया है। उन्हें हम शक्ति स्वरूपा, जगदम्बा का रूप मानते हैं। एक तरफ विचार में ऐसा है और दूसरी तरफ व्यवहार में देखा तो उनकी हालत बहुत खराब है। महिलाएं समाज का एक हिस्सा होने के नाते समाज जीवन के सब प्रयासों में बराबर की हिस्सेदार हैं। कई मामलों में महिलायें पुरुषों से ज्यादा समर्थ हैं। उनको और सशक्त करने की जरूरत है, स्वतंत्रता देने की जरूरत, प्रबुद्ध क्षेत्रों में बढ़ाने की जरूरत है। अपने घर से प्रारंभ करके समाज के हर क्षेत्र तक मातृशक्ति जागरण का काम होना चाहिए, यही संघ की इच्छा है। महिला और पुरुष परस्पर पूरक हैं।
 
हिन्दुत्व और संघ
अब बात हिन्दुत्व की। संघ का विचार हिन्दुत्व का विचार है। यह अपने देश में परम्परा से चलता आया विचार है, सर्वसम्मत विचार है। लेकिन भ्रम खड़े होने के कई कारण हैं। उन कारणों के निर्माण में सबसे बड़ी भूमिका स्वयं हिन्दू समाज की ही है। हिन्दुत्व मूल्य समुच्चय का नाम है। विविधता में एकता, समन्वय, त्याग, संयम, कृतज्ञता। इसका आधार जो सत्य है उसका अन्वेषण हमारे यहां किया गया। सत्य एक है, अस्तित्व की एकता का सत्य। उसके चलते दुनिया की विविधताओं का सम्मान करो, उनका उत्सव करो। अपनी-अपनी विविधता पर श्रद्धापूर्वक पक्के रहो। ये संदेश देने वाला जो मूल्य समुच्चय हिन्दू है, हिन्दुत्व है। प्राचीन ग्रंथों में ये शब्द कहीं मिलेगा ही नहीं। आज भी बहुत से विद्वान, संत भी हिन्दू नहीं कहते, सनातन कहते हैं, धर्म कहते हैं। अन्य सम्प्रदाय में धम्म कहते हैं। हिन्दू नाम बाद में आया, किसी परिस्थिति विशेष के कारण आया। लोकभाषा का शब्द संत पहले उठाते हैं, तो संतों की वाणी में पहली बार, उसके बाद गुरुनानक देव ने जैसे कहा तुर्कस्थान खसमाना गया, हिन्दुस्थान डराया, काया कपड़ टुक, टुक होसी, हिन्दुस्थान समाल सी बोला। हिन्दू शब्द तब से लोगों में प्रचलित है, लेकिन अब वह चिपक गया है तो क्या करेंगे। समाजवाद में व्यक्ति और समाज परस्पर विकास में साथ चल सकते हैं। मानव समाज में विकास और पर्यावरणवाद में कोई विरोध नहीं है, वह साथ चल सकते हैं। सारा विश्व एक ही अस्तित्व होने के कारण है। सब लोग साथ चल सकते हैं। इस विचार को बोलने पर लोग कहते हैं कि हिन्दू विचार को बोल रहे हैं। मैंने ऐसा सुना है, हज यात्रा पर जाने वाले भारत के मुसलमानोंे का भी वहां पंजीयन जो होता है उसमें उनको माना जाता है कि ये हिन्दू मुसलमान हैं। बौद्धिक परिकर में चर्चाओं में इस प्रकार के विचारों को इंडिक थॉट कहते हैं। भारत एक स्वभाव का नाम है। ये सारे शब्द समानार्थी शब्द हैं। लेकिन इसके आशय को स्पष्ट रूप से बनाने वाला एक शब्द है हिन्दू। इसलिये संघ हिन्दू शब्द को आग्रहपूर्वक लेकर चलता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जो भारत शब्द का उपयोग करते हैं, जो इंडिक शब्द का उपयोग करते हैं, जो आर्य शब्द का उपयोग करते हैं उनसे हमारा कोई झगड़ा है या विरोध है। आशय की बात तो एक ही है, विविधता मंे एकता। इस मूल्य समुच्चय के आधार पर एक धर्म बनता है। धर्म के साथ कर्मकांड भी आता है तो कर्मकांड विशेष प्रकार का, विशेष प्रकार की पूजा, उसको रिलीजन कहते हैं और रिलीजन का ट्रांसलेशन धर्म करते हैं। इसलिये गलतफहमी पैदा होती है। आज हम जिसे हिन्दू धर्म कहते हैं वह वास्तव में हिन्दुओें का धर्म नहीं है। हिन्दुओं का धर्म हिन्दू धर्म शास्त्र के नाम से नहीं है। वह मानव धर्म शास्त्र कहा जाता है। हिन्दू शब्द आने के पहले वह रचा गया। वह किसी एक के लिए नहीं था। वह सब के लिए था। हमारे देश में जितनी आत्मधारायें हैं-सिख, बौद्ध, जैन, सनातनी, आर्य समाजी, इन सबका जन्म तो भारत में हुआ, भारत के समाज में काम किया लेकिन उन्होंने जो कहा है वह सम्पूर्ण विश्व के लिए है। हमने कभी भी अपनी परम्परा में अपने आपको विश्व मानवता से अलग नहीं माना। अस्तित्व की एकता का भान सबको करा देने के प्रयोजन से भारत का अस्तित्व बना है। तब से हम इन सब प्रकार की विविधताओं को लेकर एक समाज के नाते चल रहे हैं। एक राष्ट्र के नाते चल रहे हैं। हमारा राष्ट्र प्राचीन है। हमारा सांस्कृतिक राष्ट्र है। इस धर्म में ये जो शाश्वत मूल्योंे का भाग है वह शाश्वत धर्म है। डॉ़ आम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल की चर्चा में संसद में विरोधियों से पूछा कि आप धर्म को क्या समझते हो। मूल्य या कोड? आप कोड को धर्म मान रहे हो। कोड बदलता है। बदलना ही चाहिए। उसको मैं बदल रहा हूं। मूल्य वही हैं, आप चर्चा करें। धर्म की ओर देखने की हमारी दृष्टि यह है। जो मूल्य के विपरीत है उसको बदलना चाहिए। कितना बदलाव हुआ है हिन्दू परम्परा में। देवी देवता भी बदल गये। वैदिक काल के देवता आज नहीं हैं। मध्य काल के देवताओं के स्वरूप बदल गये हैं। नये-नये सम्प्रदाय निकल जाते हैं। हिन्दुत्व की संकल्पना अमुक पूजा को लेकर समर्थन नहीं करती। सृष्टि के साथ मानव समाज व्यक्ति का सुख और समाज का सुख दोनों एक साथ रखकर चले, इसलिए अर्थ, काम है, उसकी मान्यता है। इच्छाएं होती हैं, उनकी तृप्ति करने से सुख मिलता है। तृप्ति के साधन चाहिए तो अर्थ पुरुषार्थ भी है। लेकिन इन दोनोंे को हम सबको मिलकर चलना है। मेरे विकास में इन सबका विकास होना चाहिए। इसका भान रखकर चलाने वाला अनुशासन है। सबके कल्याण में अपना कल्याण, अपने कल्याण से सबका कल्याण, ऐसा जीवन जीने का अनुशासन और सबका कल्याण हो इसलिये सबके हितों का एक संतुलित समन्वय वास्तव में हिन्दुत्व है। भारत से निकले सभी सम्प्रदायों का सामूहिक मूल्य बोध है हिन्दुत्व। यह भारत की पहचान है। यह वैश्विक धर्म है। अध्यात्म सारे विश्व मेंे गया। तथागत के काल में उनकी प्रेरणा से सारी दुनिया में इस धम्म का प्रचार हुआ। रमण महर्षि के पास सर पॉल ब्रेंटन आए थे। उन्होंेने कहा कि मुझे हिन्दू बना लो। रमण महर्षि ने कहा तुम अच्छे ईसाई हो उसी में अच्छे बनो। तुम्हें हिन्दू बनने की जरूरत नहीं है क्योंकि इन सब विविधताओं को, सब दर्शनों को, सब तत्वज्ञान को, हम मानते हैं कि वे सब सत्य है। सही हैं। हिन्दुत्व में विविधतायें रहेंगी। विशेषतायें रहेंगी। उसका स्वीकार होगा। सम्मान होगा। लेकिन ये आपस में अलगाव का कारण नहीं बनेंगी, क्योंकि ऐसा भेद नहीं करना, ऐसी सीख देने वाली भारत भूमि के हम पुत्र हैं। इसलिये हम जिसको हिन्दुत्व कहते हैं उस मूल्यबोध, उससे निकली हुई है यह संस्कृति। उसके साथ दूसरा घटक है देशभक्ति। वह भारत की पहचान है। भारत इसके लिए है। और इसलिये इसका आचरण इस भारतवर्ष में लगातार हो रहा है। सब प्रकार की परिस्थिति में हुआ। जब आक्रामकों के पैरों तले हमारी धरती रौंदी जा रही थी, तब भी इस धर्म का आचरण जितना जैसा बनता है, उतना किया गया। जब अपने ही स्वार्थी लोगों के द्वारा इसके आचरण को मूल्यों के विपरीत बिगाड़ दिया गया तो उसको वापस लाइन पर लाने वाले अनेक संत-महात्मा हुए, उनसे ही हमारे सम्प्रदाय बने। इसलिये प्रस्थान बिन्दु सबका एक है, आचरण का उपदेश सबका एक है। देशकाल परिस्थिति के अनुसार दर्शन और विधि आचार्य धर्म सबने अलग अलग बताया है और इसलिये इस मूलभूत एकता को देखकर साथ चलने के स्वभाव का नाम हिन्दुत्व है। हमारे पूर्वजों ने कहा सर्वे भवन्तु सुखिन:। यहां जो खल है, दुष्ट है उसका भी भला हो। हमारे यहां उद्घोष चलता है, धर्म की जय हो। अधर्मी का विनाश हो ऐसा नहीं कहते। धर्म की जय हो, अधर्म का विनाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, ऐसा कहा जाता है। ये अपनी विचाराधारा है, जिसकी आज के विश्व को नितान्त आवश्यकता है। उस विचारधारा को अपने आचरण में चरितार्थ करने वाला समाज भारत में खड़ा करना है और वही हम सबको जोड़ता है। कोई एक भाषा हमको जोड़ती है क्या? नहीं! कोई एक देवी-देवता हमको जोड़ते हैं क्या? नहीं! हमारे खानपान, रीति-रिवाज का तरीका तक समान नहीं है।
 
वैश्विक संस्कृति के अनुयायी
ये सब होने के बावजूद भी हम सब भारत माता के पुत्र उस वैश्विक संस्कृति के अनुयायी हैं। हम जहां-जहां विश्व में गए हैं, हमने कोई लड़ाई नहीं की, हमने किसी का राज्य नहीं जीता। हमने किसी की सम्पत्ति को लूटा नहीं। जहां गये वहां ज्ञान दिया, सभ्यता दी। अन्य देश के लोग आए, उन्होंने हमको प्रभावित किया, चले गए। एकमात्र भारत है, जिससे जुड़ी स्मृतियों को दूसरे देशों के लोग आनंद से, आदरपूर्वक बताते हैं। आज भी उसके अवशेष उन देशों में दिखते हैं। कहीं पर मूर्तियां मिलती है, कहीं पर शिल्प खड़े करते हैं। महाभारत की, रामायण की कथाएं चलती हैं। रामलीलाएं चलती हैं। पूजा पद्घति भले बदल गई। आज मुसलमान हैं, लेकिन वह कहते हैं हमने अपने पूर्वज नहीं बदले। ये मधुर स्मृतियां, एकमात्र चमत्कार भारत का ही क्यों है? इसीलिए क्यों कि भारत इस संतुलन को, अनुशासन को विश्व कल्याण की भावना से सबको अपना मानकर ले गया है। ये चित्र हमारे यहां खड़ा करना है। हमने कभी लड़ाई करना सीखा ही नहीं, जो आएगा उसको बसा लिया। तुम भी रहो, भाषाएं हमारी भी पहले से अनेक हैं। देवी-देवता हमारे पहले से अनेक हैं। उससे कुछ नहीं बिगड़ता। मानवता के धर्म को लेकर चलो। बंधुभाव की आवश्यकता है और वह बंधुभाव ही धर्म है। बंधुभाव का आधार क्या है? हमारे पूर्वज समान हैं, हमारी सांस्कृतिक विरासत सबकी साझी है और हमारी मातृभूमि एक है। राष्ट्र के नाते हम सब एक पहचान के लोग हैं। हम उसको हिन्दू नाम से पहचानते हैं। सब लोग हमारे अपने हैं, भारत के हैं। हमारी दृष्टि से इस सम्पूर्ण समाज का संगठन हिन्दू संगठन है। हमारी शत्रुता करने वाले लोग होंगे, उनसे अपने को बचाते हुए भी हमारी आकांक्षा उनको समाप्त करने की नहीं, उनको साथ लेने की है, जोड़ने की है। ये वास्तव में हिन्दुत्व है।
आज जो हिन्दू के नाते प्रचलित है वह सब कुछ धर्म नहीं है। क्योंकि इस भावना का लोप महाभारत काल से धीरे-धीरे होता आया। इसलिए मैंने कहा कि उसको संकुचित करने में पहला योगदान हिन्दू समाज का है। उसने मूल्यों को कर्मकाण्ड में बांध दिया, जिससे कई प्रकार की कुरीतियां, रूढि़यां, अस्पृश्यता जैसे पाप हिन्दू समाज में प्रवेश कर गए। हम चाहते हैं कि यह सब साफ हो जाए और देश, काल, परिस्थिति अनुसार नवीन रूप में उस सनातन मानव धर्म का पुनरुत्थान भारत में हो। हम जानते हैं कि हमारे देश के सब सम्प्रदायों में वही आचरण बताया है, मूल्य आधारित। उसका ही प्रचलन सर्वत्र हो। वह किसी को बुरा नहीं कहेगा, किसी को पराया नहीं कहेगा, जिसको हाथ लगाएगा, उसको अपनाएगा, उसको अच्छा बनाएगा। हमारे हिन्दुत्व की यही संकल्पना है। अपने देश में अपने देश की चिंता करने वाले सब प्रामाणिक नि:स्वार्थ बुद्धि के लोगों ने अपने देश के बारे में जो संकल्पना की, उसी को लेकर हम चल रहे हैं, हमको नया विचार कुछ करना नहीं है। 
संविधान का अनुपालन
आधुनिक जीवन मेंे हमारे प्रजातांत्रिक देश में हमने एक संविधान क्यों स्वीकार किया और स्वीकार किया है तो क्या? वह संविधान जो हमारे लोगों ने तैयार किया, अपना संविधान अपने देश की कन्सेन्सस (साझा सहमति) है और इसलिए उस संविधान के अनुशासन का पालन करना ये सबका कर्तव्य है। संघ इसको पहले से ही मानता है। स्वतंत्र भारत के सब प्रतीकों के अनुशासन में उसका पूर्ण सम्मान करके हम चलते हैं। अब आगे की एक महत्वपूर्ण बात है,जिसे डॉ.आम्बेडकर साहब ने अपने संविधान सभा के भाषण में कहा था। उनके कहने का भाव था कि हमारी आपस की लड़ाई के कारण विदेशी जीते और हमको गुलाम बनाया। आज भी दिखता है। अभी भी हम संसद में एक दूसरे के परस्पर विरोधी बनकर बैठे हैं। ये तो तंत्र की मजबूरी है लेकिन इन सबके बावजूद हम सब एक हैं, ऐसा बन्धुभाव हमने उत्पन्न नहीं किया तो फिर कौन से दिन देखने पड़ेंगे बता नहीं सकते। संघ का काम इस बन्धुभाव के लिए है और इस बन्धुभाव के लिए एक ही आधार है विविधता मेें एकता। वह विचार देने वाली हमारी चलती आई हुई विचारधारा है उसको दुनिया हिंदुत्व कहती है, इसलिये हम कहते हैं कि हमारा हिन्दू राष्ट्र है। इसका मतलब इसमें मुसलमान नहीं चाहिए ऐसा बिल्कुल नहीं होता। जिस दिन ये कहा जाएगा कि यहां मुसलमान नहीं चाहिए, उस दिन यह हिन्दुत्व नहीं रहेगा। हिन्दुत्व तो विश्व कुटुम्ब की बात करता है।
 
सामर्र्थ्य-सम्पन्न हो हमारा देश
हमको कैसा देश चाहिए? हमको सामर्थ्य सम्पन्न देश चाहिए। इस सामर्थ्य का उपयोग हमको दूसरों को दबाने के लिए नहीं करना है। लेकिन जिसका सामर्थ्य नहीं है, उसकी अच्छी बातें भी दुनिया नहीं सुनती है, यह वास्तविकता है। सत्य की तब चलती, जब उसके पीछे कोई शक्ति होती है। इसलिए सब तरह से सामर्थ्यवान होना पड़ेगा। आर्थिक, नैतिक, सामरिक। किसलिये, विश्व कल्याण के लिए। और यह काम हम सबको मित्र बनाकर करेंगे। इसलिए कितने भी कड़े विवाद हो, बैठकर हल निकाला जा सकता है। बशर्ते भारत का हित सबके मन में हो, अपने पूर्वजों का गौरव सबके मन में हो और इस संस्कृति के बारे में श्रद्धा मन में हो। यह जोड़ने वाली बात है। उसको हम हिन्दुत्व कहते हैं और इसके प्रति श्रद्धा रखते हैं, तो सारे प्रश्नों का हल निकलता है।
 
समाजशक्ति हो जाग्रत
संघ का आह्वान यही है कि अपनी पवित्र मातृभूमि का भाग्य बदलने लायक बनों और सबको बनाओ और फिर हम सब मिल कर जो तय करेंगे सामूहिक विचार से, वह होगा। यह संघ का मंतव्य है। आज दुनिया में कोई अच्छा काम करने चलो लोग पहले पूछते हैं ये क्यों कर रहे हो। ऐसी सशंक्ति अवस्था समाज के मन मंे है। इसलिए कई बार कुछ नया करना कठिन हो जाता है। जान-बूझकर अंधकार, भ्रम उत्पन्न करने वाले लोग भी काम करते हैं। उनका भी भला हो। उनके बारे में हमारी भावना बुरी नहीं है। उनका टेढ़ापन चला जाए, इतनी ही प्रार्थना है। इस कार्यक्रम को करने के बारे में हमने सोचा कि एक बार प्रमुख लोगों को बुलाकर यह बात साफ-साफ आपके सामने रखी जाए कि संघ क्या करना चाहता है? क्यों करना चाहता है? संघ क्यों हिन्दुत्व की बात करता है? और संघ के सामने भारत की दृष्टि क्या है? यह चारों बातें मैंने आपके सामने रखी हैं।