साफ बात असर गहरा
   दिनांक 25-सितंबर-2018
 
दुनिया में हमारा कोई शत्रु नहीं है। अगर कोई शत्रु है भी तो अपने को बचाते हुए उन्हें साथ लेकर चलने की आकांक्षा रखते हैं। ये वास्तव में हिन्दुत्व है— डॉ. मोहन भागवत
भविष्य का भारत : संघ का दृष्टिकोण, नाम से दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय आयोजन को ऐतिहासिक मानने के कई कारण हैं।
इनमें सर्वप्रमुख है- ऐसे विशाल सार्वजनिक मंच से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक द्वारा विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर संघ के मत को समाज जीवन की विभिन्न विभूतियों के सामने स्पष्ट तौर पर रखना। किन्तु इसके साथ ही जुड़ता एक अन्य त्रिआयामी पक्ष और है जिसे इस बात का संज्ञान लेकर समझना होगा कि इस सफल आयोजन के बाद स्वयंसेवक प्रफुल्लित तो थे लेकिन उद्बोधन की किसी बात से कोई स्वयंसेवक तनिक नहीं चौंका। (यह विज्ञान भवन और बाद में मिली प्रतिक्रियाओं में साफ दिखा।)
ऐसा होने के पीछे तीन बातें हैं जिनमें पहली बात यह है कि— इन प्रश्नों को लेकर स्वयंसेवकों के मन में कोई उलझन या असहजता नहीं है।
दूसरी बात, उलझन इसलिए नहीं है क्योंकि संघ के भीतर इन मुद्दों पर पहले भी चर्चा-विमर्श होते रहे हैं।
तीसरी और सबसे मार्के की बात-पूरे आयोजन के दौरान किसी मुद्दे पर संघ का रुख अपनी स्थापित लीक से उलट चला गया हो, ऐसा तो बिल्कुल ही नहीं है।
राममंदिर, जम्मू-कश्मीर या आरक्षण.. सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने वही बातें तो कहीं जो संघ का दृढ़ मत है। तो फिर, ताबड़तोड़ खबरों, प्राइम टाइम बहसों और राजनीतिक गलियारों में तेज सरगर्मियों की वजह क्या है? इससे पहले आने वाला और सबसे ज्यादा पूछा जा रहा प्रश्न यह भी है कि आमतौर पर प्रचार से कतराने वाले संघ को देश की राजधानी में 'ऊंचे' मंच से ऐसा 'विलक्षण-विराट'कार्यक्रम करने की क्या आवश्यकता? दरअसल, ऐसे दौर में जब कभी प्रभावी रही विचारधाराओं और दल-संगठनों का आधार तथा समर्थन छीज रहा है, देश-समाज में राष्ट्रीयभाव के प्रति जुड़ाव तथा संग के प्रति सकारात्मक उत्सुकता बढ़ रही है। इसके साथ ही यह बात भी बिल्कुल सच है कि संघ के दृष्टिकोण की स्पष्टता, विविध विषयों पर उसके विचारों का फैलाव और इसके साथ दिन-प्रतिदिन समाज में लगातार बढ़ती स्वीकार्यता वे कारक हैं जो संघ-संकोची व संघ-शंकालु लोगों, गुटों को डरा रहे हैं। (और इसी के चलते राजनीति-मीडिया में इस आयोजन को लेकर खास किस्म की सक्रियता या इसके उलट जबरन ओढ़ी गई निष्क्रियता दिखी)
इस आयोजन के बाद समाज से एक सवाल तो स्वाभाविक ही उठेगा-जो संघ आरक्षण का समर्थन करता है, अंतर्जातीय विवाह को बुरा नहीं मानता, समलैंगिकता या मुसलमानों के मुद्दे पर उसके मन में कोई दुराव-छिपाव नहीं, वह संघ कैसा है? औरों ने बताया वैसा या सरसंघचालक ने 'दिखाया' वैसा! हर बात साफ होने के बाद भी जो संघ पर उंगली उठाएगा, उसके 'प्रगतिशील' और 'सेकुलर' होने पर लोग तो शंका करेंगे ही!
सो, इस आयोजन से जहां एक ओर समाज के बड़े फलक पर संघ की तस्वीर और साफ हुई है, वहीं दूसरी ओर, उन लामबंदियों के लिए साख का संकट पैदा हुआ है जो संघ और संघ के नजरिए के बारे में लोगों को भ्रमित करती और डराती थीं। इस आयोजन के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की निश्छल-निर्भयता को भी देश-दुनिया ने देखा है। गुट, पार्टी, विचारधारा... कला, संगीत या कोई अन्य क्षेत्र.. समाज जीवन की विभिन्न धाराओं से जुड़ी विभूतियों को बुलाया गया। जिन्हें उम्मीद नहीं थी, ऐसे महानुभावों को भी 'सत्य से साक्षात्कार' का न्यौता दिया गया। यह कितनी बड़ी बात है! वास्तव में सरलता और भरोसे के साथ उठाए गए ऐसे छोटे-छोटे कदम ही संघ को बड़ा बनाते हैं। विचारधाराओं की घोषणा करने वाले किसी दल या संगठन में ऐसा साहस दिखता है! आज कौन-सा संगठन है जो सार्वजनिक मंच से दो दर्जन विषयों पर सौ से ज्यादा प्रश्नों का इस बेबाकी से उत्तर दे सकता है? जाहिर है, विज्ञान भवन का यह आयोजन कई मुद्दों पर छाए (या पैदा किया गया) कुहासे को छांट गया। साफ-उजली रोशनी में संघ और उसका सोच लोगों के सामने है। स्वयंसेवक मुस्करा रहे हैं, संघ-संकोची अपने झूठ और संकीर्णता के साथ सहमे खड़े हैं।
अंत में, किसी आयोजन की सफलता, असफलता को संख्या और भव्यता की कसौटियों से परे आंकना हो तो उसके संदेश और प्रभाव को देखना होता है। इस आयोजन के संदेश की स्पष्टता यही बताती है कि इसका असर ऐतिहासिक और दीर्घकालिक रहेगा।