दुनियाभर में अमेरिका गैस—तेल की पाइपलाइन बिछाना चाहता है पर नहीं हो रहा सफल
   दिनांक 27-सितंबर-2018
                                                                                                                                               - के़ नाथ
  
विश्व में अमेरिकी प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए जहां ऊर्जा के स्रोत और रास्ते हैं, वहां सामरिक भागीदार की जरूरत भी है। यह पूरे यूरेशिया क्षेत्र में सामरिक संगठन में अधिक सहयोग से संभव है।'' ये शब्द हैं, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के सुरक्षा मामलों के सलाहकार ब्रेजिन्स्की के।
पाइपलाइनिस्तान के सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर अमेरिका ने मैकिन्डर के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए सैनिक ठिकाने बना लिए हैं। 19वीं शताब्दी के खेल में यह शायद निर्णायक साबित होता, परंतु 21वीं शताब्दी 19वीं शताब्दी नहीं है। इराक और अफगानिस्तान में लगभग 2,000 अरब डॉलर (140 लाख करोड़ रुपए) खर्च ने के बाद भी, उसे इस इलाके में पकड़ तो दूर, इज्जत से भागने के लाले पड़ रहे हैं।
अमेरिका की मुसीबत रूस, चीन और ईरान हैं। रूस का आज तेल और गैस की पाइपलाइनों पर लगभग एकाधिकार है। किसी भी परिवर्तन से उसमें टकराव आना ही है। अमेरिका के बाद चीन ऊर्जा का सबसे बड़ा खरीदार है। जाहिर है, वह इतने महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहेगा। रूस के बाद ईरान गैस का सबसे बड़ा उत्पादक है। उसे अपनी गैस के लिए बाजार चाहिए। उसके लिए वह सब तरफ हाथ-पैर मार रहा है। अमेरिकी विरोध इसमें सबसे बड़ा रोड़ा है।वैसे तो अमेरिका के पास गैस का अपना काफी बड़ा स्रोत है। अमेरिका ने तार भरी बालू और शेल, जो अमेरिका और कनाडा में बहुत बड़ी मात्रा में मौजूद है, से तेल और गैस निकालने की तकनीक विकसित कर ली है। तेल और गैस के दाम गिरने का एक बड़ा कारण इस नए स्रोत से गैस का उत्पादन भी है, लेकिन उससे वैश्विक प्रभाव तो नहीं मिलता। पाइपलाइनिस्तान में उसे अकूत मुनाफे की संभावना दिखाई देती है। वैसे भी अमेरिकी राजनीति पर दो उद्योग हावी रहते हैं- तेल और सामरिक शस्त्र का उद्योग। पाइपलाइनिस्तान दोनों उद्योगों के लिए अकूत मुनाफे का स्रोत दिखाई देता है।
यूरेशिया की ट्रेन पटरी से उतर गई है, या यूं कहें, अगवा कर ली गई है, क्योंकि यूरेशिया में एशिया वाला हिस्सा कुछ अलग सोच रहा है। तेल और गैस, यूरोप और अमेरिका से एशिया की ओर शक्ति एवं समृद्धि के स्थानांतरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। अंत में जयमाला किसके गले में पड़ेगी, यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन कम से कम अमेरिका के गले में तो पड़ती नहीं लगती। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका में जितने भी विदेश सचिव हुए हैं, उनमें से दो को छोड़कर सभी किसी न किसी तरह तेल उद्योग से जुड़े रहे हैं। अपवाद हैं एलेन डलेस और कालिन पावर। कालिन पावर के समय उनको छोड़कर लगभग पूरा प्रशासन, राष्ट्रपति बुश समेत, सभी तेल उद्योग से संबंधित थे। उप राष्ट्रपति डिक चेनी फोर्च्यून 500 में आने वाली कंपनी हैलीबर्टन के निदेशक रहे हैं। यह कंपनी तेल उद्योग को सेवा और संसाधन उपलब्ध कराती है।
इसमें 1,00,000 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं और 130 देशों में इसकी शाखाएं हैं। चेनी एवं बुश दोनों चेनी द्वारा निदेशित कंपनी अर्बुस्तो में साथ काम करते थे। अर्बुस्तो ने मुनाफा कमाया हो या न कमाया हो, लेकिन वह धनी अरब शेखों की चहेती जरूर रही है। अर्बुस्तो के निदेशकों में एक, जेम्स बाथ, जिसके बुश सीनियर से घने संबंध थे, खाड़ी के देशों में काले पैसों को सफेद करने के लिए विख्यात था। उसके ग्राहकों में एक, सलेम बिन लादेन, ओसामा बिन लादेन के 17 भाइयों में से एक था।
कालिन पावर के बाद की अमेरिकी विदेश सचिव कोन्डोलीजा राइस, अमेरिकी तेल कंपनी शावेरान की निदेशक और मध्य एशिया के मामलों की सलाहकार थीं। राइस की सलाह पर शावेरान ने कजाकिस्तान में लगभग 20 अरब डॉलर (14,000 करोड़ रुपए) का निवेश किया। शावेरान को ही 'तापी' (तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इंडिया) पाइपलाइन का ठेका मिला हुआ है। 'तापी' के निर्माण के लिए जरूरी है कि अफगानिस्तान अमेरिका के नियंत्रण में हो, चाहे तालिबान को दबाकर या उनसे सौदा कर, पाकिस्तान काबू में बना रहे और भारत भी साथ दे, यह कब तक संभव होगा, या संभव होगा भी या नहीं, भविष्य ही बताएगा।
सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही नाटो ने तेजी से वारसा संधि की जगह लेने की कोशिश शुरू कर दी थी। पहला बहाना बना, अल्बानियाई अल्पसंख्यकों की कोसोवो में रक्षा। लेकिन साथ में अमेरिकी डच कंपनी अल्बानियन मैसेडोनियन बल्गारियन ऑयल कॉपार्ेरेशन (अम्बो) ने 12 अरब डॉलर की तेल की पाइपलाइन, रूस और ईरान दोनों की भूमि को बचाते हुए बना दी। अम्बो पाइपलाइन 2012 से कैस्पियन सागर के तेल को जार्जिया, तुर्की, बल्गारिया, मैसेडोनिया और अल्बानिया होते हुए यूरोप पहुंचा रही है। फिर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की बारी आई। पहले साम और दाम से काम चलाने की कोशिश की गई। अमेरिकी प्रशासन, राष्ट्रपति क्लिंटन के समय 1996 में ही, तालिबान प्रतिनिधिमंडल को हयूस्टन में आवभगत कर रिझाने की कोशिश कर चुका था। आवभगत की अगुआई और कोई नहीं खलीलजाद और अहमद करजई कर रहे थे, जो उस समय यूनोकोल अमेरिकी तेल कंपनी के प्रतिनिधि थे। खूब खिलाया (पिलाया नहीं) गया। लेकिन तालिबान वैसे चाहे कितने ही पिछड़े क्यों न हों, सौदेबाजी के मामले में पक्के निकले। तेल कंपनियांे को 10 करोड़ डॉलर (लगभग 700 करोड़ रुपए) सालाना रायल्टी पाइपलाइन अफगानिस्तान से गुजरने के लिए पेश की गई लेकिन बात बनी नहीं। साम्राज्य के गुस्से का ठिकाना न रहा। अंत में साम्राज्य को उन्हें रास्ते पर लाने के लिए कदम उठाने पड़े। यही खलीलजाद और करजई, जो तालिबान की अमेरिका में आवभगत कर रहे थे, आतंकवाद की लड़ाई के बाद अफगानिस्तान में अमेरिका के राजदूत और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति बने। फिर जार्जिया की बारी आई, जहां से रूस की भूमि बचाने के लिए हर पाइपलाइन को गुजरना पड़ता है। अब रूस, ईरान और चीन, यदि कोसोवो का युद्ध, अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ युद्ध, जार्जिया का संघर्ष, इन सबको अगर पाइपलाइनिस्तान का युद्ध न समझें, तो क्या कहें?
अमेरिका यदि पूर्व में तापी पाइपलाइन पर निर्भर है तो पश्चिम में नाबुक्को और बीटीसी (बाकू-त्बिलिसी-केहान) पाइपलाइनों पर। इन दोनों पाइपलाइनों की स्थिति ज्यादा ही नाजुक लगती है। बीटीसी जार्जिया में रूसी हस्तक्षेप के बाद अपना आकर्षण अमेरिका के लिए खो चुकी है।
दूसरी पाइपलाइन अमेरिका की अम्बो कंपनी बना रही है। लगभग 11 अरब डॉलर (77,000 करोड़ रुपए) की लागत वाली यह पाइपलाइन, कैस्पियन सागर क्षेत्र से जार्जिया के तेल डिपो तक तेल पहुंचाएगी। वहां से टैंकरों द्वारा तेल को कालेसागर पर स्थित बल्गारिया के बंदरगाह बुर्गास तक पहुंचाया जाएगा, जहां से एक दूसरी पाइपलाइन द्वारा तेल मैसेडोनिया और फिर अल्बानिया के बंदरगाह ब्लोरा तक पहुंचेगा। जाहिर है, कवायद खासी लंबी है। जार्जिया के दुबारा रूसी प्रभाव में जाने की तो समस्या है ही, यदि इन इलाकों के दूसरे माफिया संगठनों को नकार भी दिया जाए तो भी। वास्तव में रूसी सैनिक हस्तक्षेप ने ब्रेजिन्स्की के सपनों की धज्जियां उड़ा दी हैं।
अजरबैजान में अमेरिका को पहली बड़ी सफलता मिली थी। 1991 में सोवियत संघ से अलग होकर अजरबैजान एक स्वतंत्र देश बना। 1995 में ब्रेजिन्स्की, जिनका जिक्र शुरू में ही आ चुका है, ने अजरबैजान के तत्कालीन शासक से मुलाकात की और उन्हें बीटीसी पाइपलाइन के लिए तैयार किया। लेकिन जार्जिया में रूसी सैनिक हस्तक्षेप के बाद अजरबैजान की निगाहें भी बदलने लगीं। फिर अजरबैजान के राष्ट्रपति इतहाम अलियेब और जार्जिया के राष्ट्रपति मिखाइल सकाशदिली के बीच 36 का आंकड़ा है। यह अमेरिकी परियोजना को और मुश्किल बना देता है।
अमेरिका की आशा अब नाबुक्को पाइपलाइन से है। नाबुक्को वास्तव में एक वर्दी इतालवी नाटककार रचित ओपेरा के एक पात्र का नाम है। आप पूछेंगे कि ओपेरा का पाइपलाइन से क्या लेना-देना? हुआ ऐसा कि नई पाइपलाइन के सिलसिले में आस्ट्रिया और टर्की के गैस अधिकारियों की बैठक 2002 में वियना में हुई, जहां उन्होंने यह ओपेरा देखा। राजा नाबुक्को द्वारा निष्कासित यहूदियों और उनके संघर्ष के बीच पनपी प्रेम कहानी ने सदस्यों को ऐसा प्रभावित किया कि उन्होंने पाइपलाइन का नाम ही नाबुक्को रख दिया। लगभग 11 अरब डॉलर (77,000 करोड़ रुपए) की लागत वाली 3,300 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन की यह योजना 2004 में कागज पर पूरी हुई है, लेकिन जमीन पर शुरुआत होने का आज भी इंतजार है।
'पाइपलाइनिस्तान' में चाहे बीटीसी हो या नाबुक्को, अमेरिका की मुश्किल एक ही है। उसके नियंत्रण में गैस या तेल का स्रोत नहीं है। अत: उसे यह पता नहीं कि अरबों डॉलर लगा कर बनाई गई पाइपलाइनें वास्तव में तेल और गैस, बाजार में पहुंचाकर मुनाफा कमाएंगी या मील के पत्थर की तरह केवल राहगीरों के लिए दिशा निर्देश का काम करेंगी। वैसे अमेरिका में पिछले 30 वर्ष में एक ही उद्योग अच्छा चल रहा है-डॉलर छापने का उद्योग। जब तक चीन, भारत सहित विश्व के सभी देश हरे कागज के बदले में अपने मजदूरों के परिश्रम से बने उत्पाद अमेरिका को देते रहेंगे, अमेरिका को इसकी विशेष चिंता नहीं होगी। खैर डॉलर की तो एक अलग ही कहानी है जो फिर कभी कही जाएगी। अभी हम 'पाइपलाइनिस्तान' के ही दूसरे खिलाडि़यों की चालों पर अपना ध्यान बनाए रखेंगे। आइए, अपने ही घर की ओर चलें और देखें कि भारतीय उपमहाद्वीप में 'पाइपलाइनिस्तान' के लिए क्या खेल खेलेे जा रहे हैं।