'राफेल' या रा..फेल
   दिनांक 28-सितंबर-2018
अपनी हर बात के लिए 'मोदी की गलती' को जिम्मेदार ठहराने वाले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आजकल खासे उत्साह में (या कहिए हवा में) हैं। राफेल पर राहुल की कलाबाजियां कांग्रेस के लिए यह खुश करने वाली बात होनी चाहिए थीं मगर हैरानी कि अध्यक्ष की तेजी ने सिपहसालारों का सिरदर्द बढ़ा दिया है।
वायुसेना उपप्रमुख, एअर मार्शल आर. नांबियार के यह कहने के बाद कि वर्तमान राफेल सौदा पहले किए जा रहे सौदे से बेहतर है, हालांकि, अब इस मुद्दे पर राजनीति की गुंजाइश नहीं बची। किन्तु क्योंकि फिलहाल, राफेल, राहुल की नई गेंद है। सो उन्हें खेलने देना चाहिए!
इस गेंद को भाजपा और खासकर प्रधानमंत्री की ओर निशानाकर उछालते हुए राहुल कुछ बातें भूल गए।
पहली बात यह कि एक ही मुद्दे और सौदे के तथ्य अलग-अलग मंच-मैदान पर अलग-अलग नहीं हो सकते। राफेल सौदे में कथित घोटाले का आरोप लगाते हुए उन्होंने शुरुआत में जो 36 हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा दिया था वह चार ट्वीट में फूलते-फूलते (राहुल गांधी के ही शब्दों में ) एक सौ तीस हजार करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।
कांग्रेस के जिम्मेदार नेता भले इन आंकड़ों पर जानकारी देने में बगलें झांकने लगें लेकिन राहुल गांधी तो ऐसे फितूरी आंकड़ों का पहाड़ा चढ़ ही सकते हैं! 'दही के धोखे में कपास खा जाने' जैसी हड़बड़ाहट और कच्चेपन का उदाहरण देती दूसरी बात सौदे में रिलायंस के दाखिल होने से जुड़ी है।
कांग्रेस समर्थक इसे उनकी 'अदा' मान सकते हैं किन्तु पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति के बयान को अपनी बात पर मुहर मानकर लपकते हुए राहुल दो बातें यहां भी भूल गए।
-एक, सीरिया पर हवाई हमले की खुफिया फ्रेंच योजना भी पत्रकारों को बता देने की वाले ओलांद की बातों को फ्रांस के लोग भी गंभीरता से लेना छोड़ चुके हैं। और तो और वे शायद दुनिया के एकलौते ऐसे राष्ट्राध्यक्ष है जिनपर 660 पृष्ठ की एक किताब लिखी गई जो बताती है कि वे क्या-क्या गलत या आपत्तिजनक बोल गए! हैरानी नहीं कि मामला गर्माने के दो ही दिन बाद अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी से बात करते हुए ओलांद अपनी बात से पलट गए! गौर कीजिए! इसी दुविधा और 'हल्केपन' के चलते ओलांद की लोकप्रियता पैंदे में बैठ गई थी और उन्होंने उम्मीदवारी तक से कदम खींच लिए थे।
-दूसरा, राहुल यह भूल गए कि हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की बजाय रिलायंस के लिए इस सौदे में गुंजाइश प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते और सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए ही बन गई थी। दरअसल, अप्रैल 2013 के पहले सप्ताह की बात है जब भारतीय मीडिया में यह खबर पहली बार आई कि हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) का पुराना 'खस्ता प्रदर्शन' भारतीय वायुसेना के लिए नए लड़ाकू राफेल विमानों की खरीद के आड़े आ रहा है। यही कारण था कि एचएएल के नाम पर दसौं एविएशन हिचकिचा रही थी। अंतत: दसौं एविएशन ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए, दिसंबर 2013 में ही, रिलायंस से हाथ मिला लिया था।
दरअसल, राजनीति में उथलेपन के प्रतीक बने और वक्त बेवक्त बेकाबू होने वाले राजनेता से पूछने लायक सवाल यह है कि देश की सुरक्षा जरूरतों को लगातार टालने और आंतरिक बाह्य खतरों को बढ़ाते जाने पर कांग्रेस और इसके कर्णधार कुनबे को कठघरे में क्यों नहीं खड़ा किया जाना चाहिए? क्या सोनिया कृपा से संप्रग राज में साढ़े सात बरस तक (सबसे लंबे समय) रक्षामंत्री रहे ए.के.एंटनी को एचएएल की खस्ताहाल का जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए?
बहरहाल, राफेल मुद्दे की पतंग वाड्रा जैसे पेड़ की लंदन तक फैली पत्तियों (या संपत्तियों) और संजय भंडारी जैसी टहनियों पर जाकर टंगेगी यह तो राहुल ने सोचा भी नहीं होगा। वैसे, उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं है! कांग्रेस के भीतर जो सोच नहीं सकते वे राहुल-राफेल के पोस्टर चिपका रहे हैं। जो सोच सकते हैं वे रा..फेल बुदबुदा रहे हैं।