वामपंथी बुद्धिजीवी हिरासत में रहेंगे, जांच भी होगी
   दिनांक 29-सितंबर-2018
भीमा-कोरेगांव मामले में गिरफ्तार पांच वामपंथी बुद्धिजीवियों की नजरबंदी को एक महीने के लिए बढ़ाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदेश साफ हैं। संदेश यह कि खुद को पाक-साफ साबित करने की कोशिश कर रहे इन बुद्धिजीवियों की स्थिति हकीकत में ऐसी नहीं है और पुणे पुलिस की जांच एक हद तक सही है। यानी वे राष्ट्र के खिलाफ अभियान में शामिल हैं। जाहिर है कि पुलिस की जांच इनके खिलाफ जारी रहेगी और उन पर अदालत अपने वक्त पर फैसला लेगी ही। लेकिन इस बहाने भारत में प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की सोच पर सवाल जरूर उठे हैं।
 
डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के प्रखर शिष्य, प्रखर विचारक और सांसद रहे किशन पटनायक ने भारतीय बुद्धिजीवियों को लेकर बड़ी बात लिखी है। अपने निबंध अयोध्या और उसके आगे में उन्होंने लिखा है, “यूरोप के बुद्धिजीवी, खासकर विश्वविद्यालयों से संबंधित बुद्धिजीवी का हमेशा यह रूख रहा है कि गैर यूरोपीय जनसमूहों के लोग अपना कोई स्वतंत्र ज्ञान विकसित न करें। विभिन्न क्षेत्रों में चल रही अपनी पारंपरिक प्रणालियों को संजीवित ना करें, संवर्धित ना करें। आश्चर्य की बात है कि कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों का भी यह रूख रहा, बल्कि अधिक रहा।”
दो दशक से ज्यादा हो गए, जब किशन पटनायक का यह निबंध प्रकाशित हुआ था। भारतीय बुद्धिजीवियों पर उनका यह वैचारिक निष्कर्ष भले ही तब उदारवाद के ताजा बह रहे झोंके में कहीं विलीन हो गया हो, लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह राष्ट्र और उसकी नींव से जुड़े तत्वों को लेकर प्रगतिशील खेमे में विकसित सोच जिस तरह हावी हुई है, उसे लेकर यह निबंध और किशन पटनायक का यह विचार फिर से प्रासंगिक हो गया है। इसे भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार पांच बुद्धिजीवियों सुधा भारद्वाज, वेरनन गोंजाल्विस, वरवर राव, गौतम नवलखा और अरूण फरेरा के बहाने भी समझा, देखा और परखा जाना चाहिए।
भारतीय परंपरा में प्रतिभा को लेकर एक कहावत कही जाती रही है,
लीक-लीक गाड़ी चले, लीकहिं चले कपूत।
लीक छोड़ि तीन चलैं, शायर, सिंह, सपूत।।
लगता है भारतीय प्रगतिशील बुद्धिजीवी इस कहावत को आत्मसात करके खुद को सपूत साबित करने में तुले रहते हैं। राष्ट्र, धर्म और मानवता को लेकर उनकी सोच में कितना विरोधाभास है, इसके समझने के लिए उनके विचारों और कार्यों पर ध्यान देना होगा। वे भारतीय राष्ट्र राज्य को तोड़ने वाले विचारों का समर्थन करते हैं। इस तरह वे लीक को तोड़ते हैं। लेकिन लीक तोड़ने का मतलब अपने पुरखों को गाली देना नहीं होता, अपनी परंपराओं को गलत साबित करना नहीं होता। अपनी विरासत को खारिज करना नहीं होता। लीक तोड़ने का मतलब यह होता है कि अगर परंपरा, संस्कृति और विरासत में कहीं कोई खोट है, जो भविष्य की प्रगति की बाधा में है तो उसे तोड़ना और नई लीक बनाना होता है। इसमें अपने मूल्यों को संजोए रखने का बोध भी छिपा होता है। लेकिन भारतीय प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की सोच से ये तत्व सिरे से नदारद हैं।
आधुनिक चीन के प्रवर्तक माओत्से तुंग की विचारधारा से प्रभावित इन बुद्धिजीवियों का अब भी ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है’ में ही भरोसा है। चीन में अब भी सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। लेकिन भारत में सत्ता का हस्तांतरण बंदूक की नली की बजाय ईवीएम और मत पत्रों के जरिए होती है। विरोधाभास देखिए कि शहरों में रहते वक्त तक ये बुद्धिजीवी माओ के विचार से इतर मतपत्रों या ईवीएम से सत्ता की राह खोजते दिखते हैं, लेकिन जैसे ही बात जंगलों-आदिवासियों की आती है, उनका विचार माओ के विचार से मेल खाने लगता है। रहते वे शहरों में हैं और जंगल-वनों, वनवासी इलाकों में रहने वाले लोगों के अधिकारों को लेकर रक्त क्रांति का समर्थन करने लगते हैं। उनके वैचारिक उत्स अपनी धरती पर नहीं पनपते, बल्कि दूसरे देशों में ही उन्हें सारी अच्छाइयां नजर आने लगती हैं। फिर वे अपनी बुद्धि को ही गिरवी रखने लगते हैं। जिस तरह भारतीय राष्ट्र राज्य के खिलाफ भारतीय प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने अभियान चला रखा है, उससे तो यही साबित होता है।
प्रगतिकामी बुद्धिजीवियों के इस कार्यकलाप को किशन पटनायक ने कितना समझा था, इसे उनके ही शब्दों में समझा जाना चाहिए। ‘अयोध्या और उसके आगे’ निबंध में ही वे लिखते हैं, “ धर्म, भाषा, संस्कृति, राष्ट्र और गांव, अलग-अलग उद्देश्यों के लिए ये अलग-अलग भावनात्मक इकाइयां हैं। इन मिथकों की आवश्यकता सामान्य जन और बुद्धिजीवी-दोनों के लिए समान मात्रा में है। ऐसा नहीं कि बुद्धिजीवी को इनकी जरूरत नहीं है। अगर इन मिथकों का नियंत्रण बुद्धिजीवी पर नहीं रहेगा तो वह मानव समाज के लिए विध्वंसक हो जाएगा, राष्ट्र के लिए विश्वासघातक हो जाएगा। वह अपनी बुद्धि भाड़े पर लगा देगा। तीसरी दुनिया के देशों में जहां राष्ट्रीय भावना की कमी हो रही है, वह अपनी बुद्धि भाड़े पर लगा भी रहा है। ”
प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की नजर में कश्मीर भारत का अंग नहीं, बल्कि कश्मीर पर भारत का कब्जा है। इनकी नजर में कश्मीरियों को अपना देश चुनने का अधिकार है। इसके लिए वे विदेशी धरती पर भी भारत विरोधी बातें कह सकते हैं। भारतीय सुरक्षा बलों के खिलाफ कार्रवाइयां हों, नक्सलवाद के नाम पर हो रही हत्याओं का समर्थन हो या फिर नक्सलविरोधी सुरक्षा अभियानों के खिलाफ आंदोलन हो, राष्ट्रीय भावनाओं के खिलाफ अनर्गल आरोपों की बौछार हो, भारतीय पारंपरिक मान्यताओं को खारिज करना हो, हर जगह ये बुद्धिजीवी हाजिर हैं। राम-सीता को भाई-बहन बनाने, दुर्गा के खिलाफ महिषासुर को उभारने, कृष्ण को यौन आखेटक साबित करने से लेकर गौरक्षा का विरोध हो, हिंदू त्योहारों के उत्साह का पर्यावरण के नाम पर विरोध हो, हर जगह ये बुद्धिजीवी सामने आ जाते हैं। लेकिन अल्पसंख्यक विचारधाराओं के खोट के खिलाफ इनकी आवाजें नहीं उभरतीं। अल्पसंख्यकों के त्योहारों में बहता निर्बाध खून हो या अल्पसंख्यक धार्मिक केंद्रों में यौन शुचिता का उल्लंघन हो, भारतीय प्रगतिकामी बुद्धिजीवियों की आवाज नहीं उठती। वे सेलेक्टिव आवाज उठाते हैं और सेलेक्टिव विरोध करते हैं। इनकी नजर में राष्ट्र की बात करना असहिष्णुता है, सनातनी परंपराओं में जीना दकियानूसीपन है। इन अर्थों में देखें तो समझ में आएगा कि किशन पटनायक कहां कह रहे थे। गनीमत है कि किशन पटनायक समाजवादी विचारक हैं। अगर यही बात किसी राष्ट्रीय विचारक ने कही होती तो प्रगतिवादी विचारकों के लिए वे असहिष्णु और न जाने क्या-क्या हो सकते थे !
प्रगतिवादी सोच की यह धारा चीन, क्यूबा और ऐसे ही देशों के बारे में आते ही चूक जाती है या चुप हो जाती है। दिलचस्प यह है कि तब वे संविधान और परंपराओं की दुहाई देने लगते हैं। नक्सली हिंसा के नाम पर नक्सली इलाकों में जो ताकत इकट्ठी की गई है, उसका इस्तेमाल रंगदारी वसूलने में हो रहा है। भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार पांचों बुद्धिजीवियों पर यह भी आरोप है कि वे हथियार खरीदने के लिए पैसा जुटाने की कोशिश में थे। गौतम नवलखा को तो 2011 में कश्मीरी आतंकियों का समर्थन करने के आरोप में भी गिरफ्तार किया गया था। लेकिन इसका हासिल क्या है, हिंसा के सिवा। इस बात को प्रगतिशील भारतीय बुद्धिजीवी समझने को तैयार नहीं हैं। भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रवर्तक मानवेंद्र नाथ राय की एक किताब है नव मानववाद। उसके आखिर में एक जगह वे लिखते हैं, “कितनी भी क्रांति क्यों ना हों, अगर आखिरी व्यक्ति के जीवन में बदलाव नहीं आता तो उस क्रांति का कोई मतलब नहीं है। ” प्रगतिशील भारतीय बुद्धिजीवियों को सोचना होगा कि भाड़े की बुद्धि से जिस रक्त क्रांति और जमीनी बदलाव की बात वे करते रहे हैं, क्या बंदूक की नली से निकलने वाली सत्ता को पोषित करने वाले उनके विचारों से संभव हो पाया है? अगर ईमानदारी से उन्हें इसका जवाब हां में मिलता है तो कोई बात नहीं..लेकिन अगर नहीं मिलता है तो उन्हें अब मान लेना होगा कि राष्ट्र में सुराख ही सुराख, राष्ट्रीय सोच में खोट ही खोट और परंपराओं में गड़बड़ियां देखने के उनके ही नजरिए में खोट रहा है।