आचार्य अनूठे: शिक्षक दिवस (5 सितम्बर पर विशेष ): आज के गुरु द्रोणाचार्य

उत्तर प्रदेश स्थित संभल जिले का प्राथमिक विद्यालय इटायला माफी कहने को तो सरकारी है लेकिन इसकी खूबसूरती किसी पांच सितारा नामी स्कूल से रत्तीभर भी कम नहीं है। इस सबके पीछे विद्यालय के प्रधानाचार्य कपिल मलिक की जिद, जुनून और कर्मठता है | प्राथमिक विद्यालय इटायला माफी की सुंदर इमारत एवं प्रधानाध्यापक कक्ष में लगा टीवी जिसके जरिए सभी कक्षाओं पर रखी जाती है नजर

उत्तर प्रदेश स्थित संभल जिले का प्राथमिक विद्यालय इटायला माफी कहने को तो सरकारी है लेकिन इसकी खूबसूरती किसी पांच सितारा नामी स्कूल से रत्तीभर भी कम नहीं है। इस सबके पीछे विद्यालय के प्रधानाचार्य कपिल मलिक की जिद, जुनून और कर्मठता है |

 प्राथमिक विद्यालय इटायला माफी की सुंदर इमारत एवं प्रधानाध्यापक कक्ष में लगा टीवी जिसके जरिए सभी कक्षाओं पर रखी जाती है नजर

सोशल मीडिया के किसी कोने में एक विद्यालय से जुड़ी वायरल हो रहीं कुछ तस्वीरों पर एक दिन नजर पड़ी तो न केवल आश्चर्य हुआ बल्कि विचार आया, क्या नामी कॉन्वेंट स्कूलों की चमक को फीकी कर देने वाले ऐसे सरकारी स्कूल हो सकते हैं? यह फोटोशॉप का तो कमाल नहीं? खैर, विद्यालय के बारे में जानकारी जुटाना शुरू किया और जो जानकारी निकलकर सामने आई उससे स्पष्ट हुआ कि न तो इस विद्यालय से जुड़ी तस्वीरें फोटोशॉप की हुई हैं और न ही सोशल मीडिया में आई खबर झूठी है। यानी विद्यालय के बारे में जो जानकारी सोशल मीडिया पर आ रही थी वह सौ फीसदी सही थी। सजे-संवरे स्कूल की तस्वीरें देख आंखें यह मानने को तैयार नहीं थीं कि यह उत्तर प्रदेश का एक सरकारी स्कूल ही है। दरअसल उत्तर प्रदेश स्थित संभल जिले के विकास क्षेत्र असमोली का प्राथमिक विद्यालय इटायला माफी कहने को तो सरकारी स्कूल है लेकिन इसकी खूबसूरती किसी पांच सितारा नामी स्कूल से रत्तीभर भी कम नहीं है। असल में विद्यालय के इस स्वरूप के शिल्पी प्रधानाध्यापक कपिल मलिक हैं, जिनकी जिद, जुनून और कर्मठता ने इस स्कूल को कॉन्वेंट से भी ज्यादा चमकीला और आधुनिक बना दिया है।

कपिल मलिक की स्कूल में 2010 में नियुक्ति हुई थी। 2013 में उन्हें कार्यवाहक प्रधानाध्यापक बनाया गया। उस समय इस स्कूल की हालात किसी खंडहर से कम नहीं थी। जर्जर इमारत में चल रहे विद्यालय में मात्र 47 बच्चों का नामाकंन था, जिसमें बमुश्किल 15 बच्चे ही आते थे। इसे देख कपिल ने स्कूल की सूरत संवारने का जिम्मा अपने कंधों पर ले लिया और जुट गए स्कूल को नया रूप देने। 2015 में वे प्रधानाध्यापक बने। इसके बाद तो उन्होंने कड़ी मेहनत और लगन से स्कूल का कायाकल्प ही कर दिया। उन्होंने खुद के पैसे से न केवल इमारत बनवाई बल्कि स्कूल में सभी जरूरी चीजों को लगवाया। इसी का नतीजा है कि आज जब कोई व्यक्ति स्कूल में प्रवेश करता है तो ऐसा आभास होता है जैसे उसने किसी नामी विद्यालय में कदम रखा हो। अगर विद्यालय के प्रवेश द्वार पर टंगा ‘प्राथमिक विद्यालय इटायला माफी’ बोर्ड हटा दें तो कोई भी इसे नामी या कॉन्वेट स्कूल मानने में देर नहीं लगाएगा। प्रवेश द्वार से लेकर स्कूल के चारों तरफ हरियाली ही हरियाली नजर आती है। स्वच्छ भारत के संकल्प को मूर्त रूप देते विद्यालय में जहां चारों तरफ साफ-सफाई का वातावरण दृश्यमान होता है वहीं लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय हैं। ऐसा नजारा सरकारी विद्यालयों में न के बराबर ही दिखता है। मलिक किस कदर अपने स्कूल के बच्चों का ख्याल रखते हैं, इसका एक उदाहरण पानी पीने का वह स्थान है जहां छोटे बच्चों के लिए पानी पीने के लिए नल की ऊंचाई कम रखी गई है तो बड़ों के लिए यह ऊंचाई ज्यादा है। इसी का परिणाम है कि आज यहां 280 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, जिसमें 250 बच्चे उपस्थित ही रहते हैं।

 

राज्य में सबसे स्वच्छ स्कूल घोषित होने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कपिल मलिक को सम्मानित करते हुए। 

भोजन का विशेष ध्यान

राज्य सरकार की ओर से स्पष्ट निर्देश है कि मध्याह्न भोजन के लिए जिस राशन, विद्यालयों में आपूर्ति की जाए उसकी गुणवत्ता अच्छी होनी चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए कोटेदार और शिक्षा विभाग से जुड़े कुछ अधिकारी बंदरबांट करके सस्ते और निम्न श्रेणी के अनाज की स्कूलों में आपूर्ति कराते हैं, जिसका परिणाम होता है कि बच्चे इस अन्न को खाना पसंद नहीं करते। इसलिए कपिल अच्छी गुणवत्ता वाला चावल खरीदते हैं और बच्चों को खिलाते हैं। वे कहते हैं,‘‘मैं इस बात का पूरा ध्यान रखता हूं कि बच्चों को खाने में जो भी चीजें दी जाएं, वे सभी उत्तम श्रेणी की हों। इसलिए मेरी रसोई में सभी खाद्य सामग्री उत्तम श्रेणी की मिलेगी।’’

सीसीटीवी कैमरे से सुसज्जित स्कूल

प्रवेश द्वार से लेकर स्कूल की कक्षाएं सीसीटीवी कैमरे की निगरानी में हैं। कपिल अपने कक्ष में लगे टीवी पर सीसीटीवी फुटेज के जरिए पूरे स्कूल का हाल देखते रहते हैं। वे बताते हैं, ‘‘इसके जरिए मेरी सभी कक्षाओं पर नजर बनी रहती है। कौन क्या कर रहा है, मेरे कक्ष से ही पता चलता रहता है। अगर मुझे किसी अध्यापक को कुछ बताना है या कुछ पूछना है या फिर किसी बच्चे से बात करनी है तो मैं अपने कक्ष से ही बात कर सकता हूं। इसके लिए मैंने सभी कक्षाओं में माइक सिस्टम का इंतजाम किया है। दूसरा सीसीटीवी कैमरे का सबसे बड़ा उपयोग बच्चों की सुरक्षा और उनकी देखभाल करना है। कौन स्कूल में आ रहा है, कौन यहां से गया, यह सब इसमें रिकॉर्ड होता है, जो आपको सारे घटनाक्रम से बाकिफ कराने का काम करता है।’’

वाईफाई से लैस

यह राज्य का शायद इकलौता सरकारी स्कूल है जो वाईफाई से लैस है। असल में स्कूल को वाईफाई से लैस करने के पीछे की वजह बताते हुए कपिल मलिक कहते हैं,‘‘मैंने कक्षाओं में बच्चों के पढ़ाने के लिए स्मार्ट टीवी लगवाए हैं, ताकि बच्चे उसके जरिए अंग्रेजी बोलना और पढ़ना आसानी के साथ सीख सकें। लेकिन इसे चलाने के लिए नेट की जरूरत होती है। इसलिए मैंने पूरे परिसर को वाईफाई से युक्त करा दिया। अब वाईफाई से ही कक्षाओं में लगे स्मार्ट टीवी चल रहे हैं और बच्चे आसानी के साथ इसके जरिए देश-दुनिया से जुड़ते हैं।’’

सौर ऊर्जा का उपयोग

बच्चों को पढ़ने में किसी भी तरह की असुविधा न होने पाए, इसलिए विद्यालय में सोलर पैनल भी है। यानी स्कूल में 24 घंटे बिजली रहती है। बिजली जाने पर सभी उपकरण सौर ऊर्जा से संचालित होते हैं। स्कूल में अनुशासन का निर्माण हो और शिक्षक एवं बच्चे समय से स्कूल आएं इसके लिए प्रधानाध्यापक ने विद्यालय में बायोमीट्रिक मशीन लगाई है, जहां सभी की उपस्थिति दर्ज होती है। वे कहते हैं कि इससे न केवल अनुशासन का निर्माण होता है बल्कि एक स्वच्छ माहौल बनता है। इसके अलावा हमने यह नियम बनाया है कि कोई भी बच्चा अगर किसी दिन स्कूल नहीं आएगा तो उसके पहले उसे अपने शिक्षक को एक प्रार्थना पत्र देना होगा। तभी उसे अवकाश मिलेगा।

सबसे खूबसूरत कक्षा-1

पूरे स्कूल में अगर सबसे खूबसूरत कक्षा की बात की जाए तो है वह कक्षा-1 जिसे बड़ी ही अच्छी तरह से स्कूल के शिक्षकों ने सजाया-संवारा है। छोटे बच्चों को पढ़ने के लिए जिस तरह का माहौल चाहिए, कक्षा में हूबहू वही माहौल है। इस कक्षा में प्रवेश करते ही चारों तरफ रंग-बिरंगे पोस्टर लगे नजर आते हैं। इनमें वर्णमाला, अंग्रेजी के वर्ण, व्यंग्य चित्रों के जरिए संदेश एवं अन्य ऐसी बहुत सारी चीजें पोस्टरों के जरिए नजर आती हैं, जिन्हें देखकर न केवल बच्चे इनके बारे में जानने के प्रति आकर्षित होते हैं बल्कि हंसी-खेल में बहुत सारी चीजों को जान जाते हैं।

इसके अलावा इस कक्षा में बच्चों के भारीभरकम बैग से परहेज रखा जाता है। इसलिए बच्चों की कक्षा को ‘बैगलेस’ बना दिया गया है। यानी नन्हे-नन्हे हाथ बस्ते के बोझ से नहीं दबते। साफ है कि शिक्षक इन बच्चों को ज्यादातर प्रायोगिक तरीके से पढ़ाते हैं।

स्कूल में अंकित हैं महापुरुषों के कथन

स्कूल के प्रवेश द्वार से कुछ ही दूरी पर मां सरस्वती का भव्य चित्र बना हुआ है, जहां बच्चे प्रतिदिन प्रार्थना करके विद्याध्ययन शुरू करते हैं। इसके अलावा स्थान-स्थान पर स्वामी विवेकानंद, सुभाष चन्द्र बोस, सर्वपल्ली राधाकृष्णनन, चंद्रशेखर आजाद, विनोबा भावे, महात्मा गांधी, भगत सिंह और भीमराव आंबेडकर के मनमोहक चित्र लगे हुए हैं। इसके अलावा सबसे ज्यादा खास बात यह है कि स्कूल में जगह-जगह महापुरुषों के वे कथन मोटे-मोटे अक्षरों में अंकित हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद किसी भी व्यक्ति की निराशा तो दूर होती ही है भविष्य में मनुष्य को क्या करना चाहिए, उसका भान होने लगता है।

स्कूल में महापुरुषों के कथन अंकित करने के विचार पर मलिक कहते हैं,‘‘मेरा मानना है कि जब कोई व्यक्ति किसी चीज को बार-बार देखता है तो उसका मन-मस्तिष्क उससे प्रभावित होता है। यहां अंकित महापुरुषों के कथन यही काम करते हैं। छोटे-छोटे बच्चे जब पढ़ते हैं कि- सफलता में दोषों को मिटाने की अनोखी शक्ति होती है; एक अच्छे चरित्र का निर्माण हजारों बार ठोकर खाने के बाद होता है—तो उनके जीवन में इसका प्रभाव पड़ता है और वे अच्छे रास्ते पर चलने का प्रयास करते हैं।’’

कान्वेंट छोड़कर आए हैं बच्चे

कपिल बताते हैं,‘‘हमारे स्कूल में ऐसे 8-9 बच्चे हैं जो कान्वेंट स्कूल छोड़कर आए हैं। इसके अलावा पास के दो निजी स्कूल भी बंद हो गए। ऐसा तभी संभव हो पाया जब यहां का माहौल बदला।’’ बहरहाल यह अलग बात है कि इस स्कूल को सजाने-संवारने में कपिल का तन, मन और धन तीनों लगे हैं। वे विद्यालय पर अब तक करीब 16 लाख रुपए खर्च कर चुके हैं, जबकि सरकार की ओर से रखरखाव के लिए साल में लगभग 6 हजार रुपए ही मिलते हैं जबकि इतने पैसे तो हर महीने स्कूल में खर्च हो जाते हैं। यानी कपिल को मिलने वाले वेतन और घर के व्यवसाय में से एक बड़ा हिस्सा स्कूल पर खर्च हुआ है। यह पूछने पर कि उनके परिवार की इस पर क्या प्रतिक्रिया है तो उन्होंने कहा हैं,‘‘परिवार से उन्हें बहुत सहयोग मिलता है। घर में मेरे पिता जी, पत्नी और दो छोटे बच्चे हैं। इसलिए ज्यादा खर्च है ही नहीं। दूसरी बात हमारे काम में पिता जी पूरी मदद करते हैं। परिवार का खर्चा निकालने के लिए उनका सौर ऊर्जा का व्यवसाय और जमीन है जहां से परिवार का भरण-पोषण होता है। इसके अलावा सबसे ज्यादा सहयोग स्कूल के 4 अन्य अध्यापकों से मिलता है। वे मेरे साथ हरेक मामले में कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं।’’

बहरहाल, ऐसे दौर में जब सरकारी शिक्षकों पर ग्राम प्रधान के साथ मिलकर बच्चों का मध्याह्न भोजन खा जाने के आरोप लग रहे है तब कपिल मलिक जैसे उदाहरण यह साबित करते हैं कि आज भी समाज में अच्छे शिक्षक हैं, जिनके लिए उनके छात्र ही सब कुछ हैं।