कर रहे रक्षा और दे रहे ज्ञान

छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले में तैनात 41वीं इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के जवान न केवल देश की सुरक्षा का जिम्मा निभा रहे हैं बल्कि ‘देश के भविष्य’ को संवारने में जुटे है |

आईटीबीपी के जवान जहां बच्चों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दे रहे हैं वहीं अच्छे से पढ़ा रहे हैं , हडेली गांव के छात्रों के साथ आईटीबीपी के जवान । नक्सल हिंसा से ग्रस्त बस्तर के कोंडागांव जिले का हडेली गांव। यहां तमाम तरह के संकट तो हैं ही, नक्सली गतिविधियों के चलते शिक्षा की स्थिति पूरी तरह जर्जर है। क्षेत्र में आए दिन नक्सलियों द्वारा अंजाम दी जाने वाली घटनाओं के भय से सरकारी विद्यालय के अध्यापक अक्सर स्कूल नहीं आ पाते थे। परिणामस्वरूप हडेली के बच्चे न केवल शिक्षा से वंचित हो रहे थे बल्कि अराजक तत्व उनका ‘ब्रेनवाश’ करने के प्रयास में थे। ऐसे में फरवरी, 2018 से इलाके में तैनात 41वीं इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) के जवानों ने क्षेत्र की सुरक्षा के साथ-साथ शिक्षक बनने का फैसला किया। पहले पहल हडेली के स्कूल में 20 बच्चे आए लेकिन अब धीरे-धीरे 88 से ज्यादा बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसके अलावा जवान उन बच्चों को सिर्फ पढ़ाई ही नहीं करवा रहे बल्कि आत्मरक्षा का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।दरअसल हडेली गांव की सीमा नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिले से भी लगती है, जिसके चलते नक्सली हिंसा की आंच इस गांव पर भी आती रहती है। इसी गांव के पास आईटीबीपी का एक शिविर लगा हुआ है। आईटीबीपी के जवान एंटी लैंडमाइन गाड़ी के साथ हर दिन जब गश्त पर निकलते थे, तब उन्हें इस स्कूल में बच्चे खेलते दिखाई देते थे। आईटीबीपी के कमांडर ने जब इसके बारे में पता लगाया तो पता चला कि गांव में एक प्राथमिक और एक माध्यमिक स्कूल है, जिसमें एक-एक शिक्षक भी नियुक्त है लेकिन ये दोनों अध्यापक नक्सलियों के डर के कारण कभी-कभार ही स्कूल आते हैं। इसे देखकर 41वीं इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के जवानों ने इस गांव को गोद लेने का फैसला किया। कमांडेंट सुरेंद्र खत्री बताते हैं,‘‘गांव के बच्चों को पढ़ाने के लिए हमने शिक्षा विभाग के अफसरों से बात की। उनकी ओर से सकारात्मक रुख दिखा। कुछ ही समय में मंजूरी मिलने के बाद हमने जवानों को स्कूल भेजना शुरू किया।’’ हडेली के इस स्कूल में जवानों ने जब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तब शुरुआत में मात्र 20 बच्चे आए। इस दौरान जवानों को महसूस हुआ कि उनके पास जो अस्त्र-शस्त्र हैं, उससे बच्चे भय खाते हैं। तो उन्होंने हथियारों का भय दूर करने का प्रयास किया और पढ़ाते समय कक्षा में अपने अस्त्र-शस्त्र बाहर रखने शुरू कर दिए। लेकिन इस दौरान स्कूल के बाहर दूसरे जवान सुरक्षा में तैनात रहते हैं। इसका प्रभाव यह है कि बच्चों का भय दूर होने लगा। आज स्थिति यह है कि अब कोई बच्चा किसी दिन स्कूल नहीं आता तो जवान उस बच्चे के घर जाकर अभिभावक से स्कूल न आने का कारण पूछते हैं। सैन्य कर्मियों के इस रवैये से जहां अभिभावक बच्चों पर गंभीरता से ध्यान देने लगे हैं वहीं बच्चों की संख्या 20 से बढ़कर 88 हो गई है। चार जवान रोहित नेगी, सुरकर सिंह, सिकंदर सिंह और जगराम यादव रोज सुबह दस बजे से शाम चार बजे तक बच्चों को स्कूल में पढ़ाते हैं और इस दौरान पूरा स्कूल सुरक्षा के घेरे में रहता है।आत्मरक्षा व खेल प्रशिक्षणये जवान बच्चों को सिर्फ शिक्षा ही नहीं दे रहे बल्कि आत्म रक्षा का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। वे उन्हें जूडो-कराटे, मुक्केबाजी एवं अन्य आत्मरक्षा के तरीके सिखा रहे हैं ताकि वक्त पड़ने दुश्मन का मुकाबला किया जा सके। इसके साथ ही उनको मुख्यधारा के बारे में ज्ञान दिया जा रहा है ताकि कोई भी अराजक तत्व बाल मन को अपने प्रभाव मंे ना ले पाए। अगर किसी बच्चे का स्वास्थ्य खराब होता है तो इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस के जवान उसे अपने शिविर में ले आते हैं, जहां उसका इलाज भी किया जाता है। इतना ही नहीं आत्मरक्षा के प्रशिक्षण के अलावा जवान कोंडागांव में हॉकी और तीरंदाजी खेल के शिविर भी लगाते हैं, जिससे बच्चों का रुझान खेलों की तरफ बढ़ सके और उनकी प्रतिभा उभरकर सामने आए। यह जवानों की मेहनत का ही परिणाम है कि खेल के क्षेत्र में कुछ बच्चों का राज्य स्तर पर चयन भी हुआ है।

आईटीबीपी के जवान जहां बच्चों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दे रहे हैं वहीं अच्छे से पढ़ा रहे हैं , हडेली गांव के छात्रों के साथ आईटीबीपी के जवान ।

आईटीबीपी के जवान जहां बच्चों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दे रहे हैं वहीं अच्छे से पढ़ा रहे हैं , हडेली गांव के छात्रों के साथ आईटीबीपी के जवान ।

नक्सल हिंसा से ग्रस्त बस्तर के कोंडागांव जिले का हडेली गांव। यहां तमाम तरह के संकट तो हैं ही, नक्सली गतिविधियों के चलते शिक्षा की स्थिति पूरी तरह जर्जर है। क्षेत्र में आए दिन नक्सलियों द्वारा अंजाम दी जाने वाली घटनाओं के भय से सरकारी विद्यालय के अध्यापक अक्सर स्कूल नहीं आ पाते थे। परिणामस्वरूप हडेली के बच्चे न केवल शिक्षा से वंचित हो रहे थे बल्कि अराजक तत्व उनका ‘ब्रेनवाश’ करने के प्रयास में थे। ऐसे में फरवरी, 2018 से इलाके में तैनात 41वीं इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) के जवानों ने क्षेत्र की सुरक्षा के साथ-साथ शिक्षक बनने का फैसला किया। पहले पहल हडेली के स्कूल में 20 बच्चे आए लेकिन अब धीरे-धीरे 88 से ज्यादा बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसके अलावा जवान उन बच्चों को सिर्फ पढ़ाई ही नहीं करवा रहे बल्कि आत्मरक्षा का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।

दरअसल हडेली गांव की सीमा नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिले से भी लगती है, जिसके चलते नक्सली हिंसा की आंच इस गांव पर भी आती रहती है। इसी गांव के पास आईटीबीपी का एक शिविर लगा हुआ है। आईटीबीपी के जवान एंटी लैंडमाइन गाड़ी के साथ हर दिन जब गश्त पर निकलते थे, तब उन्हें इस स्कूल में बच्चे खेलते दिखाई देते थे। आईटीबीपी के कमांडर ने जब इसके बारे में पता लगाया तो पता चला कि गांव में एक प्राथमिक और एक माध्यमिक स्कूल है, जिसमें एक-एक शिक्षक भी नियुक्त है लेकिन ये दोनों अध्यापक नक्सलियों के डर के कारण कभी-कभार ही स्कूल आते हैं। इसे देखकर 41वीं इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के जवानों ने इस गांव को गोद लेने का फैसला किया। कमांडेंट सुरेंद्र खत्री बताते हैं,‘‘गांव के बच्चों को पढ़ाने के लिए हमने शिक्षा विभाग के अफसरों से बात की। उनकी ओर से सकारात्मक रुख दिखा। कुछ ही समय में मंजूरी मिलने के बाद हमने जवानों को स्कूल भेजना शुरू किया।’’ हडेली के इस स्कूल में जवानों ने जब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तब शुरुआत में मात्र 20 बच्चे आए। इस दौरान जवानों को महसूस हुआ कि उनके पास जो अस्त्र-शस्त्र हैं, उससे बच्चे भय खाते हैं। तो उन्होंने हथियारों का भय दूर करने का प्रयास किया और पढ़ाते समय कक्षा में अपने अस्त्र-शस्त्र बाहर रखने शुरू कर दिए।

लेकिन इस दौरान स्कूल के बाहर दूसरे जवान सुरक्षा में तैनात रहते हैं। इसका प्रभाव यह है कि बच्चों का भय दूर होने लगा। आज स्थिति यह है कि अब कोई बच्चा किसी दिन स्कूल नहीं आता तो जवान उस बच्चे के घर जाकर अभिभावक से स्कूल न आने का कारण पूछते हैं। सैन्य कर्मियों के इस रवैये से जहां अभिभावक बच्चों पर गंभीरता से ध्यान देने लगे हैं वहीं बच्चों की संख्या 20 से बढ़कर 88 हो गई है। चार जवान रोहित नेगी, सुरकर सिंह, सिकंदर सिंह और जगराम यादव रोज सुबह दस बजे से शाम चार बजे तक बच्चों को स्कूल में पढ़ाते हैं और इस दौरान पूरा स्कूल सुरक्षा के घेरे में रहता है।

आत्मरक्षा व खेल प्रशिक्षण

ये जवान बच्चों को सिर्फ शिक्षा ही नहीं दे रहे बल्कि आत्म रक्षा का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। वे उन्हें जूडो-कराटे, मुक्केबाजी एवं अन्य आत्मरक्षा के तरीके सिखा रहे हैं ताकि वक्त पड़ने दुश्मन का मुकाबला किया जा सके। इसके साथ ही उनको मुख्यधारा के बारे में ज्ञान दिया जा रहा है ताकि कोई भी अराजक तत्व बाल मन को अपने प्रभाव मंे ना ले पाए। अगर किसी बच्चे का स्वास्थ्य खराब होता है तो इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस के जवान उसे अपने शिविर में ले आते हैं, जहां उसका इलाज भी किया जाता है। इतना ही नहीं आत्मरक्षा के प्रशिक्षण के अलावा जवान कोंडागांव में हॉकी और तीरंदाजी खेल के शिविर भी लगाते हैं, जिससे बच्चों का रुझान खेलों की तरफ बढ़ सके और उनकी प्रतिभा उभरकर सामने आए। यह जवानों की मेहनत का ही परिणाम है कि खेल के क्षेत्र में कुछ बच्चों का राज्य स्तर पर चयन भी हुआ है।