चाय की दुकान चलाने वाले राव फैला रहे शिक्षा का उजाला, मोदी ने की तारीफ
   दिनांक 04-सितंबर-2018
ओडिशा के कटक जिले में चाय की छोटी-सी गुमटी चला रहे डी.प्रकाश राव झुग्गी-झोंपड़ियों के उन दर्जनों बच्चों के जीवन में शिक्षा का उजियारा लाने के लिए प्रयासरत हैं, जो अभाव के चलते पढ़ाई से वंचित हैं। वे अपनी गाढ़ी कमाई का आधा पैसा बच्चों की पढ़ाई और भोजन पर खर्च कर रहे हैं
 
 प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ‘आशा आश्वासन:’ में पढ़ने वाले बच्चों के साथ। साथ में प्रकाश राव ।
‘मई महीने की 25 तारीख। शाम का यही कोई तकरीबन साढे चार बजे का समय। मैं प्रतिदिन की तरह ग्राहकों के लिए चाय तैयार कर रहा था। इतने में मेरे फोन की घंटी बजी। फोन उठाते ही दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘क्या आप कटक से मिस्टर प्रकाश राव जी बोल रहे हैं। मैं प्रधानमंत्री कार्यालय से बोल रहा हूं। मोदी जी आपसे मिलना चाहते हैं। इसलिए आप 26 मई को अपने स्कूल के बच्चों के साथ 2 बजे कटक के किला मैदान आ जाएं।’ फिर उन्होंने पूछा,‘क्या आप उन बच्चों का नाम बता पाएंगे जिन्हें आप पढ़ाते हैं?’ मैंने कहा, लिखिए और कुछ ही पलों में मैंने उन्हें काफी सारे नाम बता दिए। तो वे बोले,‘बस...बस! ज्यादा बच्चों को सुरक्षा देना मेरे लिए कठिन होगा, इतने नाम ही काफी हैं। आप इन बच्चों को लेकर तय समय पर किला मैदान पहुंच जाएं, जहां प्रधानमंत्री जी आपसे मिलेंगे।’ इससे आगे जब तक मैं कुछ और पूछता, तब तक फोन कट चुका था। फोन कटने के बाद एकबारगी मुझे लगा कि किसी ने मजाक किया होगा। लेकिन अगले ही पल जिले के कुछ और अधिकारियों के फोन आए और उन्होंने भी मुझे वही बात बोली जो पीएमओ आॅफिस के अधिकारी द्वारा बोली गई थी।
अगले दिन मुझे जिलाधिकारी तय समय पर किला मैदान लेकर पहुंचे। सभामंच पर भाजपा के कई केंद्रीय पदाधिकारी और मंत्री उपस्थित थे, जिन्होंने मेरे काम को जाना और सराहा। कुछ ही समय बाद एक ऐसा पल आया जिसका मुझे बेसब्री से इंतजार था। जब प्रधानमंत्री ने मुझे देखते ही कहा,‘राव साहब! मुझे आपके बारे में सब पता है। मैं आपसे मिलने आया हूं। आप अपने बच्चों से मिलवाइये।’ वे जब ऐसा कह रहे थे तो मुझे लग रहा था कि मैं कोई स्वप्न देख रहा हूं। लेकिन अगले ही पल लगा कि यह सपना नहीं, हकीकत है। मैं और बच्चे प्रधानमंत्री के पास जब आत्मीयता से बात कर रहे थे तो उन्होंने पास खड़े अधिकारियों से कहा,‘नो मिनिस्टर, नो कलेक्टर। मुझे इन बच्चों से अकेले में बात करनी है।’ और हम फिर एक बूथ के पास गए जहां प्रधानमंत्री के साथ मैं और मेरे बच्चे 18 मिनट तक रहे। इस दौरान प्रधानमंत्री बच्चों के साथ घुलमिल गए और खाने से लेकर उनके स्वास्थ्य तक की चिंता करते दिखे। वे बच्चों से उनकी पढ़ाई से लेकर रुचि की चीजें पूछ रहे थे तो वहीं भविष्य में क्या बनोगे, इसे भी जान रहे थे। बीच-बीच में बच्चों के जवाब सुनकर वे ठहाके भी लगा रहे थे। प्रकाश राव कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री का यह स्वरूप देखकर मैं चकित था। इससे ज्यादा खुशी मुझे इस बात की थी कि स्वयं प्रधानमंत्री जी मेरे काम की बार-बार प्रशंसा कर रहे थे। यह मेरा अहोभाग्य
ही है।’
 
झुग्गी-झोंपड़ियों के बच्चों को पढ़ाने में तल्लीन प्रकाश राव 
दरअसल यह कोई कहानी नहीं बल्कि हकीकत है। ओडिशा के कटक से संबंध रखने वाले 61 वर्षीय प्रकाश राव पिछले 18 साल से झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले गरीब बच्चों के जीवन में शिक्षा का उजियारा लाने के लिए प्रयासरत हैं। स्थानीय बक्शी बाजार में 5 दशक से भी ज्यादा समय से चाय की दुकान चला रहे राव अपनी कमाई का आधा पैसा इन बच्चों की शिक्षा और भोजन पर खर्च कर रहे हैं। इसका परिणाम है कि उनके पढ़ाए करीब 378 बच्चे आज ओडिशा के अच्छे विद्यालयों में शिक्षा पा रहे हैं। तो कुछ बच्चे तैराकी, खेल एवं अन्य खेलों में जिले और राज्य स्तर पर मेडल लाए हैं।
दरअसल राव के जीवन की कहानी जितनी दिलचस्प है, उतना ही उनका संघर्षपूर्ण है, जिसे जीतकर आज वे सैकड़ों बच्चों को शिक्षा देने में सफल हो पा रहे हैं। वे बताते हैं,‘‘ मेरे पिता 18 वर्ष की ही उम्र में सेना में भर्ती हो गए। उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ था। तब कटक के बहुत से युवा सेना में भर्ती हुए थे। उस समय बड़ी भीषण परिस्थितियां रहीं। सौभाग्य से मेरे पिताजी जीवित बच गए। विश्वयुद्ध खत्म होने के कुछ समय बाद वे कटक आ गए। वे एक सपना लेकर आए थे कि जाते ही कुछ ठीकठाक काम मिल जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वर्षों मेहनत-मजदूरी की। लेकिन वह भी सप्ताह में कुछ दिन मिलती और कुछ दिन नहीं मिलती, जिसके कारण घर में फाका पड़ने लगा। कुछ समय बाद पिताजी ने कटक में चाय की दुकान खोली। उस समय मैं छोटा था लेकिन पिताजी के काम में हाथ बंटाता था। पर पढ़ाई की उम्र थी तो मेरा पढ़ने को मन करता था। डॉक्टर बनूंगा, ऐसा सपना था। लेकिन वह भी पूरा नहीं हुआ। मैं फुटबॉल भी ठीकठाक खेलता था लेकिन उसमें भी आगे नहीं जा पाया। दुकान पर अत्यधिक काम के कारण मैं ठीक से खा भी नहीं पाता था। क्योंकि जो रोज की आमदनी होती थी, वह दुकान के खर्चों में ही निकल जाती थी। कुछ भी पैसा नहीं बचता था। जैसे-तैसे घर का भोजन बनता था। लेकिन मैं अधिकतर समय बिस्कुट खाकर पेट भर लेता था और भोजन नहीं करता था। वर्षों तक यही दिनचर्या चलती रही। जिसका परिणाम यह हुआ कि मेरे शरीर में बहुत से पोषक तत्वों की भारी कमी हो गई और 17 वर्ष की अवस्था में मुझे पैरलाइसिस हो गया। मेरे आधे शरीर ने काम करना बंद कर दिया था। मुझे कटक के श्रीराम चंद्रभंज मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने मेरी रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर और टीबी पाई। चिकित्सकों को मेरा आॅपरेशन करने के लिए एक बोतल खून की जरूरत थी लेकिन मेरे परिवार में कोई ऐसा रक्तदाता नहीं था, जो खून दे सके। 1970 के समय हालत यह थी कि जागरूकता के अभाव में अपनों को भी किसी बीमार व्यक्ति को खून देने से रोका जाता था। लेकिन ईश्वर की कृपा देखिए कि किसी अनजान व्यक्ति ने मुझे खून दिया और मैं बच गया। मैं छह महीने तक अस्पताल में रहा, जहां मेरी सेवा-सुश्रुषा हुई। कुछ समय बाद मैंने फिर से दुकान संभाली। तब तक पिताजी की तबियत बहुत खराब हो चुकी थी। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराकर मैंने अपने कांपते पैरों से जिम्मेदारी संभाली और समय के साथ शारीरिक रूप से ठीक हो गया।’’

 
 चाय की दुकान चलाने वाले राव फैला रहे शिक्षा का उजाला , मोदी ने की तारीफ
प्रकाश राव बताते हैं,‘‘उस समय जब भी मैं अपनी दुकान के आस-पास स्थित बस्ती के बच्चों को देखता था जिनकी उम्र पढ़ने की थी, लेकिन जो साधनों के अभाव में नहीं पढ़ पा रहे थे तो मुझे बड़ी टीस होती थी। बच्चों के बर्बाद होते जीवन को देखकर मुझे अपना जीवन याद आने लगता था। इसलिए मैंने इनके लिए कुछ करने का प्रण किया और साल 2000 में दो कमरे वाले अपने घर में एक कमरा बच्चों के पढ़ने के लिए नियत कर दिया और प्रतिदिन पास के 10-15 बच्चों को पढ़ाने लगा। इसे देखकर धीरे-धीरे आस-पास की बस्तियों से भी बच्चों का आना शुरू हो गया।’’ प्रकाश की दिनचर्या कुछ इस तरह है। वे भोर के पांच बजे से लेकर 10 बजे तक अपनी दुकान पर काम करते हैं। फिर 10:30 मिनट से 12:30 बजे तक 70 से ज्यादा बच्चों को पढ़ाते हैं। इस काम में उनका सहयोग स्थानीय छह महिलाएं निशुल्क रूप से करती हैं, जिन्हें बच्चे प्रेम से गुरु मां कहकर पुकारते हैं। ये गुरुमां बच्चों को नहलाने से लेकर उनके कपड़ों तक की चिंता रखती हैं, साथ ही इस दौरान वे उन्हें दूध और चावल-सब्जी भी खिलाती हैं, ताकि भरपूर मात्रा में पोषक तत्व बच्चों को मिलता रहे।
प्रकाश बताते हैं,‘‘मेरे काम को देखकर एक दिन स्थानीय स्तर पर काम करने वाले आश्वासन: महिला क्लब ने इस कार्य में मदद करने की इच्छा जताई। क्लब ने इन बच्चों के लिए दो कमरों का एक स्कूल बनवाया है, जिसे मैंने क्लब के नाम पर आशा आश्वासन: नाम दिया। आज इस स्कूल में 4 साल से 9 साल तक की उम्र के 70 बच्चे पढ़ हैं।’’ 54 साल से चाय बेच रहे राव कई भाषाओं के ज्ञाता हैं। वे हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, मलयालम, बांग्ला, कन्नड़ और उड़िया जो कि उनकी मातृभाषा है, को अच्छी तरह से बोल लेते हैं।
वे कहते हैं कि मुझे अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए। मैं केवल इन बस्ती के बच्चों को बेहतर जीवन देना चाहता हूं। देश के प्रधानमंत्री ने जब मेरी इस कोशिश की सराहना की तो मुझे बेहद खुशी मिली। मेरा उद्देश्य तो केवल इन बच्चों के भविष्य को संवारना है।’’
बहरहाल प्रधानमंत्री जब ‘मन की बात’ में प्रकाश राव का जिक्र कर उनके कार्य की प्रशंसा करते हुए कहते हैं,‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय का वेद वाक्य तो सभी को ज्ञात है लेकिन असल में उसे प्रकाश राव ने जीकर दिखाया है।’’ तब वे पूरे देश को एक प्रेरणा देते हैं कि व्यक्ति कितना भी छोटा काम करे, लेकिन अगर उसके इरादे बुलंद हैं तो वह सैकड़ों जीवन प्रकाशवान कर सकता है।
215 बार किया रक्तदान प्रकाश
राव सिर्फ गरीब बच्चों का शिक्षा के जरिए ही जीवन नहीं संवार रहे हैं बल्कि रक्तदान करके वे दर्जनों लोगों का जीवन बचा चुके हैं। पैरालाइसिस के समय अनजान व्यक्ति द्वारा उन्हें दिए गए खून से बची जान के आज भी वे कर्जदार हैं। वे कहते हैं,‘‘मैंने तभी से प्रण किया था कि नियमित रूप से रक्तदान करूंगा। तब से लेकर आज तक मैं करीब जहां 215 बार रक्तदान कर चुका हूं वहीं 17 बार प्लेटलेट्स के लिए रक्त दान किया है। इसके अलावा जब मैं दोपहर 12:30 पर बच्चों को पढ़ाना बंद करता हूं, उस समय मेरी दूसरी सेवा शुरू हो जाती है। मैं 1:20 से शाम 4 बजे तक उसी अस्पताल में 400 से 500 रोगियों को गर्म पानी पिलाता हूं, जहां के चिकित्सकों ने मुझे नया जीवन दिया। राज्य सरकार ने मेरे काम को देखकर अस्पताल में एक छोटा सा कार्यालय मुझे दिया है। यहां मेरे सहयोग के लिए 5-7 अन्य सेवाभावी एकत्र हो जाते हैं और अस्पताल आने वाले रोगियों को सूचना से लेकर अन्य मदद देते हैं।’’राव बताते हैं,‘‘सेवाभावी साथियों की मदद से हमारे पास एक कामचलाऊ एबुलेंस भी है, जो 8 किमी. तक के रोगियों को किसी भी समय अस्पताल ले आने का काम करती है।’’