''हमारा काम है छात्रों में क्षमताओं का निर्माण करना'
   दिनांक 05-सितंबर-2018
शिक्षा में सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों, डिजिटल इंडिया के तहत शिक्षा में होने वाले सुधारों, संभावनाओं, नैतिक शिक्षा को शामिल करने जैसे तमाम मुद्दों पर हमने केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से बातचीत की। प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:-
 
भारतीय परंपरा में शिक्षा और रोजगार दो अलग अलग विषय रहे हैं, लेकिन जब हम मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बात करते हैं तो तस्वीर उतनी स्पष्ट नहीं दिखती। क्या आने वाले समय में हम ऐसा मानें कि शिक्षा का एक अलग से मंत्रालय होगा?
 
देखिए, यह मूलत: शिक्षा मंत्रालय ही है, लेकिन पहले इसमें विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग समेत बहुत सारे विभाग थे। अब कौशल विभाग का अलग मंत्रालय बनाया गया है, पहले वे योजनाएं भी इसमें थीं शायद इसलिए इसका नाम मानव संसाधन विकास मंत्रालय हुआ होगा। आज मूलत: यह शिक्षा मंत्रालय है और शिक्षा मंत्रालय बहुत बड़ा है, क्योेंकि देश में पहली से लेकर 12वीं तक के 26 करोड़ छात्र हैं। साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा कॉलेज के छात्र हैं। एक करोड़ के लगभग अध्यापक-प्राध्यापक हैं और 50 करोड़ अविभावक। 20 करोड़ अविभावकों के भी अविभावक। कुल मिलाकर यह 100 करोड़ लोगों का हमेशा विषय रहता है। इसलिए यह एक महत्वपूर्ण मंत्रालय है। व्यक्ति में क्षमताएं निर्माण करना ही हमारा काम है इसलिए इसका नाम मानव संसाधन विकास मंत्रालय है।
शिक्षा क्षेत्र में नई शिक्षा नीति की बात हुई थी। वह क्या है और कब से लागू होने वाली है?
नई शिक्षा नीति आधुनिकीकरण के लिए होती है और यह अगली पीढ़ी के लिए है। यह 2020 से लेकर 2040 तक देश का एक सशक्त मार्गदर्शन करे, ऐसी हमारी परिकल्पना है। इसका ड्राफ्ट लगभग तैयार है। इस पर ढाई साल तक काम हुआ है। महीने भर में इसे अंतरिम रूप दे दिया जाएगा। इससे देश की शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ होगी और देश को बहुत लाभ होगा।
आपने कई बार कहा है कि आठवीं तक छात्रों को फेल न करने की जो नीति है उससे पूरी पीढ़ी बर्बाद हो रही है। समाज पर उसका अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। इसके बारे में आप क्या कहेंगे?
 
पिछली संप्रग सरकार ने यह निर्णय किया था कि पहली से लेकर आठवीं तक कोई भी छात्र फेल नहीं होगा। पिछले दस सालों में इस निर्णय के कारण स्कूलों की, शिक्षकों की, छात्रों की, अभिभावकों की सबकी जवाबदेही समाप्त हुई है। इस निर्णय का समाज पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा। अनेक स्कूल सिर्फ मिड डे मील स्कूल में तब्दील हो गए। आना, जाना, खाना बस यह ही होता था। आठवीं का छात्र पांचवीं का गणित नहीं कर सकता। सातवीं का छात्र चौथी का पाठ नहीं पढ़ सकता था। यह बहुत दिक्कत वाली व्यवस्था थी। इसलिए लगभग सभी राज्यों की यह मांग थी कि इसे बदलना चाहिए। इसके बाद हम इसको बदलने के लिए लोकसभा में बिल लाए। बिल लोकसभा में पास हो गया है। अब यह प्रस्ताव राज्यसभा में है। मुझे विश्वास है कि यह राज्यसभा में भी सर्वसम्मति से पास होगा। आने वाले साल में यह लागू होगा। छात्र पांचवीं और आठवीं की जो परीक्षा मार्च में देते हैं, यदि वे इसमें फेल होंगे तो उन छात्रों को दो महीने और अध्ययन करने के लिए मिलेंगे और मई में फिर से परीक्षा होगी। यदि इसमें भी वे छात्र फेल हो जाते हैं तो फिर छात्रों को उसी कक्षा में रखा जाएगा। कुल मिलाकर यह सबकी जवाबदेही तय करने के लिए किया गया है ताकि सबको लगे कि मुझे कहीं पहुंचना है, आगे बढ़ना है, जीवन में कुछ करना है।
 
निजी स्कूलों की तरफ लोगों का रुझान बढ़ रहा है। यहां तक कि गांवों में भी लोगों का रुझान निजी स्कूलों की तरफ ज्यादा है। क्यों?
इसके दो कारण हैं। एक संप्रग के कार्यकाल में शिक्षा की अनदेखी बहुत ज्यादा हुई तो सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता में कमी आई। अब हमने शिक्षकों का प्रशिक्षण जो पन्द्रह लाख अप्रशिक्षित थे, उनका प्रशिक्षण पूरा कराने का काम किया। वह अभी भी लगातार चल रहा है। जवाबदेही तय करने के लिए भी सरकार ने बहुत सारे कदम उठाए हैं। शिक्षक, छात्र, अविभावक एवं अन्य विषयों के बारे में आकलन कर एक नई शिक्षा नीति तैयार की जा रही है। देखिए जैसे-जैसे समाज में समृद्धि आती है तो लोग पहले बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना चाहते हैं। लोगों को गलतफहमियां भी होती हैं कि महंगी शिक्षा और अंग्रेजी शिक्षा ही अच्छी शिक्षा होती है। इस कारण भी लोग निजी विद्यालयों की तरफ भागते हैं। हमारा पूरा प्रयास है कि सरकारी विद्यालय में बेहतर से बेहतर शिक्षा मिले।
एक तरफ तो सरकार की तरफ से सरकारी विद्यालयों में अच्छी पहल हो रही है लेकिन निजी विद्यालयों की तरफ से एक बड़ी समस्या आ रही है-बेलगाम फीस की समस्या। क्या इसकी रोकथाम के लिए सरकार कोई पहल करेगी?
आज जो भी निजी स्कूल हैं उनमें से 95 प्रतिशत स्कूल सरकारी व्यवस्था से संबद्ध हैं। उनकी संबद्धता राज्य सरकार देखती है। स्कूल जिस राज्य में होते हैं वहां के नियम राज्य सरकार द्वारा तय किए जाते हैं। राज्य सरकारें इसके लिए फैसला लेती हैं। विभिन्न राज्यों में इस संबंध में अलग-अलग निर्णय लिए गए हैं। इसमें केन्द्र का कोई विशेषाधिकार नहीं होता कि उसके लिए हम यहां से कोई नियम बनाएं।
आज हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं। यह बात तो तय है कि डेटा तो सस्ता है, लेकिन शिक्षण संस्थान और शिक्षा दोनों ही बहुत महंगे हैं। क्या सरकार डिजिटल एजुकेशन और ऑन लाइन एजुकेशन को लेकर कोई कदम उठा रही है?
जो सरकारी विश्वविद्यालय हैं सरकारी संस्थान हैं, उनकी फीस बहुत कम है। निजी संस्थानों में लोग अपनी मर्जी से जाते हैं। राज्य सरकारों से संबद्ध जो संस्थान हैं वहां भी फीस बहुत कम है। जहां तक डिजिटल प्लेफार्म को स्कूलों एवं कॉलेजों में पहुंचाने की बात है तो उसके लिए सरकार बहुत काम कर रही है। जैसे 9वीं से स्नातकोत्तर स्तर तक 15 लाख कक्षाएं हैं। इन सभी में डिजिटल बोर्ड लगेगा, इसकी घोषणा बजट में पहले की जा चुकी है। यह एक बड़ी कामयाबी होगी। 'स्वयं' पोर्टल है, जो ऑन लाइन भी है और ऑफ लाइन भी । हमें एटीएम मालूम है (ऑल टाइम मनी), 'स्वयं' एटीएल है यानी एनी टाइम लर्निंग, एनी वेयर लनिंर्ग, फॉरएवर लर्निंग। धीरे-धीरे इसका विस्तार होगा। अभी इसमें एक हजार पाठ्यक्रम हैं, 20 लाख लोग इसके लिए पंजीकरण करा कर चुके हैं। इसका धीरे-धीरे विस्तार होगा। इसमें तीन महीने से लेकर एक साल तक के पाठ्यक्रम हैं। इसमें परीक्षा के बाद सर्टिफिकेट भी मिलता है। यह केवल छात्रों के लिए नहीं हैं। 'स्वयं' प्लेटफार्म के तहत व्यवसायी व पेशेवर नई चीजें सीख रहे हैं। यहां तक कि वरिष्ठ नागरिक भी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। यह टीवी में भी दिखता है। हमारे 32 चैनल हैं शिक्षा के जिनको आप टी.वी. के माध्यम से देख सकते हैं। यह डिजिटल इंडिया का ही एक प्लेटफार्म है। इसके अलावा हमने 1 लाख 65 हजार किताबों का डिजिटलाइजेशन किया है। हमने शिक्षा में शोध की तरफ विशेष ध्यान दिया है। छात्र जीवन से ही शोध की प्रवृत्ति को अवसर मिले और बढ़ावा मिले, यह हमारा प्रयास है। कॉलेज के विद्यार्थियों को देश की समस्याओं के बारे में शोध के माध्यम से हल तलाशने का अवसर मिल रहा है। वे प्रयोग कर रहे हैं और इस कारण से हमें अब शिक्षा और शोध के क्षेत्र में अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। हम कॉलेजों में हेकाथॉन आयोजित कर रहे हैं। लाखों छात्र उसके सहभागी बन रहे हैं। स्मार्ट इंडिया हैकाथन से देश की समस्याओं पर शोध करके उसका हल तलाशने का प्रयास किया गया है। डिजिटल इंडिया के तहत ही यह काम कर रहे हैं। हमने शोध के लिए 'प्रधानमंत्री शोध फैलोशिप' की शुरुआतकी है। इसमें एक लाख रुपए हर माह मेधावी छात्रों को शोध के लिए दिए जाएंगे, इस वर्ष 135 छात्रों को यह मिलेगी। ऐसा हमने इसलिए किया ताकि हमारे देश की प्रतिभा बाहर न जाए और देश में रहकर देशहित में काम करे।
बहुत से ऐसे ऐसे शोध हैं जिनसे यह साबित हो चुका है कि सबसे अच्छी शिक्षा मातृभाषा में हो सकती है। आपका इस बारे में क्या कहना है?
भारत की सभी भाषाएं बहुत ही अच्छी हैं। बच्चे की शिक्षा मातृभाषा में ही शुरू होती है। इसलिए जो सरकारी विद्यालय हैं वहां मातृभाषा में ही शिक्षा मिलती हैं लेकिन आजकल एक दुविधा है कि अविभावकों को लगने लगा है मेरा बच्चा अंग्रेजी माध्यम में पढ़ेगा तभी आगे उसका अच्छा भविष्य बनेगा। इसलिए वे अंग्रेजी माध्यम की तरफ जाने का प्रयास करते हैं, वे अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में अपनी चाहत से पढ़ाते हैं। अपनी मातृभाषा को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक राज्यों ने वहां की भाषाओं में पाठ्यपुस्तकें निकाली हैं। हम उनको प्रोत्साहित कर रहे हैं।
आज के दौर में समाज को दिशा देने के लिए नैतिक शिक्षा की बहुत जरूरत है, आपको नहीं लगता कि नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम का हिस्सा होनी चाहिए ?
देखिए, हम हमेशा ऐसा ही मानते आए हैं। इसलिए हमने जो चिंतन शिविर किए उसमें यह तय हुआ कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानवर्द्धन नहीं, चरित्रवर्धन भी है। हमारा उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था में नैतिक और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देना है। इसके लिए हम हमेशा प्रयासरत हैं। विशेषज्ञों द्वारा दिए गए सुझावों को क्रियान्वित भी कर रहे हैं।
 
केन्द्र में भाजपानीत सरकार को काम करते चार से अधिक वर्ष हो गए है। इन वर्षों की उपलब्धि के बारे में संक्षेप में बताएं ?
 
सरकार ने सबसे बड़े जो बदलाव किए हैं वे ये हैं कि पहले जो हर जगह भ्रष्टाचार होता था उसको हमने खत्म किया है। उदाहरण के तौर पर पहले सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार खदानों के आवंटन में होता था। चाहे वह बालू की खदान हो, कोयला खदान हो या कोई अन्य खदान। हमने इस व्यवस्था को ठीक करने के लिए नीतिगत निर्णय लिए। इसका परिणाम यह निकला कि जब हमने कोयला खदानों की प्रत्यक्ष नीलामी की तो नीलामी आधी भी खत्म नहीं हुई थी तो तीन लाख करोड़ रुपए आ गए। इससे पता चलता है कि पिछली सरकार में जो कोयला घोटाला हुआ था वह कितना बड़ा था। अब जो पैसा आया, वह पैसा गरीबों के विकास के लिए है। राज्यों को देने का फैसला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी करेंगे। अब हर काम नीति के आधार पर होता है। इसलिए अब बिचौलियों का कोई काम ही नहीं रहा, अब बिचौलिए समाप्त हो गए। राजीव गांधी कहा करते थे कि मैं सौ रुपए भेजता हूं तो गरीब के पास मात्र 15 रुपए जाते हैं। अब मोदी जी 100 रुपए भेजते हैं तो 100 के सौ रुपए गरीब के पास पहुंचते हैं। आज भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था के तौर पर देखा जाता है।