अनोखे साइकिल गुरु आदित्य कुमार
   दिनांक 05-सितंबर-2018
                                                                                                                                                            - पूनम नेगी 
पूरे भारत के बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए साइकिल से यात्रा करने वाले लखनऊ के आदित्य कुमार ने अब तक 20,000 गांवों में कक्षाएं लगाई हैं और लाखों बच्चों में पढ़ने की लगन लगाई है 
 
 बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक करते आदित्य
लखनऊ के आदित्य कुमार को गरीब बच्चों को साक्षर बनाने का ऐसा जुनून चढ़ा कि साढ़े तीन वर्ष पहले वे भारत भर में साइकिल से ही शिक्षा की अलख जगाने निकल पड़े। इस दौरान उन्होंने एक लाख 17 हजार किलोमीटर साइकिल चलाकर लोगों को साक्षरता के प्रति जागरूक किया है। भारत के 25 राज्यों की साइकिल से यात्रा कर 20 हजार गांवों में कक्षाएं लगाने वाले आदित्य आज लोगों के बीच ‘साइकिल वाले गुरु जी’ के रूप में जाने जाते हैं। लखनऊ के मुंशी पुलिया के रहने वाले आदित्य ने गरीब बच्चों को पढ़ाने में 24 वर्ष बिता दिए। इस मुहिम में कोई बाधा न पड़े, इसलिए शादी नहीं की। विरोध करने पर परिवार से दूर होना पड़ा। फुटपाथ पर रहने वाले गरीब बच्चों को साक्षर बनाने के इस पुण्य कार्य के लिए जब उन्हें सम्मान मिला तो हौसला और बढ़ा और 12 जनवरी, 2015 को स्वामी विवेकानंद की जयंती (युवा दिवस) पर 45 वर्षीय आदित्य राजधानी लखनऊ के जिलाधिकारी आवास से साक्षरता का संदेश देने को साइकिल यात्रा पर निकल पड़े।

 
कहते हैं कि लक्ष्य पावन हो और हौसला ऊंचा तो कोई बाधा रास्ता नहीं रोक सकती। जज्बे के धनी इस अनूठे साइकिल अध्यापक ने दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कन्याकुमारी, आंध्रप्रदेश समेत 25 राज्यों में यात्रा कर गरीब बच्चों को शिक्षा की अहमियत बता कर उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित किया है। आदित्य कहते है,‘‘मैंने गरीबी को बेहद नजदीक से देखा है। मुझे अच्छे से पता है, अच्छे स्कूलों में प्रवेश न मिलने पर प्रतिभाशाली गरीब बच्चों को कैसा महसूस होता है। मैं नहीं चाहता कि गरीबी और पैसे की कमी के कारण देश का कोई भी बच्चा अशिक्षित रह जाए। इसीलिए मेरा संकल्प आजीवन गरीब बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाना है। मैं खासकर उन बच्चों तक शिक्षा पहुंचाना चाहता हूं जो अभावग्रस्त तबके से आते हैं।’’ वे बच्चों को बताते है कि शिक्षा के अभाव में लोग कैसे अपने अधिकारों से वंचित होकर मूर्ख बन जाते हैं। आदित्य कहते हैं कि जब वे अपने पढ़ाये बच्चों को अच्छी नौकरी के साथ सम्मानजनक जीवन जीते देखते हैं तो उन्हें आत्मिक संतुष्टि मिलती है। अभावों के बीच स्नातक की शिक्षा पूर्ण करने वाले आदित्य बताते हैं कि जब वे लखनऊ से इस यात्रा पर निकले थे तो उनकी जेब में मात्र पांच सौ रुपये थे। लेकिन अधिकतर पड़ाव पर लोगों ने उनकी मदद की। वे जहां छोटे-छोटे बच्चों का समूह देखते, उनके पहिए वहीं रुक जाते और वे वहीं बच्चों की कक्षा लगाना शुरू कर देते। ऐसे बच्चों के मां-बाप उनके भोजन-पानी व बिस्तर आदि की व्यवस्था करते। हां, कुछ स्थानों पर उन्हें कुछ समस्याएं भी हुर्इं। बच्चों को पढ़ाने के बाद उन्हें अपने भोजन पानी के लिए मशक्कत करनी पड़ी पर वे ऐसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए पहले से ही तैयार थे। लिम्का बुक, गोल्डन बुक आॅफ वर्ल्ड रिकार्ड, यूनिक वर्ल्ड रिकार्ड जैसे अनेक सम्मानों से सम्मानित आदित्य की इस मुहिम की प्रशंसा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रामनाईक के साथ ही उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री भी कर चुके हैं।