'आम आदमी' के कन्वर्जन का खेल

                                                                                                                                                   - आशीष कुमार ‘अंशु’

चर्च के पैसों पर पलने वाले मिशनरियों के एजेंट भारत में अंधविश्वास फैलाते हैं और ‘जीसस की कृपा से कैंसर एवं एड्स जैसी घातक बीमारियों के उपचार’ का दावा करते हैं। ये कन्वर्जन का कारोबार चलाते हैं और विदेशों में भारत के विरुद्ध विष वमन करते हैं, लेकिन इनके पाखंड से भरी प्रार्थना सभाओं के खुलेआम आयोजन पर अंधविश्वास के विरुद्ध लड़ने वाले कभी कुछ नहीं बोलते 

 दिल्ली सरकार के मोहल्ला क्लीनिकों पर मिशनरी छाप ,  (बाएं से) तालकटोरा में आयोजित चंगाई सभा के लिए पोस्टर पर उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को बतौर मुख्य अतिथि प्रचारित किया गया। (दाएं) असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और उनकी पत्नी के साथ डेनियलवह चर्च के पैसों पर पलता है और भ्रमजाल फैलाकर भारत में कन्वर्जन का कारोबार चलाता है। वह अपना नाम जीसस बाबू या ईसा बाबू रख सकता था, लेकिन चूंकि उसे भारतीय जनमानस की समझ कम्युनिस्टों से कहीं बेहतर है, इसलिए उसने अपना नाम एवेंजलिस्ट पी.एस. रामबाबू रखा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अंधविश्वास की टोकरी लेकर पूरे देश में घूमने वाले चालबाज रामबाबू के विरुद्ध कोई भी अंधविश्वास निर्मूलन के दो शब्द बोलने का साहस नहीं जुटा पाया। लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी को उसे स्पष्ट समर्थन दिखता है।दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में रामबाबू ने डंके की चोट पर अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले अपने कार्यक्रम का आयोजन किया। खबर है कि दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी उसके साथ मंच साझा किया। इस मंच से रामबाबू उन तमाम प्रगतिशील लोगों के मुंह पर तमाचा मार कर गया जो दावा करते हैं कि वे अंधविश्वास के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे हैं। चर्च पोषित रामबाबू मामले में ऐसे तमाम लोगों की जुबान को जैसे लकवा मार गया। रामबाबू यह दावा करता है कि वह लंगड़े को चला सकता है, उसकी प्रार्थना सभा में आकर अंधे और बहरे देखने-सुनने लगेंगे। इतना ही नहीं, वह हर तरह की बीमारी दूर करने का भी दावा करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अब तक दस लाख लोगों का कन्वर्जन करा चुका है। कन्वर्जन के इस कारोबार में अब बेटा भी उसका हाथ बंटाता है। एवेंजलिस्ट अंकित रामबाबू जब 13 साल का था, तभी रामबाबू ने उसे अपने धंधे में उतारा। फिलहाल अंकित 23 साल का है। यह जानकारी रामबाबू की वेबसाइट रामबाबू डॉट ओआरजी से मिली। हमेशा की तरह तालकटोरा स्टेडियम में 25-26 अगस्त को आयोजित रामबाबू का कार्यक्रम इस बार भी 10 हजार लोगों के कन्वर्जन के साथ शांतिपूर्वक सम्पन्न हो गया होता, यदि दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट तेजिन्दर पाल सिंह बग्गा हरकत में नहीं आते। बाद में जब सुदर्शन चैनल ने चर्च पोषित रामबाबू की धूर्तता पर बहस रखी तो कोई भी पादरी उसमें आने को तैयार नहीं हुआ। सुदर्शन चैनल के सीएमडी और संपादक सुरेश चव्हाणे कहते हैं, ‘‘एक भी पादरी चैनल पर बहस में आने को तैयार नहीं हुआ, तब उनके घर पर ओबी वैन भेजी गई, लेकिन वे अपने घरों से भाग गए।’’ सवाल यह है कि जब पी.एस. राम बाबू जैसे लोग ‘हलुलुइया’ बोल कर कैंसर से लेकर एड्स तक की दुसाध्य बीमारी ठीक कर सकते हैं तो एम्स और मेदांता जैसे अस्पतालों की क्या जरूरत है? दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपनी खांसी के इलाज के लिए बेंगलुरु जाने की क्या जरूरत थी? दो बार ‘हलुलुइया’ बोल देते और ‘जीसस की पवित्र रोटी’ खाकर रामबाबू के चमत्कार से बीमारी भगा लेते। इस देश में अपनी धूर्तता की बदौलत कन्वर्जन की दुकान चलाने वाला पीएस रामबाबू इकलौता शख्स नहीं है। नवंबर 2016 में दिल्ली में ही आयोजित चंगाई सभा में अरविंद केजरीवाल ने भी हिस्सा लिया था। इस सभा में ‘जीसस की कृपा से कैंसर से लेकर किडनी की बीमारी तक के इलाज’ का दावा किया गया था। इस फरेब का आयोजन डेनियल मोहन सिंह ने किया था। डेनियल के कन्वर्जन का कारोबार समूचे दक्षिण एशिया में फैला हुआ है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के लिए तो डेनियल ने गोवा और पंजाब में खुद प्रचार भी किया था। अगर केजरीवाल ऐसे झूठे—मक्कार और कन्वर्जन के लिए अंधविश्वास का प्रचार करने वाले शख्स के साथ अगर दिल्ली में कदमताल कर रहे हैं तो यह शर्मिंदगी की बात है। वैसे भी दबी जुबान में कहा जाता है कि केजरीवाल क्रिप्टो क्रिश्चियन हैं। क्रिप्टो क्रिश्चियन उन्हें कहा जाता है, जिन्होंने कन्वर्जन को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन समाज के समक्ष इस सच को स्वीकार नहीं कर पाते। 2016 में आयोजित चंगाई सभा के दौरान डेनियल मोहन सिंह के साथ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल केजरीवाल ने मिशनरीज आॅफ चैरिटी की संस्थापक टेरेसा के कहने पर कोलकाता के कालीघाट में कुछ महीने तक काम भी किया है। यह बात खुद अरविंद केजरीवाल भी स्वीकार कर चुके हैं। टेरेसा को संत की उपाधि देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के लिए केजरीवाल वेटिकन सिटी भी गए थे। गौरतलब है कि मिशनरीज आॅफ चैरिटी में काम करने वाले गैर ईसाई लोग एकाध ही होंगे। यह वही संस्था है जो बच्चा बेचने की घटना को लेकर हाल ही में चर्चा में थी। केजरीवाल जब से दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, तब से राष्ट्रीय राजधानी की झुग्गियों में ईसाई मिशनरी ने भी अपना पांव पसारना शुरू किया। केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के कुछ दिन बाद ही विकासपुरी में विदेशी ईसाई महिलाओं को लाकर कन्वर्जन कराने की घटना का खुसाला हुआ था। खुद केजरीवाल अंधविश्वास से भरी कन्वर्जन की चंगाई सभाओं में शामिल होते रहे हैं। उन्होंने कभी भी ऐसी सभाओं का विरोध नहीं किया। केजरीवाल ने मोहल्ला क्लीनिकों में टेरेसा की तस्वीरें लगाई हैं और खुद भी इन मोहल्ला क्लीनिकों में मिशनरीज आॅफ चैरिटी के साथ कई महीने गुजारे हैं। दक्षिण एशिया में कन्वर्जन अभियान में जुटा डेनियल मोहन सिंह केवल अरविंद केजरीवाल का ही खास नहीं है, बल्कि असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और उनकी पत्नी डौली गोगोई का भी करीबी है। इस साल फरवरी में तरुण गोगोई के साथ अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा करते हुए डेनियल मोहन सिंह ने दोनों पति-पत्नी के लिए जीसस से प्रार्थना करने की बात लिखी है। कन्वर्जन के बड़े खिलाड़ियों में एक और नाम है- डॉ. जोसफ डिसूजा। डिसूजा दलित फ्रीडम नेटवर्क (डीएफएन) चलाते हैं, जो कॉलेरेडो में काम करता है। संस्था का आधिकारिक तौर पर मानना है कि वह दलितों को मानवीय गरिमा और सामाजिक स्वतंत्रता दिलाने, उन्हें सशक्त करने के लिए सूचना, मानवीय और आर्थिक रूप से सहायता देती है। भारत में अपना अभियान चलाने के लिए इस संस्था ने आॅल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के साथ गठजोड़ कर रखा है। काउंसिल देश में लगभग 2000 ईसाई संगठनों के साथ काम करती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि डीएफएन अमेरिका में आॅल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल को अपनी बात कहने में मदद करता है। डीएफएन ‘जाति आधारित छुआछूत’ पर अमेरिका में सेमिनार और गोष्ठी कराता है, जिस पर सवाल उठते रहे हैं। इस तरह के सेमिनार और गोष्ठियों में केवल भारत विरोधी बातें की जाती हैं।  एक चंगाई सभा में लोगों को संबोधित करता डेनियल मोहन सिंह। डेनियल पूरे दक्षिण एशिया में कन्वर्जन अभियान की बागडोर संभालता है बीते कुछ सालों से डीएफएन की पोल खुलने लगी है। दरअसल, डीएफएन और आॅल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल का संचालन डॉ. जोसफ डिसूजा ही करते हैं। इस साल से डीएफएन नए नाम ‘डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क’ से काम कर रहा है, जो बिना किसी संकोच के यह स्वीकार करता है कि यह एक ईसाई संस्था है। डीएफएन ने कथित भारतीय दलित चिंतक कांचा इलैया को अपने खर्चे पर विदेश यात्रा कराई है। इलैया एक तरफ खुद को प्रगतिशील और वामपंथी दिखाते हैं तथा दक्षिणपंथियों का साया भी अपने ऊपर पड़ने नहीं देते, दूसरी ओर वे डीएफएन के खर्चे पर अमेरिका में भाषण देने जाते रहते हैं। अमेरिका में डीएफएन कट्टर दक्षिणपंथी ईसाइयों का समूह है। जब इलैया से बार-बार यह सवाल पूछा जाने लगा तो उन्होंने अपना नाम बदलकर कांचा इलैया शेफर्ड रख लिया। कन्वर्जन का एक और खिलाड़ी है महाराष्ट्र का सुनील सरदार। दक्षिण दिल्ली में इसकी एक बड़ी कोठी है, जहां अरुंधति राय से लेकर ऐसे तमाम लोग आते रहते हैं, जो कन्वर्जन कराने में सुनील की मदद करते हैं। सुनील ट्रूथ सीकर्स इंटरनेशनल नाम से एक एनजीओ चलाता है। वह घोषित तौर पर कन्वर्जन के जरिये भारत में जीसस का साम्राज्य स्थापित करना चाहता है। ऐसा वह अपनी संस्था की वेबसाइट http://www.truthseekersinternational.org/ पर लिखता है।यह बात उन सभी लोगों के समझने के लिए है कि यदि जीसस के दम पर घातक और लाइलाज बीमारियों का उपचार संभव होता तो पोप जॉन पॉल 2004 की क्रिसमस में ऐसी हालत में क्यों आते जब उन्हें नाक के जरिये प्लास्टिक की नली से खाना दिया जा रहा था? पोप निमोनिया के भी शिकार हुए। जो लोग ईसाइयत के साथ समृद्धि देखते हैं, उन्हें फिलीपींस की ओर जरूर देखना चाहिए। फिलीपीन्स के लोगों ने भी पादरियों पर विश्वास करके ईसाइयत को अपनाया। आज पूरी दुनिया में यह पांचवां सबसे बड़ा कैथोलिक ईसाइयों का देश है। यहां की 90 प्रतिशत आबादी ईसाई है, जिसमें 80.6 प्रतिशत रोमन कैथोलिक है। फिर भी फिलीपींस की गरीबी खत्म नहीं हुई। प्राकृतिक संपदा से भरा पूरा फिलीपींस पूरी तरह से ईसाइयत को अपनाने के बाद भी गरीबी से छुटकारा नहीं पा सका।

 दिल्ली सरकार के मोहल्ला क्लीनिकों पर मिशनरी छाप ,  (बाएं से) तालकटोरा में आयोजित चंगाई सभा के लिए पोस्टर पर उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को बतौर मुख्य अतिथि प्रचारित किया गया। (दाएं) असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और उनकी पत्नी के साथ डेनियल

वह चर्च के पैसों पर पलता है और भ्रमजाल फैलाकर भारत में कन्वर्जन का कारोबार चलाता है। वह अपना नाम जीसस बाबू या ईसा बाबू रख सकता था, लेकिन चूंकि उसे भारतीय जनमानस की समझ कम्युनिस्टों से कहीं बेहतर है, इसलिए उसने अपना नाम एवेंजलिस्ट पी.एस. रामबाबू रखा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अंधविश्वास की टोकरी लेकर पूरे देश में घूमने वाले चालबाज रामबाबू के विरुद्ध कोई भी अंधविश्वास निर्मूलन के दो शब्द बोलने का साहस नहीं जुटा पाया। लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी को उसे स्पष्ट समर्थन दिखता है।

दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में रामबाबू ने डंके की चोट पर अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले अपने कार्यक्रम का आयोजन किया। खबर है कि दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी उसके साथ मंच साझा किया। इस मंच से रामबाबू उन तमाम प्रगतिशील लोगों के मुंह पर तमाचा मार कर गया जो दावा करते हैं कि वे अंधविश्वास के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे हैं। चर्च पोषित रामबाबू मामले में ऐसे तमाम लोगों की जुबान को जैसे लकवा मार गया।

रामबाबू यह दावा करता है कि वह लंगड़े को चला सकता है, उसकी प्रार्थना सभा में आकर अंधे और बहरे देखने-सुनने लगेंगे। इतना ही नहीं, वह हर तरह की बीमारी दूर करने का भी दावा करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अब तक दस लाख लोगों का कन्वर्जन करा चुका है। कन्वर्जन के इस कारोबार में अब बेटा भी उसका हाथ बंटाता है। एवेंजलिस्ट अंकित रामबाबू जब 13 साल का था, तभी रामबाबू ने उसे अपने धंधे में उतारा। फिलहाल अंकित 23 साल का है। यह जानकारी रामबाबू की वेबसाइट रामबाबू डॉट ओआरजी से मिली। हमेशा की तरह तालकटोरा स्टेडियम में 25-26 अगस्त को आयोजित रामबाबू का कार्यक्रम इस बार भी 10 हजार लोगों के कन्वर्जन के साथ शांतिपूर्वक सम्पन्न हो गया होता, यदि दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट तेजिन्दर पाल सिंह बग्गा हरकत में नहीं आते।

बाद में जब सुदर्शन चैनल ने चर्च पोषित रामबाबू की धूर्तता पर बहस रखी तो कोई भी पादरी उसमें आने को तैयार नहीं हुआ। सुदर्शन चैनल के सीएमडी और संपादक सुरेश चव्हाणे कहते हैं, ‘‘एक भी पादरी चैनल पर बहस में आने को तैयार नहीं हुआ, तब उनके घर पर ओबी वैन भेजी गई, लेकिन वे अपने घरों से भाग गए।’’ सवाल यह है कि जब पी.एस. राम बाबू जैसे लोग ‘हलुलुइया’ बोल कर कैंसर से लेकर एड्स तक की दुसाध्य बीमारी ठीक कर सकते हैं तो एम्स और मेदांता जैसे अस्पतालों की क्या जरूरत है? दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपनी खांसी के इलाज के लिए बेंगलुरु जाने की क्या जरूरत थी? दो बार ‘हलुलुइया’ बोल देते और ‘जीसस की पवित्र रोटी’ खाकर रामबाबू के चमत्कार से बीमारी भगा लेते।

इस देश में अपनी धूर्तता की बदौलत कन्वर्जन की दुकान चलाने वाला पीएस रामबाबू इकलौता शख्स नहीं है। नवंबर 2016 में दिल्ली में ही आयोजित चंगाई सभा में अरविंद केजरीवाल ने भी हिस्सा लिया था। इस सभा में ‘जीसस की कृपा से कैंसर से लेकर किडनी की बीमारी तक के इलाज’ का दावा किया गया था। इस फरेब का आयोजन डेनियल मोहन सिंह ने किया था। डेनियल के कन्वर्जन का कारोबार समूचे दक्षिण एशिया में फैला हुआ है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के लिए तो डेनियल ने गोवा और पंजाब में खुद प्रचार भी किया था। अगर केजरीवाल ऐसे झूठे—मक्कार और कन्वर्जन के लिए अंधविश्वास का प्रचार करने वाले शख्स के साथ अगर दिल्ली में कदमताल कर रहे हैं तो यह शर्मिंदगी की बात है। वैसे भी दबी जुबान में कहा जाता है कि केजरीवाल क्रिप्टो क्रिश्चियन हैं। क्रिप्टो क्रिश्चियन उन्हें कहा जाता है, जिन्होंने कन्वर्जन को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन समाज के समक्ष इस सच को स्वीकार नहीं कर पाते।

 

2016 में आयोजित चंगाई सभा के दौरान डेनियल मोहन सिंह के साथ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल 

केजरीवाल ने मिशनरीज आॅफ चैरिटी की संस्थापक टेरेसा के कहने पर कोलकाता के कालीघाट में कुछ महीने तक काम भी किया है। यह बात खुद अरविंद केजरीवाल भी स्वीकार कर चुके हैं। टेरेसा को संत की उपाधि देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के लिए केजरीवाल वेटिकन सिटी भी गए थे। गौरतलब है कि मिशनरीज आॅफ चैरिटी में काम करने वाले गैर ईसाई लोग एकाध ही होंगे। यह वही संस्था है जो बच्चा बेचने की घटना को लेकर हाल ही में चर्चा में थी। केजरीवाल जब से दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, तब से राष्ट्रीय राजधानी की झुग्गियों में ईसाई मिशनरी ने भी अपना पांव पसारना शुरू किया। केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के कुछ दिन बाद ही विकासपुरी में विदेशी ईसाई महिलाओं को लाकर कन्वर्जन कराने की घटना का खुसाला हुआ था। खुद केजरीवाल अंधविश्वास से भरी कन्वर्जन की चंगाई सभाओं में शामिल होते रहे हैं। उन्होंने कभी भी ऐसी सभाओं का विरोध नहीं किया। केजरीवाल ने मोहल्ला क्लीनिकों में टेरेसा की तस्वीरें लगाई हैं और खुद भी इन मोहल्ला क्लीनिकों में मिशनरीज आॅफ चैरिटी के साथ कई महीने गुजारे हैं।

दक्षिण एशिया में कन्वर्जन अभियान में जुटा डेनियल मोहन सिंह केवल अरविंद केजरीवाल का ही खास नहीं है, बल्कि असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और उनकी पत्नी डौली गोगोई का भी करीबी है। इस साल फरवरी में तरुण गोगोई के साथ अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा करते हुए डेनियल मोहन सिंह ने दोनों पति-पत्नी के लिए जीसस से प्रार्थना करने की बात लिखी है। कन्वर्जन के बड़े खिलाड़ियों में एक और नाम है- डॉ. जोसफ डिसूजा। डिसूजा दलित फ्रीडम नेटवर्क (डीएफएन) चलाते हैं, जो कॉलेरेडो में काम करता है। संस्था का आधिकारिक तौर पर मानना है कि वह दलितों को मानवीय गरिमा और सामाजिक स्वतंत्रता दिलाने, उन्हें सशक्त करने के लिए सूचना, मानवीय और आर्थिक रूप से सहायता देती है। भारत में अपना अभियान चलाने के लिए इस संस्था ने आॅल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के साथ गठजोड़ कर रखा है। काउंसिल देश में लगभग 2000 ईसाई संगठनों के साथ काम करती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि डीएफएन अमेरिका में आॅल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल को अपनी बात कहने में मदद करता है। डीएफएन ‘जाति आधारित छुआछूत’ पर अमेरिका में सेमिनार और गोष्ठी कराता है, जिस पर सवाल उठते रहे हैं। इस तरह के सेमिनार और गोष्ठियों में केवल भारत विरोधी बातें की जाती हैं।

 

 एक चंगाई सभा में लोगों को संबोधित करता डेनियल मोहन सिंह। डेनियल पूरे दक्षिण एशिया में कन्वर्जन अभियान की बागडोर संभालता है

बीते कुछ सालों से डीएफएन की पोल खुलने लगी है। दरअसल, डीएफएन और आॅल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल का संचालन डॉ. जोसफ डिसूजा ही करते हैं। इस साल से डीएफएन नए नाम ‘डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क’ से काम कर रहा है, जो बिना किसी संकोच के यह स्वीकार करता है कि यह एक ईसाई संस्था है। डीएफएन ने कथित भारतीय दलित चिंतक कांचा इलैया को अपने खर्चे पर विदेश यात्रा कराई है। इलैया एक तरफ खुद को प्रगतिशील और वामपंथी दिखाते हैं तथा दक्षिणपंथियों का साया भी अपने ऊपर पड़ने नहीं देते, दूसरी ओर वे डीएफएन के खर्चे पर अमेरिका में भाषण देने जाते रहते हैं। अमेरिका में डीएफएन कट्टर दक्षिणपंथी ईसाइयों का समूह है। जब इलैया से बार-बार यह सवाल पूछा जाने लगा तो उन्होंने अपना नाम बदलकर कांचा इलैया शेफर्ड रख लिया।

कन्वर्जन का एक और खिलाड़ी है महाराष्ट्र का सुनील सरदार। दक्षिण दिल्ली में इसकी एक बड़ी कोठी है, जहां अरुंधति राय से लेकर ऐसे तमाम लोग आते रहते हैं, जो कन्वर्जन कराने में सुनील की मदद करते हैं। सुनील ट्रूथ सीकर्स इंटरनेशनल नाम से एक एनजीओ चलाता है। वह घोषित तौर पर कन्वर्जन के जरिये भारत में जीसस का साम्राज्य स्थापित करना चाहता है। ऐसा वह अपनी संस्था की वेबसाइट http://www.truthseekersinternational.org/ पर लिखता है।

यह बात उन सभी लोगों के समझने के लिए है कि यदि जीसस के दम पर घातक और लाइलाज बीमारियों का उपचार संभव होता तो पोप जॉन पॉल 2004 की क्रिसमस में ऐसी हालत में क्यों आते जब उन्हें नाक के जरिये प्लास्टिक की नली से खाना दिया जा रहा था?

पोप निमोनिया के भी शिकार हुए। जो लोग ईसाइयत के साथ समृद्धि देखते हैं, उन्हें फिलीपींस की ओर जरूर देखना चाहिए। फिलीपीन्स के लोगों ने भी पादरियों पर विश्वास करके ईसाइयत को अपनाया। आज पूरी दुनिया में यह पांचवां सबसे बड़ा कैथोलिक ईसाइयों का देश है। यहां की 90 प्रतिशत आबादी ईसाई है, जिसमें 80.6 प्रतिशत रोमन कैथोलिक है। फिर भी फिलीपींस की गरीबी खत्म नहीं हुई। प्राकृतिक संपदा से भरा पूरा फिलीपींस पूरी तरह से ईसाइयत को अपनाने के बाद भी गरीबी से छुटकारा नहीं पा सका।