केरल आपदा और मीडिया का परदा

दिल्ली का मीडिया ढिंढोरा पीट रहा था कि केरल में बारिश और बाढ़ से निपटने के विश्वस्तरीय इंतजाम हैं। अब उसी मीडिया का एक बड़ा वर्ग राज्य सरकार के निकम्मेपन पर परदा डालने में जुटा है

कुछ दिन पहले आजतक चैनल ने एक ओवरब्रिज पर बारिश का पानी भरने की खबर दिखाई थी। उसने दावा किया था कि यह ओवरब्रिज गाजियाबाद में है और हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसका उद्घाटन किया है। चैनल ने व्यंग्य किया कि इस ओवरब्रिज को दुनिया का अजूबा घोषित कर देना चाहिए। जबकि उसे यह पता था कि खबर झूठी है। उसने योगी सरकार को कोसने से पहले केरल की वामपंथी सरकार की प्रशंसा के पुल बांधे थे। कहा कि केरल में बारिश व बाढ़ से निपटने के विश्वस्तरीय इंतजाम हैं। पर कुछ हफ्ते में ही केरल सरकार की कथित कार्यकुशलता की पोल खुल गई। अब इस क्रांतिकारी चैनल ने कान-आंख बंद कर लिए।

केरल में लाखों लोग जब सरकारी निकम्मेपन की सजा भुगत रहे थे, तब दिल्ली का मीडिया का एक बड़ा वर्ग इसे छिपाने में जुटा था। शेखर गुप्ता जैसे पत्रकारों ने इस अवसर का इस्तेमाल उत्तर-दक्षिण भारत के नाम पर खाई पैदा करने के लिए किया। अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित लेख में उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि उत्तर भारत के राज्य दक्षिण पर बोझ हैं। बाढ़ के बहाने मिशनरी, मदरसे कन्वर्जन की तैयारी में हैं और मीडिया इसमें मददगार बन रहा है। इकोनॉमिक टाइम्स ने एक कार्टून छापा, जिसमें दिखाया गया कि बाढ़ में डूबते एक आदमी को बचाने के बदले में एक आदमी उसे ‘वेद पढ़ने’ को कह रहा है। सभी जानते हैं कि यह तरीका ईसाई मिशनरियों का है, पर मीडिया में बैठे उनके एजेंट इसे हिंदू धर्म पर चस्पां करने की कोशिश करते हैं। पर यही मिशनरीपरस्त अखबार तब चुप हो जाते हैं जब पता चलता है कि राहत शिविरों में कथित ऊंची जाति के ईसाइयों ने ‘छोटी जाति के ईसाइयों’ के साथ रहने से इनकार कर दिया। इस खबर को भी लगभग दबा दिया गया कि चर्च की संस्थाओं ने पश्चिमी घाट में पर्यावरण के साथ जो खिलवाड़ किया, उसके कारण ही राज्य के लोगों को इतनी बड़ी आपदा झेलनी पड़ी। औरैया (उ.प्र.) में गोहत्या का विरोध करने पर दो साधुओं की बर्बर हत्या की जानकारी सामने आने पर भी मीडिया चुप रहा। हैरानी है कि फेसबुक व ट्विटर पर भी इस घटना से जुड़ी खबरों को ‘सेंसर’ करने की कोशिश हो रही थी। जिन्होंने इस हत्याकांड की तस्वीरें साझा की थीं, वे उनके पेज से गायब हो गईं। यह समझना मुश्किल नहीं है कि किस तरह की ताकतें ऐसी कोशिश करती हैं। ये लोग मुख्यधारा मीडिया ही नहीं, सोशल मीडिया के ऊंचे पदों पर भी भरे हैं। ट्विटर के सीईओ ने माना कि वे अपनी वेबसाइट के जरिए वामपंथ को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं। हिंदू त्योहारों पर मीडिया की ओछी टिप्पणियां नई बात नहीं है। पर हैरानी तब होती है जब यही संस्थान लंबे-लंबे लेखों में बकरीद की कुबार्नी का महत्व समझाते हैं। इस साल तकरीबन सभी अखबारों, वेबसाइटों ने बकरीद का महिमामंडन किया। इनमें दैनिक भास्कर भी शामिल है जो शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर दूध न चढ़ाने के लिए ‘जागरूकता अभियान’ चला रहा था।

 

उधर, अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर जब पूरा देश शोक में डूबा था तो वामपंथी पत्रकार अपने पवित्र काम में जुटे थे। उन्होंने गांधी परिवार के नेताओं के महिमामंडन के लिए अटल जी के नाम का इस्तेमाल करने की पूरी कोशिश की। अचानक ऐसे लेखों की बाढ़ आ गई जिनमें उनकी तुलना नेहरू से की गई थी। कुछ मीडिया घरानों ने तो अटल जी को लेकर बेहूदा टिप्पणियां शुरू कर दीं। पंजाब में कांग्रेस सरकार के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू इमरान खान के शपथ ग्रहण पर पाकिस्तान गए। वहां सेना प्रमुख बाजवा के साथ उनकी गलबहियों पर मीडिया हमलावर है, पर उसने यह ध्यान भी रखा कि सवाल कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी पर न उठे। क्या ऐसा संभव है कि सिद्धू बिना पार्टी नेतृत्व की अनुमति के पाकिस्तान गए? अगर उनकी पाकिस्तान यात्रा में राहुल गांधी की रजामंदी थी तो इस मीडिया इस बात को क्यों छिपाना चाहता था?