विश्व हिंदू कांग्रेस की सफलता क्यों जरूरी ?

1. हिन्दुओं को वैश्विक मंच की जरूरत

विश्व में ईसाई और मुस्लिमों के बाद हिन्दुओं की संख्या आती है। लेकिन हिन्दुओं के पास उनके समक्ष वैश्विक स्तर पर आने वाली समस्याओं को रखने के लिए कोई मंच नहीं है। जबकि मुसलमानों के लिए विश्व स्तर पर काम करने के लिए ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कॉपोरेशन (ओआईसी) है। जिसे करीब 45 मुस्लिम देशों का समर्थन प्राप्त है। इसी तरह ईसाइयों के लिए भी क्रिश्चियन इकोनॉमिक फोरम समेत कई संगठन है। इसीलिए विश्व हिन्दू कांग्रेस (डब्लूएचसी) ने धर्म से आगे बढ़कर 50 देशों के अपने 250 वैचारिक नेताओं, 2200 प्रतिनिधियों के साथ हिन्दू इकोनॉमिक फोरम, हिन्दू एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस और वूमेन फोरम आदि बनाने के लिए कदम बढ़ाया है।

2. अर्थव्यवस्था पर एक प्रभावी कारक धर्म

विश्व स्तर पर इन दिनों धर्म का अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव है। एक लेख के अनुसार हर साल अमेरिकन अर्थव्यवस्था को 1.2 ट्रिलियन की रकम धर्म के नाम पर प्राप्त होती है। इसके अलावा 418 बिलियन धार्मिक मंचों से और 437 बिलियन विभिन्न धार्मिक संस्थानों जैसे यूनिवर्सिटी, चैरिटी, हेल्थ सिस्टम आदि से मिलती है। वहीं, विश्व स्तर पर कैथॉलिक क्रिश्चियन के लिए काम करने वाले वेटिकन बैंक की 8 बिलियन की चल अचल संपत्ति है। ओआईसी मुस्लिमों के लिए यहीं काम करता है। लेकिन हिंदुओ के लिए ऐसा कोई फोरम नही है। डब्लूएचसी ने इस और पहला कदम बढ़ाया है। विश्व स्तर पर फैले हिन्दू उद्यमियों को साथ लेकर यह फोरम देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए बेहतर काम कर सकता है। 

3. राजनीतिक मंचों का महत्व

पहली बार 5 देशों के राजनीतिक प्राधिकारी डब्लूएचसी में शामिल हुए है, जो स्वागत योग्य है। यह ध्यान रखने की बात है कि जब 4 सितंबर 2016 को पॉप कैनोनिसेड टेरेसा हुए थी तो उसमें 13 राज्यों के हेड, 90 राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था। वहीं, रोहिंग्या मुद्दे पर चर्चा के लिए ओआईसी ने विशेष सत्र बुलाया था। यहां बता दें की भारत से बाहर 70 मिलियन हिन्दू रहते हैं। 45 देशों में हिंदू फैले हुए हैं। आंकड़े बताते है कि नेपाल, बांग्लादेश इंडोनेशिया, पाकिस्तान, श्रीलंका, मलेशिया, यूके, कनाडा, फिजी आदि 15 देशों में 5 लाख से हिन्दू रहते हैं।

4 . हिदुओं की अलग पहचान जरूरी

इस्लामिक आतंकवाद के बढ़ने से यूरोप और अमेरिका में माइग्रेशन को लेकर नीतियां सख्त होती जा रहीं हैं। एक रिसर्च के अनुसार आने वाले समय मे बड़ी संख्या में हिन्दू यूरोप और अमेरिका में रहने जाएंगे। इसलिए यह जरूरी है की हिन्दू अपनी अलग पहचान बनाएं। इतिहास साक्षी है कि हिन्दुओं ने अपना देश बनाने के लिए कभी दूसरे देशों को तबाह नहीं किया। कभी दूसरों को गुलाम नहीं बनाया। हिन्दू जहां कहीं भी गए उन्होंने अन्य लोगों से हमेशा शांतिपूर्ण संबंध बनाए और अन्य लोगों की संस्कृति में बेहतर चीजों को जोड़ा।

 

5. सार्वभौमिक प्रेम का संदेश देने की जरूरत

आज से करीब 125 साल पहले जब स्वामी विवेकानंद ने धर्म और देश में सार्वभौमिक प्रेम का संदेश दिया था तो उनके अद्भुत व्यक्तित्व प्रभावी उद्बोधन  से सभी अंतर खत्म हो गए थे। भारत उस समय बेहतर देश था। आज उनके संदेश के इतने बरसों बाद भी भारत उनके संदेशों को विश्व मे फैली हिन्दू बिरादरी की मदद से सामूहिक और प्रभावशाली तरीके से आगे बढ़ाने के राह पर है। इस काम के लिए एक बार फिर शिकागो का चयन किया गया है जो केवल कोई प्रतीक मात्र नही है बल्कि यह एक बार फिर विश्व की अलग अलग प्रतिष्ठित सभा के लिए विश्व शांति की अपनी मंशा जाहिर करने का मंच है।