जन्मदिन विशेष: भारत के इस महान् वैज्ञानिक का अल्बर्ट आइन्स्टाइन भी मानते थे लोहा
   दिनांक 01-जनवरी-2019

मारे देश का इतिहास वैज्ञानिक अनुसंधानों का साक्षी रहा है. शून्य की खोज से लेकर दशमलव की खोज तक देश के गौरवपूर्ण इतिहास का बखान करती है. लगातार विदेशी आक्रमण और गुलामी का दंश झेल रहे भारतवासियों को मंदबुद्धि वाला देश कहा जाने लगा, खोज के मामले में अनाड़ी समझा जाने लगा, विदेशी आक्रांता भारत को पिछलग्गुओं का देश कहने लगे। गुलामी ने भले ही हमें आर्थिक रुप से कमजोर बना दिया हो लेकिन बौद्धिक रूप से हमने दुनिया में अपनी क्षमताओं का लोहा मनवाया। अन्तराष्ट्रीय स्तर पर यूं तो कई भारतीय वैज्ञानिक जिन्होंने अपनी खोज से भारतवासियों को गौरवान्वित किया लेकिन सत्येंद्र नाथ बोस एकमात्र ऐसे वैज्ञानिक थे जिसका लोहा स्वयं अल्बर्ट आइन्स्टाइन भी मानते थे.
सत्येंद्र नाथ बोस का जन्म 1 जनवरी 1894 को कोलकाता में हुआ था. इनके पिता सुरेंद्र नाथ बोस ईस्ट इंडिया रेलवे में इंजीनियरिंग विभाग में कार्यरत थे. सत्येंद्र अपने माता-पिता की सात संतानों में इकलौते बेटे व सबसे बड़े थे. वह एक स्वयंभू विद्यार्थी थे जिनकी रूचि कई सारे क्षेत्रों में थी. मैथमेटिक्स, केमिस्ट्री फिजिक्स, लिटरेचर, फिलॉसफी, आदि विषयों में पकड़ रखने वाले सत्येन्द्र को उनके गणित के अध्यापक ने उन्हें गणित विषय में 100 में से 110 नंबर दिए थे और कहा था कि “यह एक दिन बहुत बड़ा गणितज्ञ बनेगा।" इसके बावजूद उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र विज्ञान को चुना. वह कोलकाता विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे. विज्ञान में गहरी रुचि होने के कारण उन्होंने अध्यापन के साथ शोध कार्य जारी रखा. इसके लिए बोस ने गिब्स, प्लांट, आइन्स्टाइन जैसे वैज्ञानिकों के शोध कार्य को पढ़ना चालू कर दिया. आइन्स्टाइन ने दिखाया कि प्रकाश, तरंग और छोटे-छोटे बॉल (जिसे हम फोटोन कहते हैं) दोनों माध्यम से चलता है. जिसकी पारंपरिक विज्ञान में व्याख्या नहीं थी. लेकिन आइन्स्टाइन का यह नया सिद्धांत कहीं ना कहीं प्लांक के सिद्धांत को प्रतिपादित नहीं कर पा रहा था. जल्द ही बोस ने एक नया सिद्धांत दिया जो यह कहता है कि “फोटोन बॉल की तरह नहीं होती है, जैसा आइन्स्टाइन ने कहा था बल्कि यह बिखरे हुए होते हैं”
यह सिद्धांत नए सांख्यिकी की शुरुआत थी. अपनी इस नई खोज को बोस ने इंग्लैंड की एक पत्रिका में छपने के लिए भेजा लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया. तब उन्होंने यह शोध आइन्स्टाइन को भेजा और उनसे अनुरोध किया कि इसे किसी पत्रिका में छपवाये. आइंस्टीन ने इस शोध को बहुत सराहा और इसका अनुवाद जर्मन भाषा में करके एक प्रसिद्ध जर्मन पत्रिका में प्रकाशित करवाया. साथ ही बोस को उनके कार्य की तारीफ में एक पत्र भी लिखा.
डॉ. बोस ने भारत में क्रिस्टल विज्ञान के क्षेत्र में अहम योगदान दिया. उन्होंने शोध कार्य के लिए ढाका विश्वविद्यालय में एक्स रे क्रिस्टल लैब का निर्माण करवाया.
कुछ समय बाद उन्हें ढाका विश्वविद्यालय का संकाय अध्यक्ष बनाया गया. भारत के लोगों में विज्ञान के प्रति जागरूकता लाने और विज्ञान की जरूरत को समझने के लिए इन्होंने कई राष्ट्रीय प्रयोगशाला के निर्माण में अहम योगदान दिया.
बोस ने क्वांटम फिजिक्स को एक नई दिशा दी. पहले वैज्ञानिकों के द्वारा यह माना जाता रहा कि परमाणु ही सबसे छोटा कण होता है लेकिन जब इस बात की जानकारी पता चली कि परमाणु के अंदर भी कई सूक्ष्म कण होते हैं जो कि वर्तमान में प्रतिपादित किसी भी नियम का पालन नहीं करते हैं. तब डॉ. बोस ने एक नए नियम का प्रतिपादन किया जो “बोस-आइन्स्टाइन सांख्यिकी सिद्धांत” के नाम से जाना जाता है. इस नियम के बाद वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म कणों पर बहुत रिसर्च किया. जिसके बाद यह निष्कर्ष निकाला कि परमाणु के अंदर पाए जाने वाले सूक्ष्म परमाणु कण मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं जिनमें से एक का नामकरण डॉ. बोस के नाम पर ‘बोसॉन’ रखा गया तथा दूसरे का एनरिको फर्मी के नाम पर ‘फर्मीऑन’ रखा गया.
आज भौतिकी में कण दो प्रकार के होते हैं एक बोसॉन और दूसरे फर्मियान. बोसॉन यानि फोटॉन, ग्लुऑन, गेज बोसॉन (फोटोन, प्रकाश की मूल इकाई) और फर्मियान यानि क्वार्क और लेप्टॉन एवं संयोजित कण प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, इलेक्ट्रॉन ( चार्ज की मूल इकाई). यह वर्तमान भौतिकी का आधार हैं.
जिस वैज्ञानिक की मेहनत का लोहा स्वयं आइंस्टीन ने माना हो. जिसके साथ स्वयं आइंस्टीन का नाम जुड़ा हो, जिसने सांख्यकी भौतिकी को नए सिरे से परिभाषित किया हो, जिसके नाम का आधार लेकर एक सूक्ष्म कण का नाम ‘बोसॉन’ रखा गया हो, उस व्यक्ति को नोबेल पुरस्कार न मिलना अपने आप मे कई प्रश्न खड़े करता हैं.
वर्तमान में अधिकांश वैज्ञानिकों का मत है की बोस- आइंस्टीन सांख्यकी सिद्धांत का जितना प्रभाव क्वांटम फिजिक्स में है उतना तो शायद हिग्स बोसॉन का भी नहीं होगा.
मां भारती के यह वीर सपूत जिसने भारत की मेधा का पूरे विश्व में लोहा मनवाया था वो आखिरकार 4 फ़रवरी 1974 को पंचतत्व में विलीन हो गया.