‘हम धार्मिक हैं, इसीलिए पंथ निरपेक्ष हैं’
   दिनांक 01-जनवरी-2019
दुनिया को यदि विनाश से बचना है तो उसे भारत की शरण लेनी होगी। हम सर्वे भवंतु सुखिन: की बात करते हैं। दुनिया को हिंदुओं से सीखना चाहिए कि परिवार कैसे चलता है
युवा कुंभ में अपने विचार रखते डॉ कृष्ण गोपाल 
कुम्भ में स्नान कर गंगा जल को साथ ले जाना, आध्यात्मिक साधना और चिंतन की हमारे समाज में परम्परा रही है। समाज की समरसता भविष्य की दिशा निर्धारित करती थी। यह मूल भावना गत 700 वर्षों में जैसे विलुप्त होने लगी। हमारा देश और समाज किस परिस्थिति में है। पूर्व में कैसा था। यह समाज और देश भविष्य की कौन-सी दिशा और कौन-से महान लक्ष्य की ओर धीरे-धीरे आगे बढ़ेगा। हमारा देश विश्व पटल पर महान देश था। इसकी ख्याति अभूतपूर्व थी। समय बदला, बारहवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक देश पर कई आक्रमण हुए। हम सम्पन्न देश से गरीब देश हो गए। हमारा देश, विश्व की आर्थिक व्यवस्था में 30 प्रतिशत का हिस्सेदार था। वह हिस्सेदारी घट कर 1 प्रतिशत पर आ गई। आक्रमणकारियों ने देश को बर्बाद कर दिया। इस देश के संतों ने आध्यात्मिकता की प्रज्ञा को जगाया। गुरुनानक, मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु ने इस देश को मुक्त कराने के लिए आवाज उठाई। लंबे संघर्ष के बाद 1947 में देश स्वतंत्र हुआ। उस समय आशंका जताई गई थी कि यह देश टिकेगा नहीं। चर्चिल कहते थे, अगर भारत को छोड़ देंगे तो भारत बिखर जाएगा। आज ‘यू. के.’ में विभाजन की आवाज उठती है। पाकिस्तान टूट गया। हमारा भारत देशएक है। इसकी आध्यात्मिक धारा इसका आधार है।
आध्यात्म और धर्म की आधार शिला पर हमारा भारत एक है। प्रयाग की धरती पर करोड़ों लोग विश्व भर से आते हैं, अर्थाभाव के बावजूद भी गंगा तट पर आते हैं। उसका आधार आध्यात्म है। इतनी बड़ी संख्या में एक स्थान पर पूरी दुनिया के कोने-कोने से लोग आध्यात्मिक ताकत के कारण आते हैं। उसी आध्यात्मिकता का भाव लेकर हम युवा कुम्भ में आए हैं। देश जिस समय पराधीन था, उस समय हमारे शिक्षण संस्थानों को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया गया। बहुत कुछ अनर्थ कर दिया गया। उस समय लोकमान्य तिलक, महामना मदनमोहन मालवीय, विपिन चन्द्र, लाला लाजपत राय, रवीन्द्र नाथ टैगोर ने देश में आध्यात्मिक भाव जगाया। 1947 में जब देश स्वतन्त्र हुआ था तब अंग्रेजों की कुटिलता के कारण देश गरीब हो चुका था। 33 करोड़ आबादी वाले इस देश के पास खाने को पर्याप्त अनाज नहीं था। तब शास्त्री जी ने एक नारा दिया था-एक समय उपवास रखने के लिए। आज देश का किसान उठ कर खड़ा हो गया है। आज 135 करोड़ लोगों के लिए इस देश में अन्न पैदा होता है। इतना ही नहीं हम 4 करोड़ टन अनाज निर्यात करते हैं। आज देश स्वावलंबन की तरफ बढ़ रहा है। प्रबंधन का क्षेत्र हो, विज्ञान का क्षेत्र या फिर सैन्य क्षेत्र हो भारत के युवाओं ने हर क्षेत्र में अपना परचम लहराया है।
अब भारत पिछड़ा और कमजोर देश नहीं रह गया है। पूरी दुनिया में बहुत तेजी से हो रहे विकास की दौड़ में भारत शामिल हो चुका है। मगर इसके साथ ही कुछ बातें हैं, जिन पर विचार करना आवश्यक है। एक तरफ जहां तेजी से विकास करता हुआ भारत है वहीं एक दूसरा भारत भी है, जिसमें गरीब लोग रहते हैं। यह संपन्न भारत और गरीब भारत, दोनों एक साथ रहने चाहिए और एक ही रहेंगे। हम हिन्दू हैं। हम आध्यात्मिक हैं। हम धार्मिक हैं। हम डॉक्टर, अभियन्ता, शिक्षक, व्यापारी या कृषक होंगे लेकिन हमारे अन्दर का व्यवहार बताता है कि हम हिन्दू हैं। जो आध्यात्मिक उन्नति और भौतिक उन्नति को साथ लेकर चलता है उसका नाम हिन्दू है। हम हजारों वर्षों से पंथनिरपेक्ष हैं। हम धार्मिक हैं। इसलिए पंथनिरपेक्ष हैं। हमारी धार्मिक भावना ही हमें पंथनिरपेक्ष बनाती है। वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवन्तु सुखिन:, ये दोनों बातें हमारे अन्दर हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम हिन्दू हैं। हम ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ की बात करते हैं। अगर दुनिया विनाश से बचना चाहती है तो भारत की शरण ले। हिन्दुओं से सीखो परिवार कैसे चलता है। अलग भाषा और अलग संस्कृति के लोग यहां पर मिल-जुलकर रहते हैं।
(रा.स्व.संघ के सह सरकार्यवाह द्वारा युवा कुंभ में दिए गए उद्बोधन के अंश)