रफाल और राहुल का पूरा चिट्ठा
   दिनांक 10-जनवरी-2019
ऑगस्टा वेस्टलैंड हैलिकॉप्टर घोटाले के बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल के बयानों में “श्रीमति गाँधी”,”सन आर (Son R)”, “माँ-बेटा”, “इटली”, “इतालवी महिला का बेटा” “बेटा जो पीएम बनने वाला है”...आदि का जिक्र आ रहा है | नेशनल हैराल्ड का फंदा भी धीरे-धीरे कस रहा है | खानदान में खलबली है | “रफाल घोटाले” के हवाई किले के पीछे दुबकने की बेचैन कोशिशों ने संसद और अदालत का मज़ाक बनाया | सब तरफ कीचड़ उछालने में जुटे युवराज और उनके दरबारी |
एक कहावत है कि अगर आप लोगों को सहमत नहीं कर सकते तो उन्हें भ्रमित कर दो | एक और प्रसिद्ध वाक्य है हिटलर के प्रचारमंत्री गोयबल्स का कि “एक झूठ को सौ बार बोलो तो वो सच बन जाता है|” ये दोनों वाक्य राहुल गाँधी की चुनावी रणनीति का सार हैं| वो बेचैन भी हैं क्योंकि पुराने घोटालों की जाँच की आँच उन तक पहुँच रही है| उनका पूरा खानदान किसी न किसी संगीन आरोप की गिरफ्त में है| हाल ही में जो मामला धीरे-धीरे सुर्ख हो रहा है वो है ऑगस्टा वेस्टलैंड हैलिकॉप्टर घोटाला, जो यूपीए सरकार के समय हुए अनेक घोटालों में से एक था | इस खरीद में 250 करोड़ की घूस खाए जाने के गंभीर आरोप हैं| मार्च 2013 में तत्कालीन रक्षामंत्री एके एंटनी ने मीडिया के सामने स्वीकारा था कि ऑगस्टा वेस्टलैंड खरीद में रिश्वत ली गई है| दिसंबर 2018 में इस घोटाले का मुख्य गवाह क्रिश्चियन मिशेल भारत की जाँच एजेंसियों के हाथ लग गया| अब मिशेल ने जाँच एजेंसियों के सामने राज़ उगलने शुरू कर दिए हैं | उसके बयानों में “श्रीमति गाँधी”,”सन आर (Son R)”, “माँ-बेटा”, “इटली”, “इतालवी महिला का बेटा” “बेटा जो पीएम बनने वाला है”...आदि का जिक्र आ रहा है|
लेकिन संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस और संसद के बाहर कांग्रेस के शाही परिवार द्वारा पोषित प्रचार तंत्र रफाल पर हो-हल्ला मचा रहा है| रफाल जिस पर सर्वोच्च न्यायालय भी मोदी सरकार के पक्ष में फैसला सुना चुका है| रफाल, जिस पर राहुल गाँधी ने सिर्फ आरोप लगाए, सबूत एक भी पेश नहीं किया| जो दलीलें, वो प्रस्तुत कर रहे हैं, उन दलीलों को देश की सबसे बडी अदालत “व्यक्तिगत सोच” कहकर खारिज कर चुकी है| रफाल, जिसकी फाइल को कांग्रेस सरकार (यूपीए-मनमोहन सिंह सरकार ) दस साल लटकाए रही, और सत्ता के आखिरी साल में कह दिया कि “हमारे पास रफाल खरीदने के लिए पैसा नहीं है (एके एंटनी, 2014)” इस बीच, जब कांग्रेस के सांसद सदन में हंगामा कर रहे रहे थे, तभी एक और खुलासा हुआ| मीडिया के हाथ कुछ दस्तावेज लगे जिससे क्रिश्चियन मिशेल के तार रफाल से भी आ जुड़े| पता लगा कि यूपीए के जमाने में मिशेल प्रयास कर रहा था कि रफाल समझौता न हो पाए, और भारत रफाल विमान की जगह यूरोफाइटर टायफून खरीदे| इस तरह मिशेल द्वारा ऑगस्टा वेस्टलैंड के संबंध में लिए जा रहे नाम “श्रीमति गाँधी”,”सन आर (Son R)”, “माँ-बेटा”, “इटली” आदि के सूत्र रफाल से भी आकर जुड़ने लगे हैं| उधर राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस-उसके साथी दल और उनका तंत्र, रफाल को घोटाला साबित करने में जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं| इसलिए, रफाल की परत दर परत का विश्लेषण आवश्यक हो गया है| ताकि पिछले 18 सालों की सचाई सामने आ सके| 6 जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अदालत को बताया कि मिशेल ने यूपीए सरकार के दौरान हुए अन्य रक्षा सौदों में भी दलाली खाई है| मिशेल को देख-देखकर खानदान का जी मचल रहा है| उधर नेशनल हैराल्ड की तलवार सर पर लटकी हुई है|
बिना जवाबदेही : दागो और भागो
राहुल राफाल को लेकर सरकार पर आरोप लगा रहे हैं| कानों में उंगली दिए आरोप दुहरा रहे हैं| चीख रहे हैं| उनका साथ देने खडे हुए है कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और पत्रकार, जो अपने युवराज से आरोपों का आधार नहीं माँगते बल्कि उन्हें अपने स्तंभों और वीडियो ब्लाग्स से प्रचारित करने में सहयोग देते हैं| अपने राजनैतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत उनके सहयोगी दलों के नेता भी कांग्रस अध्यक्ष के पीछे आ खड़े हुए हैं|
इतिहास गवाह है कि राहुल की कोई जवाबदेही नहीं है| शुरू से ही, वो आरोपों की राजनीति करते आए हैं| याद करें , जब वो किसान आंदोलन करने उत्तरप्रदेश के भट्टापारसौल पहुँचे थे| देशभर के मीडिया कैमरों के सामने राहुल एक गड्ढे के किनारे जम गए और बोले कि “यहाँ दर्जनों लाशें गड़ी हुई हैं|” क्रेन लाई गई| खुदाई शुरू हुई| लाशें तो छोडिए, हड्डी का टुकड़ा भी नहीं निकला| फिर राहुल ने कहा कि पुलिस ने कई महिलाओं के साथ बलात्कार किया है| मीडिया ढूँढता रहा| इलाके में कोई ऐसी महिला नहीं मिली| जिन महिलाओं को अत्याचार का शिकार बताया गया वो राहुल के दावों पर खुद ही आश्चर्यचकित थीं| पर राहुल बेलौस थे| ऐसी घटनाओं के सिलसिले हैं|
रफाल मामले में भी राहुल यही कर रहे हैं| वो संसद में खड़े होकर कहते हैं कि “मोदी जी के दबाव में रक्षा मंत्री झूठ बोल रही हैं| मेरी फ़्रांस के राष्ट्रपति से बात हुई| उन्होंने बतलाया कि रफाल सौदे में कीमत की गोपनीयता की कोई शर्त नहीं है|” तत्काल फ्रांस सरकार का बयान आता है कि राहुल गाँधी से राष्ट्रपति की ऐसी कोई बात नहीं हुई है और कीमत को गुप्त रखना सौदे का हिस्सा है| वो हर शहर में रफाल का अलग-अलग दाम बतलाते हैं | राहुल लोकसभा में खड़े होकर एक टेप चलाने की बात करते हैं जिसमें पूर्व रक्षामंत्री मनोहर परिकर की आवाज होने का दावा करते हैं | जब लोकसभा अध्यक्ष उनसे उस टेप की विश्वसनीयता की जिम्मेदारी लेने को कहती हैं तो वो पीछे हट जाते हैं| वो लोकसभा में रफाल पर बहस की माँग करते हैं और जब बहस शुरू होती है तो उनके नेतृत्व में कांग्रेस के सांसद रक्षा मंत्री और वित्तमंत्री का उत्तर सुनने के स्थान पर शोरशराबा करते हैं और कागज़ के जहाज उड़ाते हैं| रोकने पर स्पीकर से बहस करते हैं| वो बेधड़क झूठ बोलते हैं और प्रधानमंत्री को ‘झूठा’ कहते हैं| वो लगातार अजीबोगरीब बातें भी करते हैं, पर इससे उनकी असत्य भाषण की क्षमता पर संदेह नहीं करना चाहिए | वो झूठ बोलते हैं और फिर उसके पीछे पूरा प्रयास, पूरा जोर लगाते हैं | रफाल मामला भी प्रयास है एक मोदी सरकार के विरुद्ध एक फर्जी घोटाला गढ़ने का, जिसे लेकर वो और उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव में जा सकें|
ऐसा ही प्रयास था अटल सरकार के ऊपर कीचड उछालने वाला कारगिल शहीद ताबूत घोटाला| पत्रकारों एक्टिविस्टों और नेताओं के घालमेल से उपजा एक शिगूफा| जिसमें न्यायालय में अटल सरकार निर्दोष साबित हुई, पर कब? अक्टूबर 2015 में | आरोप लगाने वाले अपना मकसद हासिल कर चुके थे| आज,रफाल, जो राहुल गाँधी की यूपीए सरकार का एक शर्मनाक अध्याय है, उसे राहुल मोदी का अपराध बतलाने में जुटे हैं|
एक आपराधिक देरी
कारगिल युद्ध के बाद भारत की वायु सेना को नयी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की आवश्यकता महसूस हुई | 2001 में अटल सरकार ने इस प्रक्रिया को शुरू किया | इस तरह के सौदे तत्काल नहीं होते | कुछ समय लगता है | क्योंकि लड़ाकू विमान बिकने के लिए तैयार रखे नहीं होते | लम्बी बातचीत और मोलभाव होता है | फिर विमानों का निर्माण प्रारंभ होता है | विमानों की आपूर्ती होते होते कई साल लग जाते हैं | इसलिए आवश्यक होता है कि समझौता जल्द से जल्द किया जाए | 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बनी | और अगले दस वर्षों तक विमानों की खरीद के मामले में कोई समझौता नहीं हुआ |
इस बीच पाकिस्तान ने अपनी वायुसेना की क्षमता बढ़ा कर दोगुनी कर ली और चीन ने 400 नए आधुनिक लड़ाकू विमान अपनी वायुसेना में जोड़ लिए जिसमें चौथी पीढ़ी के जे-10, जे-11, जे-16 जैसे विमान और पांचवी पीढ़ी के स्टेल्थ बमवर्षक शामिल हैं , जिन्हें रडार पकड़ नहीं पाता | इधर भारत की वायुसेना दूसरी और तीसरी पीढ़ी के विमानों और उनकी भी घटती संख्या के कारण बुरे हाल में बनी रही और सरकार से तत्काल कम से कम दो स्क्वाड्रन ( 36 विमान ) तत्काल खरीद कर देने की याचना करती रही | लेकिन उसे एक विमान भी नहीं मिला | पुराने विमान सेवा के बाहर होते गए | और इन दस सालों में वायुसेना की 42 स्क्वाड्रन घट कर 33 रह गयीं | इसके चलते आज वायुसेना की स्थिति चिंताजनक है और राहुल गाँधी पूछ रहे हैं कि मोदी जी को रफाल का सौदा करने की ऐसी जल्दी क्या थी|
 
“आपकी डील !... कौनसी डील ?”
राहुल गाँधी लगातार चिल्ला रहे हैं कि “हमारी डील मोदी जी की डील से बेहतर थी |” सच्चाई ये है कि राहुल गाँधी की यूपीए सरकार ने कोई समझौता (डील) किया ही नहीं था | सरकारी दस्तावेज में उनकी दावे की पुष्टि करने वाला एक भी कागज नहीं है | रक्षा बातचीत और रक्षा सौदे में अंतर होता है | राहुल गाँधी की यूपीए सरकार 10 साल तक सिर्फ बातचीत करती रही | परिणाम ये है कि आज ( 2001 से अब तक ) जनवरी 2019 में 18 सालों बाद भी वायुसेना खाली हाथ है | जबकि मोदी सरकार के 2016 के रफाल समझौते के फलस्वरूप सितम्बर 2019 से रफाल लड़ाकू विमानों की आपूर्ति शुरू हो जाएगी | फिर भी राहुल गाँधी बोले जा रहे हैं कि उनकी डील बेहतर थी | यानि कि ‘हमने जो आलू नहीं खरीदे वो आपके द्वारा खरीदे गए आलू से बेहतर है’ | ऐसी बयानबाजी कर के राहुल वोटों की सुनहरी फसल काटने का ख्वाब देख रहे हैं |
18 राहुल जी ! 126 नहीं.....
राहुल गाँधी और कांग्रेस बार-बार कह रहे हैं कि “हम 126 विमान खरीदने वाले थे | मोदी जी सिर्फ 36 क्यों खरीद रहे हैं ?” यह सरासर झूठ है | यूपीए सरकार मात्र 18 विमान खरीदने की बात कर रही थी | शेष 108 विमान एच.ए.एल(हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड) के द्वारा बनाए जाने को लेकर चर्चा हुई और प्रस्ताव रद्द हो गया | यहाँ एक और बात ध्यान देने की है कि एच.ए.एल यूपीए सरकार के दौर में ही रफाल समझौते से बाहर हो चुका था | पर राहुल गाँधी के अन्दर इतना दुस्साहस है कि वो एच.ए.एल के संस्थान में जाकर वहां के कर्मचारियों के बीच में भाषणबाजी करते हैं कि “रफाल आपका हक़ है जिसे मोदीजी ने आपसे छीन लिया |”
एच.ए.एल पर घडियाली आँसू
जब रफाल बनाने वाली फ्रेंच कंपनी दसौं के साथ बातचीत शुरू हुई तो प्रस्ताव रखा गया कि 18 रफाल विमान दसौं बना कर दे, शेष विमानों के निर्माण के लिए एच.ए.एल को तकनीक का स्थानान्तरण (टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर) किया जाए | लेकिन दो महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर जाकर बात अटक गई | एक, एच.ए.एल के पुराने प्रदर्शन को देखते हुए दसौं उसके साथ समझौता करने के लिए इच्छुक नहीं थी | सन 2012-13 में इस आशय के समाचार अनेक अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए | दसौं ने साफ़ कह दिया कि (अगर समझौता होता है तो ) वो एच.ए.एल द्वारा निर्मित किये गए शेष 108 विमानों की गारंटी नहीं लेगी| दूसरा मुद्दा समय को ले कर था | एच.ए.एल रफाल विमानों के निर्माण के लिए 2.7 गुना अधिक समय मांग रहा था | लगभग पौने तीन गुना समय बढ़ने से इस महंगे रक्षा सौदे की कीमत असाधारण रूप से बढ़ जाती | फलस्वरूप 2013 के पहले ही एच.ए.एल रफाल-बातचीत से बाहर हो गया | इसीलिए जब 2015 में मोदी सरकार ने पुनः नए सिरे से रफाल सौदे की बातचीत प्रारंभ की तो स्वाभाविक रूप से एच.ए.एल उस बातचीत का हिस्सा नहीं था | राहुल गाँधी के द्वारा “एच.ए.एल का हक़ छीनने” की बात सफ़ेद झूठ है |
36 विमानों का फौरी महत्व
कांग्रेस सवाल उठा रही है कि सरकार 36 विमान ही क्यों खरीद रही है, जबकि आवश्यकता 126 की है | सच्चाई ये है कि सरकार वायुसेना को 229 नए लड़ाकू विमान देने जा रही है , जिनमे 110 स्वदेश निर्मित होंगे | शेष के लिए प्रक्रिया जारी है | अब 36 विमानों का गणित समझते हैं | 36 विमान वायुसेना की न्यूनतम आवश्यकता हैं| 36 विमानों का अर्थ होता है 2 स्क्वाड्रन | जब जब सुरक्षा तैयारी की दृष्टि से आपात स्थिति बनी है तब वायु सेना ने न्यूनतम दो स्क्वाड्रन की (तत्काल) मांग रखी है | (दुर्भाग्य से ऐसी आपात स्थिति अक्सर बनी रही है )1982 में पाकिस्तान अमरीका से एफ-16 लड़ाकू जहाज खरीद रहा था , तब वायुसेना की मांग पर रूस से मिग-23 के दो स्क्वाड्रन खरीदे गए| फिर 1985 में चीन-पाकिस्तान की बढ़ती मित्रता और सियाचिन में जारी संघर्ष को देखते हुए फ़्रांस से मिराज-2000 के दो स्क्वाड्रन खरीदे गए | 1987 में रूस से फिर दो स्क्वाड्रन खरीदे गए | यही 2016 में मोदी सरकार ने भी किया| वायुसेना प्रमुख धनोआ ने भी पत्रकार वार्ता में इस सौदे पर संतोष जतलाया है|
 
कहाँ से आया 526 का आंकड़ा ?
राहुल गाँधी ने लोक सभा में बयान दिया कि हम 526 करोड़ का रफाल हवाई जहाज खरीदने वाले थे मोदी सरकार उसे1600 करोड़ में खरीद रही है | सच्चाई यह है रफाल विमान की 526 करोड़ कीमत यूपीए समय के सरकारी दस्तावेजों में कहीं नहीं है | वास्तव में राहुल गाँधी जनता को तकनीकी जटिलताओं का फायदा उठा कर बरगलाना चाहते है | रक्षा सौदों की प्रक्रिया बड़ी जटिल होती है | आवेदन बुलाए जाते हैं , कई-कई समितियां बनती हैं | सभी समितियों से अनुमति मिलने के बाद और लम्बी बातचीत के बाद सौदे पर हस्ताक्षर होते हैं |
2007 में दसौं की तरफ से जो पहला प्रस्ताव आया था, उसमें एक विमान का आधार मूल्य (बेस प्राइस) 526 करोड़ बताया गया था | इसे ही पकड़ कर राहुल गाँधी 526 करोड़ दोहराते रहते हैं ( जब भूल जाते हैं अलग-अलग दाम भी बताते रहते हैं )| वास्तव में विमान की कीमत साल-दर साल बढ़ती जाती है , जिसे वृद्धि मूल्य ( एस्केलेशन प्राइस ) कहते हैं | अगर 2007 में ही 526 करोड़ में सौदा तय हो जाता तो उस सौदे के अनुसार वृद्धि मूल्य के चलते आज वो विमान 737 करोड़ का पड़ता | जबकि मोदी सरकार के किये गए समझौते के अनुसार एक विमान 670 करोड़ का पड़ रहा है, यानि प्रति विमान 67 करोड़ की बचत हुई है|
1600 करोड़ कीमत है क्योंकि ...
कांग्रेस अध्यक्ष बार बार बयान दे रहे हैं कि विमान की कीमत 1600 करोड़ कैसे हो गयी | मानो ये कॉमनवेल्थ खेल घोटाला (2010) हो, जहाँ 1000 रूपए की कुर्सी को 8300 रूपए में किराय पर लिया गया और 4-4 हजार के नैपकिन खरीदे गए थे | लड़ाकू विमान की दो कीमत होती है – एक सिर्फ विमान की कीमत,याने आधार मूल्य अथवा बेस प्राइस, जो 670 करोड़ प्रति रफाल विमान तय हुई है | दूसरी कीमत होती है विमान की वारंटी, रखरखाव, अपनी जरूरत के हिसाब से विमान में तकनीकी परिवर्तन, विमान में लगने वाले मिसाइल-बम इत्यादि और वृद्धि मूल्य (एस्केलेशन प्राइस) | वृद्धि मूल्य या एस्केलेशन प्राइस का अर्थ होता है कि हर साल विमान का मूल्य बढेगा| याने आने वाली हर खेप के साथ विमान का मूल्य बढ़ता जाता है| वैसे ही जैसे हर साल मकान-दुकान का किराया बढ़ जाता है| इन सबको मिलाकर अंतिम कीमत तय होती है|
नए समझौते में 100-500 कि.मी तक मार करने वाली मेटिओर तथा स्कैल्प मिसाइलें भी शामिल हैं | इसे ब्रम्होस मिसाइल दागने के लिए भी तैयार किया जा रहा है | अन्य भी अनेक बारीकियाँ हैं जिनका खुलासा नहीं किया गया है | इन सब को मिला कर विमान की कीमत लगभग 1600 करोड़ ( बेस प्राइस 670 करोड़) पहुँचती है | सरल शब्दों में कहें तो एक खाली प्लाट की कीमत और भवन सहित प्लाट की कीमत में जो अंतर होता है वही अंतर रफाल के आधार मूल्य (बेस प्राइस) और अंतिम कीमत (1600 करोड़) में है | वायुसेना प्रमुख ने सौदे की प्रशंसा करते हुए कहा “हमें विमान के साथ बहुत अच्छी पैकेज डील मिली है| बहुत अच्छे सेंसर, इलेक्ट्रोनिक उपकरण इसमें लगे हैं| विमान जल्दी मिलेगा| रखरखाव की शर्त भी पहले से बेहतर है और हमें ज्यादा वारंटी मिली है|”
आलू-गोभी नहीं गोभी-आलू चाहिए....
किसी भी तरह बात बनती न देख कांग्रेस ने नए-नए आरोप उछालने शुरू कर दिए | नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड्गे ने कहा कि ये सौदा करने में सरकार ने बैंक गारंटी अथवा स्वायत्त (सॉवरेन) बैंक गारंटी क्यों नहीं ली | सीधी सी बात है, जब समझौता दो सरकारों के बीच हो रहा है और जिस देश से हमारे पुराने आर्थिक, राजनैतिक और सामरिक सम्बन्ध हैं, वहां ऐसी गारंटी का औचित्य है क्या?
फ़्रांस सरकार हमारा पैसा ले कर भाग जाएगी क्या ? भारत ने रूस और अमरीका के साथ भी ऐसे ही समझौते किये हैं | कहीं पर भी बैंक गारंटी नहीं मांगी गयी है | इस प्रकार की हास्यास्पद बातें कहने के पीछे उद्देश्य है कि कुछ न कुछ नुक्ताचीनी जारी रखी जाए और बातों को इस ढंग से कहा जाए कि देश की जनता को लगे सरकार ने कोई नियम विरुद्ध कार्य किया है|
न्यायालय के फैसले को तोड़मरोड़ कर मामले को ज़िंदा रखने की जद्दोजहद जारी है| अदालत ने कहा कि विमान की कीमत तय करना हमारा काम नहीं है | इसके साथ उसने ये भी कहा कि वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों और सम्बंधित लोगों से बात करके अदालत संतुष्ट है| कीमत से भी| लेकिन कांग्रेस पार्टी के नेता दावा कर रहे हैं कि अदालत ने विमान की कीमत को लेकर संशय बतलाया है| याने आलू-गोभी की सब्जी परोसी गई तो ‘हमें गोभी-आलू चाहिए’ कहकर झगडा शुरू कर दिया|
सुप्रीमकोर्ट से बड़ी जेपीसी ?
न्यायालय से निराश कांग्रेस पार्टी अब संयुक्त संसदीय समिती (जॉइंट पार्लियामेंट्री कमिटी) बना कर सौदे की जांच की मांग कर रही है | जेपीसी अर्थात कांग्रेस समेत अन्य दलों के सांसदों की एक समिति | इसके पीछे कांग्रेस की योजना है कि जेपीसी रफाल मामले की समीक्षा करे और समिति में शामिल कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के सांसद रफाल मामले पर सरकार पर कीचड़ उछालते रहें ताकि रफाल मामले पर हंगामा चलता रहे | क्या सांसदों के किसी समूह की योग्यता सर्वोच्च न्यायालय और सीएजी (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) से अधिक है ?
 
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली है और सर्वोच्च न्यायालय ने दो टूक फैसला सुना दिया है | रफाल मामले पर फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हमने रफाल के तीन आयामों – कीमत, खरीद प्रक्रिया और ऑफसेट साझेदारी का गहराई से अध्ययन किया और पाया कि इसमें कोई हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है ( पैरा 34 ) | पैरा 33 में न्यायालय कहता है कि रफाल के ऑफसेट साझेदार चुनने में सरकार की भूमिका साबित नहीं होती | पैरा 26 में कहा गया है कि हमने आधार-मूल्य ( बेस प्राइस ), वृद्धि मूल्य ( एस्केलेशन कॉस्ट ) और मूल प्रस्ताव ( आरएफपी ) को देखा| वस्तुवार कीमत को भी देखा | कोर्ट ने कहा कि हमने पहले तय किया कि दाम को नहीं देखेंगे | बाद में अपनी अंतरात्मा को संतुष्ट करने के लिए हमने दाम माँगा | सरकार ने हमें मुहरबंद लिफ़ाफ़े में दाम दिया | हमने पढ़ा | पढ़ने के बाद लगा कि हमें इस मामले में हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है|
दस्तावेजों के आधार पर कोर्ट ने बताया कि विभिन्न समितियों की 74 बैठकों के बाद रफाल सौदे पर हस्ताक्षर हुए हैं | कीमत को गुप्त रखने के सवाल पर न्यायालय ने कहा कि साक्ष्य बतलाते हैं कि सरकार ने बेसिक प्राइस के अलावा कीमत का विवरण किसी को भी नहीं बतलाया है | संसद को भी नहीं क्योंकि इस से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है | इसके लिए भारत और फ़्रांस के बीच गोपनीयता अनुबंध भी है | इस तरह कोर्ट ने गोपनीयता अनुबंध पर भी अपनी मुहर लगायी है |
जहाँ तक जेपीसी का सवाल है बोफोर्स घोटाले की जांच के लिए भी एक कमेटी बनाई थी जिसने ये तो माना था कि पैसे का लेनदेन हुआ है पर इसे घोटाला मानने से इनकार कर दिया था |
रिलायंस पर राहुल का झूठ
सबसे ज्यादा हल्ला रिलायंस कंपनी और उसके मालिक अनिल अम्बानी को ले कर मचाया गया | राहुल गाँधी प्रधानमन्त्री पर बार-बार अनिल अम्बानी को लाभ पहुचने का आरोप लगा रहे हैं | जरा ध्यान से देखने पर पता चलता है कि सारा मामला शब्दों की जालसाजी का है | पहले ऑफसेट पार्टनर का मतलब समझना होगा | जब एक देश कोई बहुत बड़ा सौदा करता है (विमान क्रय अथवा कुछ अन्य), तो वो सामने वाली कंपनी के सामने शर्त रखता है कि सौदे की कीमत की 30-40 प्रतिशत खरीद देशी कंपनियों से की जाए, ताकि देशी कंपनियों को भी इस बड़े सौदे का लाभ मिले, देश की अर्थव्यवस्था को फायदा हो और जो पैसा देश से बाहर जा रहा है उसकी कुछ भरपाई हो सके | ये खरीद किसी भी चीज़ की हो सकती है | भले ही उस सामग्री का विमान निर्माण से कोई लेना देना न हो |
 
मोदी ने दसौं के साथ समझौते में 50 % ऑफसेट साझेदारी का अनुबंध किया | अर्थात सौदे की कुल रकम के आधे के बराबर, 29 हजार करोड़ मूल्य की खरीददारी दसौं को भारतीय कंपनियों से करनी होगी | इनमें से कोई भी कंपनी विमान नहीं बनाएगी, केवल माल आपूर्ति करेगी | दसौं ने ऐसी 100 कंपनियों की सूची बनाई है | उनमें से एक कंपनी अनिल अम्बानी की रिलायंस है, जिसके हिस्से में 3% माल आपूर्ति का अनुबंध आया है, जो लगभग 800 करोड़ होता है | शेष 27,200 करोड़ की आपूर्ति अन्य भारतीय कम्पनियाँ करने वाली हैं जिनमें सेमटेल, एचसीएल, एलएंडटी, टीसीएस, टाटा एडवांस सिस्टम्स, गोदरेज एंड बॉय, आइबीएम इंडिया, विप्रो इन्फ्रा स्ट्रक्चर्स, महिंद्रा एयरो स्ट्रक्चर्स और सरकारी कंपनी बीईएल आदि हैं | इन कंपनियों में टाटा, गोदरेज, विप्रो, महिंद्रा जैसे सभी बड़े नाम हैं |इन सभी को दसौं कंपनी ने ही चुना है | लेकिन एक अनिल अम्बानी का नाम ले कर ये दुष्प्रचार किया जा रहा है कि (उन्हें माल आपूर्ति का नहीं बल्कि) विमान निर्माण का ठेका मिला है और उन्हें तो लड़ाकू जहाज निर्माण का कोई अनुभव ही नहीं है|
सौदे की शर्तों को देखने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी पुष्टि की है कि ऑफसेट कंपनियों को चुनने का अधिकार दसौं के पास था | लेकिन भ्रम फैलाने के लिए टाटा, गोदरेज, विप्रो, महिंद्रा जैसे दिग्गजों के नाम छिपा कर सिर्फ अनिल अम्बानी का नाम उछाला जा रहा है और आपूर्तिकर्ता के रूप में पात्रता पर सवाल उठाए जा रहे हैं | मीडिया में जिस तथ्य की बहुत कम चर्चा हुई है वो ये है कि अनिल अम्बानी की कंपनी भारतीय नौसेना के लिए पांच गश्ती जहाज और भारतीय तटरक्षक के लिए 14 तीव्र गति वाले गश्ती जहाज बना रही है | इसके अलावा दुनिया के सबसे विशाल और शक्तिशाली अमरीकी नौसेना के 7वें बेड़े के 100 से भी अधिक जहाजों का हिन्द महासागर क्षेत्र में रखरखाव करने वाली कम्पनी भी रिलायंस है |
राहुल गाँधी बार-बार फ़्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद के बयान का हवाला देते हैं जिसमें ओलांद ने कहा है कि मोदी सरकार ने अम्बानी को ठेका देने के लिए कहा था | ओलांद के इस बयान का फ़्रांस की वर्तमान सरकार खंडन कर चुकी है | इसके अलावा दसौं के सीइओ एरिक ट्रेपियर ने भी ओलांद के बयान का खंडन करते हुए कहा है कि जैसे कंपनी ने 100 अन्य भारतीय कंपनियों को चुना, वैसे ही रिलायंस को भी चुना | ट्रेपियर ने बताया कि रिलायंस से दसौं का संपर्क 2011-12 में हुआ | तब न ओलांद फ़्रांस के राष्ट्रपति थे और न ही मोदी भारत के प्रधानमन्त्री | कहने का आशय यह कि गुजरात के सीएम रहते न तो मोदी दबाव बना सकते थे और न ही ओलांद (तब) किसी पद पर थे थे | एक और तथ्य ट्रेपियर के इस बयान की पुष्टि करता है | इकॉनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार अनिल अम्बानी के भाई मुकेश अम्बानी यूपीए सरकार के दौरान ही रफाल सौदे का हिस्सा बनने की दौड़ में थे | बाद में उनके भाई अनिल अम्बानी इसका हिस्सा बने |
सो, अंबानी की स्लेट तो साफ़ है, इसके उलट (यूपीए शासनकाल के दौरान रफाल की ऑफसेट साझेदारी के तार गांधी परिवार के दामाद रॉबर्ट वाड्रा से जरुर जुड़ते हैं | कई प्रमुख समाचार माध्यमों में प्रकाशित समाचारों के अनुसार भारत सरकार द्वारा ब्लैक लिस्टेड और भगोड़ा, हथियारों का दलाल संजय भंडारी रॉबर्ट वाड्रा का मित्र है, जो देश-विदेश में वाड्रा के साथ दिखाई देता रहा है , जो वाड्रा के लिए हवाई जहाज के टिकट खरीदता आया है | ख़बरों के अनुसार भंडारी की कंपनी ओआईसी इस दौड़ में शामिल थी | भाजपा ने आरोप लगाया है कि भंडारी को दलाल के रूप में सौदे में जगह दिलाने के लिए ही यूपीए सरकार ने रफाल डील को लटकाए रखा |
शक की गुंजाइश बनती भी है | 2007 में लड़ाकू विमान खरीदी के लिए टेंडर बुलाए गए | जरूरत के मुताबिक़ 2 विमान- रफाल और यूरो को लेकर बात आगे बढ़ी | सरकार की सभी कमेटियों और वायुसेना ने रफाल को चुना | साल 2012 में फाइल मंजूरी के लिए तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी की मेज पर आ गयी | सारी मंजूरियाँ मिल चुकी थीं, लेकिन मामले को फिर लटका दिया गया| एंटनी ने रफाल की फाइल पर नोट लिखा कि रफाल खरीदी को तो मंजूरी दी जाती है लेकिन रफाल मंजूरी की प्रक्रिया को रद्द किया जाता है | अर्थ ये हुआ कि ‘ हमें सामान तो पसंद आया पर सामान को पसंद करने की प्रक्रिया को हम रद्द करते हैं|’ ऐसे विचित्र तौर तरीकों के द्वारा रफाल की खरीद को लटका कर रखा गया | जबकि देश की सुरक्षा की स्थिति गंभीर से गंभीर होती जा रही थी |
‘हाल’ का ये हाल किया है आपने :
एच.ए.एल. (हाल) के लिए कांग्रेस अध्यक्ष घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं | 1940 में स्थापित एच.ए.एल. से अपेक्षा थी कि वो अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता का सामना करने योग्य बनेगा परन्तु वह भारतीय वायुसेना की जरूरतें पूरी करने में ही पिछड़ता रहा|
वायुसेना अध्यक्ष के शब्दों में “ जहाँ तक विमानों के निर्माण की बात है, हाल थोडा पीछे है| सुखोई विमानों पर हम (हाल) तीन साल पीछे हैं| जगुआर विमान निर्माण अपनी तय समय सीमा से 6 साल पीछे है| हलके लड़ाकू विमान निर्माण में भी हल 5 साल पीछे है|मिराज 2000 विमान को अपग्रेड करने में हाल दो साल पीछे चल रहा है| एक और विमान में हम 5 साल पीछे चल रहे हैं|” एच.ए.एल की समीक्षा के लिए बनी स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट में कहा गया की ‘कमिटी इस बात से निराश है कि स्थापना के तीन दशकों बाद भी एच.ए.एल. भारतीय मूल का लड़ाकू जहाज नहीं दे पाया है |’ एच.ए.एल द्वारा विकसित किया जा रहा पाँचवी पीढ़ी का लड़ाकू विमान एएमसीए भी सन 2032 में जाकर पहली उड़ान भर पाएगा, जबकि चीन पांचवीं पीढ़ी क दो लड़ाकू जहाज बना चुका है- चेंगदू जे -20 और शेनयांग एफसी- 31.
विकिलीक्स के खुलासों में भी एच.ए.एल. के खराब प्रदर्शन पर टिप्पणी की गई है | आज़ादी के बाद के छः दशकों में कांग्रेस सरकारों ने ‘हाल’ की बेहाली पर ध्यान नहीं दिया| यूपीए सरकार ने भी क्षमता बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया | न ही इन दस सालों में एक रूपए का निवेश किया, न ही उसकी क्षमता बढाने की कोई कवायद की |
लोकसभा में एच.ए.एल. के लिए किये गए मोदी सरकार के प्रयासों के बारे में बताते हुए रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन ने बयान दिया कि सरकार ने एच.ए.एल. की दशा सुधारने के लिए एक लाख करोड़ का ताजा निवेश किया है, जिसमें 50 हजार करोड़ के 83 तेजस लड़ाकू विमान, 15 लड़ाकू हेलिकॉप्टर... (35 - 44) शामिल हैं , जिसके फलस्वरूप एच.ए.एल. के क्षमता में वृद्धि हुई | जिस एच.ए.एल. ने 2014 तक सिर्फ 8 तेजस बनाए थे अब वही प्रतिवर्ष 16 तेजस विमान बना रहा है | राहुल गाँधी ने रक्षामंत्री के इस बयान को झूठा करार दिया तो रक्षा मंत्री ने एच.ए.एल. को दिए गए उपरोक्त आदेश की प्रति को सार्वजनिक कर दिया |
कीमत की गोपनीयता ज़रूरी है.....
राहुल गाँधी जानते हैं कि रफाल की कीमत को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता| आखिरकार वो दस साल सत्ता में रहे हैं, और यूपीए के समय भी रफाल की बातचीत में गोपनीयता की शर्त थी| न्यायालय ने भी इस बात की पुष्टि अपने फैसले में की है| फिर भी राहुल सरकार को भ्रष्ट ठहराने के लिए प्रधानमंत्री को बार-बार चुनौती दे रहे हैं कि वो रफाल की कीमत सार्वजनिक करके बताएं| ऐसा करते समय वो भारत के मित्र देश फ़्रांस की भी परवाह नहीं कर रहे जिसने इस सौदे में गोपनीयता की शर्त जुड़वाई है|
भारत और फ़्रांस दोनों ऐसा नहीं करेंगे| कीमत के बारे में मोटी-मोटी जानकारी तो सरकार ने दे दी है, अब और अधिक जानकारी देने का मतलब है ये बतलाना कि हम रफाल विमान पर अमुक-अमुक अस्त्र और अमुक-अमुक तकनीक लगाने जा रहे हैं जिसकी कीमत इतनी-इतनी है| तब हमारी तैयारियों के बारे में चीन और पाकिस्तान को पहले से ही पता चल जाएगा, और वो उसकी काट तैयार करने में जुट जाएँगे| राहुल जानते हैं कि मोदी ऐसा नहीं करेंगे इसलिए वो इसका फायदा उठा रहे हैं|
शस्त्रों की गोपनीयता का महत्व क्या होता है, इसके उदाहरण सैन्य इतिहास में भरे पड़े हैं| जब खाड़ी युद्ध हुआ तो सद्दाम हुसैन अमरीका को ख़म ठोंककर ललकार रहे थे| सद्दाम को अंदाज़ ही नहीं था कि अमरीका की तकनीक कितनी आगे है| वो अमरीका से ईराक के रेगिस्तान में निपटने का ख्वाब देख रहे थे| अमरीका की तैयारी कुछ और थी| अमरीका ने स्टेल्थ लड़ाकू जहाज विकसित कर लिए थे, जो दुनिया में केवल उसके पास थे| ये जहाज रडार की पकड़ में नहीं आते थे| जब हवाई हमला शुरू हुआ तो इराकी हैरान थे कि बम कहाँ स गिर रहे हैं क्योंकि उनके रडार पर कोई विमान नहीं दिख रहा था| इस युद्ध को देखकर चीनी सेना भी सकते में थी, और उसने तभी से चुपचाप स्टेल्थ तकनीक पर काम शुरू दिया| दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी के राकेट बमों के हमलों ने लन्दन को खंडहर बना दिया था| पानीपत के पहले युद्ध में बाबर ने भी तोपों का इस्तेमाल किया था जो 102 से 142 किलो तक के गोले दागती थीं, और जिन्होंने युद्ध में तहलका मचा दिया था| दुश्मन को चौंकाने की क्षमता युद्ध कला का महत्वपूर्ण अंग है| लेकिन राहुल जी को इससे क्या| वो सत्ता में लौटने को बेचैन हैं, किसी भी कीमत पर|
एक और बात समझने की है| फ्रांस भारत को सिर्फ हथियार नहीं बेच रहा है, वो भारत का सामरिक सहयोगी भी है| वो दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा हिन्द महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव स चिंतित है| फ्रांस समेत सभी यूरोपीय देश इस इलाके को चीन के प्रभाव से मुक्त रखना चाहते हैं, अन्यथा उनका व्यपार और उर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी| इसलिए वो हमसे सहयोग कर रहा है, लेकिन स्वाभाविक रूप से वो इस बात को गुप्त रखना चाहेगा कि उसने इस सौदे में भारत को कौनसी सहूलियतें दी हैं| मामला वैसा भी है जब आपका घनिष्ठ दुकानदार आपको विशेष छूट देता है पर आपसे अपेक्षा रखता है कि आप उसकी किसी से चर्चा न करें|
मोदी ने सौदे को अधिक पारदर्शी बनाया
वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी ने सौदे को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाया | ऐसा उन्होंने किया इसे दो सरकारों के बीच का रक्षा समझौता आईजीए (Inter Government Agreement) बनाकर | रक्षा खरीद दो प्रकार से होती है – एक, कपनियों से आवेदन बुला कर (Biddinng) और दूसरा आईजीए | पहले में दलाली की गुंजाइश होती है, क्योंकि प्रतिस्पर्धी कम्पनियां सौदा जीतने की होड़ में दलालों और बिचौलियों को मैदान में उतारती हैं जो अपना काम निकालने के लिए नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों को घूस या कमीशन देते हैं| पर जब दो सरकारें सौदा करती हैं, तो सारी बातचीत आधिकारिक होती है और आड़े-तिरछे रास्ते बंद हो जाते हैं| तब ये दो देशों की सरकारों के बीच पारस्परिक विश्वास और सम्मान का विषय होता है| ऐसे सौदे सामरिक साझेदार देशों के बीच होते हैं| तब व्यापार जगत के खुर पेंच नहीं होते|
सब झूठे, राहुल सच्चे ?
राहुल गाँधी और उनकी माँ नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं| ऑगस्टा वेस्टलैंड हैलिकॉप्टर घोटाले में क्रिश्चियन मिशेल “इतालवी माँ और उसके बेटे” का नाम ले रहा है| पर राहुल बिना किसी सबूत रफाल पर प्रधानमंत्री मोदी को भ्रष्ट साबित करने में जुटे हैं| वो “चौकीदार चोर है” और “मोदी जी भ्रष्ट हैं” जैसी बातें बेलिहाज कह रहे हैं| वो रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण को झूठा बतला रहे हैं| उनकी पार्टी वायुसेना प्रमुख और सहप्रमुख को झूठा ठहरा रही है| उनके हिसाब से दसां के सीईओ ट्रेपियर भी झूठ बोल रहे हैं| फ्रांस सरकार भी झूठ बोल रही है| देश के अनेक वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ, पूर्व सैनिक, सीएजी झूठ बोल रहे हैं| सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भी गलत है| सच्चे हैं तो राहुल गाँधी, उनकी माता सोनिया गाँधी और उनके दरबारी|
राग चलता रहेगा
रक्षा सौदे जटिल होते हैं| जनसामान्य के लिए उसकी बारीकियों को समझना कठिन होता है| राहुल इसी जटिलता का फायदा उठाकर प्रधानमंत्री मोदी पर भ्रष्टाचार की कालिख मलना चाहते हैं| “रफाल घोटाले” पर जारी शोरगुल प्रयास है मोदी सरकार के विरुद्ध एक फर्जी घोटाला गढ़ने का, जिसे लेकर राहुल और उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव में जा सकें|
श्रीलाल शुक्ल के प्रसिद्ध उपन्यास राग दरबारी में गाँव के नेतापुत्र, एक युवा नेता रुप्पन बाबू का चरित्र है| रुप्पन बाबू के चरित्र का चित्रण करते हुए एक स्थान पर लेखक लिखते हैं “रुप्पन बाबू ज्यादा तेज चाल चलने के आदि हो गए थे और कई बार दुल्की की जगह सरपट दौड़ने लगते थे| ज्यादा रफ़्तार खेंच देने से कभी-कभी मैदान तो चुक जाता था, पर उनकी रफ़्तार नहीं चुकती थी, जिससे वे कई अवसरों पर शून्य में कबूतर की तरह उलटे हुए जज़र आते थे|” रफाल पर कुहराम अब इसी दिशा में गतिमान है| राहुल की समस्या ये है कि वो रफाल राग को इतना खींच चुके हैं, कि उनके पीछे लौटने का रास्ता नहीं बचा है| खानदान के दरबारी भी उनके पीछे -पीछे फिसले चले आ रहे हैं| वो रफाल को मोदी सरकार का ‘ताबूत घोटाला’ बनाने में अपनी बची-खुची साख दाँव पर लगा चुके हैं| वो हवा बाँध रहे हैं| दाँव उल्टा पड़ा तो ये आख़िरी कील भी साबित हो सकती है| तब तक, युवराज और दरबारियों का का राग चलता रहेगा|