कांग्रेस और कम्युनिस्ट नहीं चाहते मुस्लिम महिलाओं के साथ हो न्याय
   दिनांक 11-जनवरी-2019
- डॉ. गीता भट्ट                      
केंद्र सरकार तीन तलाक के जरिए मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है, पर कट्टरवादियों के दबाव में कांग्रेस सहित कुछ दल इसका विरोध कर रहे हैं। ये लोग वोट बैंक राजनीति के आवेश में मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा नहीं समझना चाहते
लोकसभा में तीन तलाक विधेयक के पारित होने पर खुशी जताती हुईं मुस्लिम महिलाएं
इतिहास तब बनेगा जब सभी जगह समानता होगी। चर्च में महिला पादरी हों, बुर्का प्रथा और हलाला सहित तीन तलाक तुरत बंद हो। मस्जिद में महिलाएं मौलवी बनाई जाएं और वही अजान दें। तभी असल में महिला हक की बात होगी।  
                                                                                                                                —लता राम कृष्णनन, ट्विटर पर              शोषण और भेदभाव भारतीय समाज के मूल चरित्र से कोसों दूर हैं। दरअसल अलग-अलग कालखंडों में, समाज में कई त्रुटियां और कुप्रथाएं जुड़ती गईं। समय साक्षी है कि समाज में जब भी रूढ़िवादिता और कट्टरता का वर्चस्व बढ़ा, न्याय और समानता के आधारभूत भारतीय विचारों ने ही सुधार का कार्य किया। बाल-विवाह, सती जैसी कुप्रथाओं के अंत के लिए समाज की चेतना ने स्वयं ही सुधार हेतु बीड़ा उठाया। ऐसे समाज सुधारों की पहल को हालांकि प्रतिक्रियावादी ताकतों का सामना करना पड़ा। ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने जब महिला साक्षरता के लिए आवाज उठाई और 1848 में लड़कियों के लिए विद्यालय प्रारंभ किया, तो लोगों ने उनकी घोर आलोचना की। परंतु भारतीय समाज में वह सांस्कृतिक दक्षता ही है,कि जिसकी वजह से वे तर्क और विवेचना द्वारा सामाजिक अपूर्णताओं की आलोचना और उनके सुधार का मार्ग निर्धारण करने में आगे आए।
किंतु ये सुधार 1947 की स्वाधीनता के पश्चात् भी बहुसंख्यक समाज की चौखट तक ही सीमित रहे। यानी हिंदू समाज निरंतर समय, काल, परिस्थिति के अनुसार विकसित होता रहा। 1956 का हिंदू विवाह अधिनियम और अनुवर्ती संशोधन, हिंदू कानूनों को संहिताबद्ध करने का प्रगतिशील कदम था जिससे बहुसंख्यक समाज की महिलाओं का सशक्तीकरण बढ़ता रहा। इसके विपरीत अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम समुदाय अपनी मध्यकालीन पद्धतियों में जकड़ा रहा और अनुवर्ती सरकारों ने भी उनकी सामाजिक विसंगतियों की ओर से अपनी आंखें बंद रखी। उधर मुस्लिम महिलाएं चुपचाप सामाजिक असमानताओं को ‘दीन’ की आड़ में सहती रहीं।
जब कभी मुस्लिम महिलाओं के समान अधिकार और सशक्तीकरण का विषय उठा, इस्लाम में हस्तक्षेप की दुहाई देकर उसे नकार दिया गया। ध्यान देने वाली बात है कि मानव अधिकारों की दुहाई देने वाले, महिला मोर्चा ‘एक्टिविस्ट’ और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग; मुस्लिम समाज की महिलाओं के उत्पीड़न से अनभिज्ञ रहे। ऐसे में मुस्लिम समाज की साधारण महिलाओं ने अपनी असाधारण क्षमताओं को जगाया और समान अधिकारों की लड़ाई स्वयं लड़ने का बीड़ा उठाया। शायरा बानो, अतिया सबरी, आफरीन रहमान, गुलशन परवीन, जो तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) की कुरीति की भुक्तभोगी थीं, ने न्याय के लिए गुहार लगाई। एक पंथनिरपेक्ष देश की नागरिक होने के साथ-साथ, 2014 के पश्चात हुए सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तन और सकारात्मकता ने उनके अंदर आशा की किरण जगाई।
22 अगस्त, 2014 वह ऐतिहासिक दिन था, जब सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को अमान्य घोषित कर दिया। इस न्यायसंगत फैसले के लिए संघर्ष तब शुरू हुआ जब 1985 में शाहबानो नामक महिला ने न्यायालय में अपने और अपने पांच बच्चों की आर्थिक सहायता के लिए अपील की जिसके परिणामस्वरूप उन्हें रखरखाव की राशि मिली। परंतु तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने उस समय राजनीतिक प्रभाव और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के दबाव में आकर संसद में मुस्लिम महिला (तलाक संरक्षण अधिनियम),1986 को पारित करवा लिया। इस अधिनियम ने न्यायालय का फैसला, जो शाहबानो के पक्ष में था, उसे निरर्थक बना दिया। इस अधिनियम में तलाक के बाद मुस्लिम महिलाओं को केवल 90 दिन के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान था।
विडंबना तो यह कि अल्पसंख्यक अधिकारों के पक्षधर, मुस्लिम महिलओं के अधिकारों के विषय में, कट्टरवादियों के साथ खड़े दिखाई दिए। पारिवारिक अनबन, सामाजिक विवादों जैसे सामान्य मसलों पर, दीन की आड़ में तलाक देना सामान्य हो गया। लखनऊ के गोमती नगर में रहने वाली शबनम को उसके पति वजीर ने,धारावाहिक देखने से मना करने की बात न मानने पर तलाक दे दिया। बनारस की रहने वाली शहाना के पति ने उसे इसलिए तलाक दे दिया क्योंकि उसका वजन बढ़ गया था। शाहबानो से शायराबानो तक के इस 30 वर्ष के समान अधिकारों के संघर्ष ने, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में अपनी सफलता की पहली जीत को अनुभव किया।
कई संगठन जैसे जमीयत उलेमा-ए-हिंद, दारुल उलूम देवबंद, जमात-ए-इस्लामी हिंद, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस फैसले पर नाराजगी व्यक्त की थी। मुस्लिम समाज की महिलाओं को समानाधिकार दिलाने पर शासन और न्यायपालिका की सोच देख कर कई लोग इतने आतंकित हो गए हैं कि इसे समान नागरिक संहिता की दस्तक मान रहे हैं। हालांकि मुस्लिम समुदाय के फिरकों में भी तीन तलाक के विषय पर एकजुटता नहीं है। जहां सुन्नी समाज ने इसका समर्थन किया, वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम वुमेन पर्सनल लॉ बोर्ड, आल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड, अहमदिया मुस्लिम जमात ने खुलकर तीन तलाक का विरोध किया है।
न्यायपालिका के निर्णय के पश्चात् भी तीन तलाक की घटनाएं होती रहीं। मुस्लिम समाज के भीतर महिला-पुरुष भेदभाव पर काबू पाने हेतु प्रयासरत सरकार ने मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2017 को संसद के दोनों सदनों में पारित करने का प्रयास किया। लोकसभा में सरकार का बहुमत होने के कारण विधेयक पारित हो गया, किंतु विपक्षी दलों ने इसे राज्यसभा में पारित नहीं होने दिया। लैंगिक समानता देने के सरकार के इस प्रयास पर, राजनीतिक दलों की अकर्मण्यता देख सरकार को मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण अध्यादेश-2018 लाना पड़ा जिसकी अवधि 6 महीने की थी। यह विधेयक तत्काल तीन तलाक को अवैध घोषित कर, आरोपी को तीन साल तक की सजा का भी प्रावधान करता है। इसमें मुस्लिम महिला को अपने और अपने नाबालिग बच्चों के लिए आर्थिक सहायता की मांग का अधिकार देना भी प्रस्तावित है। महिला अपने बच्चों के संरक्षण की भी मांग कर सकती है।
हाल ही में बेंगलुरु की रेशमा अजीज को उसके शौहर ने 15 साल विवाह के उपरांत ‘व्हाट्सअप’ द्वारा अमेरिका से तलाक दे दिया । बरेली की रजिया के पति नहीम ने उसे तीन तलाक देकर घर में बंद कर, भूखा रखा और प्रताड़ित किया। रजिया को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। तीन तलाक को न्यायालय द्वारा अवैध घोषित करने के उपरांत, 400 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं। तीन तलाक के अलावा हलाला और बहु विवाह जैसी कुप्रथाएं अभी भी मुस्लिम समाज में प्रचलित हैं। गोरखपुर में 90 वर्षीय हबीब शाह ने जब गुस्से में अपनी 80 वर्षीया पत्नी को तीन तलाक दे दिया और गलती का एहसास होने पर मुफ्ती से राय मांगी, तो उसने पत्नी का हलाला कराने का सुझाव दिया। 21वीं शताब्दी में ऐसी मानवाधिकारों का हनन करती प्रथाओं को, जो कि महिलाओं के शोषण का माध्यम हों, अमान्य और अवैध घोषित करने की चुनौती भी है। सरकार ने पुन: मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक-2018 संसद के शीत सत्र में प्रस्तुत किया जो कि लोक सभा में पारित हो गया और राज्यसभा में पुन: अटका है।
ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने इस विधेयक का विरोध किया है। इमाम मौलाना बुखारी ने भी न्यायपालिका और कार्यपालिका के इस कदम की निंदा की है। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी इस विधेयक को मुस्लिम परिवारों में हस्तक्षेप बताया। यह खेदजनक है कि मुस्लिम समाज के मजहबी और राजनीतिक नेता कट्टरवादी और रूढ़िवादी सोच से ग्रसित हैं। अगर वे स्वयं इस पूर्वाग्रह को त्यागने की दूरदृष्टि रखते तो मुस्लिम महिलाओं को न्यायालय की चौखट तक न जाना पड़ता। भारतीय मुस्लिम समाज के सामने उदाहरण है ट्यूनीशिया, अफगानिस्तान, कुवैत, मलेशिया जैसे मुस्लिम देशों का, जिन्होंने अपने निजी कानूनों को संहिताबद्ध कर दिया है और तीन तालाक को प्रतिबंधित कर दिया है। देश के राजनीतिक दलों से भी यह अपेक्षित है कि वे वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठ कर, मुस्लिम महिलाओं की दयनीय स्थिति को सुधारने के प्रयास में सकारात्मक भूमिका निभाएं।
राष्ट्र के जनमानस की सबसे छोटी इकाई एक परिवार होता है। परिवार की मनोस्थिति और संस्कारों की दिशा, परिवार की स्त्री के मनोबल पर काफी हद तक आश्रित रहता है।
यदि मुस्लिम समुदाय नारी के सम्मान और समानता की पहल करने से संकोच करेगा तो वह स्वयं के परिवारों को ही आहत करेगा। मुस्लिम समुदाय समान नागरिक संहिता और समान आपराधिक कानूनों से इस लोकतंत्र में शासित है। समय आ गया है कि वे अपने व्यक्तिगत कानूनों में सुधार कर, समान संहिता की परिधि के भीतर लाएं और अपने समाज की महिलाओं को एक पंथनिरपेक्ष लोकतंत्र में गरिमापूर्ण जीवन जीने का अवसर दें।
(लेखिका भास्कराचार्य कॉलेज, दिल्ली विवि. में यंत्रीकरण विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)