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   दिनांक 11-जनवरी-2019
मीडिया का एक वर्ग समाचारों में नहीं, अपने राजनीतिक आकाओं को रिझाने में जुटा
 
जैसे-जैसे चुनाव पास आ रहे है, मुख्यधारा मीडिया, का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस की प्रचार शाखा में बदल चुका है। पिछले कई बार की तरह इस बार भी इसकी शुरुआत इंडिया टुडे समूह ने की। कांग्रेस के ‘प्रथम परिवार’ के प्रति इस समूह की निष्ठा देखने लायक है। पत्रिका ने ‘शहजादे’ के महिमामंडन में दरबारी चारणों को भी पीछे छोड़ दिया। इस पत्रिका में एक के बाद एक चुनाव जीतने वाले भाजपा के तमाम नेताओं के लिए ऐसी प्रशंसा कभी नहीं छपी होगी, जैसी 5 में से 1 राज्य में चुनाव जीतने वाली पार्टी के अध्यक्ष की हुई। यह बात बड़ी सफाई से गायब कर दी गई कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस जीती नहीं, बल्कि वहां त्रिशंकु विधानसभा है। चापलूसी के अत्युत्साह में यह ध्यान भी नहीं रहा कि कवर पेज पर जिस जैकेट में राहुल गांधी की फोटो छापी है उसी जैकेट में उनका एक वीडियो कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिसमें वे घबराए हुए सवालों के जवाब देने के लिए अपने से कनिष्ठ नेताओं से ‘ट्यूशन’ ले रहे हैं।
मध्य प्रदेश और राजस्थान में किसी तरह सरकार तो बन गई लेकिन आपसी मतभेद चरम पर हैं। पार्टी के ही नेता एक-दूसरे के खिलाफ मीडिया में खबरें ‘लीक’ करा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में बहुमत के बावजूद गुटबाजी अपने चरम पर है। तमाम क्षेत्रीय दल लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं, लेकिन ऐसे तमाम घटनाक्रमों से जुड़ी खबरें राष्ट्रीय मीडिया से लगभग गायब हैं। इसके उलट एनडीए में टूट की अटकलबाजी पर सारा जोर है।
मीडिया के इस सकारात्मक माहौल के बीच राहुल गांधी एक अपुष्ट टेप लेकर अचानक प्रकट हुए। दावा किया कि उन्होंने राफेल घोटाले पर ‘बड़ा खुलासा’ कर दिया है। मीडिया पूरे दिन उनके उस टेप को उछालता रहा। लेकिन राहुल संसद में टेप की विश्वसनीयता की जिम्मेदारी लेने से मुकर गए। पूरे देश ने विपक्षी दल के सबसे बड़े नेता को मजाक का पात्र बनते देखा। हैरानी तो तब होती है जब इतना बड़ा झूठ खुलने के बाद कोई पत्रकार उनसे यह नहीं पूछ पाता कि आखिर आप देश को गुमराह क्यों करना चाहते हैं? सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद भी राफेल को लेकर ऐसी निम्न स्तरीय राजनीति के पीछे असली कारण क्या है? प्रेस वार्ता में राहुल ने दो दिन पहले प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेने वाली समाचार एजेंसी की महिला पत्रकार को लेकर अभद्र टिप्पणी की। इसके बावजूद मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर करने वाले पत्रकारों की फौज ने चुप्पी साधे रखी।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किसानों को 3-3 दिन तक यूरिया के लिए लाइन में लगना पड़ रहा है। यूरिया के बदले कई जगह किसानों पर पुलिस से लाठियां चलवाई गईं। शहरों में घंटों बिजली कटौती हो रही है। कांग्रेस सरकार ने आते ही वंदेमातरम गाने पर पाबंदी लगा दी। राजस्थान सरकार बेशर्मी के साथ संकेत दे रही है कि स्कूल की किताबों में अब अकबर को महान बताया जाएगा, महाराणा प्रताप को नहीं। यही नहीं राष्ट्रीय गौरव के तमाम प्रतीकों को हटाने की बातें हो रही हैं। लेकिन अब यह सब कुछ राष्ट्रीय बहस से बाहर हो चुका है।
कई बार ऐसा लगता है मानो कुछ चैनलों और अखबारों के लिए हिंदू दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। नोएडा में पार्क में नमाज बंद कराई गई तो आजतक और अंग्रेजी चैनलों ने जमकर छाती पीटी। लेकिन जब बिना अनुमति हो रही भागवत कथाएं भी बंद कराए जाने का समाचार आया तो सबने आंख, कान बंद कर लिए।
यह बात साफ थी कि प्रशासन की कार्रवाई जमीन कब्जाने की कोशिशों के खिलाफ है, लेकिन आजतक जैसे चैनलों ने इसे सांप्रदायिक रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। स्पष्ट है कि मीडिया के इस वर्ग की रुचि समाचारों में नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक आकाओं के हितों की रक्षा में है। इसके लिए उन्होंने पत्रकारिता को औजार की तरह इस्तेमाल किया है।