सोहराबुद्दीन मामला: न्यायालय के फैसले से बेनकाब हुई कांग्रेस
   दिनांक 02-जनवरी-2019
सोहराबुद्दीन मामले में न्यायालय का फैसला आने के बाद एक बार फिर उसका चेहरा बेनकाब हो चुका है। न्यायालय के फैसले में स्पष्ट कहा गया कि भाजपा नेताओं को फंसाने की साजिश की गई थी 
सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर पर न्यायालय का फैसला आ चुका है। सोहराबुद्दीन मामले में न्यायालय का फैसला आने के बाद राहुल गांधी के टवीटर हैंडल से किया गया उनका ट्वीट यह था, 'हरेन पांड्या, तुलसीराम प्रजापति, जस्टिस लोया, प्रकाश थोम्ब्रे, श्रीकांत खंदालकर, कौसर बी और सोहराबुद्दीन शेख को किसी ने नहीं मारा। वे सिर्फ मर गए।' सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर बाद हुई सीबीआई जांच को राजनीति से प्रेरित बताए जाने के बाद भी राहुल गांधी का इस तरह का ट्वीट कांग्रेस की मानसिकता को बताता है कि वह अपने राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने के लिए कहां तक जा सकती है। ऐसा तब है जबकि न्यायालय में अपने आदेश में न्यायाधीश शर्मा ने कहा कि उनके पूर्वाधिकारी (न्यायाधीश एमबी गोस्वामी) ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अर्जी पर आरोपमुक्त आदेश जारी करते हुए कहा था कि जांच राजनीति से प्रेरित थी।
उन्होंने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि ‘मेरे सामने प्रस्तुत किए गए तमाम साक्ष्यों और गवाहों के बयानों पर बहुत बारीकी से विचार करते हुए मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सीबीआई जैसी एक शीर्ष जांच एजेंसी के पास एक पूर्व निर्धारित सिद्धांत और पटकथा थी, जिसका मकसद राजनीतिक नेताओं को फंसाना था। कोर्ट ने यह भी कहा कि गवाहों के शुरुआती बयानों में राजनीतिक षड्यंत्र की बात नहीं थी मगर फिर सालों बाद षड्यंत्र की बात आई ।
सीबीआई ऐसे किसी भी षड्यंत्र के होने की बात को साबित करने में नाकाम रही। न्यायालय ने यह भी कहा कि गवाहों को प्रलोभन देने की बात भी नहीं साबित हो सकी।
इस मामले में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह का कहना है कि एनकाउंटर हुआ इसमें कोई शक नहीं हैं लेकिन एनकाउंटर के बाद सोहराबुद्दीन के मामले की जांच को जिस तरह मोड़ा गया उस पर सवाल उठना लाजिमी है। जब इस मामले की जांच शुरू हुई तो कांग्रेस ने सीबीआई के जरिए दिल्ली से दबाव बनाया कि इसमें भाजपा के बड़े नेताओं को फंसाया जाए। पहले कोशिश हुई अमित शाह को इसमें फंसाया जाए। इसके बाद उनके जरिए मोदी जी तक पहुंचा जाए। कांग्रेस की असल मंशा यही थी। इसके लिए गवाह तोड़े गए, तथ्यों को तोड़ा—मरोड़ा गया। जांच की दिशा को मोड़ कर एक झूठ पर खड़ा करने की कोशिश की गई। इस मामले को राजनीतिक तूल भी दिया गया। कांग्रेस की तरफ से लगातार इसके खिलाफ बयानबाजी भी की गई। इससे पहले भी भाजपा यह कहती रही है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वदिता के चलते हम लोगों को फंसाने के लिए सीबीआई का दुरुपयोग किया गया। न्यायालय के फैसले पर इस पर मुहर लगा दी है। इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है।
इस मामले में न्यायालय का फैसला आने के बाद केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा, कांग्रेस और उसकी तत्कालीन अध्यक्ष की राजनीतिक साजिश के तहत सीबीआइ ने अमित शाह (गुजरात के तत्कालीन गृह राज्यमंत्री) को निशाना बनाया था। क्योंकि कांग्रेस उस समय गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह को राजनीतिक प्रतिद्वंदी के तौर पर देख रही थी। यह इस बात का उदाहरण है कि कांग्रेस अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। उन्होंने कहा कि अपने राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने के लिए कांग्रेस न्याय और संविधान को भी कुचल सकती है।
समाजसेवक नहीं हिस्ट्रीशीटर था सोहराबुद्दीन शेख
जिस सोहराबुद्दीन शेख के एनकाउंटर को फर्जी बताकर कांग्रेस ने सीबीआई के जरिए भाजपा नेताओं को फंसाने की कोशिश की वह सोहराबुद्दीन कोई समाज सेवक नहीं था बल्कि एक हिस्ट्रीशीटर था जिस पर कई मामले दर्ज थे। दरअसल सोहराबुद्दीन मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले का रहने था। गुजरात और राजस्थान पुलिस की एक संयुक्त टीम ने 26 नवंबर 2005 को उसे एक मुठभेड़ में मार गिराया था।
 
सोहराबुद्दीन मामले में न्यायालय के फैसले के बाद राहुल गांधी का ट्वीट  
90 के दशक में हथियारों की तस्करी का मामला था दर्ज
सोहराबुद्दीन शेख पर 90 के दशक में ही हथियारों की तस्करी का मामला दर्ज हो चुका था। मध्यप्रदेश में स्थित उसके घर से वर्ष 1995 में 40 एके-47 राइफल बरामद हुई थीं। सोहराबुद्दीन पर गुजरात व राजस्थान के मार्बल व्यापारियों से हफ्ता वसूली और हत्या के मुकदमे भी दर्ज थे। इसके अलावा उसके कुख्यात दाउद इब्राहिम के गुर्गे छोटा दाउद उर्फ शरीफखान पठान, अब्दुल लतीफ, रसूल पर्ती से भी संबंध थे। लश्करे ए तैयबा व पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी उसके संबंध थे। वर्ष 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद देश में आतंक फैलाने के लिए अब्दुल लतीफ ने कराची में रह रहे छोटा दाउद उर्फ शरीफ खान से 40 एके 47 राइफल मंगवाई थीं। सोहराबुद्दीन गुजरात व राजस्थान के मार्बल व्यापारियों से हफ्ता भी वसूलता था। उस पर व्यापारियों से वसूली और हत्या के कई मामले दर्ज थे।
जब सोहराबुद्दीन पर हथियार तस्करी का मामला दर्ज हुआ था तब महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी। महाराष्ट्र में ही सोहराबुद्दीन शेख पर हथियार तस्करी की एफआईआर दर्ज थी। कांग्रेस को पता था कि सोहराबुद्दीन पर कई मामले दर्ज हैं और उसका पुराना अपराधिक इतिहास है। बावजूद इसके कांग्रेस सीबीआई के जरिए सोहराबुद्दीन शेख के एनकाउंटर को फर्जी साबित करने में लगी रही और इसके लिए उसने सीबीआई का गलत इस्तेमाल किया। इस मामले में जुलाई 2010 में गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। सीबीआई ने राजस्थान के तत्कालीन गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया से भी पूछताछ की थी।सोहराबुद्दीन के पिछले आपराधिक इतिहास की सारी जानकारी होने के बाद भी योजनाबद्ध तरीके से कांग्रेस ने भाजपा नेताओं को फंसाने की जो साजिश रची थी उसमें वह कामयाब नहीं हो पाई। न्यायालय के फैसले से दूध का दूध और पानी का पानी हो गया है।