अब द्वीपों पर मिशनरियों की नजर
   दिनांक 03-जनवरी-2019
लगभग 500 द्वीपों के समूह अंदमान निकोबार पर दुष्टों की नजर पड़ चुकी है। यही लोग चाऊ जैसे मिशनरी को वहां तक पहुंचने में मदद करते हैं और विदेशी पैसे पर चर्च और मस्जिदों का निर्माण करते हैं। वहां के लोगों का कहना है कि इनकी जांच-पड़ताल जरूरी है
  
पोर्ट ब्लेयर में वनवासी कल्याण आश्रम के तत्वावधान में प्रदर्शन करती महिलाएं। इनका नारा था, ‘कन्वर्जन रोको, आदिम जाति बचाओ’
गत दिनों अंदमान निकोबार द्वीप समूह के उत्तरी सेंटिनल द्वीप में अमेरिकी नागरिक जॉन एलन चाऊ की ‘हत्या’ की चर्चा पूरी दुनिया में हुई। कहा गया कि उसकी हत्या सेंटिनल द्वीप में रहने वाले आदिम लोगों ने की। हालांकि अभी तक उसकी लाश नहीं मिलने से अंदमान पुलिस चाऊ को मृत नहीं मान रही है। पुलिस का कहना है कि जब तक चाऊ की लाश नहीं मिलेगी, तब तक कानूनी रूप से उसे मृत नहीं माना जा सकता। उल्लेखनीय है कि सरकार की अनुमति के बिना उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर कोई नहीं जा सकता। वहां हजारों बरसों से ऐसे लोग रह रहे हैं, जो अभी तक पूरी दुनिया से कटे हुए हैं। यदि वे लोग बाहरी दुनिया के लोगों के संपर्क में आ जाएं तो उन्हें कोई बीमारी हो सकती है, जो उनके लिए घातक सिद्ध हो सकती है। इसके साथ ही वे लोग बाहरी लोगों को देखकर उन पर हमला करते हैं। इसीलिए अंदमान के 29 द्वीपों पर बाहरी लोगों का जाना मना है। पर चाऊ सारे नियम-कानून को ताक पर रखकर वहां गया। जिन नाविकों की मदद से वह वहां तक गया था, उन्हीं में से एक ने बताया कि चाऊ को मार दिया गया है। उस नाविक के अनुसार, ‘‘मैंने बहुत दूर से उन लोगों (सेंटिनल के मूल लोग) को एक लाश दफनाते हुए देखा। वह चाऊ की हो सकती है।’’ उन नाविकों को चाऊ ने अपने माता-पिता के नाम एक पत्र दिया था। 13 पन्ने के उस पत्र में उसने लिखा था, ‘‘आप लोगों को लगता होगा कि मैं सनकी हो गया हूं, पर सेंटिनल के वासियों को जीसस के बारे में बताना आवश्यक है। उन लोगों से मिलना बेकार नहीं है। मैं चाहता हूं कि सेंटिनल के लोग भी अपनी भाषा में प्रभु की प्रार्थना करें। इस कोशिश में यदि वे लोग मुझे मार दें तो उन्हें माफ कर देना।’’ उसके इस पत्र से नाविक की बात को बल मिला। इसलिए अंदमान पुलिस दूरबीन के जरिए यह पता लगाती रही कि वह नाविक जिस लाश की बात कर रहा है, वह चाऊ की है या नहीं? दूरबीन से इसलिए क्योंकि वहां जाना किसी के लिए भी खतरे से खाली नहीं है। अंदमान निकोबार द्वीप समूह के पुलिस महानिदेशक दीपेन्द्र पाठक कहते हैं, ‘‘वे लोग (आदिम जाति के लोग) हमारे लिए धरोहर हैं। हम उनको नुक्सान नहीं पहुंचा सकते।’’
चाऊ की मौत हुई या नहीं, इस पर मुहर लगाना तो प्रशासन का काम है, पर एक बात तो तय है कि वह सेंटिनल द्वीप तक भारत के कायदे-कानून को ताक पर रखकर गया। रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी कहते हैं, ‘‘कानून तोड़कर चाऊ का सेंटिनल द्वीप तक जाना अनेक सवाल खड़े करता है। वह भारतीय तटरक्षक दल को चकमा देकर बार-बार सेंटिनल द्वीप तक पहुंचता रहा। उसने भारत की आंतरिक सुरक्षा की खामियों को भी उजागर कर दिया। भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था छिद्रयुक्त है। यही कारण है कि कोई भी विदेशी नागरिक यहां आता है और प्रतिबंधित क्षेत्रों में भी चला जाता है। सुरक्षा के मामले में भारत अपने इतिहास से कोई सबक नहीं ले रहा है।’’
ब्रह्म चेलानी जैसी राय रखने वाले लोगों की कमी नहीं है। ऐसे लोग सवाल उठा रहे हैं कि चाऊ जैसे विदेशियों को रोकने में हमारा तंत्र विफल क्यों हो रहा है?
वहीं ऐसे लोग भी बड़ी संख्या में हैं, जो कह रहे हैं कि उत्तरी सेंटिनल के लोगों ने अपनी रक्षा के लिए चाऊ को मारा। पोर्ट ब्लेयर से प्रकाशित हिंदी साप्ताहिक ‘द्वीप चेतना’ के संपादक दुर्गविजय सिंह ‘दीप’ कहते हैं, ‘‘वैसे तो किसी की मौत को उचित नहीं ठहराया जा सकता है, लेकिन यदि चाऊ की हत्या सेंटिनल द्वीप की आदिम जनजाति के लोगों द्वारा हुई है तो यह कहने में कोई हर्ज नहीं दिख रहा है कि उन्होंने अपनी रक्षा के लिए उचित कदम उठाया है। हम जानते हैं कि प्रतिबंध के बावजूद कुछ लोग अंदमान के द्वीपों में चोरी-छुपे प्रवेश कर जाते हैं, यह प्रशासन के लिए भी चुनौती है। यहां की आदिम जनजातियों की सुरक्षा के लिए जो भी कदम उठाने की जरूरत पड़े उसे जरूर उठाना चाहिए।’’
पोर्ट ब्लेयर में एक धार्मिक संस्था से जुड़े महंत ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘‘चाऊ जिन लोगों के सहारे उत्तरी सेंटिनल द्वीप तक पहुंचा था, उनमें से ज्यादातर ईसाई थे। चर्च से जुड़े लोग अंदमान निकोबार के पूरे क्षेत्र में कन्वर्जन के काम में लगे हैं। यहां की जनजातियों को ईसाई बनाने के लिए अनेक साल से कोशिशें हो रही हैं, लेकिन सब कुछ जानते हुए भी प्रशासन खामोश रहता है। कुछ संगठन कन्वर्जन के विरुद्ध आवाज उठाते हैं, तो उन्हें सांप्रदायिक कहकर दबाने का प्रयास होता है।’’ कुछ ऐसी ही बातें विश्व हिंदू परिषद्, अंदमान निकोबार द्वीप समूह के प्रांत संगठन मंत्री पार्थो मंडल भी कहते हैं। उनका कहना है कि अंदमान की अनदेखी देश को महंगी पड़ सकती है। उन्होंने चार साल पुरानी एक घटना का उदाहरण देते हुए बताया, ‘‘2014 में फ्रांस के तीन नागरिक (बाउच राफेल अलेंक्जेंडर पेरी, लेबले केरी मेरी और मार्टिन अलेंक्जेंडर) भी चुपचाप जारवा जनजाति के लोगों तक पहुंच गए थे। उन लोगों ने जारवाओं की तस्वीर ली और एक वीडियो भी बना लिया। बाद में यू ट्यूब पर उन तस्वीरों और वीडियो को डाला भी गया। तब भारत को पता चला कि फ्रांस के नागरिक जारवा तक पहुंच गए।’’ पार्थो यह भी कहते हैं, ‘‘विदेशी नागरिक यहां तक अपने आप नहीं आ सकते, उन्हें लाया जाता है। कौन लोग लाते हैं? इसकी जांच होनी चाहिए, ताकि देश को पता चले कि कौन लोग देश के विरुद्ध काम कर रहे हैं।’’
सेकुलर मीडिया ने चाऊ को एक ‘साहसी’ पर्यटक के रूप में दिखाने की कोशिश की, लेकिन उसकी पोल ‘इंटरनेशनल क्रिश्चियन कन्सर्न’ नामक एक ईसाई संगठन ही खोल दिया। इसने अपनी एक रपट में चाऊ को ईसाई मिशनरी बताया। इसलिए जब कुछ लोग कहते हैं कि चाऊ कन्वर्जन के मकसद से ही सेंटिनल द्वीप तक एक नहीं, 2016 से अपनी मौत तक तीन बार गया तो, उनकी बातों में दम लगता है। वरिष्ठ पत्रकार बलबीर पुंज ने अपने एक लेख में चाऊ के बारे में लिखा, ‘‘वह भी उसी मानसिकता से ग्रसित था, जिस मानसिकता से नाविक क्रिस्टोफर कोलंबस ईसाइयत के प्रचार-प्रसार के लिए मूर्तिपूजक भारत की खोज में निकला था और अकस्मात् उसने अमेरिका की खोज की थी?’’ वे यह भी कहते हैं, ‘‘क्या यह सत्य नहीं कि उन्हीं श्वेत शासकों की विस्तारवादी नीति और मजहबी दमनचक्र ने आज अमेरिका के मूल निवासियों और उनकी संस्कृति को किसी संग्रहालय की शोभा बढ़ाने तक सीमित कर दिया है और कुछ ऐसा ही चिंतन चाऊ का भी था।’’
अंदमान निकोबार द्वीप समूह के मुख्य सचिव रहे शक्ति सिन्हा भी मानते हैं कि चाऊ कन्वर्जन के लिए ही वहां गया था, पर इस घटना को वे आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती नहीं मानते। वे कहते हैं, ‘‘वहां के 19 द्वीपों पर लोग रहते हैं और 18 द्वीपों पर सुरक्षा बल की तैनाती है। सुरक्षा व्यवस्था में कोई कमी नहीं है, पर एक-एक व्यक्ति पर नजर रखना उतना आसान नहीं होता। उसी का फायदा चाऊ ने उठाया और इसका दुष्परिणाम उसे ही भुगतना पड़ा।’’
इस घटना के बाद अंदमान निकोबार द्वीप समूह के लोगों में गुस्सा है। 1 दिसंबर, 2018 को राजधानी पोर्ट ब्लेयर में कई संगठनों ने इसके विरोध में प्रदर्शन किया। वहां के लोगों की मांग है कि किसी भी विदेशी को यहां आने देने से पहले उसकी अच्छी तरह जांच हो और वीजा की समाप्ति से पहले वह अपना देश वापस चला जाए, यह भी सुनिश्चित हो। इन तथ्यों से यही निष्कर्ष निकलता है कि अंदमान निकोबार द्वीप समूह में सजगता और सतर्कता बढ़ाई जाए, तभी भारत विरोधी तत्व समय रहते पकड़ में आएंगे।
 
वे लोग (आदिम जाति के लोग) हमारे लिए धरोहर हैं। हम उनको नुक्सान नहीं पहुंचा सकते।
—दीपेन्द्र पाठक, पुलिस महानिदेशक अंदमान निकोबार द्वीप समूह
अंदमान निकोबार द्वीप समूह की जनसंख्या :

वर्ष

1961

1971

1981

1991

2001

2011

हिन्दू

32781

70134

121793

189521

246589

264296

मुस्लिम

7398

11655

16188

21354

29265

32413

ईसाई

17973

30342

48274

67211

77178

80984

सिख

241

865

991

1350

1587

1286

बौद्ध

1707

103

127

322

421

338

जैन

3

14

11

17

23

31

अन्य मत

3444

1264

231

256

238

564

अन्य

1

756

1126

630

851

669

कुल

63548

115133

188741

280661

356152

380581

"अंदमान निकोबार द्वीप समूह के 19 द्वीपों पर लोग रहते हैं और 18 द्वीपों पर सुरक्षा बल की तैनाती है। सुरक्षा व्यवस्था में कोई कमी नहीं है, पर एक-एक व्यक्ति पर नजर रखना उतना आसान नहीं होता है। उसी का फायदा चाऊ ने उठाया और इसका दुष्परिणाम उसे ही भुगतना पड़ा।"
—शक्ति सिन्हा, पूर्व मुख्य सचिव, अंदमान निकोबार द्वीप समूह
 
                                                                        चाऊ चीनी मूल का अमेरिकी नागरिक
कौन था चाऊ
चाऊ चीनी मूल का अमेरिकी नागरिक था। चीन में हुई सांस्कृतिक क्रांति के दौरान उसके पिता ने अमेरिका में शरण ली थी और बाद में ईसाई बन गए। मिशनरी पाठशाला में चाऊ को ऐसी पट्टी पढ़ाई गई कि उसने ईसायत के प्रचार-प्रसार को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। अमेरिका की ह्यआॅल नेशन मिशनरी एजेंसीह्ण ने उसे भारत भेजा था। इस एजेंसी ने स्वीकार किया है, ह्यह्यचाऊ को भारत भेजने के लिए उसने भारतीय वीजा नियमों का उल्लंघन किया। मिशनरी वीजा मिलने में होने वाली दिक्कतों को देखते हुए उसे पर्यटक वीजा दिलाया गया।
"चाऊ भी उसी मानसिकता से ग्रसित था, जिस मानसिकता से नाविक क्रिस्टोफर कोलंबस ईसाइयत के प्रचार-प्रसार के लिए मूर्तिपूजक भारत की खोज में निकला था और अकस्मात् उसने अमेरिका की खोज की थी।"
—बलबीर पुंज , वरिष्ठ पत्रकार
"भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था छिद्रयुक्त है। यही कारण है कि कोई भी विदेशी नागरिक यहां आता है और प्रतिबंधित क्षेत्रों में भी चला जाता है। सुरक्षा के मामले में भारत अपने इतिहास से कोई सबक नहीं ले रहा है।"
—ब्रह्म चेलानी , रक्षा विशेषज्ञ
सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण द्वीप
यह सर्वविदित सत्य है कि बंगाल की खाड़ी में स्थित अंदमान निकोबार द्वीप समूह सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस द्वीप समूह के धुर उत्तर में स्थित है कोको द्वीप, जो कभी इस द्वीप समूह के साथ भारतीय भूभाग था। यह देश का दुर्भाग्य था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस द्वीप को बर्मा (म्यांमार) को उस समय देकर बड़ी भारी सामरिक भूल की थी। म्यांमार सरकार ने इस द्वीप को चीन को सौंप दिया है। चीन ने वहां हवाई अड्डे का निर्माण कर हिन्द महासागर पर अपनी सामरिक पकड़ को मजबूत बनाने की कोशिश की है। इसी आड़ में इन द्वीपों में भारत विरोधी ताकतें सक्रिय हैं। ये ताकतें हिन्द महासागर क्षेत्र में अपना सामरिक वर्चस्व स्थापित करने के उद्देश्य से अनेक प्रकार की कोशिशें कर रही हैं। कभी मछली पकड़ने के बहाने, कभी समाजसेवी गतिविधियों की आड़ में, कभी मजहब के प्रचार-प्रसार के आवरण में, कभी व्यापारी या सरकारी कर्मचारियों को लोभ में फंसाकर ये ताकतें अपना काम कर रही हैं। विगत बरसों में इन द्वीपों में विदेशी सहायता से बड़ी संख्या में मस्जिदों और चर्चों का निर्माण हुआ है। इन निर्माणों के पीछे क्या वास्तविकता है? यह पड़ताल का विषय है।
                                                                                                                                                -अशोक कुमार श्रीवास्तव
नियमों की अनदेखी
अंदमान निकोबार द्वीप समूह के 29 द्वीप, जिसमें उत्तरी सेंटिनल द्वीप भी शामिल है, बरसों से प्रतिबंधित क्षेत्र रहे हैं। आदिमजाति-जनजाति संरक्षण अधिनियम 1956 और भारतीय वन अधिनियम 1927 के अंतर्गत इन क्षेत्रों में किसी के जाने पर रोक है। विदेशियों को इन द्वीपों में जाने के लिए आर.ए.पी. (रिस्ट्रिक्टेड एरिया परमिट) लेना होता है। पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस वर्ष जून में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आर.ए.पी. की अनिवार्यता खत्म कर दी, लेकिन यह प्रावधान जरूर किया कि कोई भी विदेशी अंदमान निकोबार द्वीप समूह जाता है तो उसे अपने बारे में पूरी जानकारी वहां के क्षेत्रीय रजिस्टार अधिकारी को देनी होगी। यहां तक कि वह कहां ठहरा है, यह भी बताना होता है, लेकिन चाऊ ने इनमें से किसी भी नियम का पालन नहीं किया।