कर्नाटक में यातना सहते रहे दलित, वोट गिनते रहे सेकुलर
   दिनांक 03-जनवरी-2019
  - बेंगलुरु से गुरुप्रसाद और प्रशांत वैद्यराज                 
कर्नाटक के एक गांव सावनकनहल्ली के एक खेत से रिहा कराए गए 52 मजदूरों को पिछले 3 साल से नारकीय हालात में कैद रखा गया था लेकिन न पिछली कांग्रेस सरकार को इसका पता चला, न अब कुमारस्वामी को भनक मिली
बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए गए दलित परिवार
यह निस्संदेह स्तब्ध कर देने वाली घटना है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच़.डी कुमारस्वामी और पूर्व प्रधानमंत्री एच़ डी. देवगौड़ा के गृह जिले हासन के एक गांव में लगभग 52 लोग वर्षों से बंधुआ मजदूरों की नारकीय यातनाएं सह रहे थे! ये सभी दलित और जनजातीय समुदाय से हैं। यह गांव बेंगलुरु से लगभग 190 किमी. दूर है। रिहा कराए गए इन सभी बंधुआ मजदूरों में 4 बच्चे और 17 महिलाएं भी शामिल हैं। शहर से महज 20 किलोमीटर दूर दुुद्दाहुबली में सावनकनहल्ली के एक खेत में बने शेड में इन लोगों को बदहाल स्थिति में बंदी बनाकर रखा गया था।
फंसाने में जुटा था तंत्र
इस कांड के मुख्य आरोपी मुनेश ने पट्टे पर जमीन का एक टुकड़ा लेकर उसे बाड़ से घेर दिया था। उसने ऑटोचालकों को किराए पर लगा रखा था जिनका काम मजदूरी की तलाश में आने वाले लोगों को फुसलाकर वहां लाना था। ऑटो वाले काम की तलाश में रेलवे स्टेशन पर उतरने वाले भोले-भाले प्रवासियों पर नजर रखते थे और उन्हें 600 रु. की दिहाड़ी का लालच देकर फार्म हाउस पहुंचा देते थे। काम पर रखने के दौरान उन्हें बताया जाता कि महिलाओं को टमाटर और अन्य सब्जियों को तोड़ने का हल्का काम और पुरुषों को खेत जोतने और नारियल छीलने जैसा भारी काम करना होगा।
यह गिरोह कडूर, आजमपुर, बिरूर और हासन रेलवे स्टेशनों पर नौकरी की आस में उतरने वाले सीधे-सादे गरीब लोगों को अपने जाल में फंसाता था। ये बंधुआ मजदूर भी कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए विभिन्न दलित और अन्य अनुसूचित जनजातियों के हैं।
रेलवे स्टेशनों से उन्हें सावनकनहल्ली गांव में खेत में उनके रहने के लिए बनाए शेड में पहुंचा दिया जाता। रोज सुबह उन्हें छोटे टेम्पो में बिठाकर या पैदल ही कृषि और अन्य कार्यों के लिए खेतों में भेजा जाता। दिनभर काम कराने के बाद उन्हें वापस उसी शेड में बंद कर दिया जाता। ये सभी 52 पुरुष और महिलाएं दूषित और अमानवीय परिस्थितियों में एक ही शेड में रहने के लिए मजबूर थे। इन्हें दिनभर की मेहनत की एक पाई तक नहीं मिलती थी, जबकि इन्हें फंसाकर लाने वाले हजारों रुपये डकार रहे थे।
नारकीय जीवन
 
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आजाद होने के बाद एक मजदूर ने मीडिया को बताया कि वह एक दलित है जो नौकरी की तलाश में आया था, लेकिन गिरोह ने उसे अपने जाल में फंसा लिया था। वह उस खेत में बने शेड में 3 साल तक कैद रहा। उसने जब भी मुक्ति की गुहार लगाई, उसे टालते हुए दीपावली या नए साल में रिहा करने का दिवास्वप्न दिखाया गया। उन्हें बंदी बनाने वालों ने उनके कपड़े उतरवाकर उन्हें फटी शर्ट और छोटे कपड़े पकड़ा दिए थे। उनके फोन, पर्स छीन लिए गए। काम और पैसों के संबंध में झूठे वादे किए गए थे। इस यातनामय जिदंगी से मुक्त होने के बाद अब ये अपने गृहनगर में ही रोजी-रोटी कमाना चाहते हैं, चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों। वे अब कभी मानव तस्करी माफिया और बंधुआ बनाने वाले गिरोहों के चक्कर में नहीं फंसना चाहते।
मुक्त हुए मजदूरों ने बताया कि शेड में हालात बहुत दयनीय थे। प्रवासी मजदूरों से उनका सारा निजी सामान छीन लिया गया था और उन्हें जंजीरों में बांधकर रखा जा रहा था। उन्हें जिंदा रहने लायक भोजन दिया जाता और जानवरों की तरह काम कराया जाता।
रायचूर जिले के पास एक गांव के जनजातीय समुदाय के एक अन्य मजदूर ने बताया कि उन्हें बेरहमी से मारा जाता था इस कारण कुछ लोगों को भयंकर चोटें आई और हाथ-पांव भी टूट गए थे। उसका कहना है कि सरकार को उनके पुनर्वास में सहायता करनी चाहिए, क्योंकि जीवन को फिर से शुरू करने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचा है। उनका कहना है कि काम की तलाश में घर से निकलते वक्त उन्होंने अपने गांव के कई लोगों से कर्ज लिया था। अब उनके पास कुछ भी नहीं है और अगर वे खाली हाथ वापस जाते हैं, तो अपना ऋण कैसे चुकाएंगे और कैसे अपना जीवन नए सिरे से शुरू करेंगे?
रिहा कराई गई एक दलित महिला
जैसे ही बंधुआ मजदूरों के मिलने के बारे में यह खबर फैली, उडुपी-चिकमंगलुरु की सांसद शोभा करंदलाजे ने घटनास्थल का दौरा किया और बंधुआ मजदूरों को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। उन्होंने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र मानव तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए नया कानून बनाने की योजना बना रहा है।
मजदूरों ने शोभा करंदलाजे से कई वर्षों की अपनी यातना की कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि काम करने पर ही उन्हें भोजन मिलता था, अगर कोई बुखार से पीड़ित होने की वजह से काम नहीं कर पाता तो उसे खाना नहीं दिया जाता था। उन्हें नाश्ता भी नहीं मिलता था। भोजन के नाम पर सिर्फ बेस्वाद सांभर और चावल दिए जाते थे। मवेशियों की तरह शेड में बंद इन मजदूरों को नित्य कर्म तक के लिए बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी, उसके लिए उसी शेड के एक कोने में एक ट्यूब लगा दी गई थी। उन पर हर समय पहरा रहता और काम के समय एक-दूसरे से बात करने की कड़ी मनाही थी। पानी पीने के लिए भी पहरेदारों से अनुमति लेनी पड़ती थी। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने किसी से शिकायत क्यों नहीं की ? तो मजदूरों ने सांसद को बताया कि उनके मोबाइल छीन लिए गए थे और कागज पर लिखे सारे टेलीफोन नंबर नष्ट कर दिए गए थे। मजदूरों को सुबह से रात तक एक खेत से दूसरे खेत में ले जाकर बिना पैसे काम कराया जाता, आवाज उठाने वालों को ऐसे अमानवीय तरीके से पीटा जाता कि उनकी जबान सहम कर हमेशा के लिए मूक हो जाती। महिलाओं का यौन शोषण किया जाता। गिरोह के लोग इतने क्रूर थे कि उन्हें छह साल के दो लड़कों और एक 62 वर्षीय वृद्ध को भी बंधुआ बनाने में शर्म नहीं आई।
 
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आखिरकार मिली आजादी
सौभाग्य से 16 दिसंबर को एक मजदूर बंधन तोड़कर भागने में सफल रहा और उसने किसी कृष्णप्पा परिवार को इसकी सूचना दी। उसने अपने ऊपर हुए अत्याचारों और खेत के शेड में कैद अन्य लोगों की दुर्दशा के बारे में बताया। यह सुनकर कृष्णप्पा परिवार ने साहस जुटाया और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। 16 दिसंबर की रात हासन के पुलिस अधीक्षक प्रकाश गौडा के नेतृत्व में एक पुलिस दल ने पूरी गोपनीयता बरतते हुए खेत पर छापा मारा और बंधक मजदूरों को छुड़ाया।
17 दिसंबर को प्रकाश गौडा ने मीडिया के सामने घटनाक्रम का खुलासा किया और अमानवीय हालातों से गुजरे मजदूरों की यातना के बारे में बताया। पुलिस टीम ने खेत में छापेमारी के दौरान दो लोगों को गिरफ्तार किया, जिन्होंने गिरोह की कार्यशैली और उसके मालिक के नाम उजागर किए। दो अन्य को बाद में गिरफ्तार कर लिया गया और इन चारों पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप दर्ज किए गए।
आजाद कराए गए मजदूरों को एक समाज कल्याण छात्रावास में अस्थायी आवास की सुविधा दी गई है। पुलिस ने राज्य सरकार से अनुरोध किया है कि वह मुक्त कराए गए मजदूरों को जल्द से जल्द उनके गृह नगरों में भेजने की व्यवस्था कराए।
मौन हैं सेकुलर मानवाधिकारी
दलितों के लिए रात-दिन खून भरे आंसू बहाने वाला मीडिया का लाडला समूह गुलामी की यातना भरी लंबी रातों के बाद आजादी का उजाला देखने वाले इन 52 दलितों और जनजातीय बंधुओं के पूरे प्रकरण पर मौन साधे बैठा है। कन्हैया कुमार या जिग्नेश मेवाणी जैसे लोग और उनकी ‘टुकड़े-टुकड़े टोली’, जो मोदी या भाजपा शासित किसी राज्य में दलितों के साथ जरा सा कुछ होने पर हंगामा खड़ा कर देते हैं, आज एक शब्द तक नहीं बोल रहे।
केंद्र सरकार के हर कदम पर कड़ी आलोचनाओं की बौछार करने वाली ‘दलित की बेटी’ मायावती ने इस बाबत अब तक कोई प्रेस बयान जारी नहीं किया, कर्नाटक के उस मुख्यमंत्री से जवाब-तलब करना तो बहुत दूर की बात है जिसके अपने जिले में यह कांड हुआ है। एमनेस्टी इंटरनेशनल भी इस मुद्दे पर चुप है जिसका एकमात्र काम आजकल केंद्र सरकार के कार्यों की निंदा करना प्रतीत होता है। उसकी वेबसाइट पर कोई प्रेस विज्ञप्ति नहीं है।
कर्नाटक के बुद्धिजीवी और स्वघोषित प्रगतिशील विचारकों ने जो अवार्ड वापसी ब्रिगेड का हिस्सा थे, कांग्रेस-जेडी (एस) सरकार के खिलाफ मीडिया में एक शब्द तक बोलने की जरूरत नहीं समझी और न ही इस मुद्दे पर किसी अखबार में कोई कॉलम या लेख लिखा। मशहूर रंगकर्मी गिरीश कारनाड ने टाउन हॉल में विरोध प्रदर्शन का कोई मजमा नहीं खड़ा किया, यहां तक कि ‘जस्ट आस्किंग’ के सेकुलर अगुआ प्रकाश राज के मुंह से भी राज्य सरकार से पूछने के लिए कोई सवाल नहीं निकला और आलम यह है कि वे कई दिनों से मौन साधना में व्यस्त हैं।
‘ऊना लिंचिंग’ का विरोध करने बड़ी तत्परता से बाहर निकले मार्क्सवादियों और कम्युनिस्ट दलों के लोगों ने अपने बंद दरवाजों से झांका तक नहीं। दलित हितों के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली दलित संघर्ष समिति और इसी तरह के संगठन भी इस मुद्दे पर मौन ही दिखे। जबकि बेंगलुरु की सड़कें 52 दलितों के साथ हुए अत्याचार के खिलाफ उन सबके क्रोध का उफान देखने का बेसब्री से इंतजार करती रहीं। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। किसी ने सरकार को कठघरे में खड़ा करने की जहमत नहीं उठाई।
इनका मौन विभिन्न तबकों में सुगबुगाते संदेह की पुष्टि करता है कि उनका क्रोध कहीं राजनीति के पासे खेलने का जरिया तो नहीं, जिसकी बुनियाद में दलितों के हित या उनकी प्रगति से जुड़ा कोई ईमानदार आग्रह कभी मौजूद था ही नहीं? कर्नाटक के उस गांव से उभरी यह पूरी कहानी उस बात को ही पुष्ट करती है कि दलितों और जनजातीय समाज के लोगों की रोजी की तलाश में अपने घर-गांव छोड़ने की विवशता उनकी गुलामी का कारण बनती है। इसमें संदेह नहीं कि उनके जीवन को विकास और सुशासन से ही बेहतर बनाया जा सकता है, न कि उनके नाम पर की जाने वाली सेकुलर नारेबाजी या उपद्रवों से।