राममंदिर: पिछले 30 वर्षों से क्यों सुलग रहा यह विषय ?
   दिनांक 04-जनवरी-2019
- प्रो. मक्खन लाल             
बात हो रही है अयोध्या की राम जन्मभूमि पर राम मंदिर के निर्माण की। जहां श्री राम का जन्म हुआ,राम का मंदिर वहां नहीं बनेगा तो कहां बनेगा? पिछले करीब 30 साल से यह विषय क्यों सुलगता रहा? क्या इसलिए कि सेकुलरवाद की बिसात पर सियासी चालें चली जाएं? किसी आस्था-केन्द्र और पवित्र स्थलों पर देश-विदेशी विद्वान क्या कहते हैं?
पिछले तीस वर्ष से भारत के जनमानस में सबसे ज्वलंत विषय अयोध्या रहा है। दिलचस्प बात यह है कि सत्ता के भाग्य की लकीरों को भी यही नगर गढ़ रहा है। मुद्दा स्पष्ट है। हिंदुओं का कहना है कि जहां बाबरी ढांचा खड़ा था वह स्थान भगवान राम का जन्मस्थान है। वहां स्थित मंदिर को 1528 में बाबर के आदेश से ध्वस्त करके वह ढांचा खड़ा किया गया था। इस दावे का विरोध करने वाला समूह इसे प्रामाणिक नहीं मानता।
हालांकि, अयोध्या का मुद्दा मात्र एक मंदिर का नहीं, बल्कि यह प्रतिनिधित्व करता है एक पवित्र नगर, पवित्र स्थान, सांस्कृतिक वैभव और धार्मिक विरासत के अतुलनीय कोश का। इसलिए, इस मुद्दे को व्यापक संदर्भ में देखना होगा।
मुद्दा
वर्तमान में अयोध्या फैजाबाद जिला मुख्यालय के पास एक छोटा सा शहर है। हिंदुओं की आस्था है कि पौराणिक काल में राजा दशरथ ने इस क्षेत्र पर राज किया था, उनकी राजधानी थी अयोध्या। उनके सबसे बड़े पुत्र, भगवान राम का जन्म अयोध्या में ही हुआ था। मान्यता है कि श्रीराम भगवान विष्णु के 7वें अवतार हैं। यही वजह है कि उनका जन्मस्थान हिंदुओं के लिए एक पवित्र और पूजनीय स्थल है।
जन्मस्थान को चिह्नित करने के लिए समय-समय पर मंदिर का निर्माण और पुनर्निर्माण किया गया। मंदिर का आखिरी साक्ष्य 11वीं शताब्दी में मिलता है जब गहड़वाल राजा ने इसे बनवाया था, जिसे 1528 में मुगल आक्रांता बाबर ने अपने अभियान के दौरान नष्ट कर एक ढांचा खड़ा किया था। उसी समय से हिंदू अपनी आस्था स्थली को पुन: प्राप्त करने का संघर्ष कर रहे हैं। उनका सपना भगवान राम के जन्मस्थान पर उनके भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण करना है। हालांकि, विरोधियों का कहना है कि राम के जन्मस्थान के दावे से संबंधित कोई प्रामाणिक साक्ष्य मौजूद नहीं है। जहां एक ओर दोनों समुदायों के लोगों के बीच दावों, प्रतिदावोंं, अदालती मामलों का सिलसिला जारी रहा, वहीं दूसरी ओर इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और राजनीतिक नेताओं के बीच दावों और प्रतिदावों की पुष्टि के संबंध में बहस शुरू हो गई। इससे मनमाने तथ्यों और कहानियों का बेलगाम प्रकाशन शुरू हुआ जिनमें दावों को साबित करने या खारिज करने की कवायद आम हो गई। साथ ही अंतहीन बैठकों, परिचर्चाओं, बहसों, अदालती मामलों का सिलसिला शुरू हो गया जो किसी परिणाम पर कभी पहुंचा ही नहीं।
समय बीतता गया और लोगों की बेचैनी भी बढ़ती गई। फिर आया 6 दिसंबर, 1992 का दिन जब तीर्थयात्रा और कारसेवा के लिए अयोध्या में एकत्रित हिंदू श्रद्धालुओं के आस्थागत उद्वेग ने ढांचा ध्वस्त कर दिया। उसके बाद से भारतीय परिदृश्य पर गहरा सन्नाटा पसरा है। कभी कभार सेकुलर तत्व छाती पीटकर हुल्लड़ मचाते हैं और फिर अपनी आरामगाह में लौट जाते हैं। ऐसे लोगों के मन में धर्म समरसता के व्यापक हितों के प्रति ईमानदारी या गांभीर्य का भाव नहीं। वे अपने आडंबरी मातम में एक पूरे समुदाय-यानी हिंदुओं-को सांप्रदायिक ठहरा कर इतिश्री कर लेते हैं।
 
वैश्विक विरासत
विरासत के मुद्दे पर 8 सितंबर, 1990 को वेनेजुएला के बार्कक्विसिमेटो में विश्व पुरातत्व कांग्रेस-2 के पूर्ण सत्र में पारित प्रस्ताव एक उल्लेखनीय दस्तावेज है। प्रस्ताव में चिह्नित बिन्दु इस प्रकार हैं: विश्व पुरातत्व कांग्रेस ने स्वीकार किया कि पवित्र स्थलों की पहचान और संरक्षण दुनियाभर में लोगों के लिए प्रमुख चिंता का विषय है और विश्व पुरातत्व कांग्रेस के तत्वावधान में एक बैठक का आयोजन होना चाहिए ताकि इसमें शामिल मुद्दों की पहचान की जा सके और पवित्र निर्माण स्थल, पवित्र स्थान और महत्वपूर्ण स्थलों के संबंध में अंतरराष्ट्रीय सहमति बन सके। ‘वन वर्ल्ड आर्कियोलॉजी’ श्रृंखला में ‘सेक्रेड साइट्स, सेक्रेड प्लेसेज’; ‘हू नीड्स द पास्ट’; ‘कंफ्लिक्ट्स इन द आर्कियोलॉजी आॅफ लिविंग ट्रेडीशंस’; ‘द प्रेजेंन्टेड पास्ट’; ‘पॉलिटिक्स आॅफ द पास्ट’ और अन्य संस्करणों का प्रकाशन एक अहम उपलब्धि है। श्रृंखला में ऐसे कई अन्य संस्करणों ने स्पष्ट रूप से विश्व पुरातत्व कांग्रेस के उद्देश्यों और लक्ष्यों को निर्धारित किया है। ये पुरातत्वविदों, इतिहासकारों और दुनिया के लोगों के लिए भी मानदंड निर्धारित करते हैं।
उपरोक्त प्रस्ताव के संदर्भ में प्रो़ पीटर जे़ उको वन वर्ल्ड आर्कियोलॉजी श्रृंखला में प्रकाशित ‘सेक्रेड साइट्स, सेक्रेड प्लेसेज’ के आमुख में लिखते हैं:
‘‘विश्व पुरातत्व कांग्रेस का सरोकार सिर्फ अतीत के दस्तावेज तैयार करना और उसे प्रस्तुत करना ही नहीं, बल्कि वह इस संदर्भ में भी अध्ययन करता है कि अतीत में लोग कैसे रहते थे, उसमें क्यों और कैसे बदलाव आया जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान समाज का अस्तित्व और संस्कृति विकसित हुई।’’
विश्व पुरातात्विक कांग्रेस(डब्ल्यूएसी) के विकास में ‘सेक्रेड साइट्स, सेक्रेड प्लेसेज’ का एक विशेष ऐतिहासिक स्थान है। डब्ल्यूएसी ने पहले ही यह दलील स्थापित कर दी थी कि पुरातत्वविदों या मानवविज्ञानी और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बसे स्थानीय निवासियों या जातीय समूहों के बीच भविष्य में बनने वाले संबंधों में विशेष महत्व के स्थलों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी और ऐसा ही हुआ। पवित्र स्थलों या पवित्र स्थानों और महत्वपूर्ण स्थलों के संबंध में 1990 में बार्कक्विसिमेटो में हुई डब्ल्यूएसी-2 की बैठक के परिणामस्वरूप डब्ल्यूएसी के पूर्ण सत्र और परिषद ने इन प्रस्तावों को मंजूर किया: डब्ल्यूएसी स्वीकार करता है़-
महत्वपूर्ण स्थल
कुछ हद तक इन्हीं कारणों से महत्वपूर्ण क्षेत्रों के संबंध में पुरातात्विक जांच-पड़ताल की दिशा डब्ल्यूएसी के भविष्य में होने वाले कार्यों के लिए ‘सेक्रेड साइट्स, सेक्रेड प्लेसेज’ को ही चार्टर के तौर पर अपनाना चाहिए।
संस्करण के प्रधान संपादक न केवल पवित्र और गोपनीय पवित्र के बीच के अंतर की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं, बल्कि उनका आदर करने के लिए जोर देते हैं। वह लिखते हैं: ‘‘सेक्रेड साइट्स, सेक्रेड प्लेसेज एक प्रभावशाली पुस्तक है, जो सशक्त विषयों को पेश करती है। जहां भी पवित्रता का भाव जुड़ा होता है, वहां पवित्र शब्द की अवधारणाएं अपरिवर्तित रहती हैं चाहे स्थितियां कैसी भी क्यों न हों। किसी को इस दलील के साथ विशेष रूप से उन स्थानों के महत्व को अस्वीकार करने का अधिकार नहीं जिसके प्रति लोग उचित भाव या व्यवहार व्यक्त कर रहे हैं, कि उनका अर्थ अतीत में अलग था और भविष्य में कुछ और हो सकता है। किसी भी विशेष समय पर ऐसे स्थानों की पहचान बनी रहनी चाहिए, ऐसी पहचान, जिसमें अलौकिकता का भाव और सामाजिक परिचय और व्यक्तिगत पहचान का साझा बल शामिल हो।’’ श्रृंखला के प्रधान संपादक प्रो़ पीटर जे़ उको विस्तार से बताते हैं कि कैसे और क्यों ऐेसे पवित्र स्थल, पवित्र स्थान या पवित्र रिक्त स्थान अस्तित्व में आते हैं। वह लिखते हैं:
‘‘महत्वपूर्ण स्थल विश्व परिदृश्य का हिस्सा हैं; इन परिदृश्यों को मनुष्य ने ही बनाया है-चाहे उसके साथ मनुष्य ने भावना का संबंध जोड़ा हो या वे पौराणिक संदर्भों से अस्तित्व में आए हों, या इंसानों ने स्वयं शारीरिक क्षमताओं के जरिए तैयार किया हो, अगर विशेष स्थलों को पुरातात्विक अभिलेखों से पहचानने में कठिनाई होती है तो हमें वर्तमान में उन चंद परिदृश्यों को (पूरी पृथ्वी नहीं) वही विशिष्ट मान्यता दे देनी चाहिए जो अतीत में उससे जुड़े समाज ने दे रखी थी।’’
इस प्रकार, सभी समुदायों ने अतीत में कुछ परिदृश्यों के साथ विशिष्ट भाव जोड़े थे, जो वर्तमान में भी बरकरार हैं। कभी-कभी मनुष्यों के द्वारा स्मारकों या अन्य संरचनाओं के रूप में किए गए निर्माण से उनका अस्तित्व स्पष्ट रूप से उपस्थित रहता है और कभी-कभी उनका भौतिक रूप मौजूद नहीं रहता। उन्होंने यह भी माना है कि ऐसे स्थलों और स्थानों को जानने का एकमात्र साधन पुरातत्व और भौतिक अभिलेख ही नहीं हैं, बल्कि स्थानीय परंपराएं, लोगों की मान्यताएं और प्रथाएं भी समान रूप से ऐसे विषयों की प्रामाणिकता पेश करने में अहम भूमिका निभाती हैं।
ऐसे पवित्र स्थलों और पवित्र स्थानों के साथ भावनात्मक, धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को डॉ. जेन ह्यूबर्ट ने ‘सेक्रेड साइट्स, सेक्रेड प्लेसेज’की प्रस्तावना में बहुत खूबसूरती से व्यक्त किया है। वह लिखती हैं: ‘‘किसी स्थल को पवित्र स्थान कहना भूमि के एक टुकड़े मात्र का वर्णन या किसी खास भौगोलिक पहचान को इंगित करना नहीं है। पवित्र स्थल के रूप में किसी स्थान की पहचान के साथ लोगों के व्यवहारगत नियमों और रीति-रिवाजों की पूरी श्रृंखला जुड़ी होती है जिनमें मान्यताओं की कड़ियां निहित होती हैं जो अनुभवातीत जगत, अक्सर पूर्वजों की आत्माओं, साथ ही दूर लोक के शक्तिशाली देवताओं या आत्माओं के प्रति आस्था का पालन करती हैं।’’
पवित्र स्थलों के स्वामित्व का प्रश्न अन्य लोगों या व्यक्तियों द्वारा घुसपैठ करने पर उठता है। भूमि पर किसी और का कब्जा न सिर्फ एक आर्थिक हानि है, बल्कि एक आध्यात्मिक क्षय भी है। भूमि को पौराणिक काल में हुई घटनाओं के आधार पर उसे पवित्र मान लिया जाता है।
कोई भी परिदृश्य इसलिए पवित्र है क्योंकि मनुष्य इसे पवित्र मानते हैं। पृथ्वी, पवित्र स्थानों और पुरातात्विक स्थलों के बारे में जानने के विभिन्न तरीके हैं। कुछ तरीके वैज्ञानिक हैं और कुछ आध्यात्मिक। जानकारी हासिल करने का एक तरीका दूसरे की वैधता को नकारता नहीं है। यह आवश्यक है कि वैज्ञानिक ज्ञान और उसके प्रभाव को स्वीकार किया जाए, साथ ही पारंपरिक देशी प्रणाली से जानकारी इकट्ठा करने की प्रक्रिया को भी मान्यता मिलनी चाहिए।
संभवत: पहली बार ऐसा हुआ है कि पुरातात्विक अध्ययन में अतीत के बारे में जानने की पारंपरिक प्रणाली को वैज्ञानिक तरीकों की तरह ही महत्वपूर्ण माना गया है। पीटर जे़ उको ने वन वर्ल्ड आर्कियोलॉजी श्रृंखला के अन्य संस्करण ‘कंफ्लीक्ट्स इन द आर्कियोलॉजी आफ लिविंग ट्रेडीशंस’ के आमुख में उस संगोष्ठी के आयोजन के कारणों पर चर्चा की है जिसके बाद आर्कियोलॉजी आफ लिविंग ट्रेडीशंस प्रकाशित हुई थी। इसके आमुख में वह लिखते हैं: ‘‘अतीत के संबंध में पुरातात्विक साक्ष्यों को एकमात्र वैध वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानने पर तथ्यों की पुनरीक्षा या उन्हें रद्द करना, अतीत को निरपेक्ष तिथियों के आधार पर विचारपूर्ण दलीलों के माध्यम से सत्यापन योग्य ऐतिहासिक दस्तावेजों की कसौटी पर अध्ययन करना एक संकीर्ण मानक है जो अतीत की कई साक्षर और निरक्षर सभ्यताआें और संस्कृतियों की जटिलता को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देता है।’’
उनके पवित्र स्थलों के स्वामित्व से उन्हें वंचित करने के विषय पर कार्लोस मामामी केडोरी के लेख की चर्चा करने के बाद, उसे प्रागैतिहासिक काल का हिस्सा कहने से मिली आलोचना और अपने पवित्र स्थल पर शुल्क देकर प्रवेश करने की व्यथा झेलने वाले पीटर उको लिखते हैं: ‘‘अतीत को उनसे और उनके लोगों से छीन लेना-इस प्रकार वर्तमान और भविष्य को उनके अधिकार से दूर रखना़ दुर्भाग्य से ये असाधारण स्थितियां नहीं जो असामान्य घटनाओं और कुछ खास संकटों से घिरे देशों तक सीमित हैं। इस तरह का अलगाव संयुक्त राज्य अमेरिका, अस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में आम है़।’’
मैं चाहता हूं कि प्रो़ उको अन्य देशों के नाम भी बताएं, जहां हिंदुओं की तरह अन्य लोग भी ऐसी ही दुश्वारियों का सामना कर रहे हैं, क्योंकि इस स्थिति का सामना सिर्फ वही लोग नहीं कर रहे जिन पर श्वेत लोगों ने शासन किया था, बल्कि उनसे पहले और कई अन्य विदेशियों ने भी शासन किया। अयोध्या विवाद के संदर्भ में कई लोग यह तर्क देते रहे हैं कि वैज्ञानिक और आर्थिक विकास को संस्कृति और धर्म सहित अन्य सभी चीजों पर वरीयता लेनी चाहिए। इस संबंध में मार्क्सवादी दृष्टिकोण से सभी परिचित हैं। इस संबंध में ओडब्ल्यूए सीरीज (नं 25) के एक संस्करण में संपादक ब्रायन मोलिनो का ‘द प्रेजेंटेड पास्ट आॅफ द इंट्रोडक्शन आॅफ द प्रेजेंटेड पास्ट: हेरिटेज, म्यूजियम और एजुकेशन’ में लिखा पहला पैरा बेहद प्रभावशाली है: ‘‘यह धारणा कि विश्व संस्कृति का सृजन सिर्फ तकनीक बेहतर करने और विज्ञान की सार्वभौमिक शिक्षा से हो सकता है, सर्वथा अविवेकी है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में इसने अपनी विश्वसनीयता खो दी है। विज्ञान आगे विकास कर सकता है, पर हमारा अभ्युदय अपनी संस्कृतियों के अतीत की डोर थाम कर ही हो सकता है। विज्ञान अपना इतिहास भूल सकता है, लेकिन एक समाज ऐसा कभी नहीं कर सकता।’’अयोध्या में राम का भव्य मंदिर बने, यह हिन्दू समाज की तीव्र आकांक्षा है। एक मुगल आक्रांता के द्वारा मंदिर को तोड़कर उसी की सामग्री से एक ढांचा खड़ा कर लेने का अर्थ यह नहीं होता कि देश के बहुसंख्यक समाज की आस्था को चंद वोटों की खातिर अनदेखा किया जाए। बात सिर्फ मंदिर की नहीं, धरोहर को संजोए रखने की है।