डा. शंकरदयाल शर्मा


पुण्यात्मा को श्रद्धांजलि

"सादा जीवन उच्च विचार' की उक्ति को चरितार्थ करने वाले भारत के दसवें राष्ट्रपति डा. शंकरदयाल शर्मा का लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया। अनुशासनप्रियता, ईमानदारी, निष्कलंकता तथा सहज व्यक्तित्व के कारण उनकी छवि एक आदर्श राजनीतिज्ञ की थी। 19 अगस्त, 1918 को भोपाल में जन्मे डा. शंकरदयाल शर्मा न केवल कुशल राजनीतिज्ञ थे अपितु कला मर्मज्ञ भी थे। इस बहुमुखी व्यक्तित्व की नींव उन्हें बाल्यकाल में मिले संस्कारों के साथ ही पड़ने लगी थी। उनमें भाषाओं को जानने-समझने की उत्सुकता कितनी थी, इसका प्रमाण इसी बात से मिलता है कि उन्होंने हिन्दी, संस्कृत और फिर अंग्रेजी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। लोक प्रशासन में विशेष पाठ्यक्रम के लिए वह लंदन गए। उन्होंने अपनी शैक्षिक यात्रा में भोपाल के विद्यालय से लेकर, आगरा वि·श्वविद्यालय, इलाहाबाद वि·श्वविद्यालय, लखनऊ वि·श्वविद्यालय, कैम्ब्रिश्वज वि·श्वविद्यालय (लंदन), और ज्यूरिख वि·श्वविद्यालय (पेरिस) के पड़ाव तय किए। लखनऊ वि·श्वविद्यालय में और कैम्ब्रिश्वज वि·श्वविद्यालय में उन्होंने अध्यापन कार्य भी किया। साहित्य में रुचि होने के कारण ही वे टैगोर सोसायटी और कैम्ब्रिज मजलिस से जुड़े। शिक्षा ग्रहण करने के साथ-साथ उन्हें भारत की दासता निरंतर कचोटती रही। और उन्होंने स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय भाग लेना शुरू कर दिया। बाद में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करके विधिवत् राजनीति में प्रवेश किया। फिर तो उनकी राजनीतिक यात्रा भोपाल रियासत के मुख्यमंत्री, कांग्रेस महासचिव, कांग्रेस अध्यक्ष, केन्द्रीय मंत्री, पंजाब और फिर महाराष्ट्र के राज्यपाल जैसे पड़ाव तय करती हुई राष्ट्रपति पद पर आकर रुकी। 1992 में उन्होंने देश के दसवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण की और 1997 में वे इस पद से सेवानिवृत्त हुए। राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होंने संवैधानिक संकट के समय अनेक बार निष्पक्ष निर्णय लिए। इन्हीं में से एक निर्णय था 1996 में लोकसभा चुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना। डा. शर्मा देश के एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति थे जिनके साथ चार प्रधानमंत्रियों ने काम किया। राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्त डा. शर्मा की आयु बढ़ चली थी, शरीर थक गया था, किन्तु मन अभी भी नहीं थका था, तभी तो विभिन्न कला-प्रदर्शनियों और कार्यक्रमों में वे अक्सर दिखाई दे जाते थे। किन्तु गत साढ़े तीन माह से वह नयी दिल्ली के एक निजी अस्पताल में अपनी बीमारी से जूझ रहे थे। डा. शर्मा ने 25 जनवरी की 10.35 बजे अन्तिम सांस ली। पुण्यात्मा डा. शंकरदयाल शर्मा को पाञ्चजन्य परिवार की श्रद्धांजलि।

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