मौत को बुलावा था हिन्दू पोशाक पहनना


यह उन दिनों की बात है, जब देश के अधिकतर शिखर अधिकारी और नेता हिन्दी में सोचते थे और हिन्दी में लिखते भी थे। इस बात के लिए कभी उनके मन में हीन भावना भी नहीं रही। पाकिस्तान में भारत के प्रथम उच्चायुक्त के नाते गए कांग्रेस नेता और उद्भट विद्वान श्री श्रीप्रकाश ने तब मूल हिन्दी में एक लेखमाला लिखी थी, "पाकिस्तान के प्रारम्भिक दिन'। वह लेखमाला बाद में पुस्तक के रूप में छपी। यह पुस्तक दो कारणों से महत्वपूर्ण है। एक तो यह पाकिस्तान के प्रारम्भिक दिनों में उसके मानस को अभिव्यक्त करती है और बताती है कि वे कौन से तत्व थे, जिन्होंने पाकिस्तान नाम के एक कृत्रिम राज्य को आकार दिया। दूसरे, यह पाकिस्तान के प्रति कांग्रेसी नेताओं और तात्कालिक कांग्रेस सरकार के मानस को भी अभिव्यक्त करती है। इस पुस्तक का प्रकाशन के सुप्रसिद्ध "मीनाक्षी प्रकाशन' बेगम पुल, मेरठ ने 1966 में किया था। "गणतंत्र दिवस अंक' में इस पुस्तक का पहला अंश छपा था। इस बार प्रस्तुत है तीसरी और अन्तिम कड़ी।-सं.

द श्रीप्रकाश

मेरी गैरहाजिरी में सिन्ध के किसी आंतरिक प्रदेश से मेरे दूतावास में एक तार आया था कि कुछ सिख लोग अमुक रेल से 6 जनवरी को कराची पहुंच रहे हैं। मेरे एक सहायक (अटैचे) ने तार लिया और उसे बिना कुछ महत्व दिए अपनी जेब में रख लिया। मुझे भी इसकी कोई खबर नहीं दी। ये सिख लोग दूसरे दिन आने वाले थे। यदि मुझे मालूम होता तो उनके स्वागत का और ठहरने का मैं कुछ प्रबन्ध करता। मैं तो एक दिन पहले ही लौटा था। जब मुझे कुछ सूचना नहीं दी गई तो मैं क्या कर सकता था। इस सबका तो मुझे कई दिन पीछे पता लगा। ये सब सिख उतरे और सबकी निर्मम हत्या कर दी गयी। इसका मेरे हृदय पर सदा ही भारी दु:ख बना रहेगा। शायद इनकी संख्या 117 थी। मुझे ठीक याद नहीं। सिखों और मुसलमानों में उस समय विशेष रूप से वैर था। वे एक दूसरे को देख नहीं सकते थे। पूर्वी और पश्चिमी पंजाब में एक दूसरे के ऊपर भयंकर आक्रमण कर रहे थे। निर्मम हत्याएं हो रही थीं। बड़ी लूटमार मची थी।

दाढ़ी और साफा आदि से सिख तो फौरन ही पहचान लिए जाते हैं। कराची में पूर्वी पंजाब से बहुत से मुसलमान आए थे। इनके हृदयों में वहां की स्थिति की बहुत चोट थी। सिखों को यह बरदाश्त नहीं कर सकते थे। यह सिख जो कराची आए वह बिल्कुल ही असहाय अवस्था में वहां पहुंचे थे, क्योंकि हमारे दूतावास की तरफ से उनके लिए कोई प्रबन्ध नहीं था। वे सब मारे गए और कराची में इतना भयंकर जोश फैला कि हिन्दुओं की सम्पत्ति उस दिन नष्ट-भ्रष्ट हो गयी। वे अपने मकानों से निकाल दिए गए। यह सब तीसरे पहर की घटना है। भयंकर आतंक फैला। मेरे दूतावास में सैकड़ों नर-नारियों ने आकर आश्रय लिया।

पाकिस्तान के उच्च अधिकारीगण मुझसे मिलने आए। वहां के गृह-विभाग के बड़े अफसर जनाब आगा शाही ने मुझसे कहा कि आपके व्यक्तिगत लिहाज से उत्पात बन्द हुआ, नहीं तो मालूम नहीं क्या हो जाता। मैं नहीं कह सकता कि किस कारण उन्होंने ऐसा मुझसे कहा। मैं तो इससे सन्तोष नहीं ही कर सकता था कि मेरे ऊपर व्यक्तिगत रूप से कृपा कर इन लोगों ने अधिक अनर्थ नहीं किया। वहां के बड़े-बड़े अफसर अवश्य विह्वल थे। सौभाग्यवश मेरे मित्र का मकान जहां मैं ठहरा था नहीं लूटा गया यद्यपि इधर-उधर के मकान लुटे। इस घटना के बाद वहां पर पुलिस गार्ड को रखा जाने लगा। दूतावास में तो पहले से ही इसका प्रबन्ध था।

मैं शहर की स्थिति देखने निकला। कितने ही हिन्दू अपने-अपने घरों से भाग-भाग कर सार्वजनिक स्थानों पर-विद्यालयों आदि के अहातों में-शरण ले रहे थे। वहां के प्रधान सेनापति जनरल अकबर खां, जिन्हें मैं पहले से ही जानता था और जो हमारे विशिष्ट कांग्रेस जन और सहयोगी अलीगढ़ के ख्वाजा अब्दुल मजीद के रिश्तेदार थे, मेरे साथ हो लिए। वे बहुत दु:खी थे। उनकी कितने ही हिन्दुओं से निज की मैत्री थी। नगर की रक्षा के लिए सेना आ गयी थी। मेरे सामने जनरल साहब ने अपने सिपाहियों को हुकम दिया कि यदि गोली चलाने की आवश्यकता हो तो "ऐसे गोली मारो कि मृत्यु हो जाए' (शूट टू किल)।

श्री रामकृष्ण आश्रम में भी मैं पहुंचा। इस संस्था को मैं वर्षों से जानता था। कराची में अपनी पहली यात्राओं में भी मैं यहां गया था। जब मैं उच्चायुक्त होकर आया तब तो मैं प्रति सप्ताह ही वहां जाया करता था। विद्वान स्वामी रंगनाथानन्द इसके मुखिया थे। यह बड़े ही लोकप्रिय प्रचारक रहे हैं। इनका भाषण सुनने के लिए बहुत से लोग एकत्रित हुआ करते थे। उस समय वे वहां नहीं थे। भारत में कहीं दौरे पर गए थे। यहां के सब स्वामी लोगों ने हमारे दूतावास में आश्रय लिया। पुस्तकालय से पुस्तकों को निकाल कर आततायियों ने उनमें आग लगा दी। जलती हुई पुस्तक राशि के सबसे ऊपर मैंने अपने पिता श्री डाक्टर भगवान् दास की अंग्रेजी की पुस्तक की एक प्रति देखी जिसका नाम था "सब धर्मों की मौलिक एकता' (एसेंशियल यूनिटी ऑफ आल रेलिजंस)।

आधुनिक कराची के एक प्रकार से निर्माता और सर्वोच्च लोकप्रिय नागरिक श्री जमशेद मेहता थे। पिताजी से उनकी बड़ी मैत्री थी। थियोसाफिकल सोसायटी से निकट सम्पर्क रखने के कारण वे मुझसे बहुत प्रेम रखते थे, और उन दुर्दिनों में मेरी और मेरे कार्यों में हर प्रकार की सहायता करते थे। वे सबके ही मित्र थे। कराची के सब लोग उन्हें जानते थे। पर जिस नगर को उन्होंने बनाया, उसी में वे पाकिस्तान की स्थापना के बाद अपरिचित हो गए। जहां सब लोग इनको मानते थे, वहां वह अनजान से हो गए। भग्न हृदय होकर थोड़े दिनों बाद वह संसार से चले ही गए। शाम को यह भी घूमते-फिरते मेरे पास पहुंचे। तीन-चार सौ नर-नारी हमारे दूतावास के थोड़े से कमरों और कोठरियों में शरणार्थी होकर आ गए थे।

इनके भोजन की समस्या उठी। मुझे श्री जमशेद जी चन्दू हलवाई की दुकान पर ले गए। वहां पर हमने तीन-चार सौ आदमियों के लिए दाल, चावल, रोटी, सब्जी ली। बड़े सन्तोष की बात थी कि इतना भोजन वहां तैयार मिल गया। रात के 10 बजे का समय रहा होगा। जब मैंने अपना बटुआ निकाला और उसका दाम देना चाहा तो चन्दू हलवाई ने दाम लेना अस्वीकार कर दिया। मैंने उन्हें बहुत समझाया कि यह मैं अपने पास से नहीं दे रहा हूं। मैं भारत सरकार से इसे ले लूंगा। तब भी उन्होंने एक पैसा भी नहीं लिया। मैं भोजन लेकर दूतावास आया। सब लोगों को भोजन करा रात्रि को अपने मित्र के यहां चला गया। पीछे चन्दू हलवाई कराची से बम्बई चले गए। कुछ दिन पीछे अंग्रेजी कपड़े पहने हुए मुझसे मिलने आए। मैंने पहचाना नहीं। इन्होंने अपना परिचय दिया। मेरे पूछने पर कि आपने यह वस्त्र क्यों धारण किया, उन्होंने कहा कि इसी से कराची में अब हमारी रक्षा हो सकती है। हिन्दू लोग अपने वस्त्र में निकलते डरते थे।

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