डिपेक्स-2001 में दिखा


विज्ञान के छात्रों का अद्भुत कौशल

-- विद्याधर वालावलकर

दीप प्रज्ज्वलित कर प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए श्री प्रमोद महाजन

"जैविक विज्ञान' गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए सुश्री मंजिरी चुणेकर (पुरस्कारप्राप्त महिला उद्यमी व मायक्रोबायोलाजिस्ट)। मंच पर उनके दाईं ओर प्रा.डा. सिद्धिविनायक बर्वे तथा बाईं ओर वैज्ञानिक डा. कर्वे उपस्थित हैं

वैकल्पिक सस्ता ईंधन, सरकारी बहुतकनीकी संस्थान, उस्मानाबाद

बहुतकनीकी संस्थान अर्थात् "पालिटेक्निक' के अभियांत्रिकी छात्रों को उनकी सृजनशीलता, कल्पनाशीलता एवं प्रतिभा अभिव्यक्त करने का अवसर प्राप्त हो तथा उद्योग, व्यापार एवं शिक्षा संस्थानों की विभूतियों से उनका सीधा सम्पर्क एवं संवाद स्थापित हो, इस उद्देश्य से महाराष्ट्र में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् एवं तकनीकी शिक्षण विद्यार्थी परिषद् द्वारा "डिपेक्स प्रदर्शनी' अर्थात् "पाठ्यक्रम प्रदर्शनी' का आयोजन किया जाता है। इसके अंतर्गत प्रतिवर्ष छात्रों द्वारा बनाई गई चल-प्रतिकृतियों की प्रदर्शनी लगाई जाती है तथा सर्वोत्तम प्रतिकृतियों को पुरस्कार देकर प्रोत्साहित किया जाता है। इस वर्ष 7 से 11 फरवरी तक मुम्बई के निकटवर्ती नगर-ठाणे में पांच दिवसीय प्रदर्शनी सम्पन्न हुई। इसमें राज्य के 34 जिलों के 1050 छात्रों ने हिस्सा लिया। छात्रों की कुल 227 चल-प्रतिकृतियां "प्रदर्शनी' में रखी गईं। प्रदर्शनी के कुल 14 विभाग थे जिसमें हर विभाग की दो-दो प्रतिकृतियों ने पुरस्कार प्राप्त किए।

स्वयं विद्युतभारित, सरकारी बहुतकनीकी संस्थान, धुलिया

7 फरवरी को सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री प्रमोद महाजन ने "प्रदर्शनी' का उद्घाटन किया। उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश द्वारा की गयी अप्रत्याशित प्रगति को आर्थिक स्वतंत्रता की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बताते हुए छात्रों से आग्रह किया कि वे भी इस लड़ाई में भाग लें। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सूचना प्रौद्योगिकी जनित क्रांति गरीब के घर तक नहीं पहुंची तो उससे पनपी विषमता का मुकाबला करना सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी।

आटोगाइरो, भारती विद्यापीठ बहुतकनीकी संस्थान, पुणे

अ.भा.वि.प. के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा. शिरीष कुलकर्णी ने अपने समापन भाषण में सूचना प्रौद्योगिकी की चकाचौंध से सतर्क रहने की सलाह देते हुए सम्यक्, संतुलित व समुचित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि प्राप्त जानकारी का उचित ढंग से आकलन नहीं किया गया या उसके प्रयोग को कुशलता से आत्मसात नहीं किया गया तो सूचना प्रौद्योगिकी हमारे काम नहीं आएगी। विज्ञान के क्षेत्र में प्राचीन भारत में हुए विस्मयकारी आविष्कारों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत को यदि विश्वगुरु बनाना है तो सर्वांगीण विकास की आवश्यकता है, न कि किसी एक क्षेत्र में।

सांगली स्थित बहुतकनीकी संस्थान के छात्रों ने सामान्य प्रतिस्पद्र्धा जीती। पुरस्कार दे रहे हैं डा. शिरीष कुलकर्णी तथा उनके साथ हैं उद्यमी श्री डोल एवं "ग्लोबल टेलिसिस्टम्स' के श्री शशिकांत जाधव

इस अवसर पर चार विभिन्न विषयों पर गोष्ठी का आयोजन किया गया जिनमें सम्बंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भाग लेकर छात्रों का मार्गदर्शन किया। ये विषय थे-"सूचना प्रौद्योगिकी-भारत के लिए', "उद्योगों में नई विचारधारा', "ग्रामीण औद्योगीकरण' तथा "जैविक विज्ञान'। इस वर्ष पहली बार "जैविक विज्ञान' पर गोष्ठी का आयोजन हुआ।

कम्पनी, उद्योग, बैंक एवं शिक्षा क्षेत्र के प्रमुख व्यक्ति इस अवसर पर उपस्थित हुए और छात्रों को उचित सुझाव देकर उन्हें प्रोत्साहित किया। लगभग 20,000 नागरिक भी इस प्रदर्शनी को देखने आए।

इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रही एक अन्य प्रदर्शनी-"भारतीय प्रौद्योगिकी की सफल गाथा'। इसमें छात्रों ने कोंकण रेल निगम, सीमेंस, भारतीय सड़क विकास निगम, आशिदा इलेक्ट्रानिक्स के सहयोग से भारत की तकनीकी प्रगति की झांकियां प्रस्तुत कीं। कोयना लेक टैपिंग एवं मोनोरेल जैसी प्रतिकृतियों ने दर्शकों को काफी प्रभावित किया।

"डिपेक्स' का सूत्रपात 1986 में हुआ था, जो आरम्भ में केवल बहुतकनीकी संस्थानों के छात्रों तक ही सीमित रहा। उत्तरोत्तर उसका दायरा विस्तृत होता गया और आज "डिपेक्स' के साथ अभियांत्रिकी महाविद्यालय, आई.आई.टी., स्नातकोत्तर अभियांत्रिक शिक्षा तथा अनुसंधान संस्थानों के छात्र भी जुड़ गए हैं।

गुजरात के प्रलयंकारी भूकम्प को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष यह शैक्षिक प्रदर्शनी सादगी से सम्पन्न हुई। फिर भी छात्रों को उनका कौशल और प्रतिभा दिखाने का पूरा अवसर दिया गया। प्रदर्शनी के प्रवेश शुल्क से जमा राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा भूकम्प पीड़ितों के सहायता-कोष में दिया गया। तलपट

सुविख्यात जनसंख्या विशेषज्ञ श्री आशीष बोस के अनुसार 1971 से 1981 के दशक में भारत में हिन्दुओं की जनसंख्या में 24.2 प्रतिशत वृद्धि थी जबकि मुसलमानों की जनसंख्या में 30.6 प्रतिशत वृद्धि हुई। भारत सरकार के जनसंख्या प्रतिवेदन के अनुसार 1951 में भारत की जनसंख्या में मुसलमानों का प्रतिशत 9.9 था जो 1991 में बढ़कर 12.0 हो गया है।

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