अढ़ाई दिन का झोंपड़ा


सिर्फ ढाई दिन में मंदिरों को तोड़कर बनवाई गई मस्जिद

-- प्रफुल्ल गोराडिया

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर पिछला वार्षिक उर्स 8 अक्तूबर को समाप्त हुआ। छह दिन के समारोह के दौरान लाखों लोगों ने अजमेर की यात्रा की, कुछ लोग बंगलादेश जैसे दूरदराज स्थानों से भी आए थे। महानतम सूफी संतों में माने जाने वाले ख्वाजा साहब 1161 ई. में भारत आए थे और अजमेर आकर बस गए थे। वे आज भी वहीं दफन हैं। पिछले उर्स के बारे में कहा जाता है कि यह 778 वां उर्स था।

दरगाह से एक फर्लांग आगे मैं त्रिपोली दरवाजे के पार गया जहां से पृथ्वीराज चौहान के एक पूर्वज द्वारा बनवाए गए तीन मंदिरों के परिसर तक पहुंचा जा सकता है। परिसर में एक संस्कृत पाठशाला भी थी जिसकी स्थापना पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज विग्रहराज तृतीय ने लगभग 1158 ई. में की थी। वह साहित्य प्रेमी था और स्वयं नाटक लिखता था। उनमें से एक हरकेली नाटक काले पत्थरों पर उत्कीर्ण किया गया जो अजमेर स्थित अकबर किला के राजपूताना संग्रहालय में आज भी प्रदर्शित है। इसी संग्रहालय में उक्त परिसर में लाई गई लगभग सौ सुंदर मूर्तियां एक पंक्ति में रखी हुई हैं। ऐसा ही एक नाटक और मिला जो राजकवि सोमदेव द्वारा रचित था। बलुआ पत्थर की मूर्तियां लगभग 900 वर्षों से सुरक्षित हैं लेकिन सभी मूर्तियों के चेहरे व्यवस्थित रूप से तोड़ दिए गए हैं। मंदिर परिसर के अहाते में भी विशाल भंडारगृह है, जिसमें और भी अनेक सुंदर मूर्तियां हैं। अपेक्षाकृत कम महत्व के अवशेष अहाते में इस प्रकार पड़े हैं कि जो चाहे उन्हें ले जाए।

पिछले 800 वर्षों से यह परिसर अढ़ाई दिन का झोपड़ा नाम से विख्यात है। यह नाम इसलिए रखा गया है, क्योंकि पहले परिसर के तीन मंदिरों को ढाई दिन के भीतर मस्जिद के रूप में बदल दिया गया था। तराई के दूसरे युद्ध (1192ई.) के बाद मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराकर उसका वध किया, विजेता के रूप में अजमेर से गुजरा था। वह यहां मंदिर से इतना भयभीत हुआ कि उसने उसे तुरंत नष्ट करके उसके स्थान पर मस्जिद बनाने की इच्छा प्रकट की। उसने अपने गुलाम सेनापति को सारा काम 60 घंटे में पूरा करने का आदेश दिया ताकि लौटते समय वह नई मस्जिद में नमाज अदा कर सके।

मुगलों द्वारा ध्वंस किए गए मंदिरों की श्रृंखला में यह झोंपड़ा ही पहला मंदिर है। इससे पहले महमूद गजनवी द्वारा ऐसे ही अत्याचार किए गए थे। लेकिन आक्रमण करने के बाद उसने रुककर शासन नहीं किया। तीनों मंदिर इतने आकर्षक थे कि उनका ध्वंस करने वालों ने लगभग सभी स्तंभों को बना रहने दिया। ऐसे 70 स्तंभ तीन छतों के नीचे इस प्रकार बने हैं कि तीनों छतें मिलकर एक छत के रूप में दिखाई देती हैं। छतदार भवन के आगे अन्य स्तम्भ भी हैं जो बढ़िया पत्थर के मंडप से दिखाई देते हैं।

स्तंभों की ऊंचाई लगभग 25 फीट है और उनमें लगभग 20 फीट की ऊंचाई तक अति सुंदर नक्काशी का काम है। जिसमें अत्यंत सुंदर नमूने बने हुए हैं जिनके ऊपर चित्ताकर्षक आकृतियां भी हैं। यह एक अस्वाभाविक बात है कि उनमें कोई भी ऐसी आकृति नहीं है जिसका सर न काटा गया हो। यूरोप में कहीं भी कलाकृतियों को इस प्रकार नष्ट करने का उदाहरण दिखाई नहीं देता। इसका अपवाद ई.पू. 455 में रोम विजय के बाद वैंडलो द्वारा किया गया अपने प्रकार का ध्वंस कार्य था। उसी के बाद से वैंडल शब्द को अपवित्रीकरण और ध्वंस के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। राजपूताना संग्रहालय में प्रदर्शित की गईं और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा निकाल कर झोपड़े के अहाते में बंद ताले में विधिवत रखी गईं सभी आकृतियों के चेहरे व्यवस्थित रूप से तोड़े गए हैं। पत्थर के बने हजारों मुंडों में वस्तुत: एक भी ऐसा नहीं है जिसकी कोई नाक या आंख सलामत हो।

यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उस परिसर में खुदाई करके अवशेष निकालने का कोई भी काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने नहीं किया है। राष्ट्रीय स्मारक संरक्षण अधिनियम 1957 पारित होने के बाद से पुरातत्व से सम्बंधित सभी क्रियाकलाप रोक दिए गए हैं। जो कुछ भी खुदाई हुई है वह 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में हुई थी जिसका श्रेय जनरल एलेक्सजेंडर कनिंघम और डा. बी.आर. भंडारकार को प्राप्त है। इसका विवरण 1966 में प्रकाशित "राजस्थान डिस्ट्रिक्ट गजेटियर अजमेर' (पृ. 703/707) में दिया गया है।

संभवत: मोहम्मद गोरी ढाई दिन की अवधि के बाद वहां नमाज अदा करना चाहता था। ढाई दिन के झोंपड़े को बाद में पूरा किया गया और उसमें सुंदर नक्काशीदार दरवाजा लगाया गया। इसका श्रेष्ठ वर्णन फ्यूहरर द्वारा पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की 1893 की वार्षिक रपट में इन शब्दों में किया गया है-"समूचे बहिर्मार्ग में इतनी महीन और कोमल नक्काशी की जाली तराशी गई है कि उसकी तुलना महीन जालीदार कपड़े से की जा सकती है।' कनिंघम ने झोंपड़े के बहिर्मार्ग का वर्णन और भी विशिष्ट तरीके से किया है "अलंकार के इतने ज्यादा भड़कीलेपन, नक्काशी की इतनी सुंदर प्रचुरता, सजावट के इतने नुकीलेपन, कारीगरी की इतनी श्रमसाध्य शुद्धता, सजावट की असीम विविधता जो कि पूर्णत: हिन्दू कारीगरों ने पैदा की थी, इन सभी की दृष्टि से इस भवन की तुलना वि·श्व के सुंदरतम भवन से की जा सकती है।'

मूलराज आनंद ने इस हिन्दू मूर्तिकला का वर्णन इन शब्दों में किया है,"अजमेर के संग्रहालय में की गई इस नक्काशी में आपस में रहस्यमय रूप से जुड़ी हुई आकृतियां हैं, जो प्रकटत: सजावट के लिए बनाई गई हैं। इसमें छैनी का प्रयोग इतनी सफाई से किया गया है कि यह केवल सजावट ही न होकर एक सुसम्बद्ध और संतुलित रचना बन गई है।' लेकिन इस वर्णन में विकृतीकरण और अपवित्रीकरण की मनोवेदना का कोई उल्लेख नहीं है। वास्तव में इस भवन में कुछ भी सुसम्बद्ध और संतुलित नहीं है। मूल आकृतियां, स्तम्भ और तीन छत्तें अलग खड़ी दिखाई देती हैं। उसके परवर्तियों द्वारा बनाया गया बहिमार्ग बिल्कुल भिन्न है। अन्य स्तम्भों से कई फीट दूर है। इसमें पवित्र कुरान की आयतों की नक्काशी एक ऐसे पीले पत्थर पर की गई है जो पीछे बने हिन्दू भवन में लगे पत्थर की तुलना में निश्चित रूप से कमजोर है। प्रयत्न की इस अशिष्टता की अनदेखी मूलराज आनंद द्वारा संभवत उनके सेकुलरवाद से सम्बंधित विचार की दृष्टि से की गई है।

दिल्ली के सुल्तान द्वारा शुरू किए गए ध्वंस का यह एक स्वरूप था। कुतुब मीनार के पास सुल्तान एबक द्वारा बनाई गई कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद और अजमेर स्थित ढाई दिन का झोपड़ा दोनों ही विजेता द्वारा हारे हुए लोगों के प्रति किए गए ऐसे अपमान का नमूना है जिसका दःकठ्ठफ़्-दृफ्/श्फ् फ्!फ् नकेफ्-फ्।सेकुलरवादफ्-फ्।से ः

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