इतिहास

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गुमनाम क्रांति गाथाएं

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महात्मा गांधी से लेकर महान क्रांतिकारी भगत सिंह की शहादत बच्चे-बच्चे की जुबान पर है। चंद्रशेखर का बलिदान आज भी राष्ट़भक्तों की आंखें नम कर देता है। सुखदेव, राजगुरु, खुदीराम बोस व रामप्रसाद बिस्मिल जैसे वीर सेनानियों की कुर्बानियां इतने वर्षों के बाद भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान शहीद मंगल पांडेय, रानी लक्ष्मीबाई, बाजीराव पेशवा, तात्या टोपे भी श्रद्धा के पात्र हैं। इसके अलावा, ऊधम सिंह, मदनललाल धींगरा, कुंवर सिंह, भगवतीचरण वोहरा, बटुकेश्वर दत्त, बाघा जतीन, बुधु भग..

‘देवदूत थे स्वयंसेवक’

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बंटवारे की त्रासदी सात दशक बाद भी भूले नहीं भूलती। जब हिन्दू मां-बहनों पर खुलेआम आततायी मुसलमानों द्वारा अत्याचार किया जा रहा था, घर-दुकान, व्यवसाय को तहस-नहस करके परिवार के परिवार मौत के घाट उतार दिए जा रहे थे। यहां तक कि गर्भवती महिलाओं तक को मुसलमानों ने नहीं छोड़ा। उनके गर्भ पर वार करके पेट से बच्चा निकालकर सूली पर टांग कर उसकी हत्या की गई। ऐसी निर्दयता भला जीते-जी कौन भूल सकता है! 1940 में मैं संघ का स्वयंसेवक बन गया। 1947 में पंजाब एवं पास के क्षेत्रों के स्वयंसेवकों के लिए फगवाड़ा में संघ का ..

भारत की अखंडता के ध्वजवाहक रहे महर्षि अरविन्द के जन्मदिवस पर विशेष

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भारतीय स्वाधीनता संग्राम में श्री अरविन्द का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उनका बचपन घोर विदेशी और विधर्मी वातावरण में बीता। पर पूर्वजन्म के संस्कारों के बल पर वे महान आध्यात्मिक पुरुष बने ओर महर्षि कहलाए..

‘स्वयंसेवकों ने दिया सेना का साथ’

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विभाजन के समय मेरी आयु 7 वर्ष की थी। मैं मीरपुर में रहता था। यह बड़ा ही समृद्ध और पढ़े-लिखे लोगों का इलाका था। 15 अगस्त, 1947 को जब विभाजन के कारण पाकिस्तान से हिन्दू भारत आ रहे थे, उस समय मीरपुर के लोगों को आशा थी कि जम्मू-कश्मीर राज्य के राजा हरि सिंह का क्षेत्र होने के कारण इसका भारत में ही विलय होगा। मुजफ्फराबाद या आस-पास के क्षेत्रों से जो पलायन हो रहा था, मीरपुर के हिन्दुओं ने उन्हें अपने में ही बसा लिया और वह 7-8 हजार लोग इन हिन्दू परिवारों में ही समा गए। इस प्रकार मीरपुर की आबादी जो कि 10-12 ..

'जो कुछ हूं संघ की बदौलत हूं'

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बंटवारे के दौर की रातों को पाकिस्तान से आना वाला कोई भी हिन्दू नहीं भूल सकता, हिन्दुओं के घरों को आग लगा दी जाती थी, बहन-बेटियों का अपहरण कर लिया जाता था। हत्याएं होती थीं।। मैं उस समय 8 वर्ष था। मेरे बड़े भाई एवं चाचा मुल्तान के पास स्थित डेरा इस्माइल खान में संघ की शाखा लगाया करते थे। पांच वर्ष का होने पर मैं भी शाखा में जाने लगा। मुझे याद है बंटवारे के समय जब ज्यादा माहौल खराब होने लगा तो हमारे चाचा जी स्वयंसेवकों के साथ छत पर पहरा दिया करते थे ताकि हिन्दू मोहल्ले में आततायी हमला न करने पाएं। क्योंकि ..

‘नहीं भूलते बंटवारे के दिन’

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 बंटवारे के वक्त मैं नागपुर में संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था। इस बीच पाकिस्तान की ओर से हिन्दुओं के पलायन की खबरें आनी शुरू हुर्इं। संघ अधिकारियों ने वर्ग को जल्दी समाप्त कर दिया ताकि सीमापार रहने वाले स्वयंसेवक अपने परिवार की मदद कर सकें। नागपुर से मैं फगवाड़ा आया, जहां संघ का शिविर लगा हुआ था और पूज्य गुरुजी वहां आए हुए थे। पाकिस्तान के हालात को देखकर शुरुआत में गुरुजी का आग्रह था कि लोग अपनी जमीन और घर न छोड़ें। लेकिन दिनोदिन स्थिति जब बहुत खराब होने लगी तो उन्होंने स्वयंसेवकों ..

‘रास्ते में बिछी थीं लाशें’

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बंटवारे के दिनों के बारे में जब भी सोचता हूं तो एक अजीब सी उलझन होने लगती है। उन दिनों पाकिस्तान में जहां भी हिन्दू रह रहे थे, वे सभी डरे हुए थे कि कब क्या हो जाए। मेरी माता जी का देहांत हो जाने के कारण मेरा लालन-पालन बुआ जी के पास हुआ। तब मेरी उम्र 8 वर्ष थी। अचानक एक दिन हमारे मुहल्ले में भी हालात खराब हो गए। स्थिति इतनी ज्यादा खराब थी कि पलायन ही एक मात्र रास्ता सभी को सूझ रहा था क्योंकि आस-पास के हिन्दू परिवार जब शाम को एक स्थान पर एकत्र होते थे तो पाकिस्तान के विभिन्न स्थानों पर मुसलमानों द्वारा ..

‘मुसलमानों ने बर्बरता की हदें पार कीं’

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बात उन दिनों की है जब मेरे बड़े भाईसाहब सेना मुख्यालय से जुड़े एक सरकारी दफ्तर में काम करते थे। कुछ दिन बाद उनका स्थानांतरण लाहौर हो गया। उस समय मैं मैट्रिक पास कर चुका था। तो भाईसाहब ने कहा कि गांव से लाहौर चले आओ तो यहां नौकरी मिल जाएगी। मुझे याद है कि मैं 8 जुलाई,1946 को लाहौर पहुंच गया। भाई की मदद से दो-तीन दिन बाद ही नौकरी मिल गयी। कुछ दिन कार्य करने के बाद 1 अक्तूबर,1946 को मुझे एक विदेशी कंपनी में बाबू की नौकरी मिल गई। मैंने कंपनी के पास में ही एक किराए का कमरा लिया। इसी के पास संघ की शाखा लगती ..

‘स्वयंसेवकों ने मदद की तो आया जीवन में स्थायित्व’

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मेरा गांव गदाई, डेरा गाजी खान से दो मील दूर था। गदाई में 1942 में संघ की शाखा शुरू हुई थी। नोनीत राय जी हमारे मुख्य शिक्षक थे। वे डेरा गाजीखान से रोजाना आते और शाखा लगाते। वही हम स्वयंसेवकों को जगाते भी थे। उनकी मेहनत और संघ के प्रति निष्ठा देखकर अनेक लोग स्वयंसेवक बने। उनमें मैं भी एक था। जब हम लोग शाखा लगाते तो उस समय मुसलमानों की भीड़ इकट्ठी हो जाती थी। बाद में कई बार यही भीड़ हिंसा पर उतारू हो गई। इसके बावजूद शाखा चलती रही। शाखा से गांव के हिंदुओं को एक नई ऊर्जा मिलती थी और वही ऊर्जा उन्हें बंटवारे ..

'रेडियो की एक घोषणा और माहौल बिल्कुल बदल गया'

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देश विभाजन के समय मैं लगभग 10 साल का था। मेरा परिवार मुल्तान जिले की एक तहसील शूजाबाद में रहता था। मैंने कई ऐसी ह्दय-विदारक घटनाएं देखीं, जो अभी भी मुझे डरा देती हैं। शूजाबाद नगर के चारों ओर पक्की दीवारें थीं और आने-जाने के लिए चार दरवाजे। हिंदू परिवार नगर के अंदर रहते थे और मुस्लिम परिवार नगर से बाहर गांवों में। विभाजन से पूर्व बड़ों से ऐसा सुनने में आता था कि पाकिस्तान कभी नहीं बनेगा, विभाजन असंभव है तथा हम सभी यहीं रहेंगे। यानी लोगों में एक आत्मविश्वास था कि यह देश, शहर, घर आदि छोड़कर कहीं जाने वाले ..

‘भूख और भय से भरे चेहरे आज तक याद हैं’

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बंटवारे के दिनों को याद कर मैं आज भी विचलित हो जाता हूं। इंसानियत तो कुछ बची ही नहीं थी। उन दिनों मेरा परिवार मुगलपुरा (लाहौर) में रहता था। मुगलपुरा में ही मेरा दफ्तर था। 1947 में मैं रेलवे में लिपिक था और संघ का स्वयंसेवक भी। उन दिनों जींद के एक गुरुद्वारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रथम वर्ष का प्रशिक्षण शिविर लगा था। शिविर में भाग लेने के लिए मैं जींद गया और उधर मार-काट शुरू हो गई। मेरे मुहल्ले मुगलपुरा में भी हिंदुओं को काटा-मारा गया। शिविर में श्रीगुरुजी भी आए हुए थे। माहौल खराब होने की ..

‘...जब नेहरू ने बुजुर्ग को जड़ दिया थप्पड़’

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बंटवारे के समय मैं छह साल का था। छोटी उम्र होने के कारण ज्यादा याद नहीं लेकिन इतना जरूर याद है कि गांव में एक अज्ञात भय व्याप्त था। ज्यादातर लोग अपने घर में बंद रहते थे। हमारे मोहल्ले के चारों तरफ मकान थे लेकिन बीच में एक बहुत बड़ा मैदान था। उसमें हमारी गायें बंधी रहती थीं। एक तरफ से प्रवेश था। घर का प्रवेश द्वार बड़ा था। शाम होते ही वह दरवाजा बंद कर दिया जाता था। मुझे याद है हमारे घर की छत पर बड़े- बड़े कड़ाहों में तेल गरम करने की व्यवस्था की गई थी, ताकि मुसलमान अगर घर पर हमला करेंगे तो दरवाजे को तोड़ने ..

'संघ न होता तो पार नहीं कर पाते सीमा'

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जब बंटवारा हुआ तो मैं बस छह बरस का था। मेरा गांव बिल्कुल सीमा पर था। उन दिनों जब ज्यादा हालात खराब हुए तो हमारे गांव से भी पलायन होने लगा। 500 से ज्यादा सिखों का एक जत्था पाकिस्तान से हिन्दुस्थान आने के लिए तैयार हो गया। लेकिन तब तक कुछ बहुरूपिये मुसलमान गांव आ गए। मुसलमानों ने जत्थे के लोगों से कहा कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह की रियासत में हथियार लेकर आना मना है तो जिनके पास जो भी अस्त्र-शस्त्र हों, वे दे दें। जत्थे में जवान और बुजुर्ग दोनों थे। जवानों ने हथियार देने से साफ मना कर दिया। ..

‘विलक्षण वीरता से भरे स्वयंसेवक’

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मुझे याद है 15 अगस्त,1947 का वह दिन, जब लाहौर सहित पूरे पश्चिम पंजाब और सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले हिन्दू-सिखों के घर धू-धू कर जल रहे थे। हजारों के काफिले में लोग सुरक्षित स्थान की तलाश में भारत की ओर भाग रहे थे। स्थान-स्थान पर अपहरण, लूटपाट और हत्याएं की जा रही थीं। रेलगाड़ियां चल तो रही थीं लेकिन भीड़ इतनी ज्यादा थी कि लोग डिब्बों की छतों पर बच्चों समेत बैठने को मजबूर थे। छतों पर बैठे कितने ही पटरियों के पास छिपे पाकिस्तानी मुसलमानों की गोलियों का शिकार हो गए। मैं उस समय लाहौर में था और मैंने ..

‘संघ के ऋणी हैं हमारे गांव के जिंदा बचे लोग’

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उन दिनों बदलते माहौल को लेकर हिंदू दहशत में रहते थे। इससे मुक्ति कैसे मिले, इस पर विचार करने के लिए 1947 के उस दिन मेरे गांव (नौसारा, डेरा गाजीखान) के आर्य समाज मंदिर में बैठक चल रही थी। मेरे पिताजी गांव के मुखिया थे। वही बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। मैं भी उनके साथ था। बैठक के दौरान ही एक एक युवक आया। उसने कहा कि मैं संघ का स्वयंसेवक हूं, एक विशेष सूचना देने के लिए आया हूं। फिर उसने कहा कि सूत्रों से पता चला है कि आज रात मुसलमान इस गांव पर हमला करने वाले हैं। इसलिए आप लोग जितनी जल्दी हो यहां से और ..

‘संघ न होता तो नहीं बचते हिन्दू’

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मुझे वह दिन भुलाए नहीं भूलता जब स्थानीय मुस्लिम समुदाय भीड़ रूप में आकर हिन्दुओं के घरों पर टूट पड़ रहे थे, आग लगा रहे थे, उन्हें लूट रहे थे, बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार कर रहे थे इसे देखकर स्थानीय हिन्दू सहमा, अपने घरों में दुबका हुआ था। दूर-दूर तक कोई मदद को नहीं आ रहा था। चूंकि मेरा पूरा परिवार संघमय था इसलिए मैं भी बचपन से स्वयंसेवक बन गया था। हिन्दुत्व से रचा-बसा परिवार होने के कारण मेरे परिवार से जुड़े लोग आस-पास के हिन्दुओं की हरसंभव मदद कर रहे थे। खतरा इतना अधिक था कि आस-पास के सभी हिन्दू ..

स्वतंत्रता संग्राम के एक अज्ञात सेनापति डॉक्टर हेडगेवार

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चिरसनातन अखण्ड भारत की सर्वांग स्वतंत्रता के लिए कटिबद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे अज्ञात सेनापति थे जिन्होंने अपने तथा अपने संगठन के नाम से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में अपना तन मन सब कुछ भारत माता के चरणों में अर्पित कर दिया था।..

सबसे कम उम्र में फांसी चढ़ने वाले अमर बलिदानी खुदीराम बोस को नमन

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भारत के स्वाधीनता संग्राम का इतिहास महान वीरों और उनके सैकड़ों साहसिक कारनामों से भरा पड़ा है। ऐसे ही क्रांतिकारियों की सूची में एक नाम खुदीराम बोस का है। ..

आज ही के दिन हिंदू सम्राट राजा कृष्णदेव राय का राज्याभिषेक हुआ था

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एक के बाद एक लगातार हमले कर विदेशी मुस्लिमों ने भारत के उत्तर में अपनी जड़ें जमा ली थीं। अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को एक बड़ी सेना देकर दक्षिण भारत जीतने के लिए भेजा। 1306 से 1315 ई. तक इसने दक्षिण में भारी विनाश किया। ऐसी विकट परिस्थिति में हरिहर और बुक्का राय नामक दो वीर भाइयों ने 1336 में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। इन दोनों को जबरन मुसलमान बना लिया गया था, पर माधवाचार्य ने इन्हें वापस हिन्दू धर्म में लाकर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। लगातार युद्धरत रहने के बाद भी यह राज्य विश्व के सर्वाधिक ..

वामपंथ के शिकार बने प्रेमचंद ने दुखी होकर छोड़ा था मुंबई

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बम्बई में एक बार सिद्ध हिंदी साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी प्रेमचंद की कहानी पर बनी फिल्म 'मजदूर' के पोस्टर देखकर उस फिल्म को देखने के इच्छुक हुए। पर तभी प्रेमचंद जी से भेंट हुई। वे बोले 'यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो यह फिल्म कभी नहीं देखना। यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं ।..

सावरकर के विरुद्ध कट्टरवादी तत्वों ने षड्यंत्र रच उन्हें सांप्रदायिक बताया

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वीर सावरकर के विरुद्ध सुनियोजित तरीके से षड्यंत्र कर उनके विचारों को सांप्रदायिक बताया गया जबकि ऐसा कुछ नहीं था। वीर सावरकर के राष्ट्रवाद को समझने के लिए उन्हें पढ़ना और समझना बहुत जरूरी है।..

राष्ट्रीय चेतना के सचेत प्रहरी : मैथिलीशरण गुप्त

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वैचारिकता और निष्ठाओं में राष्ट्र को लेकर घटती चिंता और क्षुद्र राजनीतिक और निजी स्वार्थों के धुएं की धुंध से सोच कुंठित हो रही हो, ऐसे माहौल में सवाल यह उठता है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को किस तरह से याद करें? ..

पुण्यतिथि पर विशेष: स्वतन्त्रता आंदोलन में उग्रवाद के प्रणेता लोकमान्य तिलक

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भारतीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन में कांग्रेस में स्पष्टतः दो गुट बन गये थे। एक नरम तो दूसरा गरम दल कहलाता था। पहले के नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे, तो दूसरे के लोकमान्य तिलक। इतिहास में आगे चलकर लाल-बाल-पाल नामक जो तिकड़ी प्रसिद्ध हुई, उसके बाल यही बाल गंगाधर तिलक थे, जो आगे चलकर लोकमान्य तिलक के नाम से प्रसिद्ध हुए।महात्मा गांधी के आंदोलन को सफल बनाने में सबसे बड़ा योगदान तिलक का ही था असहयोग आंदोलन के लिए जब एक साल के भीतर एक करोड़ रुपये जमा करने का लक्षय रखा गया तो गांधी जी ने तिलक की पुण्यतिथि पर कोष ..

'जिहाद' मुंशी प्रेमचंद की कहानी - खजानचंद ने मृत्यु को स्वीकार किया पर नहीं बना मुसलमान

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मुंशी प्रेमचंद बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफिला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था। मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाती थी। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला ..

स्वामी विवेकानंद से प्रभावित मुंशी प्रेमचंद

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मुंशी प्रेमचंद स्वामी विवेकानंद से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने उर्दू में स्वामी विवेकानंद जी के बारे में 'स्वामी विवेकानंद: एक जीवन झांकी' नाम से लेख लिखा था, जो 'जमाना' मासिक के मई, 1908 के अंक में प्रकाशित हुआ था। बाद में उन्होंने स्वयं इसका हिन्दी अनुवाद कियामुंशी प्रेमचंद स्वामी विवेकानन्द का जीवन-वृत्तान्त बहुत संक्षिप्त है। दु:ख है कि भरी जवानी में ही गोलोकवासी हो गए और आपके महान व्यक्तित्व से देश और जाति को जितना लाभ पहुंच सकता था, न पहुंच सका। 1863 में स्वामी जी एक प्रतिष्ठित कायस्थ कुल ..

समाधि लगाकर बैठना उतना कठिन नहीं जितना कर्तव्य की वेदी पर बलिदान होना:मुुंशी प्रेमचंद

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कल्याण, कृष्णांक अगस्त 1931 के मुंशी प्रेमचंद के लेख में संस्कृति के स्मरण बिंदु संकेतक की तरह जगह—जगह खड़े दिखते हैं। वह लिखते हैं कि जब तक कर्मयोग के तत्व को नहीं समझा जाएगा, तब तक संसार स्वार्थ के पंजे में जकड़ा रहेगा, लेकिन यदि इसके गूढ़ रहस्य को समझ लिया गया तो मोक्ष का रास्ता पा लिया..

गांधी जी की तरह प्रेमचंद्र ने भी लड़ी हैं लड़ाइयां

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मुंशी प्रेमचंद और महात्मा गांधी दोनों ने ही लड़ाइयां लड़ीं, जहां गांधी जी सत्याग्रह के माध्यम से लड़े वहीं मुंशी प्रेमचंद भी समाजिक कुरीतियों के खिलाफ पहले से ही अपनी लेखनी से लड़ाई लड़ रहे थे। गांधी जी की क्रियात्मकता झलक हमें प्रेमचंद्र के प्रारम्भिक साहित्य में ही मिलने लगती है फिर चाहे बात देशप्रेम की हो या फिर सामाजिक कुरीतियों की।..

ईश्वरचंद्र विद्यासागर की पुण्य तिथि पर नमन

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भारत में 19वीं शताब्दी में जिन लोगों ने सामाजिक परिवर्त्तन में बड़ी भूमिका निभाई, उनमें श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उनका जन्म 16 सितम्बर, 1820 को ग्राम वीरसिंह (जिला मेदिनीपुर, बंगाल) में हुआ था। धार्मिक परिवार होने के कारण इन्हें अच्छे संस्कार मिले। आज उन्हीं की पुण्य तिथि है।09 वर्ष की अवस्था में उन्होंने संस्कृत विद्यालय में प्रवेश लिया अगले 13 वर्ष तक वहीं रहे। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए अपना खर्च निकालने के लिए वह दूसरों के घरों में भोजन बनाया करते ..

सावरकर ने बंटवारे पर पहले ही चेताया था कांग्रेसी नेताओं ने नहीं सुनी

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1940 में जब सिंध को मुंबई प्रांत से अलग कर दिया गया, तब सावरकर ही थे जिन्होंने चेताया था कि पाकिस्तान की नींव पड़ गई है, अब बंटवारा रोकना कठिन होगा। गांधीजी और नेहरू ने तो कहा था कि पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा।पर सात वर्ष बाद वे गलत साबित हुए और सावरकर सही ...स्वातंत्र्यवीर सावरकर वह राष्ट्रवादी विभूति थे जिन्होंने आजादी के बाद के कालखण्ड में समाज को एकजुट रखने में भरपूर योगदान दिया। आज आवश्यकता है उनके दीर्घकालिक और तार्किक राष्ट्रवाद के प्रकाश में भीमा-कोरेगांव, जातिवादी दंगों और पत्थर गढ़ी जैसी घटनाओं ..

अधीश जी एक प्रेरणा पुंज, हंसकर मृत्यु को स्वीकार करने वाले

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किसी ने लिखा है - तेरे मन कुछ और है, दाता के कुछ और। संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री अधीश जी के साथ भी ऐसा ही हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए उन्होंने जीवन अर्पण किया। पर विधाता ने 52 वर्ष की अल्पायु में ही उन्हें अपने पास बुला लिया।..

आध्यात्मिकता के शिखर पुरुष 'कबीर'

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चरखे पर सूत कातते कर्मयोगी कबीर के अंतस की यह वाणी वाकई अद्भुत है। पूर्ण निष्ठा से अपनी जाति के जुलाहा कर्म का पालन करते हुए उनके द्वारा व्याख्यायित मानव जीवन का तत्वज्ञान सुनकर बडे़ बड़े धर्म मर्मज्ञ व दार्शनिक उनके आत्मज्ञान के समक्ष नत मस्तक हो जाते हैं। ..

सिनौली में उभरी सरस्वती कालीन सभ्यता, वामपंथी झूठ की खुली पोल

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विश्व के पुरातन व गौरवशाली भारतीय इतिहास को ब्रिटिश इतिहासकारों ने विकृत करने का चरम प्रयास किया, लेकिन उनका विकृत सिद्धांत अब दम तोड़ चुका है। उत्तर प्रदेश के बागपत के सिनौली में अभी तक हुए उत्खनन से साबित हुआ है कि सरस्वती नदी के किनारे विकसित हुई सभ्यता ही वैदिक सभ्यता थी, जिसे वामपंथियों ने सिंधु घाटी सभ्यता नाम दिया था। खुदाई में निकले सारे पुरावशेषों ने हमारे वेदों में लिखी बातों को सिद्ध कर दिया है कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे और विश्व की सबसे प्राचीन और विकसित सभ्यता भारत की ’वैदिक सभ्यता’ ..

मेवाड़ के लिए भामाशाह के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता

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मेवाड़ के लिए धन जुटाने हेतु भामाशाह ने युक्ति निकाली और मालवा के मुगल इलाकों में धावे मारने निकल पड़े। उन्होंने रामपुरा, भाणपुरा, मंदसौर, मालपुरा आदि शाही थानों पर धावे मार कर वहां के जागीरदारों शाही थानेदारों से दंड वसूल कर भारी धनराशि एकत्र की। धनराशि लेकर वे चूलियां ग्राम में महाराणा की सेवा में उपस्थित हुए। स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाने हेतु उन्होंने 25 लाख रुपए की धनराशि, 20,000 अशर्फियां और अन्य युद्ध सामग्री महाराणा को भेंट की।..

कूटनीति और राजनीति में निपुण थे महाराणा

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प्रताप ने कभी भी अपनी सुरक्षा नीति, अपने मनोभाव तथा विचार दूत पर जाहिर नहीं होने दिए भले ही उनके सजातीय क्यों न आए हों। प्रताप एक व्यवहारिक कूटनीतिज्ञ थे तथा प्राचीन राजनीतिक सिद्धांतों से परिचित थे। अकबर ने दूसरे दूतमंडल के रूप में कुंवर मानसिंह को भेजा। यहां अकबर ने सजातीय को दूत के रूप में भेज कर दोहरा कूटनीतिक दावपेच चला था।..

महाराणा की मृत्यु पर रोया था अकबर कहा था राणा जीत तेरी ही हुई

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महाराणा प्रताप की मृत्यु की सूचना पाकर अकबर की आंखों में भी आंसू आ गए थे। वह स्वयं उनकी बहादुरी की प्रशंसा करता था। एक गोभक्षी बघेरे को स्वयं महाराणा प्रताप ने धनुष द्वारा तीर चलाकर मारा। तीर चलाते समय प्रताप की आंतों में खिंचाव आया, जिसके कारण वे अस्वस्थ हो गए। दो मास की अस्वस्थता के पश्चात उन्होंने देह त्यागकर गोलोकवास किया।..

शौर्य के प्रतीक थे महाराणा, हिंदुओं का सिरमौर थे

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महाराणा, कुंभा के समय (1433-1468) चित्तौड़ भारत की राजधानी के रूप में विकसित हो गया था। यह युग कला शिल्प, स्थापत्य, साहित्य, निर्माण से परिपूर्ण था। मेवाड़ राज्य की सीमाओं का विस्तार इसी कालखंड में हुआ। महाराणा सांगा के समय (1509-1528) देशभर के हिन्दू राजाओं ने अपने नायक के रूप में मेवाड़ का नेतृत्व स्वीकार कर लिया था। खानवा के युद्ध में शामिल राज्य इसके प्रमाण हैं।..

हल्दीघाटी युद्ध: मुगलों के माथे पर लिखी थी इस हार की कहानी

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महाराणा की महागाथा

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पढ़े-लिखे लोग भी अक्सर जिस एक पहेली पर गच्चा खा जाते हैं, वह भारतीय इतिहास से जुड़ा एक छोटा-सा सवाल है। हम कितने वर्ष गुलाम रहे? इस प्रश्न का उत्तर तलाशते हुए ज्यादातर लोग 1947 की ताजा यादों तक ही लौट पाते हैं जबकि तथ्यत: यह बात गलत है। वास्तव में यह 1192 ई. में तराइन का दूसरा युद्ध था जिसने पहली बार भारतीयों पर किसी विदेशी वंश का 'शासन' थोपा।..