इतिहास

कूटनीति और राजनीति में निपुण थे महाराणा

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प्रताप ने कभी भी अपनी सुरक्षा नीति, अपने मनोभाव तथा विचार दूत पर जाहिर नहीं होने दिए भले ही उनके सजातीय क्यों न आए हों। प्रताप एक व्यवहारिक कूटनीतिज्ञ थे तथा प्राचीन राजनीतिक सिद्धांतों से परिचित थे। अकबर ने दूसरे दूतमंडल के रूप में कुंवर मानसिंह को भेजा। यहां अकबर ने सजातीय को दूत के रूप में भेज कर दोहरा कूटनीतिक दावपेच चला था।..

महाराणा की मृत्यु पर रोया था अकबर कहा था राणा जीत तेरी ही हुई

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महाराणा प्रताप की मृत्यु की सूचना पाकर अकबर की आंखों में भी आंसू आ गए थे। वह स्वयं उनकी बहादुरी की प्रशंसा करता था। एक गोभक्षी बघेरे को स्वयं महाराणा प्रताप ने धनुष द्वारा तीर चलाकर मारा। तीर चलाते समय प्रताप की आंतों में खिंचाव आया, जिसके कारण वे अस्वस्थ हो गए। दो मास की अस्वस्थता के पश्चात उन्होंने देह त्यागकर गोलोकवास किया।..

शौर्य के प्रतीक थे महाराणा, हिंदुओं का सिरमौर थे

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महाराणा, कुंभा के समय (1433-1468) चित्तौड़ भारत की राजधानी के रूप में विकसित हो गया था। यह युग कला शिल्प, स्थापत्य, साहित्य, निर्माण से परिपूर्ण था। मेवाड़ राज्य की सीमाओं का विस्तार इसी कालखंड में हुआ। महाराणा सांगा के समय (1509-1528) देशभर के हिन्दू राजाओं ने अपने नायक के रूप में मेवाड़ का नेतृत्व स्वीकार कर लिया था। खानवा के युद्ध में शामिल राज्य इसके प्रमाण हैं।..

हल्दीघाटी युद्ध: मुगलों के माथे पर लिखी थी इस हार की कहानी

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                                                                                                                     ..

महाराणा की महागाथा

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पढ़े-लिखे लोग भी अक्सर जिस एक पहेली पर गच्चा खा जाते हैं, वह भारतीय इतिहास से जुड़ा एक छोटा-सा सवाल है। हम कितने वर्ष गुलाम रहे? इस प्रश्न का उत्तर तलाशते हुए ज्यादातर लोग 1947 की ताजा यादों तक ही लौट पाते हैं जबकि तथ्यत: यह बात गलत है। वास्तव में यह 1192 ई. में तराइन का दूसरा युद्ध था जिसने पहली बार भारतीयों पर किसी विदेशी वंश का 'शासन' थोपा।..