इतिहास

भारत माता का दु:ख

अयोध्या राष्ट्रीय अखण्डता को अपने-अपने हानि-लाभ की तुला पर तौलने वालों के लिए चुनौती भी है और चेतावनी भी। अयोध्या देश और राष्ट्र की प्रतीति का प्रमाण पत्र है..

राममंदिर : पुनः प्रतिष्ठित हो भारत का गौरव

श्रीराम जन्मभूमि को प्राप्त करके राम मन्दिर के पुनर्निर्माण का संघर्ष शताब्दियों से चलता आ रहा है। अनेक पीढि़यों ने इस संघर्ष में अपना योगदान किया है। इस स्थान को प्राप्त करने हेतु 76 युद्धों का वर्णन इतिहास में दर्ज है। देश के अनेक बुद्धिजीवियों का यह मत है कि इस विषय का समाधान आपसी वार्तालाप अथवा न्यायिक प्रक्रिया द्वारा हो। ..

राममंदिर और सरयू तट का सच

सरयू नदी तट पर राम जन्मभूमि परिसर का उत्खनन और उससे प्राप्त भग्नावशेष वहां भव्य मंदिर होने के अकाट्य प्रमाण हैं। न्यायालय की देरी विवाद को बिना वजह बढ़ाने का ही काम कर रही है। देर से मिलने वाला ‘न्याय’ कैसे करेगा लोगों को संतुष्ट ?..

जयंती विशेष: बालासाहब देवरस समरसता के मंत्रदाता

यदि छुआछूत पाप नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है।'' राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस के ये शब्द रूढि़ग्रस्त मन पर तगड़ी चोट करते हैं..

'भारत के ही मूल निवासी हैं आर्य, हरियाणा व उत्तर थे सभ्यता के मुख्य केंद्र'

वामपंथियों इतिहासकरों ने भारत के इतिहास को हमेशा गलत तरीके से प्रस्तुत किया। अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय इतिहास को विकृत करने का काम शुरू हुआ। वामपंथी इतिहासकारों ने यह थ्योरी गढ़ी कि आर्य भारत में मूल निवासी नहीं थे। वे बाहर से आए थे। अब खुदाई में मिले अवशेषों और विज्ञान ने भी प्रमाणित कर दिया है कि आर्य यहीं के मूल निवासी थे।आर्यों को मध्य एशिया का मूल निवासी बताने वाली थ्योरी अब पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है। इतिहास की खोजों से साबित हो चुका है कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे और उनका मुख्य ..

जयंती विशेष: बिरसा मुंडा के आह्वान पर वनवासी समाज ने लड़ी थी स्वाभिमान की लड़ाई

झारखंड के अमर स्वाधीनता सेनानी और क्रांतिदर्शी बिरसा मुंडा को आज विभिन्न राजनीतिक दल, संगठन और समुदाय अपने-अपने ढंग से भले याद करते हों, लेकिन बड़ा कष्ट होता है यह जानकर कि इतने वर्षोें बाद भी बिरसा के बारे में कोई उपयुक्त प्रकाशित विवरण उपलब्ध नहीं है।..

राम मंदिर आंदोलन जब कारसेवकों पर ढाए गए थे जुल्म

अयोध्या राममंदिर आंदोलन ने देश की हवा, पानी, मिट्टी के तेवर को बदल दिया था। उसके पीछे श्रीराम के प्रति कोटि-कोटि भारतीयों की अनन्य भक्ति और श्रद्धा है..

चीन से सावधान रहने को पटेल ने नेहरू से कहा था पर वह नहीं माने

चीन के प्रति दीवानगी की हद तक अंधविश्वास रखने वाले नेहरू ने यदि सरदार पटेल की बात मानी होती तो आज भारत सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में शामिल होता। 1962 के भारत-चीन युद्ध में जो भारत को अपनी भूमि और वीर सैनिकों के प्राण गंवाने पड़े वह न होता। चीन का तिब्बत पर कब्जा न हुआ होता..

कश्मीर-विलय के लिए महाराजा को राजी करने सरदार पटेल के आग्रह पर श्री गुरुजी कश्मीर गए थे

भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के संबंध में रियासत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन से तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी को महाराजा को इसे बारे में सलाह देने के लिए तैयार करने का आग्रह किया। श्री गुरुजी श्रीनगर गए, और महाराजा से विस्तृत बातचीत की। परिणामत: विलय संभव हुआ। यह सारा अल्पज्ञात किन्तु ऐतिहासिक घटनाक्रम पाञ्चजन्य के 1 अप्रैल, 1990 के अंक में प्रकाशित हुआ था..

नेहरू ने शेख अब्दुल्ला की खातिर कश्मीर को भी दाव पर लगा दिया था

इतिहास ने जितना अन्याय जम्मू कश्मीर के अंतिम महाराजा हरि सिंह के साथ किया उतना शायद किसी अन्य के साथ नहीं किया होगा। जम्मू कश्मीर को लेकर जितना कुछ लिखा गया है उतना शायद भारत की किसी और रियासत को लेकर न लिखा गया हो।..

राजमाता विजयाराजे सिंधिया जेल गईं पर इंदिरा के सामने नहीं झुकीं

हमेशा संगठन को महत्व देने वाली राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने एक बार जो जनसंघ की सदस्ता ली तो फिर हमेशा वह जनसंघ के विचार के साथ रहीं। आपातकाल के दौरान वह 19 महीने जेल में रहीं लेकिन इंदिरा गांधी के सामने झुकी नहीं। भय के कारण उनके पुत्र माधवराव सिंधिया देश छोड़कर चले गए और बाद में कांग्रेस में शामिल भी हो गए लेकिन राजमाता ने अंतिम समय तक अपने सिद्धांत और विचारधारा के प्रति जो समर्पण था उसे कभी छोड़ा नहीं..

जन्मदिन विशेष: राष्ट्र को जीवन समर्पित करने वाले नानाजी को नमन

ग्राम कडोली (जिला परभणी, महाराष्ट्र) में 11 अक्तूबर, 1916 (शरद पूर्णिमा) को श्रीमती राजाबाई की गोद में जन्मे चंडिकादास अमृतराव (नानाजी) देशमुख ने भारतीय राजनीति पर अमिट छाप छोड़ी।..

हिन्दू भयजनित सहनशीलता त्यागें

हिन्दू समाज की महान परंपरा एवं समूची मानवता के लिए उसके ऐतिहासिक योगदान के बारे में साधारण हिन्दू ही नहीं, समाज के अधिकांश विद्वान भी अपरिचित हैं।..

हिंदू दर्शन अध्यात्म का ही दूसरा नाम है, यह एक वैज्ञानिक दर्शन

हिंदू दर्शन अध्यात्म का ही दूसरा नाम है। यह एक वैज्ञानिक दर्शन है। उसके आधार पर जो धर्म खड़ा हुआ, वह सर्वश्रेष्ठ धर्म सिद्ध हुआ। आज भी उस दर्शन के सिद्धांत विश्व को नयी अर्थव्यवस्था देने की क्षमता रखते हैं। कम्युनिज्म का प्रयोग जिस संकट में फंस गया है, उससे उबारने की शक्ति हिंदू-दर्शन में ही है।..

डॉ. हेडगेवार बंदी बनाए गए तो उन्होंने न्यायालय में कहा था पूर्ण स्वराज हमारा ध्येय

1921 में डॉ. हेडगेवार पर राजद्रोहात्मक भाषण देने के अपराध में मुकदमा चलाया गया था। उस समय डॉ. साहब ने न्यायालय में जो उत्तर दिया था, वह हर देशभक्त के लिए स्मरणीय है। उनका वह ऐतिहासिक वक्तव्य सामने रखता यह आलेख पाञ्चजन्य के 20 मार्च, 1961 के अंक में प्रकाशित हुआ था..

बिना संस्कार, नहीं सहकार का मंत्र देने वाले थे वकील साहब

कार्यकर्ता गढ़ना और संगठन का आधार तैयार करना सरल काम नहीं है। किन्तु वकील साहब के नाम से प्रसिद्ध लक्ष्मणराव ईनामदार यह काम सहज ही करते रहे। सहकारिता आंदोलन के लिए, ‘बिना संस्कार, नहीं सहकार,’ का मंत्र उन्होंने ही दिया। गुजरात में अनेक कार्यकर्ताओं के जीवन और संघ-संगठनों के विविध आयामों पर उनकी छाप आज भी दिखाई देती है। वकील साहब के जीवन की झांकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कलम से।..

जयंती विशेष: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना में ऐनी बेसेंट के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता

बात तब की है जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत थी। महामना पं. मदनमोहन मालवीय काशी में एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे, परंतु नियमानुसार इसके लिए एक कॉलेज का होना अनिवार्य था। मालवीय जी ने एक अंग्रेज महिला के समक्ष उनके द्वारा स्थापित सेन्ट्रल हिंदू कॉलेज की विश्वविद्यालय से संबद्धता का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने तत्काल प्रस्ताव स्वीकार करते हुए विनम्रता से कहा, ''यह विद्यालय आपका ही है पंडित जी! मेरे पास जो कुछ भी है वह इस देश के ही लिए है।..

शाखा ने समाज को एक साथ खड़ा करने का काम किया

संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को बचपन से ही लगता था कि अपने देश पर अंग्रेजों का शासन नहीं होना चाहिए। जब वे 9-10 वर्ष के थे और तीसरी कक्षा में थे तब इंग्लैंड की रानी और हिंदुस्तान की महारानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक का स्वर्ण महोत्सव मनाया जा रहा था। इस अवसर पर सभी स्कूलों में मिठाइयां बांटी गईं। तीसरी कक्षा के बाकी सभी विद्यार्थियों ने उसे खुशी से खाया लेकिन केशव हेडगेवार ने मिठाई कचरे के डिब्बे में डाल फेंक दी।..

आधुनिक भारत के कौटिल्य पं. दीनदयाल उपाध्याय

पं. दीनदयाल उपाध्याय ने सदियों पुरानी भारतीय मनीषा के विचारों और नीतियों को ही आगे बढ़ाने का कार्य किया। उनकी इच्छा थी कि राष्ट के हर व्यक्ति को फूलने-फलने का अवसर मिले। इस विचार को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने एकात्ममानवाद का दर्शन प्रस्तुत किया ..

सितम्बर/जन्म-दिवस विशेष: युगों में जन्म लेते हैं दीनदयाल जी जैसे मनीषी

सुविधाओं में पलकर सफलता पाना आसान है, पर अभावों के बीच रहकर शिखरों को छूना बहुत कठिन है। 25 सितम्बर, 1916 को जयपुर से अजमेर मार्ग पर स्थित ग्राम धनकिया में अपने नाना पण्डित चुन्नीलाल शुक्ल के घर जन्मे दीनदयाल उपाध्याय ऐसी ही विभूति थे।..

आजादी के आंदोलन में संघ का बड़ा योगदान था लेकिन संघ को श्रेय लेने की आदत नहीं

एक षड्यंत्र के तहत यह प्रचारित किया जाता है कि आजादी के आंदोलन में संघ का कोई योगदान नहीं है, जबकि इतिहास गवाह है कि डॉ. हेडगेवार सहित अनेक स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते हुए जेल की यातनाएं सही थीं..

जन्म दिवस पर विशेष: हिंदी नवजागरण के प्रतीक भारतेंदु

 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम बेशक नाकाम रहा, लेकिन वह भारतीय समाज में आधुनिकता की सोच का गवाक्ष भी रहा है। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पहली बड़ी बगावत की भारतीय समाज को काफी कीमत चुकानी पड़ी। लाखों लोग मारे गए, लोगों की संपत्ति अंग्रेज सरकार ने जब्ती के नाम पर लूटी। लेकिन इस क्रांति ने भारतीय समाज को पश्चिम से आ रही नई और ठंडी हवा के झोंकों से भी परिचय कराया। इस पर विवाद हो सकता है कि जिसे हम आधुनिकता कहते हैं, वह सचमुच क्या आधुनिकता है? इस सवाल का जिक्र इसलिए कि भारतीयता की जो अवधारणा है, वह ..

महान था या नहीं, मगर क्या अकबर मुसलमान था ?

जहां भारत के शिक्षित हिंदुओं में अकबर की छवि उदार व कुशल बादशाह की है वहीं पाकिस्तान में उसके प्रति घृणा का भाव है। दरअसल अकबर आध्यात्मिकता की ओर झुकाव के कारण इस्लाम से दूर होने लगा था। उसने अपने दरबार में मजहबी—वैचारिक विमर्श में इस्लाम यहां तक कि पैंगबर मुहम्मद पर भी प्रश्न उठाने की छूट दे दी थी।..

गुमनाम क्रांति गाथाएं

महात्मा गांधी से लेकर महान क्रांतिकारी भगत सिंह की शहादत बच्चे-बच्चे की जुबान पर है। चंद्रशेखर का बलिदान आज भी राष्ट़भक्तों की आंखें नम कर देता है। सुखदेव, राजगुरु, खुदीराम बोस व रामप्रसाद बिस्मिल जैसे वीर सेनानियों की कुर्बानियां इतने वर्षों के बाद भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान शहीद मंगल पांडेय, रानी लक्ष्मीबाई, बाजीराव पेशवा, तात्या टोपे भी श्रद्धा के पात्र हैं। इसके अलावा, ऊधम सिंह, मदनललाल धींगरा, कुंवर सिंह, भगवतीचरण वोहरा, बटुकेश्वर दत्त, बाघा जतीन, बुधु भग..

‘देवदूत थे स्वयंसेवक’

बंटवारे की त्रासदी सात दशक बाद भी भूले नहीं भूलती। जब हिन्दू मां-बहनों पर खुलेआम आततायी मुसलमानों द्वारा अत्याचार किया जा रहा था, घर-दुकान, व्यवसाय को तहस-नहस करके परिवार के परिवार मौत के घाट उतार दिए जा रहे थे। यहां तक कि गर्भवती महिलाओं तक को मुसलमानों ने नहीं छोड़ा। उनके गर्भ पर वार करके पेट से बच्चा निकालकर सूली पर टांग कर उसकी हत्या की गई। ऐसी निर्दयता भला जीते-जी कौन भूल सकता है! 1940 में मैं संघ का स्वयंसेवक बन गया। 1947 में पंजाब एवं पास के क्षेत्रों के स्वयंसेवकों के लिए फगवाड़ा में संघ का ..

भारत की अखंडता के ध्वजवाहक रहे महर्षि अरविन्द के जन्मदिवस पर विशेष

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में श्री अरविन्द का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उनका बचपन घोर विदेशी और विधर्मी वातावरण में बीता। पर पूर्वजन्म के संस्कारों के बल पर वे महान आध्यात्मिक पुरुष बने ओर महर्षि कहलाए..

‘स्वयंसेवकों ने दिया सेना का साथ’

विभाजन के समय मेरी आयु 7 वर्ष की थी। मैं मीरपुर में रहता था। यह बड़ा ही समृद्ध और पढ़े-लिखे लोगों का इलाका था। 15 अगस्त, 1947 को जब विभाजन के कारण पाकिस्तान से हिन्दू भारत आ रहे थे, उस समय मीरपुर के लोगों को आशा थी कि जम्मू-कश्मीर राज्य के राजा हरि सिंह का क्षेत्र होने के कारण इसका भारत में ही विलय होगा। मुजफ्फराबाद या आस-पास के क्षेत्रों से जो पलायन हो रहा था, मीरपुर के हिन्दुओं ने उन्हें अपने में ही बसा लिया और वह 7-8 हजार लोग इन हिन्दू परिवारों में ही समा गए। इस प्रकार मीरपुर की आबादी जो कि 10-12 ..

'जो कुछ हूं संघ की बदौलत हूं'

बंटवारे के दौर की रातों को पाकिस्तान से आना वाला कोई भी हिन्दू नहीं भूल सकता, हिन्दुओं के घरों को आग लगा दी जाती थी, बहन-बेटियों का अपहरण कर लिया जाता था। हत्याएं होती थीं।। मैं उस समय 8 वर्ष था। मेरे बड़े भाई एवं चाचा मुल्तान के पास स्थित डेरा इस्माइल खान में संघ की शाखा लगाया करते थे। पांच वर्ष का होने पर मैं भी शाखा में जाने लगा। मुझे याद है बंटवारे के समय जब ज्यादा माहौल खराब होने लगा तो हमारे चाचा जी स्वयंसेवकों के साथ छत पर पहरा दिया करते थे ताकि हिन्दू मोहल्ले में आततायी हमला न करने पाएं। क्योंकि ..

‘नहीं भूलते बंटवारे के दिन’

 बंटवारे के वक्त मैं नागपुर में संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था। इस बीच पाकिस्तान की ओर से हिन्दुओं के पलायन की खबरें आनी शुरू हुर्इं। संघ अधिकारियों ने वर्ग को जल्दी समाप्त कर दिया ताकि सीमापार रहने वाले स्वयंसेवक अपने परिवार की मदद कर सकें। नागपुर से मैं फगवाड़ा आया, जहां संघ का शिविर लगा हुआ था और पूज्य गुरुजी वहां आए हुए थे। पाकिस्तान के हालात को देखकर शुरुआत में गुरुजी का आग्रह था कि लोग अपनी जमीन और घर न छोड़ें। लेकिन दिनोदिन स्थिति जब बहुत खराब होने लगी तो उन्होंने स्वयंसेवकों ..

‘रास्ते में बिछी थीं लाशें’

बंटवारे के दिनों के बारे में जब भी सोचता हूं तो एक अजीब सी उलझन होने लगती है। उन दिनों पाकिस्तान में जहां भी हिन्दू रह रहे थे, वे सभी डरे हुए थे कि कब क्या हो जाए। मेरी माता जी का देहांत हो जाने के कारण मेरा लालन-पालन बुआ जी के पास हुआ। तब मेरी उम्र 8 वर्ष थी। अचानक एक दिन हमारे मुहल्ले में भी हालात खराब हो गए। स्थिति इतनी ज्यादा खराब थी कि पलायन ही एक मात्र रास्ता सभी को सूझ रहा था क्योंकि आस-पास के हिन्दू परिवार जब शाम को एक स्थान पर एकत्र होते थे तो पाकिस्तान के विभिन्न स्थानों पर मुसलमानों द्वारा ..

‘मुसलमानों ने बर्बरता की हदें पार कीं’

बात उन दिनों की है जब मेरे बड़े भाईसाहब सेना मुख्यालय से जुड़े एक सरकारी दफ्तर में काम करते थे। कुछ दिन बाद उनका स्थानांतरण लाहौर हो गया। उस समय मैं मैट्रिक पास कर चुका था। तो भाईसाहब ने कहा कि गांव से लाहौर चले आओ तो यहां नौकरी मिल जाएगी। मुझे याद है कि मैं 8 जुलाई,1946 को लाहौर पहुंच गया। भाई की मदद से दो-तीन दिन बाद ही नौकरी मिल गयी। कुछ दिन कार्य करने के बाद 1 अक्तूबर,1946 को मुझे एक विदेशी कंपनी में बाबू की नौकरी मिल गई। मैंने कंपनी के पास में ही एक किराए का कमरा लिया। इसी के पास संघ की शाखा लगती ..

‘स्वयंसेवकों ने मदद की तो आया जीवन में स्थायित्व’

मेरा गांव गदाई, डेरा गाजी खान से दो मील दूर था। गदाई में 1942 में संघ की शाखा शुरू हुई थी। नोनीत राय जी हमारे मुख्य शिक्षक थे। वे डेरा गाजीखान से रोजाना आते और शाखा लगाते। वही हम स्वयंसेवकों को जगाते भी थे। उनकी मेहनत और संघ के प्रति निष्ठा देखकर अनेक लोग स्वयंसेवक बने। उनमें मैं भी एक था। जब हम लोग शाखा लगाते तो उस समय मुसलमानों की भीड़ इकट्ठी हो जाती थी। बाद में कई बार यही भीड़ हिंसा पर उतारू हो गई। इसके बावजूद शाखा चलती रही। शाखा से गांव के हिंदुओं को एक नई ऊर्जा मिलती थी और वही ऊर्जा उन्हें बंटवारे ..

'रेडियो की एक घोषणा और माहौल बिल्कुल बदल गया'

देश विभाजन के समय मैं लगभग 10 साल का था। मेरा परिवार मुल्तान जिले की एक तहसील शूजाबाद में रहता था। मैंने कई ऐसी ह्दय-विदारक घटनाएं देखीं, जो अभी भी मुझे डरा देती हैं। शूजाबाद नगर के चारों ओर पक्की दीवारें थीं और आने-जाने के लिए चार दरवाजे। हिंदू परिवार नगर के अंदर रहते थे और मुस्लिम परिवार नगर से बाहर गांवों में। विभाजन से पूर्व बड़ों से ऐसा सुनने में आता था कि पाकिस्तान कभी नहीं बनेगा, विभाजन असंभव है तथा हम सभी यहीं रहेंगे। यानी लोगों में एक आत्मविश्वास था कि यह देश, शहर, घर आदि छोड़कर कहीं जाने वाले ..

‘भूख और भय से भरे चेहरे आज तक याद हैं’

बंटवारे के दिनों को याद कर मैं आज भी विचलित हो जाता हूं। इंसानियत तो कुछ बची ही नहीं थी। उन दिनों मेरा परिवार मुगलपुरा (लाहौर) में रहता था। मुगलपुरा में ही मेरा दफ्तर था। 1947 में मैं रेलवे में लिपिक था और संघ का स्वयंसेवक भी। उन दिनों जींद के एक गुरुद्वारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रथम वर्ष का प्रशिक्षण शिविर लगा था। शिविर में भाग लेने के लिए मैं जींद गया और उधर मार-काट शुरू हो गई। मेरे मुहल्ले मुगलपुरा में भी हिंदुओं को काटा-मारा गया। शिविर में श्रीगुरुजी भी आए हुए थे। माहौल खराब होने की ..

‘...जब नेहरू ने बुजुर्ग को जड़ दिया थप्पड़’

बंटवारे के समय मैं छह साल का था। छोटी उम्र होने के कारण ज्यादा याद नहीं लेकिन इतना जरूर याद है कि गांव में एक अज्ञात भय व्याप्त था। ज्यादातर लोग अपने घर में बंद रहते थे। हमारे मोहल्ले के चारों तरफ मकान थे लेकिन बीच में एक बहुत बड़ा मैदान था। उसमें हमारी गायें बंधी रहती थीं। एक तरफ से प्रवेश था। घर का प्रवेश द्वार बड़ा था। शाम होते ही वह दरवाजा बंद कर दिया जाता था। मुझे याद है हमारे घर की छत पर बड़े- बड़े कड़ाहों में तेल गरम करने की व्यवस्था की गई थी, ताकि मुसलमान अगर घर पर हमला करेंगे तो दरवाजे को तोड़ने ..

'संघ न होता तो पार नहीं कर पाते सीमा'

जब बंटवारा हुआ तो मैं बस छह बरस का था। मेरा गांव बिल्कुल सीमा पर था। उन दिनों जब ज्यादा हालात खराब हुए तो हमारे गांव से भी पलायन होने लगा। 500 से ज्यादा सिखों का एक जत्था पाकिस्तान से हिन्दुस्थान आने के लिए तैयार हो गया। लेकिन तब तक कुछ बहुरूपिये मुसलमान गांव आ गए। मुसलमानों ने जत्थे के लोगों से कहा कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह की रियासत में हथियार लेकर आना मना है तो जिनके पास जो भी अस्त्र-शस्त्र हों, वे दे दें। जत्थे में जवान और बुजुर्ग दोनों थे। जवानों ने हथियार देने से साफ मना कर दिया। ..

‘विलक्षण वीरता से भरे स्वयंसेवक’

मुझे याद है 15 अगस्त,1947 का वह दिन, जब लाहौर सहित पूरे पश्चिम पंजाब और सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले हिन्दू-सिखों के घर धू-धू कर जल रहे थे। हजारों के काफिले में लोग सुरक्षित स्थान की तलाश में भारत की ओर भाग रहे थे। स्थान-स्थान पर अपहरण, लूटपाट और हत्याएं की जा रही थीं। रेलगाड़ियां चल तो रही थीं लेकिन भीड़ इतनी ज्यादा थी कि लोग डिब्बों की छतों पर बच्चों समेत बैठने को मजबूर थे। छतों पर बैठे कितने ही पटरियों के पास छिपे पाकिस्तानी मुसलमानों की गोलियों का शिकार हो गए। मैं उस समय लाहौर में था और मैंने ..

‘संघ के ऋणी हैं हमारे गांव के जिंदा बचे लोग’

उन दिनों बदलते माहौल को लेकर हिंदू दहशत में रहते थे। इससे मुक्ति कैसे मिले, इस पर विचार करने के लिए 1947 के उस दिन मेरे गांव (नौसारा, डेरा गाजीखान) के आर्य समाज मंदिर में बैठक चल रही थी। मेरे पिताजी गांव के मुखिया थे। वही बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। मैं भी उनके साथ था। बैठक के दौरान ही एक एक युवक आया। उसने कहा कि मैं संघ का स्वयंसेवक हूं, एक विशेष सूचना देने के लिए आया हूं। फिर उसने कहा कि सूत्रों से पता चला है कि आज रात मुसलमान इस गांव पर हमला करने वाले हैं। इसलिए आप लोग जितनी जल्दी हो यहां से और ..

‘संघ न होता तो नहीं बचते हिन्दू’

मुझे वह दिन भुलाए नहीं भूलता जब स्थानीय मुस्लिम समुदाय भीड़ रूप में आकर हिन्दुओं के घरों पर टूट पड़ रहे थे, आग लगा रहे थे, उन्हें लूट रहे थे, बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार कर रहे थे इसे देखकर स्थानीय हिन्दू सहमा, अपने घरों में दुबका हुआ था। दूर-दूर तक कोई मदद को नहीं आ रहा था। चूंकि मेरा पूरा परिवार संघमय था इसलिए मैं भी बचपन से स्वयंसेवक बन गया था। हिन्दुत्व से रचा-बसा परिवार होने के कारण मेरे परिवार से जुड़े लोग आस-पास के हिन्दुओं की हरसंभव मदद कर रहे थे। खतरा इतना अधिक था कि आस-पास के सभी हिन्दू ..

स्वतंत्रता संग्राम के एक अज्ञात सेनापति डॉक्टर हेडगेवार

चिरसनातन अखण्ड भारत की सर्वांग स्वतंत्रता के लिए कटिबद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे अज्ञात सेनापति थे जिन्होंने अपने तथा अपने संगठन के नाम से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में अपना तन मन सब कुछ भारत माता के चरणों में अर्पित कर दिया था।..

सबसे कम उम्र में फांसी चढ़ने वाले अमर बलिदानी खुदीराम बोस को नमन

भारत के स्वाधीनता संग्राम का इतिहास महान वीरों और उनके सैकड़ों साहसिक कारनामों से भरा पड़ा है। ऐसे ही क्रांतिकारियों की सूची में एक नाम खुदीराम बोस का है। ..

आज ही के दिन हिंदू सम्राट राजा कृष्णदेव राय का राज्याभिषेक हुआ था

एक के बाद एक लगातार हमले कर विदेशी मुस्लिमों ने भारत के उत्तर में अपनी जड़ें जमा ली थीं। अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को एक बड़ी सेना देकर दक्षिण भारत जीतने के लिए भेजा। 1306 से 1315 ई. तक इसने दक्षिण में भारी विनाश किया। ऐसी विकट परिस्थिति में हरिहर और बुक्का राय नामक दो वीर भाइयों ने 1336 में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। इन दोनों को जबरन मुसलमान बना लिया गया था, पर माधवाचार्य ने इन्हें वापस हिन्दू धर्म में लाकर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। लगातार युद्धरत रहने के बाद भी यह राज्य विश्व के सर्वाधिक ..

वामपंथ के शिकार बने प्रेमचंद ने दुखी होकर छोड़ा था मुंबई

बम्बई में एक बार सिद्ध हिंदी साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी प्रेमचंद की कहानी पर बनी फिल्म 'मजदूर' के पोस्टर देखकर उस फिल्म को देखने के इच्छुक हुए। पर तभी प्रेमचंद जी से भेंट हुई। वे बोले 'यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो यह फिल्म कभी नहीं देखना। यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं ।..

सावरकर के विरुद्ध कट्टरवादी तत्वों ने षड्यंत्र रच उन्हें सांप्रदायिक बताया

वीर सावरकर के विरुद्ध सुनियोजित तरीके से षड्यंत्र कर उनके विचारों को सांप्रदायिक बताया गया जबकि ऐसा कुछ नहीं था। वीर सावरकर के राष्ट्रवाद को समझने के लिए उन्हें पढ़ना और समझना बहुत जरूरी है।..

राष्ट्रीय चेतना के सचेत प्रहरी : मैथिलीशरण गुप्त

वैचारिकता और निष्ठाओं में राष्ट्र को लेकर घटती चिंता और क्षुद्र राजनीतिक और निजी स्वार्थों के धुएं की धुंध से सोच कुंठित हो रही हो, ऐसे माहौल में सवाल यह उठता है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को किस तरह से याद करें? ..

पुण्यतिथि पर विशेष: स्वतन्त्रता आंदोलन में उग्रवाद के प्रणेता लोकमान्य तिलक

भारतीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन में कांग्रेस में स्पष्टतः दो गुट बन गये थे। एक नरम तो दूसरा गरम दल कहलाता था। पहले के नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे, तो दूसरे के लोकमान्य तिलक। इतिहास में आगे चलकर लाल-बाल-पाल नामक जो तिकड़ी प्रसिद्ध हुई, उसके बाल यही बाल गंगाधर तिलक थे, जो आगे चलकर लोकमान्य तिलक के नाम से प्रसिद्ध हुए।महात्मा गांधी के आंदोलन को सफल बनाने में सबसे बड़ा योगदान तिलक का ही था असहयोग आंदोलन के लिए जब एक साल के भीतर एक करोड़ रुपये जमा करने का लक्षय रखा गया तो गांधी जी ने तिलक की पुण्यतिथि पर कोष ..

'जिहाद' मुंशी प्रेमचंद की कहानी - खजानचंद ने मृत्यु को स्वीकार किया पर नहीं बना मुसलमान

मुंशी प्रेमचंद बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफिला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था। मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाती थी। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला ..

स्वामी विवेकानंद से प्रभावित मुंशी प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद स्वामी विवेकानंद से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने उर्दू में स्वामी विवेकानंद जी के बारे में 'स्वामी विवेकानंद: एक जीवन झांकी' नाम से लेख लिखा था, जो 'जमाना' मासिक के मई, 1908 के अंक में प्रकाशित हुआ था। बाद में उन्होंने स्वयं इसका हिन्दी अनुवाद कियामुंशी प्रेमचंद स्वामी विवेकानन्द का जीवन-वृत्तान्त बहुत संक्षिप्त है। दु:ख है कि भरी जवानी में ही गोलोकवासी हो गए और आपके महान व्यक्तित्व से देश और जाति को जितना लाभ पहुंच सकता था, न पहुंच सका। 1863 में स्वामी जी एक प्रतिष्ठित कायस्थ कुल ..

समाधि लगाकर बैठना उतना कठिन नहीं जितना कर्तव्य की वेदी पर बलिदान होना:मुुंशी प्रेमचंद

कल्याण, कृष्णांक अगस्त 1931 के मुंशी प्रेमचंद के लेख में संस्कृति के स्मरण बिंदु संकेतक की तरह जगह—जगह खड़े दिखते हैं। वह लिखते हैं कि जब तक कर्मयोग के तत्व को नहीं समझा जाएगा, तब तक संसार स्वार्थ के पंजे में जकड़ा रहेगा, लेकिन यदि इसके गूढ़ रहस्य को समझ लिया गया तो मोक्ष का रास्ता पा लिया..

गांधी जी की तरह प्रेमचंद्र ने भी लड़ी हैं लड़ाइयां

मुंशी प्रेमचंद और महात्मा गांधी दोनों ने ही लड़ाइयां लड़ीं, जहां गांधी जी सत्याग्रह के माध्यम से लड़े वहीं मुंशी प्रेमचंद भी समाजिक कुरीतियों के खिलाफ पहले से ही अपनी लेखनी से लड़ाई लड़ रहे थे। गांधी जी की क्रियात्मकता झलक हमें प्रेमचंद्र के प्रारम्भिक साहित्य में ही मिलने लगती है फिर चाहे बात देशप्रेम की हो या फिर सामाजिक कुरीतियों की।..

ईश्वरचंद्र विद्यासागर की पुण्य तिथि पर नमन

भारत में 19वीं शताब्दी में जिन लोगों ने सामाजिक परिवर्त्तन में बड़ी भूमिका निभाई, उनमें श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उनका जन्म 16 सितम्बर, 1820 को ग्राम वीरसिंह (जिला मेदिनीपुर, बंगाल) में हुआ था। धार्मिक परिवार होने के कारण इन्हें अच्छे संस्कार मिले। आज उन्हीं की पुण्य तिथि है।09 वर्ष की अवस्था में उन्होंने संस्कृत विद्यालय में प्रवेश लिया अगले 13 वर्ष तक वहीं रहे। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए अपना खर्च निकालने के लिए वह दूसरों के घरों में भोजन बनाया करते ..

सावरकर ने बंटवारे पर पहले ही चेताया था कांग्रेसी नेताओं ने नहीं सुनी

1940 में जब सिंध को मुंबई प्रांत से अलग कर दिया गया, तब सावरकर ही थे जिन्होंने चेताया था कि पाकिस्तान की नींव पड़ गई है, अब बंटवारा रोकना कठिन होगा। गांधीजी और नेहरू ने तो कहा था कि पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा।पर सात वर्ष बाद वे गलत साबित हुए और सावरकर सही ...स्वातंत्र्यवीर सावरकर वह राष्ट्रवादी विभूति थे जिन्होंने आजादी के बाद के कालखण्ड में समाज को एकजुट रखने में भरपूर योगदान दिया। आज आवश्यकता है उनके दीर्घकालिक और तार्किक राष्ट्रवाद के प्रकाश में भीमा-कोरेगांव, जातिवादी दंगों और पत्थर गढ़ी जैसी घटनाओं ..

अधीश जी एक प्रेरणा पुंज, हंसकर मृत्यु को स्वीकार करने वाले

किसी ने लिखा है - तेरे मन कुछ और है, दाता के कुछ और। संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री अधीश जी के साथ भी ऐसा ही हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए उन्होंने जीवन अर्पण किया। पर विधाता ने 52 वर्ष की अल्पायु में ही उन्हें अपने पास बुला लिया।..

आध्यात्मिकता के शिखर पुरुष 'कबीर'

चरखे पर सूत कातते कर्मयोगी कबीर के अंतस की यह वाणी वाकई अद्भुत है। पूर्ण निष्ठा से अपनी जाति के जुलाहा कर्म का पालन करते हुए उनके द्वारा व्याख्यायित मानव जीवन का तत्वज्ञान सुनकर बडे़ बड़े धर्म मर्मज्ञ व दार्शनिक उनके आत्मज्ञान के समक्ष नत मस्तक हो जाते हैं। ..

सिनौली में उभरी सरस्वती कालीन सभ्यता, वामपंथी झूठ की खुली पोल

विश्व के पुरातन व गौरवशाली भारतीय इतिहास को ब्रिटिश इतिहासकारों ने विकृत करने का चरम प्रयास किया, लेकिन उनका विकृत सिद्धांत अब दम तोड़ चुका है। उत्तर प्रदेश के बागपत के सिनौली में अभी तक हुए उत्खनन से साबित हुआ है कि सरस्वती नदी के किनारे विकसित हुई सभ्यता ही वैदिक सभ्यता थी, जिसे वामपंथियों ने सिंधु घाटी सभ्यता नाम दिया था। खुदाई में निकले सारे पुरावशेषों ने हमारे वेदों में लिखी बातों को सिद्ध कर दिया है कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे और विश्व की सबसे प्राचीन और विकसित सभ्यता भारत की ’वैदिक सभ्यता’ ..

मेवाड़ के लिए भामाशाह के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता

मेवाड़ के लिए धन जुटाने हेतु भामाशाह ने युक्ति निकाली और मालवा के मुगल इलाकों में धावे मारने निकल पड़े। उन्होंने रामपुरा, भाणपुरा, मंदसौर, मालपुरा आदि शाही थानों पर धावे मार कर वहां के जागीरदारों शाही थानेदारों से दंड वसूल कर भारी धनराशि एकत्र की। धनराशि लेकर वे चूलियां ग्राम में महाराणा की सेवा में उपस्थित हुए। स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाने हेतु उन्होंने 25 लाख रुपए की धनराशि, 20,000 अशर्फियां और अन्य युद्ध सामग्री महाराणा को भेंट की।..

कूटनीति और राजनीति में निपुण थे महाराणा

प्रताप ने कभी भी अपनी सुरक्षा नीति, अपने मनोभाव तथा विचार दूत पर जाहिर नहीं होने दिए भले ही उनके सजातीय क्यों न आए हों। प्रताप एक व्यवहारिक कूटनीतिज्ञ थे तथा प्राचीन राजनीतिक सिद्धांतों से परिचित थे। अकबर ने दूसरे दूतमंडल के रूप में कुंवर मानसिंह को भेजा। यहां अकबर ने सजातीय को दूत के रूप में भेज कर दोहरा कूटनीतिक दावपेच चला था।..

महाराणा की मृत्यु पर रोया था अकबर कहा था राणा जीत तेरी ही हुई

महाराणा प्रताप की मृत्यु की सूचना पाकर अकबर की आंखों में भी आंसू आ गए थे। वह स्वयं उनकी बहादुरी की प्रशंसा करता था। एक गोभक्षी बघेरे को स्वयं महाराणा प्रताप ने धनुष द्वारा तीर चलाकर मारा। तीर चलाते समय प्रताप की आंतों में खिंचाव आया, जिसके कारण वे अस्वस्थ हो गए। दो मास की अस्वस्थता के पश्चात उन्होंने देह त्यागकर गोलोकवास किया।..

शौर्य के प्रतीक थे महाराणा, हिंदुओं का सिरमौर थे

महाराणा, कुंभा के समय (1433-1468) चित्तौड़ भारत की राजधानी के रूप में विकसित हो गया था। यह युग कला शिल्प, स्थापत्य, साहित्य, निर्माण से परिपूर्ण था। मेवाड़ राज्य की सीमाओं का विस्तार इसी कालखंड में हुआ। महाराणा सांगा के समय (1509-1528) देशभर के हिन्दू राजाओं ने अपने नायक के रूप में मेवाड़ का नेतृत्व स्वीकार कर लिया था। खानवा के युद्ध में शामिल राज्य इसके प्रमाण हैं।..

हल्दीघाटी युद्ध: मुगलों के माथे पर लिखी थी इस हार की कहानी

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महाराणा की महागाथा

पढ़े-लिखे लोग भी अक्सर जिस एक पहेली पर गच्चा खा जाते हैं, वह भारतीय इतिहास से जुड़ा एक छोटा-सा सवाल है। हम कितने वर्ष गुलाम रहे? इस प्रश्न का उत्तर तलाशते हुए ज्यादातर लोग 1947 की ताजा यादों तक ही लौट पाते हैं जबकि तथ्यत: यह बात गलत है। वास्तव में यह 1192 ई. में तराइन का दूसरा युद्ध था जिसने पहली बार भारतीयों पर किसी विदेशी वंश का 'शासन' थोपा।..