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कांग्रेस के मर्म पर बागियों की चोट

WebdeskMar 12, 2021, 12:00 AM IST

कांग्रेस के मर्म पर बागियों की चोट

पांच राज्यों में चुनाव से पूर्व कांग्रेस में चौतरफा घमासान मचा है। अलग-अलग राज्य में अलग-अलग मुद्दों पर असंतोष है और अंदरूनी कलह के कारण पुडुचेरी में पार्टी की सरकार भी गिर चुकी है। इधर, पार्टी के बागी नेताओं के गुट जी-23 ने जम्मू में बैठक के बाद जो कहा, उससे पार्टी में भूचाल आ गया है पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गयी है। पार्टी की कार्यशैली और इसमें सुधार के लिए आवाज उठाने वाला वरिष्ठ नेताओं का गुट जी-23 आजकल बखूबी सक्रिय है। 27 फरवरी को इस गुट के नेताओं ने जम्मू में बैठक की। इस बैठक ने पार्टी के मर्म पर चोट की है। इसमें पार्टी नेताओं ने जो कहा, उसने विस्फोटक का काम किया है। हालांकि पार्टी आलाकमान ने अभी तक किसी पर कोई कार्रवाई नहीं की है, पर कुछ राज्यों से प्रतिक्रियाएं सुनाई पड़ने लगी हैं। जम्मू-कश्मीर में ही इस बैठक पर त्वरित प्रतिक्रिया हुई और गुलाम नबी आजाद समर्थक और विरोधियों, दोनों ने अपने-अपने तरीके से सड़कों पर प्रदर्शन भी किए। जम्मू में पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं ने आजाद का पुतला भी जलाया। जी-23 की बैठक से पहले राहुल गांधी दक्षिण भारत में सक्रिय थे। केरल में उन्होंने उत्तर व दक्षिण भारत की राजनीति पर जो विभाजनकारी टिप्पणी की, उससे भी उनकी व पार्टी की फजीहत हो रही है। पार्टी के नेता ही इसकी आलोचना कर रहे हैं। वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने राहुल का बचाव करने की बजाय उन्हें नसीहतें दी हैं। पार्टी हाईकमान ने प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर को दिल्ली बुलाकर उनसे पूछताछ की है। गांधी परिवार के विश्वस्त मीर जी-23 की सभा में नहीं थे। उन्होंने गुलाम नबी आजाद से दूरी बनाकर रखी है, पर उनका कहना है कि आजाद के बयान से राज्य में पार्टी कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास डोल गया है। उधर, गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव में हार के बाद पार्टी में मतभेद उभरे हैं। पाटीदार बहुल इलाकों में मिली हार के बाद प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल की आलोचना हो रही है। करीब दो साल पहले कांग्रेस में शामिल हुए इस युवा पाटीदार नेता ने चुनाव परिणामों पर निराशा जताई है। उन्होंने एक ट्वीट में कहा कि पार्टी उनका सही से प्रयोग नहीं कर पा रही है। पार्टी के भीतर अपने ही नेता टांग खींचने में जुटे हैं। अहमद पटेल होते, तो ऐसा नहीं होता। जी-23 की बगावत बागी नेताओं के इसी जी-23 गुट ने पिछले साल अगस्त में सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठाया था और इसमें सुधार की मांग की थी। चिट्ठी के मीडिया में लीक होने के बाद 24 अगस्त को हुई पार्टी कार्यसमिति की बैठक में इन नेताओं की लानत-मलामत ही होती रही और पार्टी की रीति-नीति पर चर्चा नहीं हो सकी। तबसे अब तक स्थिति जस की तस है। जी-23 गुट में शामिल नेता पार्टी में हर स्तर पर चुनाव की मांग कर रहे हैं। खासतौर से कार्यसमिति और केंद्रीय समिति के सदस्यों का चुनाव। बहरहाल, जी-23 ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में एक और कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है। ऐसे ही कार्यक्रम पंजाब, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में भी हो सकते हैं। कहना मुश्किल है कि यह बगावत किस हद तक जाएगी, पर पांच राज्यों के चुनाव को देखते हुए यह समय नाजुक है। ऐसा नहीं है कि बागी गुट एकजुट है। इसमें भी आपसी फूट दिखाई पड़ रही है। जी-23 में शामिल कुछ वरिष्ठ नेता आजाद खेमे से दूरी बना रहे हैं। जम्मू में जी-23 समूह की बैठक के बाद चार बड़े नेताओं ने गुलाम नबी आजाद के बर्ताव से असहमति जताई है। राज्यसभा के पूर्व उपाध्यक्ष पीजे कुरियन ने कहा है, ‘‘मैं आज भी उस पत्र की भावना का समर्थक हूं, पर लक्ष्मण रेखा को लांघना उचित नहीं है।’’ वहीं, संदीप दीक्षित ने तो इस गुट के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लगाते हुए कहा है, ‘‘ऐसा कोई समूह नहीं है। अलबत्ता, पार्टी अध्यक्ष को लिखे पत्र पर 23 नेताओं ने दस्तखत जरूर किए थे, पर मुझे नहीं लगता कि यह कोई समूह है।’’ उधर, मध्य प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जय सिंह का कहना है, ‘‘हमने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र से जुड़े सवाल उठाए थे, पर मुझे जम्मू की बैठक की जानकारी नहीं थी।’’ पूर्व केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली ने भी खुद को जम्मू की बैठक से अलग कर लिया है। उन्होंने पार्टी के आंतरिक मतभेदों के बाहर आने पर चिंता तो जताई, पर राहुल को पुन: अध्यक्ष बनाने का समर्थन भी किया। दूसरी ओर, आनंद शर्मा ने पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के साथ पार्टी के गठबंधन को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने ट्वीट किया कि आईएसएफ जैसी पार्टी के साथ गठबंधन करके कांग्रेस गांधी-नेहरू के पंथनिरपेक्ष विचारों से दूर जा रही है, जो पार्टी की आत्मा है। इन मसलों पर कांग्रेस कार्यसमिति की अनुमति होनी चाहिए। ऐसे मौके पर पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष की उपस्थिति दर्दनाक और शर्मनाक है। आनंद शर्मा तो गांधी परिवार के विश्वस्त थे। फिर वे क्यों नाराज हैं? आनंद शर्मा के नजदीकी लोगों का कहना है कि कुछ समय से यह नजदीकी खत्म हो गई है। मल्लिकार्जुन खड़गे को राज्यसभा में नेता और उन्हें उपनेता बनाया गया है। उन्हें खड़गे के अधीन रहना होगा। खड़गे को राहुल गांधी का करीबी माना जाता है। वे सोनिया गांधी के भी आनंद शर्मा के मुकाबले ज्यादा करीबी हैं। सोनिया और राहुल गांधी के करीबियों के टकराव के कारण ही बागी गुट जी-23 का जन्म हुआ है। पराजय से पनपा असंतोष कांग्रेस में विद्रोह की यह प्रवृत्ति नई नहीं है। 2014 के आम चुनाव में हार के बाद भी कांग्रेस के भीतर विद्रोह के स्वर उठे थे। मिलिंद देवड़ा, प्रिया दत्त, सत्यव्रत चतुर्वेदी जैसे नेताओं से इसकी शुरुआत हुई थी। हालांकि इन नेताओं के विरोध का तरीका सौम्य था। शशि थरूर, दिग्विजय सिंह से लेकर पी. चिदंबरम जैसे वरिष्ठ नेताओं ने तो ‘बड़ी सर्जरी’ की बात की थी। लेकिन केरल के वरिष्ठ नेता मुस्तफा और राजस्थान के विधायक भंवरलाल शर्मा ने उसी बात को कड़वे ढंग से कहा था। पार्टी की केरल शाखा ने तो केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ प्रस्ताव पास करने की तैयारी भी कर ली थी, जिसे अंतिम क्षण में रोका गया। अरुणाचल प्रदेश व असम में भी बड़े स्तर पर बगावत हुई, पर बागी नेताओं में भी एकता नहीं है। संवादहीनता या विचारधारा? असंतोष केवल जी-23 की गतिविधियों तक सीमित नहीं है। अलग-अलग राज्यों में असंतोष के अलग-अलग कारण हैं। मसलन, केरल के पलक्कड़ में जिला कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ए.वी. गोपीनाथ का कहना है कि उन्हें हाशिए पर डाला जा रहा है। केरल में कांग्रेस के भीतर कई प्रकार के अंतर्विरोध हैं। केरल कांग्रेस (जोसफ) और कांग्रेस के बीच मतभेद भी उभर रहे हैं। ऐसे ही अंतर्विरोध बंगाल में भी हैं, जहां फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दिकी की पार्टी आईएसएफ के साथ गठबंधन को लेकर मतभेद हैं। खासतौर से इसलिए कि पीरजादा जिन सीटों की मांग कर रहे हैं, उनसे कांग्रेस के कुछ नेताओं का भविष्य जुड़ा है। उधर, पुडुचेरी में पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष के कारण चुनाव के ठीक पहले सरकार गिर चुकी है। दरअसल, पार्टी में उपजे असंतोष के पीछे एक बड़ा कारण संवादहीनता से जुड़ा है। या तो कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पा रही हैं या केंद्रीय नेतृत्व तक उनकी बात नहीं पहुंच रही है। असंतोष का दूसरा कारण है- विचारधारा। पार्टी के वरिष्ठ नेता ए.के. एंटनी ने 2014 में कहा था कि पार्टी की ‘हिन्दू-विरोधी’ छवि बनना ठीक नहीं। हालांकि जी-23 के कुछ नेता कहते हैं, ‘‘हम हिन्दू-विरोधी नहीं हैं।’’ लेकिन जम्मू में समूह की हुई बैठक में नेताओं की भगवा पगड़ियों को लेकर सवाल उठे हैं। सबसे ज्यादा चुभने वाली बात यह है कि इस बैठक में जो पोस्टर लगाया गया, उसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की तस्वीर नदारद थी। 2014 में एंटनी के नेतृत्व में गठित चार सदस्यीय समिति ने स्थानीय व राज्य स्तर पर पड़ताल की थी। इससे पूर्व एंटनी चुनाव में मिली हार पर कम से कम दो रिपोर्ट तैयार कर चुके थे। उनकी सिफारिशों में दो बातें महत्वपूर्ण थीं। पहला, पार्टी में भीतरी स्तर पर चुनाव करा कर संगठन को मजबूत किया जाए, दूसरा विधानसभा तथा लोकसभा के लिए कम से कम 3 से 6 माह पहले प्रत्याशियों के नाम तय किए जाएं। राहुल गांधी ने भी कहा था, ‘‘मैं पार्टी में संरचनात्मक बदलाव चाहता हूं।’’ लेकिन यह बदलाव चेहरों में हुआ, व्यवस्था में नहीं। नेतृत्व का सवाल महत्वपूर्ण बात यह है कि 11 अगस्त, 2019 से पार्टी का कोई नियमित अध्यक्ष नहीं है। मई 2019 में चुनाव परिणाम आने के बाद 3 जुलाई को राहुल गांधी ने पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष पद छोड़ने की घोषणा की थी। 11 अगस्त को कार्यसमिति ने सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष चुना। राहुल ने 2019 में जो खुला पत्र लिखा था, उसे पार्टी ने करीब एक माह के इंतजार के बाद स्वीकार किया था। राहुल ने लिखा था, ‘‘कांग्रेस प्रमुख के तौर पर 2019 के लोकसभा चुनाव में हार की जिÞम्मेदारी मेरी है। भविष्य में पार्टी के विस्तार के लिए जवाबदेही काफी अहम है। यही कारण है कि मैंने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया है। पार्टी को फिर से बनाने के लिए कड़े फैसले की जरूरत है। 2019 में हार के लिए कई लोगों की जवाबदेही तय करने की जरूरत है। यह अन्याय होगा कि मैं दूसरों की जवाबदेही तय करूं और अपनी जवाबदेही की उपेक्षा करूं।’’ बावजूद इसके पार्टी की ओर से 2019 की हार की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। यही नहीं, राहुल ने सुझाव भी दिया था कि गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को पार्टी का अध्यक्ष बनाना चाहिए, पर डेढ़ साल बाद भी नए अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो सका है। पिछले साल के अंत में चुनाव प्रक्रिया शुरू होने की सुगबुगाहट हुई थी, लेकिन गत 22 जनवरी को कार्यसमिति की बैठक में चुनाव जून तक के लिए टाल दिए गए। कहा गया कि पांच राज्यों में चुनाव के बाद यह काम होगा। दरअसल पार्टी में दो तरह की बातें पूरे मामले को जटिल बना रही हैं। औपचारिक रूप से न सही, पर व्यावहारिक रूप से पार्टी का नेतृत्व राहुल के पास है। फिर भी उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है कि वे अध्यक्ष पद लेंगे या नहीं। आंतरिक चुनाव नहीं दिसंबर 2010 में बुराड़ी में आयोजित 83वें अधिवेशन में कांग्रेस ने अपने संविधान में संशोधन किया था। इसमें हर पांच साल में पार्टी में चुनाव कराना तय हुआ था। इससे पहले हर तीन साल पर चुनाव कराने की व्यवस्था थी। अध्यक्ष का कार्यकाल भी तीन साल से बढ़ाकर पांच साल किया गया था। इस लिहाज से पार्टी में 2015 में चुनाव होना था, जो 2017 में हुआ। उसी साल 16 दिसंबर को राहुल ने औपचारिक रूप से पार्टी अध्यक्ष का पद संभाला। अब यदि इस साल जून में नए अध्यक्ष की नियुक्ति हो भी जाएगी, तो उसका कार्यकाल करीब डेढ़ साल का होगा, क्योंकि 2022 में पुन: चुनाव होंगे। पार्टी संविधान के अनुसार, चुनाव प्राथमिक यानी बूथ स्तर से लेकर अध्यक्ष के पद तक होना था, पर अब तक इस पर अमल नहीं हुआ। अधिकतर नियुक्तियां सहमति से की गई हैं। अध्यक्ष पद के लिए राहुल के सामने कोई उतरा ही नहीं। हालांकि महासमिति के दस सदस्य अध्यक्ष पद के लिए किसी के भी नाम प्रस्तावित कर सकते हैं। पार्टी का सबसे महत्वपूर्ण निकाय कार्यसमिति है, जो पूरी तरह मनोनीत है। बीते करीब 40 वर्षों में केवल दो ही बार पार्टी में चुनाव हुए हैं। नवीनतम चुनाव 2000 में हुआ था, जब अध्यक्ष पद के लिए सोनिया गांधी और जितेंद्र प्रसाद आमने-सामने थे। पर 7,448 के मुकाबले प्रसाद को मात्र 94 वोट मिले थे। वहीं, 1997 में सीताराम केसरी को 6,224 वोट मिले थे, जबकि शरद पवार 882 व राजेश पायलट को 354 वोट मिले थे। इसी तरह, कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव भी दो बार ही हुए हैं- 1992 में तिरुपति में और 1997 में कोलकाता में। कांग्रेस में ज्यादातर असंतोष संवादहीनता, रसूख में कमी या व्यक्तिगत टकरावों के कारण हैं। दूसरे, सोनिया गांधी के दौर की कांग्रेस का रूपांतरण हो रहा है। पुराने नेता हाशिए पर जा रहे हैं या वे नए नेताओं के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र की मशीनरी जंग खा चुकी है। बहरहाल, लगता है कि जी-23 के नेता जून में होने वाले पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में भी अपना प्रत्याशी खड़ा करेंगे। वे जानते हैं कि यदि राहुल गांधी खड़े हुए तो उनकी जीत तय है, फिर भी जी-23 अपना प्रत्याशी खड़ा करेगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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