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कांग्रेस को न उत्तर से मतलब न दक्षिण से, चाहिए तो सिर्फ सत्ता

WebdeskMar 04, 2021, 12:28 PM IST

कांग्रेस को न उत्तर से मतलब न दक्षिण से, चाहिए तो सिर्फ सत्ता

यह गांधी परिवार की शैली है. इन्हें उत्तर में जरा सी आंच महसूस होती है, ये दक्षिण में जा छिपते हैं. और जैसे ही उत्तर में फिर पांव जमते नजर आते हैं, तो दक्षिण को ठेंगा दिखा देते हैं. इंदिरा और सोनिया गांधी ने भी यह किया और अब राहुल गांधी भी यही कर रहे हैं असम में चुनाव है, पश्चिम बंगाल में भी चुनाव है, लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी दक्षिण भारत में डांस कर रहे हैं, मछलियां पकड़ रहे हैं. इन्हीं राहुल गांधी के उद्गार थे कि दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत के लोगों की राजनीतिक समझ कम है. यह वही महानुभाव हैं, जो उत्तर भारत की अमेठी सीठ से लगातार 15 साल सांसद रहने का लुत्फ उठा चुके हैं. राहुल गांधी के बयान पर चौंकिए मत. ये इस परिवार की शैली है. इन्हें उत्तर में जरा सी आंच महसूस होती है, ये दक्षिण में जा छिपते हैं. और जैसे ही उत्तर में फिर पांव जमते नजर आते हैं, तो दक्षिण को ठेंगा दिखा देते हैं. इंदिरा गांधी ने ये किया, सोनिया गांधी ने भी किया और अब अगर राहुल गांधी ये कर रहे हैं, तो ताज्जुब कैसा,, राहुल गांधी अपनी नई संसदीय सीट वायनाड के दौरे पर थे. 23 फरवरी को राहुल ने तिरुवनंतपुरम में एक सभा में कहा था- 15 साल मैं उत्तर भारत से सांसद था. मुझे वहां दूसरी तरह की राजनीति का सामना करना पड़ता था. केरल आना मेरे लिए ताजगी भरा रहा, क्योंकि यहां के लोग मुद्दों की राजनीति करते हैं. सिर्फ सतही नहीं, बल्कि मुद्दों की तह तक जाते हैं. राहुल गांधी की बात का जरा विश्लेषण करते हैं. अमेठी (जहां भाजपा नेता स्मृति ईरानी ने उन्हें ऐतिहासिक पटखनी दी) के मुकाबले वायनाड में उन्हें ताजगी महसूस होती है. उनकी बात का साफ इशारा था कि उत्तर भारत के लोग सतही मुद्दों पर राजनीति करते हैं. हालांकि राहुल गांधी की माता और कांग्रेस अध्यक्ष रायबरेली से सांसद हैं. उन्होंने राहुल गांधी का बयान आने के बाद उत्तर भारत की बकौल राहुल बासी और सतही राजनीति पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. राहुल ने ये भी स्पष्ट नहीं किया कि ताजगी से भरी मुद्दों की राजनीति के लिए उनकी माता सोनिया गांधी भी क्या दक्षिण भारत आने वाली हैं ? राहुल गांधी को जवाब देते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सही नब्ज पकड़ी. उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता को लोगों को बांटने की आदत है. उन्होंने ट्वीट में लिखा- कुछ दिन पहले वह पूर्वी भारत में थे, तो पश्चिम भारत के खिलाफ जहर उगल रहे थे. आज दक्षिण में हैं, तो उत्तर के खिलाफ जहर उगल रहे हैं. अब बांटों और राज करो की राजनीति काम नहीं करेगी. लोगों ने इस राजनीति को खारिज कर दिया है. नड्डा अपने ट्वीट में इस बात की ओर इशारा कर रहे थे कि राहुल गांधी में असम में गुजरात और गुजरातियों के लिए बहुत अपमानजनक टिप्पणी की थी. केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी ट्वीट किया- एहसान फरामोश! इनके बारे तो दुनिया कहती है थोथा चना बाजे घना. खुद कांग्रेस के अंदर तूफान मचा है. कांग्रेस में राहुल की विदूषक राजनीति के विरोध में झंडा बुलंद किए जी-23 समूह के नेता आनंद शर्मा ने कहा कि कांग्रेस के पास उत्तर भारत के महान नेता रहे हैं. संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, कैप्टन सतीश शर्मा से लेकर राहुल गांधी तक कांग्रेस के नेताओं को चुनने के लिए पार्टी अमेठी के लोगों की आभारी है. राहुल गांधी ने अपने किसी अनुभव के आधार पर टिप्पणी की है, मुझे किसी क्षेत्र के अपमान की बात मुझे नहीं दिखती. राहुल गांधी ही स्पष्टीकरण दे सकते हैं. कपिल सिब्बल ने भी राहुल ही जानें, वह क्या कह रहे हैं के अंदाज में अपना विरोध व्यक्त किया. वैसे ये काम भी राहुल गांधी ही कर सकते हैं कि उन्होंने बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को उत्तर प्रदेश में झोंक रखा है और इस तरह के बयानों से उनका ही तंबू उखाड़ने में लगे हैं. जब इंदिरा पहुंची थीं चिकमंगलूर देश की राजनीति में वर्ष 1978 के उप चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हैं. इमरजेंसी के तत्काल बाद का दौर था. इमरजेंसी की ज्यादतियों के खिलाफ बहुत गुस्सा था. उत्तर भारत से कांग्रेस का लगभग सफाया हो चुका था. इंदिरा के खिलाफफ जो लहर थी, उसमें एक सुरक्षित सीट तलाशी जा रही थी. और आखिरकार ये तलाश कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट पर जाकर समाप्त हुई. चंद्र गौडा यहां से सांसद थे. उनका इस्तीफा दिलाकर ये सीट खाली कराई गई. यहां उनका मुकाबला कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल से हुआ. पूरे चुनाव के दौरान इंदिरा ने दक्षिण भारतीयों की शान में कसीदे पढ़े. बताया कि कैसे वे कार्य संस्कृति को समझते हैं. चुनाव में जिस तरह से उत्तर भारत से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ था, उसका गुस्सा इंदिरा गांधी के बयानों में साफ नजर आता था. बहरहाल इंदिरा गांधी चिकमंगलूर की प्रतिष्ठित लड़ाई जीत गईं. 77 हजार वोटों से जीत मिली, लेकिन ये उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं था. फिर भी चिकमंगलूर ने उन्हें राजनीतिक जीवनदान दिया. लेकिन इंदिरा गांधी चिकमंगलूर या दक्षिण भारत के साथ वफा न कर सकीं. चुनाव के दौरान किए अपने वादों को भूल गईं. और राजनीतिक पुनर्वास होने के बाद कभी चिकमंगलूर या दक्षिण भारत की ओर नहीं लौटीं. सोनिया चली गई थीं बेल्लारी बात 1999 के आम चुनाव की है. देश में अटल बिहारी वाजपेयी के नाम की हवा बह रही थी. कारगिल युद्ध में जिस तरीके से पाकिस्तान को पटखनी दी गई, वाजपेयी राष्ट्र के नायक के रूप में उभरे थे. आर्थिक उदारीकरण और लोक कल्याणकारी योजनाओं के कारण भी उनकी नीतियों को जनता के बीच खासा समर्थन मिल रहा था. इस सबसे अलग एक बात और थी. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक बार फिर केंद्र को अस्थिर करने के लिए दक्षिण भारत कार्ड का इस्तेमाल किया था. वाजपेयी सरकार के खिलाफ सोनिया गांधी ने जाल बुना. और अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता उसमें फंस गईं. सोनिया गांधी ने एक चाय पार्टी रखी और उस पार्टी से वाजपेयी सरकार को गिराने की मुहिम शुरू हुई. अन्नाद्रमुक ने एनडीए सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. वाजपेयी ने भी जयललिता की सनक भरी मांगों के सामने घुटने टेकने से इंकार कर दिया था. बहरहाल कांग्रेस के राजनीतिक दांव-पेंच के बीच लोकप्रिय वाजपेयी सरकार एक वोट से गिर गई. इस पूरे शक्ति परीक्षण में कांग्रेस की बेशर्म सत्ता लिप्सा भी सामने आई. दो दिन पहले ही उड़ीसा के मुख्यमंत्री की शपथ ले चुके गिरिधर गोमांग ने लोकसभा में अपने मताधिकार का अनैतिक प्रयोग किया. वाजपेयी कभी चुनाव में जाने से नहीं डरे. और इस बार तो मानो लहर थी. सोनिया गांधी को अमेठी से खतरा महसूस हुआ. उन्होंने दो जगह से चुनाव लड़ने का फैसला किया. अमेठी के साथ-साथ उनके लिए एक और सुरक्षित सीट की तलाश शुरू हुई. ये तलाश इंदिरा की तरह की कर्नाटक जाकर समाप्त हुई. सोनिया गांधी के लिए सीट चुनी गई बेल्लारी. भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने यहां सोनिया गांधी को कड़ी चुनौती दी. सोनिया गांधी बेल्लारी से भी जीतीं और अमेठी से भी. हालांकि चुनाव के दौरान सोनिया गांधी कर्नाटक और दक्षिण भारत को लेकर अपना प्रेम दर्शाती रहीं, लेकिन नतीजे आने के बाद उन्होंने जीती हुई बेल्लारी को छोड़कर अमेठी को प्रतिनिधित्व के लिए चुना. सतही सोच व मुद्दों वाली उत्तर भारत की सीट. इसके बाद आज तक सोनिया गांधी बेल्लारी नहीं लौटीं. जैसे उत्तर भारत में जगह मिलते ही इंदिरा गांधी का दक्षिण प्रेम हवा हो गया था, वैसे ही सोनिया गांधी ने भी दक्षिण भारत को ठेंगा दिखा दिया. न उत्तर न दक्षिण, बस सत्ता असल में मुद्दे, उत्तर, दक्षिण.... कांग्रेस का बस एक पैमाना है. सत्ता. जरा एक मामले पर गौर कीजिए. राजीव गांधी हत्याकांड की जांच करने वाले जस्टिस मिलाप चंद जैन आयोग ने साफ कहा था कि राजीव के हत्यारों को द्रमुक ने तमिलनाडु में पनाह दी। हत्याकांड के बाद कई ऐसे सबूत भी सामने आए, जिनके आधार पर कहा गया कि गांधी के हत्यारे संगठन लिट्टे का इस कांड से पहले तमिलनाडु की सरकार से कई गोपनीय संदेशों का आदान-प्रदान हुआ था. जिस सरकार का जिक्र जस्टिस जैन ने किया था वह द्रमुक की करुणानिधि सरकार थी. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद कांग्रेस ने केंद्र में सत्तारूढ़ संयुक्त मोर्चा की इंद्र कुमार गुजराल सरकार को गिरा दिया था. कांग्रेस की जिद थी कि द्रमुक को सरकार में जगह न मिले. तब कांग्रेस नेता द्रमुक को राजीव गांधी के हत्यारों का साथी करार दे रहे थे. वही द्रमुक संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार में 2004 से 2013 तक साथी रही. जैन कमीशन के अनुसार राजीव की हत्या में शामिल लोगो में से एक सिवरासन को द्रमुक की एक तत्कालीन सांसद ने अपने घर में पनाह दी थी. यह सांसद यूपीए सरकार में मंत्री भी रहीं. लेकिन अब कांग्रेस द्रमुक के साथ है. ठीक वैसे, जैसे कांग्रेस दिल्ली में चल रहे कथित किसान आंदोलन में शामिल उन खालिस्तानियों के साथ है, जो छाती ठोककर कहते हैं कि हमने इंदिरा को भी नहीं छोड़ा था.

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